भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1150

‘इनके सिवा अन्य बहुत-से दैत्योंको भी इस रथके द्वारा पराजित किया है, जिनकी संख्या सहस्रों, लाखों और अरबोंतक पहुँच गयी है ।। ८२ ।। त्वमप्यनेन कौन्तेय निवातकवचान् रणे । विजेता युधि विक्रम्य पुरेव मघवा वशी ।। ८३ ।। ‘कुन्तीनन्दन! जैसे पूर्वकालमें सबको वशमें करनेवाले इन्द्रने असुरोंपर विजय पायी थी, उसी प्रकार तुम भी इस रथके द्वारा युद्धमें पराक्रम करके निवातकवचोंको परास्त करोगे ।। ८३ ।। अयं च शंखप्रवरो येन जेतासि दानवान् । अनेन विजिता लोकाः शक्त्रेणापि महात्मना ।। ८४ ।। ‘यह श्रेष्ठ शंख है, जिसे बजानेसे तुम्हें दानवोंपर विजय प्राप्त हो सकती है। महामना इन्द्रने भी इसके द्वारा सम्पूर्ण लोकोंपर विजय पायी है’ ।। ८४ ।। प्रदीयमानं देवैस्तं देवदत्तं जलोद्भवम् । प्रत्यगृह्णं जयायैनं स्तूयमानस्तदामरैः ।। ८५ ।। स शङ्खी कवची बाणी प्रगृहीतशरासनः । दानवालयमत्युग्रं प्रयातोऽस्मि युयुत्सया ।। ८६ ।। वही यह शंख है, जिसे मैंने अपनी विजयके लिये ग्रहण किया था। देवताओंने उसे दिया था, इसलिये इसका नाम देवदत्त है। शंख लेकर देवताओंके मुखसे अपनी स्तुति सुनता हुआ मैं कवच, बाण तथा धनुषसे सज्जित हो युद्धकी इच्छासे अत्यन्त भयंकर दानवोंके नगरकी ओर चल दिया ।। ८५-८६ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वण्यर्जुनवाक्ये अष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १६८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनवाक्यविषयक एक सौ अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १६८ ।।


१. निर्दोष प्राणीका वध हो जाय, तो उसे पुनः संजीवित करनेकी विद्याको प्रायश्चित्त कहते हैं। २. शत्रुके अस्त्रसे पराभवको प्राप्त हुए अपने अस्त्रको पुनः शक्तिशाली बनाना प्रतिघात कहलाता है।

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