महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
‘अर्जुन! अब तुम्हें युद्धमें देवता भी परास्त नहीं कर सकते। फिर मर्त्यलोकमें रहनेवाले बेचारे असंयमी मनुष्योंकी तो बात ही क्या है? ।। ६३ ।।
अप्रमेयोऽप्रधृष्यश्च युद्धेष्वप्रतिमस्तथा ।
अजेयस्त्वं हि संग्रामे सर्वैरपि सुरासुरैः ।
अथाब्रवीत् पुनर्देवः सम्प्रहृष्टतनूरुहः ।। ६४ ।।
‘तुम युद्धमें अप्रमेय, अजेय और अनुपम हो। संग्रामभूमिमें सम्पूर्ण देवता और असुर भी तुम्हें पराजित नहीं कर सकते।’ इतना कहते-कहते देवराजके शरीरमें रोमांच हो आया। तदनन्तर वे फिर बोले— ।। ६४ ।।
अस्त्रयुद्धे समो वीर न ते कश्चिद् भविष्यति ।
अप्रमत्तः सदा दक्षः सत्यवादी जितेन्द्रियः ।। ६५ ।।
ब्रह्मण्यश्चास्त्रविच्चासि शूरश्चासि कुरूद्वह ।
अस्त्राणि समवाप्तानि त्वया दश च पञ्च च ।। ६६ ।।
पञ्चभिर्विधिभिः पार्थ विद्यते न त्वया समः ।
प्रयोगमुपसंहारमावृत्तिं च धनंजय ।। ६७ ।।
प्रायश्चित्तं च वेत्थ त्वं प्रतीघातं च सर्वशः ।
ततो गुर्वर्थकालोऽयं समुत्पन्नः परंतप ।। ६८ ।।
‘वीर! अस्त्र-युद्धमें तुम्हारा सामना कर सके, ऐसा कोई योद्धा नहीं होगा। कुरुश्रेष्ठ! तुम सर्वदा सावधान रहते हो, प्रत्येक कार्यमें कुशल हो, जितेन्द्रिय, सत्यवादी और ब्राह्मणभक्त हो; तुम्हें अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञान है और तुम अद्भुत शौर्यसे सम्पन्न हो। पार्थ! तुमने पाँच विधियोंसहित पंद्रह अस्त्र प्राप्त किये हैं, अतः इस भूतलपर तुम्हारे-जैसा शूर दूसरा कोई नहीं है। परंतप धनंजय! प्रयोग, उपसंहार, आवृत्ति, प्रायश्चित्त³ और प्रतिघात³—ये अस्त्रोंकी पाँच विधियाँ हैं; तुम इन सबका पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर चुके हो। अतः अब गुरुदक्षिणा देनेका समय आ गया है ।। ६५—६८ ।।
प्रतिजानीष्व तं कर्तुं ततो वेत्स्याम्यहं परम् ।
ततोऽहमब्रुवं राजन् देवराजमिदं वचः ।। ६९ ।।
विषह्यं यन्मया कर्तुं कृतमेव निबोध तत् ।
ततो मामब्रवीद् राजन् प्रहसन् बलवृत्रहा ।। ७० ।।
‘तुम उसे देनेकी प्रतिज्ञा करो, तब मैं अपने महान् कार्यको तुम्हें बताऊँगा।’ राजन्! यह सुनकर मैंने देवराजसे कहा—‘भगवन्! जो कुछ मैं कर सकता हूँ, उसे किया हुआ ही समझिये।’ नरेश्वर! तब बल और वृत्रासुरके शत्रु इन्द्रने मुझसे हँसते हुए कहा— ।। ६९-७० ।।
नाविषह्यं तवाद्यास्ति त्रिषु लोकेषु किंचन ।
निवातकवचा नाम दानवा मम शत्रवः ।। ७१ ।।
‘वीरवर! तीनों लोकोंमें ऐसा कोई कार्य नहीं है, जो तुम्हारे लिये असाध्य हो। निवातकवच नामक दानव मेरे शत्रु हैं।। ७१ ।। समुद्रकुक्षिमाश्रित्य दुर्गे प्रतिवसन्त्युत। तिस्रः कोट्यः समाख्यातास्तुल्यरूपबलप्रभाः ।। ७२ ।। तांस्तत्र जहि कौन्तेय गुर्वर्थस्ते भविष्यति। ततो मातलिसंयुक्तं मयूरसमरोमभिः ।। ७३ ।। हयैरुपेत्तं प्रादान्मे रथं दिव्यं महाप्रभम्। बबन्ध चैव मे मूर्ध्नि किरीटमिदमुत्तमम् ।। ७४ ।। ‘वे समुद्रके भीतर दुर्गम स्थानका आश्रय लेकर रहते हैं। उनकी संख्या तीन करोड़ बतायी जाती है और उन सभीके रूप, बल और तेज एक समान हैं। कुन्तीनन्दन! तुम उन दानवोंका संहार कर डालो। इतने से ही तुम्हारी गुरु-दक्षिणा पूरी हो जायगी।' ऐसा कहकर इन्द्रने मुझे एक अत्यन्त कान्तिमान् दिव्य रथ प्रदान किया, जिसे मातलि जोतकर लाये थे। उसमें मयूरोंके समान रोमवाले घोड़े जुते हुए थे। रथ आ जानेपर देवराजने यह उत्तम किरीट मेरे मस्तकपर बाँध दिया ।। ७२—७४ ।। स्वरूपसदृशं चैव प्रादादङ्गविभूषणम्। अभेद्यं कवचं चेदं स्पर्शरूपवदुत्तमम् ।। ७५ ।। फिर उन्होंने मेरे स्वरूपके अनुरूप प्रत्येक अंगमें आभूषण पहना दिये। इसके बाद यह अभेद्य उत्तम कवच धारण कराया, जिसका स्पर्श तथा रूप मनोहर है ।। अजरां ज्यामिमां चापि गाण्डीवे समयोजयत्। ततः प्रायामहं तेन स्यन्दनेन विराजता ।। ७६ ।। येनाजयद् देवपतिर्बलिं वैरोचनं पुरा। ततो देवाः सर्व एव तेन घोषेण बोधिताः ।। ७७ ।। मन्वाना देवराजं मां समाजग्मुर्विशाम्पते। दृष्ट्वा च मामपृच्छन्त किं करिष्यसि फाल्गुन ।। ७८ ।। तत्पश्चात् मेरे गाण्डीव धनुषमें उन्होंने यह अटूट प्रत्यञ्चा जोड़ दी। इस प्रकार युद्धकी सामग्रियोंसे सम्पन्न होकर उस तेजस्वी रथके द्वारा मैं संग्रामके लिये प्रस्थित हुआ, जिसपर आरूढ़ होकर पूर्वकालमें देवराजने विरोचनकुमार बलिको परास्त किया था। महाराज! तब उस रथकी घर्घरहाटसे सजग हो सब देवता मुझे देवराज समझकर मेरे पास आये और मुझे देखकर पूछने लगे—'अर्जुन! तुम क्या करनेकी तैयारीमें हो?' ।। ७६—७८ ।।
