महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1148, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें‘वीरवर! तीनों लोकोंमें ऐसा कोई कार्य नहीं है, जो तुम्हारे लिये असाध्य हो। निवातकवच नामक दानव मेरे शत्रु हैं।। ७१ ।। समुद्रकुक्षिमाश्रित्य दुर्गे प्रतिवसन्त्युत। तिस्रः कोट्यः समाख्यातास्तुल्यरूपबलप्रभाः ।। ७२ ।। तांस्तत्र जहि कौन्तेय गुर्वर्थस्ते भविष्यति। ततो मातलिसंयुक्तं मयूरसमरोमभिः ।। ७३ ।। हयैरुपेत्तं प्रादान्मे रथं दिव्यं महाप्रभम्। बबन्ध चैव मे मूर्ध्नि किरीटमिदमुत्तमम् ।। ७४ ।। ‘वे समुद्रके भीतर दुर्गम स्थानका आश्रय लेकर रहते हैं। उनकी संख्या तीन करोड़ बतायी जाती है और उन सभीके रूप, बल और तेज एक समान हैं। कुन्तीनन्दन! तुम उन दानवोंका संहार कर डालो। इतने से ही तुम्हारी गुरु-दक्षिणा पूरी हो जायगी।' ऐसा कहकर इन्द्रने मुझे एक अत्यन्त कान्तिमान् दिव्य रथ प्रदान किया, जिसे मातलि जोतकर लाये थे। उसमें मयूरोंके समान रोमवाले घोड़े जुते हुए थे। रथ आ जानेपर देवराजने यह उत्तम किरीट मेरे मस्तकपर बाँध दिया ।। ७२—७४ ।। स्वरूपसदृशं चैव प्रादादङ्गविभूषणम्। अभेद्यं कवचं चेदं स्पर्शरूपवदुत्तमम् ।। ७५ ।। फिर उन्होंने मेरे स्वरूपके अनुरूप प्रत्येक अंगमें आभूषण पहना दिये। इसके बाद यह अभेद्य उत्तम कवच धारण कराया, जिसका स्पर्श तथा रूप मनोहर है ।। अजरां ज्यामिमां चापि गाण्डीवे समयोजयत्। ततः प्रायामहं तेन स्यन्दनेन विराजता ।। ७६ ।। येनाजयद् देवपतिर्बलिं वैरोचनं पुरा। ततो देवाः सर्व एव तेन घोषेण बोधिताः ।। ७७ ।। मन्वाना देवराजं मां समाजग्मुर्विशाम्पते। दृष्ट्वा च मामपृच्छन्त किं करिष्यसि फाल्गुन ।। ७८ ।। तत्पश्चात् मेरे गाण्डीव धनुषमें उन्होंने यह अटूट प्रत्यञ्चा जोड़ दी। इस प्रकार युद्धकी सामग्रियोंसे सम्पन्न होकर उस तेजस्वी रथके द्वारा मैं संग्रामके लिये प्रस्थित हुआ, जिसपर आरूढ़ होकर पूर्वकालमें देवराजने विरोचनकुमार बलिको परास्त किया था। महाराज! तब उस रथकी घर्घरहाटसे सजग हो सब देवता मुझे देवराज समझकर मेरे पास आये और मुझे देखकर पूछने लगे—'अर्जुन! तुम क्या करनेकी तैयारीमें हो?' ।। ७६—७८ ।।