भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः

अर्जुनका पातालमें प्रवेश और निवातकवचोंके साथ युद्धारम्भ

अर्जुन उवाच

ततोऽहं स्तूयमानस्तु तत्र तत्र महर्षिभिः ।
अपश्यमुदधिं भीममपां पतिमथाव्ययम् ॥ १ ॥
फेनवत्यः प्रकीर्णाश्च संहताश्च समुत्थिताः ।
ऊर्मयश्चात्र दृश्यन्ते वल्गन्त इव पर्वताः ॥ २ ॥
**अर्जुन बोले—**राजन्! तदनन्तर मार्गमें जहाँ-तहाँ महर्षियोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए मैंने जलके स्वामी समुद्रके पास पहुँचकर उसका निरीक्षण किया। वह देखनेमें अत्यन्त भयंकर था। उसका पानी कभी घटता-बढ़ता नहीं है। उसमें फेनसे मिली हुई पहाड़ोंके समान ऊँची-ऊँची लहरें उठकर नृत्य करती-सी दिखायी दे रही थीं। वे कभी इधर-उधर फैल जाती और कभी आपसमें टकरा जाती थीं ॥ १-२ ॥

नावः सहस्रशस्तत्र रत्नपूर्णाः समन्ततः ।
नभसीव विमानानि विचरन्त्यो विरेजिरे ।
तिमिङ्गिलाः कच्छपाश्च तथा तिमितिमङ्गिलाः ॥ ३ ॥
मकराश्चात्र दृश्यन्ते जले मग्ना इवाद्रयः ।
शङ्खानां च सहस्राणि मग्नान्यप्सु समन्ततः ॥ ४ ॥
वहाँ सब ओर रत्नोंसे भरी हुई हजारों नावें चल रही थीं, जो आकाशमें विचरते हुए विमानोंकी-सी शोभा पाती थीं तथा तिमिंगिल³, तिमितिमिंगिल³, कछुए और मगर पानीमें डूबे हुए पर्वतोंके समान दृष्टिगोचर होते थे। सहस्रों शंख सब ओर जलमें निमग्न थे ॥ ३-४ ॥

दृश्यन्ते स्म यथा रात्रौ तारास्तन्वभ्रसंवृताः ।
तथा सहस्रशस्तत्र रत्नसङ्घाः प्लवन्त्युत ॥ ५ ॥
जैसे रातमें झीने बादलोंके आवरणसे सहस्रों तारे चमकते दिखायी देते हैं, उसी प्रकार समुद्रके जलमें स्थित हजारों रत्नसमूह तैरते हुए-से प्रतीत हो रहे थे ॥ ५ ॥

वायुश्च घूर्णते भीमस्तदद्भुतमिवाभवत् ।
तमुदीक्ष्य महावेगं सर्वाम्भोनिधिमुत्तमम् ॥ ६ ॥
अपश्यं दानवाकीर्णं तद् दैत्यपुरमन्तिकात् ।
तत्रैव मातलिस्तूर्णं निपत्य पृथिवीतले ॥ ७ ॥