भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1149

तानब्रुवं यथाभूतमिदं कर्तास्मि संयुगे । निवातकवचानां तु प्रस्थितं मां वधैषिणम् ॥ ७९ ॥ निबोधत महाभागाः शिवं चाशास्त मेऽनघाः । ततो वाग्भिः प्रशस्ताभिस्त्रिदशाः पृथिवीपते । तुष्टुवुर्मां प्रसन्नास्ते यथा देवं पुरंदरम् ॥ ८० ॥ तब मैंने उनसे सब बातें बताकर कहा—'मैं युद्धमें यही करने जा रहा हूँ। आपको यह ज्ञात होना चाहिये कि मैं निवातकवच नामक दानवोंके वधकी इच्छासे प्रस्थित हुआ हूँ। अतः निष्पाप एवं महाभाग देवताओ! आप मुझे ऐसा आशीर्वाद दें, जिससे मेरा मंगल हो।' राजन्! तब वे देवतालोग प्रसन्न हो देवराज इन्द्रकी भाँति श्रेष्ठ एवं मधुर वाणीद्वारा मेरी स्तुति करते हुए बोले— ॥ ७९-८० ॥ रथेनानेन मघवा जितवान् शम्बरं युधि । नमुचिं बलवृत्रौ च प्रह्लादनरकावपि ॥ ८१ ॥ इस रथके द्वारा इन्द्रने युद्धमें शम्बरासुरपर विजय पायी है। नमुचि, बल, वृत्र, प्रह्लाद और नरकासुरको परास्त किया है ॥ ८१ ॥ बहूनि च सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदान्यपि । रथेनानेन दैत्यानां जितवान् मघवा युधि ॥ ८२ ॥