तानब्रुवं यथाभूतमिदं कर्तास्मि संयुगे । निवातकवचानां तु प्रस्थितं मां वधैषिणम् ॥ ७९ ॥ निबोधत महाभागाः शिवं चाशास्त मेऽनघाः । ततो वाग्भिः प्रशस्ताभिस्त्रिदशाः पृथिवीपते । तुष्टुवुर्मां प्रसन्नास्ते यथा देवं पुरंदरम् ॥ ८० ॥ तब मैंने उनसे सब बातें बताकर कहा—'मैं युद्धमें यही करने जा रहा हूँ। आपको यह ज्ञात होना चाहिये कि मैं निवातकवच नामक दानवोंके वधकी इच्छासे प्रस्थित हुआ हूँ। अतः निष्पाप एवं महाभाग देवताओ! आप मुझे ऐसा आशीर्वाद दें, जिससे मेरा मंगल हो।' राजन्! तब वे देवतालोग प्रसन्न हो देवराज इन्द्रकी भाँति श्रेष्ठ एवं मधुर वाणीद्वारा मेरी स्तुति करते हुए बोले— ॥ ७९-८० ॥ रथेनानेन मघवा जितवान् शम्बरं युधि । नमुचिं बलवृत्रौ च प्रह्लादनरकावपि ॥ ८१ ॥ इस रथके द्वारा इन्द्रने युद्धमें शम्बरासुरपर विजय पायी है। नमुचि, बल, वृत्र, प्रह्लाद और नरकासुरको परास्त किया है ॥ ८१ ॥ बहूनि च सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदान्यपि । रथेनानेन दैत्यानां जितवान् मघवा युधि ॥ ८२ ॥
‘इनके सिवा अन्य बहुत-से दैत्योंको भी इस रथके द्वारा पराजित किया है, जिनकी संख्या सहस्रों, लाखों और अरबोंतक पहुँच गयी है ।। ८२ ।। त्वमप्यनेन कौन्तेय निवातकवचान् रणे । विजेता युधि विक्रम्य पुरेव मघवा वशी ।। ८३ ।। ‘कुन्तीनन्दन! जैसे पूर्वकालमें सबको वशमें करनेवाले इन्द्रने असुरोंपर विजय पायी थी, उसी प्रकार तुम भी इस रथके द्वारा युद्धमें पराक्रम करके निवातकवचोंको परास्त करोगे ।। ८३ ।। अयं च शंखप्रवरो येन जेतासि दानवान् । अनेन विजिता लोकाः शक्त्रेणापि महात्मना ।। ८४ ।। ‘यह श्रेष्ठ शंख है, जिसे बजानेसे तुम्हें दानवोंपर विजय प्राप्त हो सकती है। महामना इन्द्रने भी इसके द्वारा सम्पूर्ण लोकोंपर विजय पायी है’ ।। ८४ ।। प्रदीयमानं देवैस्तं देवदत्तं जलोद्भवम् । प्रत्यगृह्णं जयायैनं स्तूयमानस्तदामरैः ।। ८५ ।। स शङ्खी कवची बाणी प्रगृहीतशरासनः । दानवालयमत्युग्रं प्रयातोऽस्मि युयुत्सया ।। ८६ ।। वही यह शंख है, जिसे मैंने अपनी विजयके लिये ग्रहण किया था। देवताओंने उसे दिया था, इसलिये इसका नाम देवदत्त है। शंख लेकर देवताओंके मुखसे अपनी स्तुति सुनता हुआ मैं कवच, बाण तथा धनुषसे सज्जित हो युद्धकी इच्छासे अत्यन्त भयंकर दानवोंके नगरकी ओर चल दिया ।। ८५-८६ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वण्यर्जुनवाक्ये अष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १६८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनवाक्यविषयक एक सौ अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १६८ ।।
१. निर्दोष प्राणीका वध हो जाय, तो उसे पुनः संजीवित करनेकी विद्याको प्रायश्चित्त कहते हैं। २. शत्रुके अस्त्रसे पराभवको प्राप्त हुए अपने अस्त्रको पुनः शक्तिशाली बनाना प्रतिघात कहलाता है।
१६९-
एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
अर्जुनका पातालमें प्रवेश और निवातकवचोंके साथ युद्धारम्भ
अर्जुन उवाच
ततोऽहं स्तूयमानस्तु तत्र तत्र महर्षिभिः ।
अपश्यमुदधिं भीममपां पतिमथाव्ययम् ॥ १ ॥
फेनवत्यः प्रकीर्णाश्च संहताश्च समुत्थिताः ।
ऊर्मयश्चात्र दृश्यन्ते वल्गन्त इव पर्वताः ॥ २ ॥
**अर्जुन बोले—**राजन्! तदनन्तर मार्गमें जहाँ-तहाँ महर्षियोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए मैंने जलके स्वामी समुद्रके पास पहुँचकर उसका निरीक्षण किया। वह देखनेमें अत्यन्त भयंकर था। उसका पानी कभी घटता-बढ़ता नहीं है। उसमें फेनसे मिली हुई पहाड़ोंके समान ऊँची-ऊँची लहरें उठकर नृत्य करती-सी दिखायी दे रही थीं। वे कभी इधर-उधर फैल जाती और कभी आपसमें टकरा जाती थीं ॥ १-२ ॥
नावः सहस्रशस्तत्र रत्नपूर्णाः समन्ततः ।
नभसीव विमानानि विचरन्त्यो विरेजिरे ।
तिमिङ्गिलाः कच्छपाश्च तथा तिमितिमङ्गिलाः ॥ ३ ॥
मकराश्चात्र दृश्यन्ते जले मग्ना इवाद्रयः ।
शङ्खानां च सहस्राणि मग्नान्यप्सु समन्ततः ॥ ४ ॥
वहाँ सब ओर रत्नोंसे भरी हुई हजारों नावें चल रही थीं, जो आकाशमें विचरते हुए विमानोंकी-सी शोभा पाती थीं तथा तिमिंगिल³, तिमितिमिंगिल³, कछुए और मगर पानीमें डूबे हुए पर्वतोंके समान दृष्टिगोचर होते थे। सहस्रों शंख सब ओर जलमें निमग्न थे ॥ ३-४ ॥
दृश्यन्ते स्म यथा रात्रौ तारास्तन्वभ्रसंवृताः ।
तथा सहस्रशस्तत्र रत्नसङ्घाः प्लवन्त्युत ॥ ५ ॥
