भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1147

‘अर्जुन! अब तुम्हें युद्धमें देवता भी परास्त नहीं कर सकते। फिर मर्त्यलोकमें रहनेवाले बेचारे असंयमी मनुष्योंकी तो बात ही क्या है? ।। ६३ ।।

अप्रमेयोऽप्रधृष्यश्च युद्धेष्वप्रतिमस्तथा ।
अजेयस्त्वं हि संग्रामे सर्वैरपि सुरासुरैः ।
अथाब्रवीत् पुनर्देवः सम्प्रहृष्टतनूरुहः ।। ६४ ।।
‘तुम युद्धमें अप्रमेय, अजेय और अनुपम हो। संग्रामभूमिमें सम्पूर्ण देवता और असुर भी तुम्हें पराजित नहीं कर सकते।’ इतना कहते-कहते देवराजके शरीरमें रोमांच हो आया। तदनन्तर वे फिर बोले— ।। ६४ ।।

अस्त्रयुद्धे समो वीर न ते कश्चिद् भविष्यति ।
अप्रमत्तः सदा दक्षः सत्यवादी जितेन्द्रियः ।। ६५ ।।
ब्रह्मण्यश्चास्त्रविच्चासि शूरश्चासि कुरूद्वह ।
अस्त्राणि समवाप्तानि त्वया दश च पञ्च च ।। ६६ ।।
पञ्चभिर्विधिभिः पार्थ विद्यते न त्वया समः ।
प्रयोगमुपसंहारमावृत्तिं च धनंजय ।। ६७ ।।
प्रायश्चित्तं च वेत्थ त्वं प्रतीघातं च सर्वशः ।
ततो गुर्वर्थकालोऽयं समुत्पन्नः परंतप ।। ६८ ।।
‘वीर! अस्त्र-युद्धमें तुम्हारा सामना कर सके, ऐसा कोई योद्धा नहीं होगा। कुरुश्रेष्ठ! तुम सर्वदा सावधान रहते हो, प्रत्येक कार्यमें कुशल हो, जितेन्द्रिय, सत्यवादी और ब्राह्मणभक्त हो; तुम्हें अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञान है और तुम अद्भुत शौर्यसे सम्पन्न हो। पार्थ! तुमने पाँच विधियोंसहित पंद्रह अस्त्र प्राप्त किये हैं, अतः इस भूतलपर तुम्हारे-जैसा शूर दूसरा कोई नहीं है। परंतप धनंजय! प्रयोग, उपसंहार, आवृत्ति, प्रायश्चित्त³ और प्रतिघात³—ये अस्त्रोंकी पाँच विधियाँ हैं; तुम इन सबका पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर चुके हो। अतः अब गुरुदक्षिणा देनेका समय आ गया है ।। ६५—६८ ।।

प्रतिजानीष्व तं कर्तुं ततो वेत्स्याम्यहं परम् ।
ततोऽहमब्रुवं राजन् देवराजमिदं वचः ।। ६९ ।।
विषह्यं यन्मया कर्तुं कृतमेव निबोध तत् ।
ततो मामब्रवीद् राजन् प्रहसन् बलवृत्रहा ।। ७० ।।
‘तुम उसे देनेकी प्रतिज्ञा करो, तब मैं अपने महान् कार्यको तुम्हें बताऊँगा।’ राजन्! यह सुनकर मैंने देवराजसे कहा—‘भगवन्! जो कुछ मैं कर सकता हूँ, उसे किया हुआ ही समझिये।’ नरेश्वर! तब बल और वृत्रासुरके शत्रु इन्द्रने मुझसे हँसते हुए कहा— ।। ६९-७० ।।

नाविषह्यं तवाद्यास्ति त्रिषु लोकेषु किंचन ।
निवातकवचा नाम दानवा मम शत्रवः ।। ७१ ।।