जैसे रातमें झीने बादलोंके आवरणसे सहस्रों तारे चमकते दिखायी देते हैं, उसी प्रकार समुद्रके जलमें स्थित हजारों रत्नसमूह तैरते हुए-से प्रतीत हो रहे थे ॥ ५ ॥
वायुश्च घूर्णते भीमस्तदद्भुतमिवाभवत् ।
तमुदीक्ष्य महावेगं सर्वाम्भोनिधिमुत्तमम् ॥ ६ ॥
अपश्यं दानवाकीर्णं तद् दैत्यपुरमन्तिकात् ।
तत्रैव मातलिस्तूर्णं निपत्य पृथिवीतले ॥ ७ ॥
रथं तं तु समाश्लिष्य³ प्राद्रवद् रथयोगवित् । त्रासयन् रथघोषेण तत् पुरं समुपाद्रवत् ॥ ८ ॥ औरोंकी तो बात ही क्या है, वहाँ भयानक वायु भी पथ-भ्रान्तकी भाँति भटकने लगती है। वायुका वह चक्कर काटना अद्भुत-सा प्रतीत हो रहा था। इस प्रकार अत्यन्त वेगशाली जलराशि महासागरको देखकर उसके पास ही मैंने दानवोंसे भरा हुआ वह दैत्यनगर भी देखा। रथ-संचालनमें कुशल सारथि मातलि तुरंत वहाँ पहुँचकर पातालमें उतरे तथा रथपर सावधानीसे बैठकर आगे बढ़े। उन्होंने रथकी घर्घराहटसे सबको भयभीत करते हुए उस दैत्यपुरकी ओर धावा किया ॥ ६-८ ॥
रथघोषं तु तं श्रुत्वा स्तनयित्नोरिवाम्बरे । मन्वाना देवराजं मामाविग्ना दानवाभवन् ॥ ९ ॥ आकाशमें होनेवाली मेघ-गर्जनाके समान उस रथका शब्द सुनकर दानवलोग मुझे देवराज इन्द्र समझकर भयसे अत्यन्त व्याकुल हो उठे ॥ ९ ॥
सर्वे सम्भ्रान्तमनसः शरचापधराः स्थिताः । तथासिशूलपरशुगदामुसलपाणयः ॥ १० ॥ सभी मन-ही-मन घबरा गये। सभी अपने हाथोंमें धनुष-बाण, तलवार, शूल, फरसा, गदा और मुसल आदि अस्त्र-शस्त्र लेकर खड़े हो गये ॥ १० ॥
ततो द्वाराणि पिदधुर्दानवास्त्रस्तचेतसः । संविधाय पुरे रक्षां न स्म कश्चन दृश्यते ॥ ११ ॥ दानवोंके मनमें आतंक छा गया था। इसलिये उन्होंने नगरकी रक्षाका प्रबन्ध करके सारे दरवाजे बंद कर लिये। नगरके बाहर कोई भी दिखायी नहीं देता था ॥ ११ ॥
ततः शङ्खमुपादाय देवदत्तं महास्वनम् । परमां मुदमाश्रित्य प्राधमं तं शनैरहम् ॥ १२ ॥ तब मैंने बड़ी भयंकर ध्वनि करनेवाले देवदत्त नामक शंखको हाथमें लेकर अत्यन्त प्रसन्न हो धीरे-धीरे उसे बजाया ॥ १२ ॥
स तु शब्दो दिवं स्तब्ध्वा प्रतिशब्दमजीजनत् । वित्रैसुश्च निलिल्युश्च भूतानि सुमहान्त्यपि ॥ १३ ॥ वह शंखनाद स्वर्गलोकसे टकराकर प्रतिध्वनि उत्पन्न करने लगा। उसकी आवाज सुनकर बड़े-बड़े प्राणी भी भयभीत हो इधर-उधर छिप गये ॥ १३ ॥
ततो निवातकवचाः सर्व एव स्वलंकृताः । दंशिता विविधैस्त्राणैर्विचित्रायुधपाणयः ॥ १४ ॥ आयसैश्च महाशूलैर्गदाभिर्मुसलैरपि । पट्टिशैः करवालैश्च रथचक्रैश्च भारत ॥ १५ ॥ शतघ्नीभिर्भुशुण्डीभिः खड्गैश्चित्रैः स्वलंकृतैः ।
प्रगृहीतैर्दितेः पुत्राः प्रादुरासन् सहस्रशः ॥ १६ ॥ भारत! तदनन्तर निवातकवचनामक सभी दैत्य आभूषणोंसे विभूषित हो भाँति-भाँतिके कवच धारण किये, हाथोंमें विचित्र आयुध लिये, लोहेके बने हुए बड़े-बड़े शूल, गदा, मुसल, पट्टिश, करवाल, रथ-चक्र, शतघ्नी (तोप), भुशुण्डि (बंदूक) तथा रत्नजटित विचित्र खड्ग आदि लेकर सहस्रोंकी संख्यामें नगरसे बाहर आये ॥ १४—१६ ॥
ततो विचार्य बहुशो रथमार्गेषु तान् हयान् । प्राचोदयत् समे देशो मातलिर्भरतर्षभ ॥ १७ ॥ तेन तेषां प्रणुन्नानामाशुत्वाच्छीघ्रगामिनाम् । नान्वपश्यं तदा किंचित् तन्मेऽद्भुतमिवाभवत् ॥ १८ ॥ भरतश्रेष्ठ! उस समय मातलिने बहुत सोच-विचारकर समतल प्रदेशमें रथ जानेयोग्य मार्गोंपर अपने उन घोड़ोंको हाँका। उसके हाँकनेपर उन शीघ्रगामी अश्वोंकी चाल इतनी तेज हो गयी कि मुझे उस समय कुछ भी दिखायी नहीं देता था। यह एक अद्भुत बात थी ॥
ततस्ते दानवास्तत्र वादित्राणि सहस्रशः । विकृतस्वररूपाणि भृशं सर्वाण्यनादयन् ॥ १९ ॥ तदनन्तर उन दानवोंने वहाँ भीषण स्वर और विकराल आकृतिवाले विभिन्न प्रकारके सहस्रों बाजे जोर-जोरसे बजाने आरम्भ किये ॥ १९ ॥
तेन शब्देन सहसा समुद्रे पर्वतोपमाः । आप्लवन्त गतैः सत्त्वैर्मत्स्याः शतसहस्रशः ॥ २० ॥ वाद्योंकी उस तुमुल-ध्वनिसे सहसा समुद्रके लाखों बड़े-बड़े पर्वताकार मत्स्य मर गये और उनकी लाशें पानीके ऊपर तैरने लगीं ॥ २० ॥
ततो वेगेन महता दानवा मामुपाद्रवन् । विमुञ्चन्तः शितान् बाणान् शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २१ ॥ तत्पश्चात् उन सब दानवोंने सैकड़ों और हजारों तीखे बाणोंकी वर्षा करते हुए बड़े वेगसे मुझपर आक्रमण किया ॥ २१ ॥
स सम्प्रहारस्तुमुलस्तेषां च मम भारत । अवर्तत महाघोरो निवातकवचान्तकः ॥ २२ ॥ भारत! तब उन दानवोंका और मेरा महाभयंकर तुमुल संग्राम आरम्भ हो गया, जो निवातकवचोंके लिये विनाशकारी सिद्ध हुआ ॥ २२ ॥
ततो देवर्षयश्चैव तथान्ये च महर्षयः । ब्रह्मर्षयश्च सिद्धाश्च समाजग्मुर्महामृधे ॥ २३ ॥ ते वै मामनुरूपाभिर्मधुराभिर्जयैषिणः । अस्तुवन् मुनयो वाग्भिर्यथेन्द्रं तारकामये ॥ २४ ॥
उस समय बहुत-से देवर्षि तथा अन्य महर्षि एवं ब्रह्मर्षि और सिद्धगण उस महायुद्धमें (देखनेके लिये) आये। वे सब-के-सब मेरी विजय चाहते थे। अतः उन्होंने जैसे तारकामय संग्रामके अवसरपर इन्द्रकी स्तुति की थी, उसी प्रकार अनुकूल एवं मधुर वचनोंद्वारा मेरा भी स्तवन किया ।। २३-२४ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि युद्धारम्भे एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें युद्धारम्भविषयक एक सौ उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १६९ ।।
१. एक विशेष प्रकारके मत्स्यका नाम ‘तिमि’ है, जो उसे निगल जाता है, उस महामत्स्यको ‘तिमिगिल’ कहते हैं। २. जो तिमिंगलको भी निगल जाता है, उस महामहामत्स्यका नाम ‘तिमितिमिंगिल’ है। ३. नीलकण्ठी टीकामें लिखा है कि पृथ्वीमें उतरकर निम्नस्थलमें गये हुए रथके चक्केको दृढ़तापूर्वक पकड़कर ऊँचा किया।
१७०-
सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
अर्जुन और निवातकवचोंका युद्ध
अर्जुन उवाच
ततो निवातकवचाः सर्वे वेगेन भारत ।
अभ्यद्रवन् मां सहिताः प्रगृहीतायुधा रणे ॥ १ ॥
**अर्जुन बोले—**भारत! तदनन्तर सारे निवातकवच संगठित हो हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लिये युद्धभूमिमें वेगपूर्वक मेरे ऊपर टूट पड़े ॥ १ ॥
आच्छाद्य रथपन्थानमुत्क्रोशन्तो महारथाः ।
आवृत्य सर्वतस्ते मां शरवर्षैरवाकिरन् ॥ २ ॥
ततोऽपरे महावीर्याः शूलपट्टिशपाणयः ।
शूलानि च भुशुण्डीश्च मुमुचुर्दानवा मयि ॥ ३ ॥
उन महारथी दानवोंने मेरे रथका मार्ग रोककर भीषण गर्जना करते हुए मुझे सब ओरसे घेर लिया और मुझपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी। फिर कुछ अन्य महापराक्रमी दानव शूल और पट्टिश आदि हाथोंमें लिये मेरे सामने आये और मुझपर शूल तथा भुशुण्डियोंका प्रहार करने लगे ॥ २-३ ॥
तच्छूलवर्षं सुमहद् गदाशक्तिसमाकुलम् ।
अनिशं सृज्यमानं तैरपतन्मद्रथोपरि ॥ ४ ॥
अन्ये मामभ्यधावन्त निवातकवचा युधि ।
शितशस्त्रायुधा रौद्राः कालरूपाः प्रहारिणः ॥ ५ ॥
दानवोंद्वारा की गयी वह शूलोंकी बड़ी भारी वर्षा निरन्तर मेरे रथपर होने लगी। उसके साथ ही गदा और शक्तियोंका भी प्रहार हो रहा था। कुछ दूसरे निवातकवच हाथोंमें तीखे अस्त्र-शस्त्र लिये उस युद्धके मैदानमें मेरी और दौड़े। वे प्रहार करनेमें कुशल थे। उनकी आकृति बड़ी भयंकर थी और देखनेमें वे कालरूप जान पड़ते थे ॥ ४-५ ॥
तानहं विविधैर्बाणैर्वेगवद्भिरजिह्मगैः ।
गाण्डीवमुक्तैरभ्यघ्नमेकैकं दशभिर्मृधे ॥ ६ ॥
तब मैंने उनमेंसे एक-एकको युद्धमें गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए सीधे जानेवाले विविध प्रकारके दस-दस वेगवान् वाणोंद्वारा बींध डाला ॥ ६ ॥
ते कृता विमुखाः सर्वे मत्प्रयुक्तैः शिलाशितैः ।
ततो मातलिना तूर्णं ह्यास्ते सम्प्रचोदिताः ॥ ७ ॥
मेरे छोड़े हुए बाण पत्थरपर तेज किये हुए थे। उनकी मार खाकर सभी दानव युद्धभूमिसे भाग चले। तब मातलि उस रथके घोड़ोंको तुरंत ही तीव्र वेगसे हाँका ॥ ७ ॥
मार्गान् बहुविधांस्तत्र विचेरुर्वातरंहसः । सुसंयता मातलिना प्रामथ्नन्त दितेः सुतान् ॥ ८ ॥ सारथिसे प्रेरित होकर वे अश्व नाना प्रकारकी चालें दिखाते हुए वायुके समान वेगसे चलने लगे। मातलिने उन्हें अच्छी तरह काबूमें कर रखा था। उन सबने वहाँ दितिके पुत्रोंको रौंद डाला ॥ ८ ॥
शतं शतास्ते हरयस्तस्मिन् युक्ता महारथे । शान्ता मातलिना यत्ता व्यचरन्नल्पका इव ॥ ९ ॥ अर्जुनके उस विशाल रथमें दस हजार घोड़े जुते हुए थे, तो भी मातलिने उन्हें इस प्रकार वशमें कर रखा था कि वे अल्पसंख्यक अश्वोंकी भाँति शान्तभावसे विचरते थे ॥ ९ ॥
तेषां चरणपातेन रथनेमिस्वनेन च । मम बाणनिपातैश्च हतास्ते शतशोऽसुराः ॥ १० ॥ उन घोड़ोंके पैरोंकी मार पड़नेसे, रथके पहियेकी घर्घराहट होनेसे तथा मेरे बाणोंकी चोट खानेसे सैकड़ों दैत्य मर गये ॥ १० ॥
गतासवस्तथैवान्ये प्रगृहीतशरासनाः । हतसारथयस्तत्र व्यकृष्यन्त तुरंगमैः ॥ ११ ॥ इसी प्रकार वहाँ दूसरे बहुत-से असुर हाथमें धनुष-बाण लिये प्राणरहित हो गये थे और उनके सारथि भी मारे गये थे, उस दशामें सारथिशून्य घोड़े उनके निर्जीव शरीरको खींचे लिये जाते थे ॥ ११ ॥
ते दिशो विदिशः सर्वे प्रतिरुध्य प्रहारिणः । अभ्यघ्नन् विविधैः शस्त्रैस्ततो मे व्यथितं मनः ॥ १२ ॥ तब वे समस्त दानव सारी दिशाओं और विदिशाओंको रोककर भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा मुझपर घातक प्रहार करने लगे। इससे मेरे मनमें बड़ी व्यथा हुई ॥ १२ ॥
ततोऽहं मातलेर्वीर्यमपश्यं परमाद्भुतम् । अश्वांस्तथा वेगवतो यदयत्नादधारयत् ॥ १३ ॥ उस समय मैंने मातलिकी अत्यन्त अद्भुत शक्ति देखी। उन्होंने वैसे वेगशाली अश्वोंको बिना किसी प्रयासके ही काबूमें कर लिया ॥ १३ ॥
ततोऽहं लघुभिश्चित्रैरस्त्रैस्तानसुरान् रणे । चिच्छेद सायुधान् राजन् शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १४ ॥ एवं मे चरतस्तत्र सर्वयत्नेन शत्रुहन् । प्रीतिमानभवद् वीरो मातलिः शक्रसारथिः ॥ १५ ॥ राजन्! तब मैंने उस रणभूमिने अस्त्र-शस्त्रधारी सैकड़ों तथा सहस्रों असुरोंको विचित्र एवं शीघ्रगामी बाणोंद्वारा मार गिराया। शत्रुदमन नरेश! इस प्रकार पूर्ण प्रयत्नपूर्वक युद्धमें
विचरते हुए मेरे ऊपर इन्द्रसारथि वीरवर मातलि बड़े प्रसन्न हुए ।। १४-१५ ।। बध्यमानास्ततस्तैस्तु हयैस्तेन रथेन च । अगमन् प्रक्षयं केचिन्न्यवर्तन्त तथा परे ।। १६ ।। मेरे उन घोड़ों तथा उस दिव्य रथसे कुचल जानेके कारण भी कितने ही दानव मारे गये और बहुत-से युद्ध छोड़कर भाग गये ।। १६ ।। स्पर्धमाना इवास्माभिर्निवातकवचा रणे । शरवर्षैः शरार्तं मां महद्भिः प्रत्यवारयन् ।। १७ ।। ततोऽहं लघुभिश्चित्रैर्ब्रह्मास्त्रपरिमन्त्रितैः । व्यधमं सायकैराशु शतशोऽथ सहस्रशः ।। १८ ।। निवातकवचोंने संग्राममें हमलोगोंसे होड़-सी लगा रखी थी। मैं बाणोंके आघातसे पीड़ित था, तो भी उन्होंने बड़ी भारी बाणवर्षा करके मेरी प्रगतिको रोकने-की चेष्टा की। तब मैंने अद्भुत और शीघ्रगामी बाणोंको ब्रह्मास्त्रसे अभिमन्त्रित करके चलाया और उनके द्वारा शीघ्र ही सैकड़ों तथा हजारों दानवोंका संहार करने लगा ।। १७-१८ ।। ततः सम्पीड़यनास्ते क्रोधाविष्टा महारथाः । अपीडयन् मां सहिताः शरशूलासिवृष्टिभिः ।। १९ ।। तदनन्तर मेरे बाणोंसे पीड़ित होकर वे महारथी दैत्य क्रोधसे आग-बबूला हो उठे और एक साथ संगठित हो खड्ग, शूल तथा बाणोंकी वर्षाद्वारा मुझे घायल करने लगे ।। १९ ।। ततोऽहमस्त्रमातिष्ठं परमं तिग्मतेजसम् । दयितं देवराजस्य माधवं नाम भारत ।। २० ।। भारत! यह देख मैंने देवराज इन्द्रके परम प्रिय माधव नामक प्रचण्ड तेजस्वी अस्त्रका आश्रय लिया ।। २० ।। ततः खड्गांस्त्रिशूलांश्च तोमरांश्च सहस्रशः । अस्त्रवीर्येण शतधा तैर्मुक्तानहमच्छिदम् ।। २१ ।। तब उस अस्त्रके प्रभावसे मैंने दैत्योंके चलाये हुए सहस्रों खड्ग, त्रिशूल और तोमरोंके सौ-सौ टुकड़े कर डाले ।। २१ ।। छित्त्वा प्रहरणान्येषां ततस्तानपि सर्वशः । प्रत्यविध्यमहं रोषाद् दशभिर्दशभिः शरैः ।। २२ ।। तत्पश्चात् दानवोंके समस्त अस्त्र-शस्त्रोंका उच्छेद करके मैंने रोषवश उन सबको भी दस-दस बाणोंसे घायल करके बदला चुकाया ।। २२ ।। गाण्डीवाद्धि तदा संख्ये यथा भ्रमरपङ्क्तयः । निष्पतन्ति महाबाणास्तन्मातलिरपूजयत् ।। २३ ।। उस समय मेरे गाण्डीव धनुषसे बड़े-बड़े बाण उस युद्ध-भूमिमें इस प्रकार छूटते थे, मानो वृक्षसे झुंड-के-झुंड भौंरे उड़ रहे हों। मातलिने मेरे इस कार्यकी बड़ी प्रशंसा
की ।। २३ ।। तेषामपि तु बाणास्ते तन्मातलिरपूजयत् । अवाकिरन् मां बलवत् तानहं व्यधमं शरैः ।। २४ ।। तदनन्तर उन दानवोंके भी बाण मेरे ऊपर जोर-जोरसे गिरने लगे। मातलिने उनकी उस बाण-वर्षाकी भी सराहना की। फिर मैंने अपने बाणोंद्वारा शत्रुओंके उन सब बाणोंको छिन्न-भिन्न कर डाला ।। २४ ।। वध्यमानास्ततस्ते तु निवातकवचाः पुनः । शरवर्षैर्महद्भिर्मां समन्तात् पर्यवारयन् ।। २५ ।। इस प्रकार मार खाते और मरते रहनेपर भी निवातकवचोंने पुनः भारी बाण-वर्षाके द्वारा मुझे सब ओरसे घेर लिया ।। २५ ।। शरवेगान्निहत्याहमस्त्रैरस्त्रविघातिभिः । ज्वलद्भिः परमैः शीघ्रैस्तानविध्यं सहस्रशः ।। २६ ।। तब मैंने अस्त्र-विनाशक अस्त्रोंद्वारा उनकी बाणवर्षाके वेगको शान्त करके अत्यन्त शीघ्रगामी एवं प्रज्वलित बाणोंद्वारा सहस्रों दैत्योंको घायल कर दिया ।। २६ ।। तेषां छिन्नानि गात्राणि विसृजन्ति स्म शोणितम् । प्रावृषीवाभिवृष्टानि शृङ्गाण्यथ धराभृताम् ।। २७ ।। उनके कटे हुए अंग उसी प्रकार रक्तकी धारा बहाते थे, जैसे वर्षा-ऋतुमें वृष्टिके जलसे भीगे हुए पर्वतोंके शिखर (गेरू आदि धातुओंसे मिश्रित) जलकी धारा बहाते हैं ।। २७ ।। इन्द्राशनिसमस्पर्शैर्वेगवद्भिरजिह्मगैः । मद्बाणैर्वध्यमानास्ते समुद्विग्नाः स्म दानवाः ।। २८ ।। मेरे बाणोंका स्पर्श इन्द्रके वज्रके समान था। वे बड़े वेगसे छूटते और सीधे जाकर शत्रुको अपना निशाना बनाते थे। उनकी चोट खाकर वे समस्त दानव भयसे व्याकुल हो उठे ।। २८ ।। शतधा भिन्नदेहास्ते क्षीणप्रहरणौजसः । ततो निवातकवचा मामयुध्यन्त मायया ।। २९ ।। उन दैत्योंके शरीरके सौ-सौ टुकड़े हो गये थे। उनके अस्त्र-शस्त्र कट गये और उत्साह नष्ट हो गया था। ऐसी अवस्थामें निवातकवचोंने मेरे साथ माया-युद्ध आरम्भ कर दिया ।। २९ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १७० ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें एक सौ सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १७० ।।
दानवोंके मायामय युद्धका वर्णन
एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
दानवोंके मायामय युद्धका वर्णन
अर्जुन उवाच
ततोऽश्मवर्षं सुमहत् प्रादुरासीत् समन्ततः ।
नगमात्रैः शिलाखण्डैस्तन्मां दृढमपीडयत् ॥ १ ॥
**अर्जुन बोले—**महाराज! तदनन्तर चारों ओरसे पत्थरोंकी बड़ी भारी वर्षा आरम्भ हो गयी। वृक्षोंके बराबर ऊँचे शिलाखण्ड रणभूमिमें गिरने लगे, इससे मुझे बड़ी पीड़ा हुई ॥ १ ॥
तदहं वज्रसंकाशैर्महेन्द्रास्त्रप्रचोदितैः ।
अचूर्यणं वेगवद्भिः शरजालैर्महाहवे ॥ २ ॥
तब मैंने महेन्द्रास्त्रसे अभिमन्त्रित वज्रतुल्य वेगवान् बाणोंद्वारा उस महासमरमें गिरनेवाले समस्त शिला-खण्डोंको चूर-चूर कर दिया ॥ २ ॥
चूर्ण्यमानेऽश्मवर्षे तु पावकः समजायत ।
तत्राश्मचूर्णान्यपतन् पावकप्रकरा इव ॥ ३ ॥
पत्थरोंकी वर्षाके चूर्ण होते ही सब ओर आग प्रकट हो गयी। फिर तो वहाँ आगकी चिनगारियोंके समूहकी भाँति पत्थरका चूर्ण पड़ने लगा ॥ ३ ॥
ततोऽश्मवर्षे विहते जलवर्षं महत्तरम् ।
धाराभिरक्षमात्राभिः प्रादुरासीन्ममान्तिके ॥ ४ ॥
तदनन्तर मेरे बाणोंसे वह पत्थरोंकी वर्षा शान्त होनेपर महत्तर जल-वृष्टि आरम्भ हो गयी। मेरे पासही सर्पोंके* समान मोटी जलधाराएँ गिरने लगीं ॥ ४ ॥
नभसः प्रच्युता धारास्तिग्मवीर्याः सहस्रशः ।
आवृण्वन् सर्वतो व्योम दिशश्चोपविशस्तथा ॥ ५ ॥
आकाशसे प्रचण्ड शक्तिशालिनी सहस्रों धाराएँ बरसने लगीं, जिन्होंने न केवल आकाशको ही, अपितु सम्पूर्ण दिशाओं और उपदिशाओंको भी सब ओरसे ढक लिया ॥ ५ ॥
धाराणां च निपातेन वायौर्विस्फूर्जितेन च ।
गर्जितेन च दैत्यानां न प्राज्ञायत किंचन ॥ ६ ॥
धाराओंकी वर्षा, हवाके झकोरों और दैत्योंकी गर्जनासे कुछ भी जान नहीं पड़ता था ॥ ६ ॥
धारा दिवि च सम्बद्धा वसुधायां च सर्वशः ।
व्यामोहयन्त मां तत्र निपतन्त्योऽनिशं भुवि ॥ ७ ॥
स्वर्गसे लेकर पृथ्वीतक एक सूत्रमें आबद्ध-सी होकर पृथ्वीपर सब ओर जलकी धाराएँ लगातार गिर रही थीं, जिन्होंने वहाँ मुझे मोहमें डाल दिया था ॥ ७ ॥ तत्रोपदिष्टमिन्द्रेण दिव्यमस्त्रं विशोषणम् । दीप्तं प्राहिणवं घोरमशुष्यत् तेन तज्जलम् ॥ ८ ॥ तब मैंने वहाँ देवराज इन्द्रके द्वारा प्राप्त हुए दिव्य विशोषणास्त्रका प्रयोग किया, जो अत्यन्त तेजस्वी और भयंकर था। उससे वर्षाका वह सारा जल सूख गया ॥ ८ ॥ हतेऽश्मवर्षे च मया जलवर्षे च शोषिते । मुमुचुर्दानवा मायामग्निं वायुं च भारत ॥ ९ ॥ भारत! जब मैंने पत्थरोंकी वर्षा शान्त कर दी और पानीकी वर्षाको भी सोख लिया, तब दानवलोग मुझपर मायामय अग्नि और वायुका प्रयोग करने लगे ॥ ९ ॥ ततोऽहमग्निं व्यधमं सलिलास्त्रेण सर्वशः । शैलेन च महास्त्रेण वायोर्वेगमधारयम् ॥ १० ॥ फिर तो मैंने वारुणास्त्रसे वह सारी आग बुझा दी और महान् शैलास्त्रका प्रयोग करके मायामय वायुका वेग कुण्ठित कर दिया ॥ १० ॥ तस्यां प्रतिहतायां ते दानवा युद्धदुर्मदाः । प्राकुर्वन् विविधां मायां यौगपद्येन भारत ॥ ११ ॥ भारत! उस मायाका निवारण हो जानेपर वे रणोन्मत्त दानव एक ही समय अनेक प्रकारकी मायाका प्रयोग करने लगे ॥ ११ ॥ ततो वर्षं प्रादुरभूत् सुमहल्लोमहर्षणम् । अस्त्राणां घोररूपाणामग्नेर्वायोस्तथाश्मनाम् ॥ १२ ॥ फिर तो भयानक अस्त्रोंकी तथा अग्नि, वायु और पत्थरोंकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी जो रोंगटे खड़े कर देनेवाली थी ॥ १२ ॥ सा तु मायामयी वृष्टिः पीडयामास मां युधि । अथ घोरं तमस्तीव्रं प्रादुरासीत् समन्ततः ॥ १३ ॥ उस मायामयी वर्षाने युद्धमें मुझे बड़ी पीड़ा दी। तदनन्तर चारों ओर महाभयानक अन्धकार छा गया ॥ १३ ॥ तमसा संवृते लोके घोरेण परुषेण च । हरयो विमुखाश्चासन् प्रास्खलच्चापि मातलिः ॥ १४ ॥ घोर एवं दुःसह तिमिरराशिसे सम्पूर्ण लोकोंके आच्छादित हो जानेपर मेरे रथके घोड़े युद्धसे विमुख हो गये और मातलि भी लड़खड़ाने लगे ॥ १४ ॥ हस्ताद्धि रश्मयश्चास्य प्रतोदः प्रापतद् भुवि । असकृच्चाह मां भीतः क्वासीति भरतर्षभ ॥ १५ ॥
उनके हाथसे घोड़ोंके लगाम और चाबुक पृथ्वीपर गिर पड़े और वे भयभीत होकर बार-बार मुझसे पूछने लगे— 'भरतश्रेष्ठ अर्जुन! तुम कहाँ हो?' ॥ १५ ॥ मां च भीराविशत् तीव्रा तस्मिन् विगतचेतसि । स च मां विगतज्ञानः संत्रस्तमिदमब्रवीत् ॥ १६ ॥ मातलिके बेसुध होनेपर मेरे मनमें भी अत्यन्त भय समा गया। तब सुध-बुध खोये हुए मातलिने मुझ भयभीत योद्धासे इस प्रकार कहा— ॥ १६ ॥ सुराणामसुराणां च संग्रामः सुमहानभूत् । अमृतार्थं पुरा पार्थ स च दृष्टो मयानघ ॥ १७ ॥ 'निष्पाप कुन्तीकुमार! प्राचीन कालमें अमृतकी प्राप्तिके लिये देवताओं और दैत्योंमें अत्यन्त घोर संग्राम हुआ था, जिसे मैंने अपनी आँखों देखा है ॥ १७ ॥ शम्बरस्य वधे घोरः संग्रामः सुमहानभूत् । सारथ्यं देवराजस्य तत्रापि कृतवानहम् ॥ १८ ॥ 'शम्बरासुरके वधके समय भी अत्यन्त भयानक युद्ध हुआ था। उसमें भी मैंने देवराज इन्द्रके सारथिका कार्य सँभाला था ॥ १८ ॥ तथैव वृत्रस्य वधे संगृहीता हया मया । वैरोचनेर्महायुद्धं दृष्टं चापि सुदारुणम् ॥ १९ ॥ 'इसी प्रकार वृत्रासुरके वधके समय भी मैंने ही घोड़ोंकी बागडोर हाथमें ली थी। विरोचनकुमार बलिका अत्यन्त भयंकर महासंग्राम भी मेरा देखा हुआ है ॥ १९ ॥ एते मया महाघोराः संग्रामाः पर्युपासिताः । न चापि विगतज्ञानोऽभूतपूर्वोऽस्मि पाण्डव ॥ २० ॥ 'ये बड़े-बड़े भयानक युद्ध मैंने देखे हैं, उनमें भाग लिया है, परंतु पाण्डुनन्दन! आजसे पहले कभी भी मैं इस प्रकार अचेत नहीं हुआ था ॥ २० ॥ पितामहेन संहारः प्रजानां विहितो ध्रुवम् । न हि युद्धमिदं युक्तमन्यत्र जगतः क्षयात् ॥ २१ ॥ 'जान पड़ता है, विधाताने आज समस्त प्रजाका संहार निश्चित किया है, अवश्य ऐसी ही बात है। जगत्के संहारके अतिरिक्त अन्य समयमें ऐसे भयानक युद्धका होना सम्भव नहीं है' ॥ २१ ॥ तस्य तद् वचनं श्रुत्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना । मोहयिष्यन् दानवानामहं मायाबलं महत् ॥ २२ ॥ अब्रुवं मातलिं भीतं पश्य मे भुजयोर्बलम् । अस्त्राणां च प्रभावं वै धनुषो गाण्डिवस्य च ॥ २३ ॥ अद्यास्त्रमाययैतेषां मायामेतां सुदारुणाम् । विनिहन्मि तमश्चोग्रं मा भैः सूत स्थिरो भव ॥ २४ ॥
मातलिका यह वचन सुनकर मैंने स्वयं ही अपने-आपको सँभाला और दानवोंके उस महान् मायाबलका निवारण करते हुए भयभीत मातलिसे कहा—‘सूत! आप डरें मत। स्थिरतापूर्वक रथपर बैठे रहें और देखें, मेरी इन भुजाओंमें कितना बल है? मेरे गाण्डीव धनुष तथा अस्त्रोंका कैसा प्रभाव है? आज मैं अपने अस्त्रोंकी मायासे इन दानवोंकी इस भयंकर माया तथा घोर अन्धकारका विनाश किये देता हूँ’ ॥ २२—२४ ॥
एवमुक्त्वाहमसृजमस्त्रमायां नराधिप ।
मोहिनीं सर्वभूतानां हिताय त्रिदिवौकसाम् ॥ २५ ॥
नरेश्वर! ऐसा कहकर मैंने देवताओंके हितके लिये अस्त्रसम्बन्धिनी मायाकी सृष्टि की, जो समस्त प्राणियोंको मोहमें डालनेवाली थी ॥ २५ ॥
पीड्यमानासु मायासु तासु तास्वसुरोत्तमाः ।
पुनर्बहुविधा मायाः प्राकुर्वन्नमितौजसः ॥ २६ ॥
उससे असुरोंकी वे सारी मायाएँ नष्ट हो गयीं। तब उन अमित तेजस्वी दानवराजाओंने पुनः नाना प्रकारकी मायाएँ प्रकट कीं ॥ २६ ॥
पुनः प्रकाशमभवत् तमसा ग्रस्यते पुनः ।
भवत्यदर्शनो लोकः पुनरप्सु निमज्जति ॥ २७ ॥
इससे कभी तो प्रकाश छा जाता था और कभी सब कुछ अन्धकारमें विलीन हो जाता था। कभी सम्पूर्ण जगत् अदृश्य हो जाता और कभी जलमें डूब जाता था ॥ २७ ॥
सुसंगृहीतैर्हरिभिः प्रकाशे सति मातलिः ।
व्यचरत् स्यन्दनाग्र्येण संग्रामे लोमहर्षणे ॥ २८ ॥
तदनन्तर प्रकाश होनेपर मातलिने घोड़ोंको काबूमें करके अपने श्रेष्ठ रथके द्वारा उस रोमांचकारी संग्राममें विचरना प्रारम्भ किया ॥ २८ ॥
ततः पर्यपतन्नुग्रा निवातकवचा मयि ।
तानहं विवरं दृष्ट्वा प्राहिण्वं यमसादनम् ॥ २९ ॥
तब भयानक निवातकवच चारों ओरसे मेरे ऊपर टूट पड़े। उस समय मैंने अवसर देख-देखकर उन सबको यमलोक भेज दिया ॥ २९ ॥
वर्तमाने तथा युद्धे निवातकवचान्तके ।
नापश्यं सहसा सर्वान् दानवान् माययाऽऽवृतान् ॥ ३० ॥
वह युद्ध निवातकवचोंके लिये विनाशकारी था। अभी युद्ध हो ही रहा था कि सहसा सारे दानव अन्तर्धानी मायासे छिप गये। अतः मैं किसीको भी देख न सका ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि मायायुद्धे एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें मायायुद्धविषयक एक सौ इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १७१ ।।
* कोशोंमें 'अक्ष' शब्दका अर्थ 'सर्प' भी मिलता है।
१७२-
द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
निवातकवचोंका संहार
अर्जुन उवाच
अदृश्यमानास्ते दैत्या योधयन्ति स्म मायया ।
अदृश्येनास्त्रवीर्येण तानप्यहमयोधयम् ॥ १ ॥
अर्जुन बोले— राजन्! इस प्रकार अदृश्य रहकर ही वे दैत्य मायाद्वारा युद्ध करने लगे तथा मैं भी अपने अस्त्रोंकी अदृश्य शक्तिके द्वारा ही उनका सामना करने लगा ॥ १ ॥
गाण्डीवमुक्ता विशिखाः सम्यगस्त्रप्रचोदिताः ।
अच्छिन्दन्नुत्तमाङ्गानि यत्र यत्र स्म तेऽभवन् ॥ २ ॥
मेरे गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाण विधिवत् प्रयुक्त दिव्यास्त्रोंसे प्रेरित हो जहाँ-जहाँ वे दैत्य थे, वहीं जाकर उनके सिर काटने लगे ॥ २ ॥
ततो निवातकवचा वध्यमाना मया युधि ।
संहृत्य मायां सहसा प्राविशन् पुरमात्मनः ॥ ३ ॥
जब मैं इस प्रकार युद्धक्षेत्रमें उनका संहार करने लगा, तब वे निवातकवच दानव अपनी मायाको समेटकर सहसा नगरमें घुस गये ॥ ३ ॥
व्यपयातेषु दैत्येषु प्रादुर्भूते च दर्शने ।
अपश्यं दानवांस्तत्र हतान् शतसहस्रशः ॥ ४ ॥
दैत्योंके भाग जानेसे जब वहाँ सब कुछ स्पष्ट दिखायी देने लगा, तब मैंने देखा, लाखों दानव वहाँ मरे पड़े थे ॥ ४ ॥
विनिष्पिष्टानि तत्रैषां शस्त्राण्याभरणानि च ।
शतशः स्म प्रदृश्यन्ते गात्राणि कवचानि च ॥ ५ ॥
हयानां नान्तरं ह्यासीत् पदाद् विचलितुं पदम् ।
उत्पत्य सहसा तस्थुरन्तरिक्षगमास्ततः ॥ ६ ॥
उनके अस्त्र-शस्त्र और आभूषण भी पिसकर चूर्ण हो गये थे। दानवोंके शरीरों और कवचोंके सौ-सौ टुकड़े दिखायी देते थे। वहाँ दैत्योंकी इतनी लाशें पड़ी थी कि घोड़ोंके लिये एकके बाद दूसरा पैर रखनेके लिये कोई स्थान नहीं रह गया था। अतः वे अन्तरिक्षचारी अश्व वहाँसे सहसा उछलकर आकाशमें खड़े हो गये ॥ ५-६ ॥
ततो निवातकवचा व्योम संछाद्य केवलम् ।
अदृश्या ह्यत्यवर्तन्त विसृजन्तः शिलोच्चयान् ॥ ७ ॥
तदनन्तर निवातकवचोंने अदृश्यरूपसे ही आक्रमण किया और केवल आकाशको आच्छादित करके पत्थरोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ७ ॥
अन्तर्भूमिगताश्चान्ये हयानां चरणान्यथ । व्यगृह्णन् दानवा घोरा रथचक्रे च भारत ॥ ८ ॥ भरतनन्दन! कुछ भयंकर दानवोंने, जो पृथ्वीके भीतर घुसे हुए थे, मेरे घोड़ोंके पैर तथा रथके पहिये पकड़ लिये ॥ ८ ॥
विनिगृह्य हरीनश्वान् रथं च मम युध्यतः । सर्वतो मामविध्यन्त सरथं धरणीधरैः ॥ ९ ॥ इस प्रकार युद्ध करते समय मेरे हरे रंगके घोड़ों तथा रथको पकड़कर उन दानवोंने रथसहित मेरे ऊपर सब ओरसे शिलाखण्डोंद्वारा प्रहार आरम्भ किया ॥ ९ ॥
पर्वतैरुपचीयद्भिः पतमानैस्तथापरैः । स देशो यत्र वर्ताम गुहेव समपद्यत ॥ १० ॥ नीचे पर्वतोंके ढेर लग रहे थे और ऊपरसे नयी-नयी चट्टानें पड़ रही थीं। इससे वह प्रदेश जहाँ हमलोग मौजूद थे, एक गुफाके समान बन गया ॥ १० ॥
पर्वतैश्छाद्यमानोऽहं निगृहीतैश्च वाजिभिः । अगच्छं परमामार्ति मातलिस्तदलक्षयत् ॥ ११ ॥ एक ओर तो मैं शिलाखण्डोंसे आच्छादित हो रहा था, दूसरी ओर मेरे घोड़े पकड़ लिये जानेसे रथकी गति कुण्ठित हो गयी थी। इस विवशताकी दशामें मुझे बड़ी पीड़ा होने लगी, जिसे मातलिने जान लिया ॥ ११ ॥
लक्षयित्वा च मां भीतमिदं वचनमब्रवीत् । अर्जुनार्जुन मा भैस्त्वं वज्रमस्त्रमुदीरय ॥ १२ ॥ इस प्रकार मुझे भयभीत हुआ देख मातलिने कहा—'अर्जुन! अर्जुन! तुम डरो मत। इस समय वज्रास्त्रका प्रयोग करो' ॥ १२ ॥
ततोऽहं तस्य तद् वाक्यं श्रुत्वा वज्रमुदीरयम् । देवराजस्य दयितं भीममस्त्रं नराधिप ॥ १३ ॥ महाराज! मातलिका वह वचन सुनकर मैंने देवराजके परम प्रिय तथा भयंकर अस्त्र वज्रका प्रयोग किया ॥ १३ ॥
अचलं स्थानमासाद्य गाण्डीवमनुमन्त्र्य च । अमुञ्चं वज्रसंस्पर्शान्यायसान् निशितान् शरान् ॥ १४ ॥ अविचल स्थानका आश्रय ले गाण्डीव धनुषको वज्रास्त्रसे अभिमन्त्रित करके मैंने लोहेके तीखे बाण छोड़े, जिनका स्पर्श वज्रके समान कठोर था ॥ १४ ॥
ततो मायाश्च ताः सर्वा निवातकवचांश्च तान् । ते वज्रचोदिता बाणा वज्रभूताः समाविशन् ॥ १५ ॥ तदनन्तर वज्रास्त्रसे प्रेरित हुए वे वज्रस्वरूप बाण पूर्वोक्त सारी मायाओं तथा निवातकवच दानवोंके भीतर घुस गये ॥ १५ ॥