भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1158

की ।। २३ ।। तेषामपि तु बाणास्ते तन्मातलिरपूजयत् । अवाकिरन् मां बलवत् तानहं व्यधमं शरैः ।। २४ ।। तदनन्तर उन दानवोंके भी बाण मेरे ऊपर जोर-जोरसे गिरने लगे। मातलिने उनकी उस बाण-वर्षाकी भी सराहना की। फिर मैंने अपने बाणोंद्वारा शत्रुओंके उन सब बाणोंको छिन्न-भिन्न कर डाला ।। २४ ।। वध्यमानास्ततस्ते तु निवातकवचाः पुनः । शरवर्षैर्महद्भिर्मां समन्तात् पर्यवारयन् ।। २५ ।। इस प्रकार मार खाते और मरते रहनेपर भी निवातकवचोंने पुनः भारी बाण-वर्षाके द्वारा मुझे सब ओरसे घेर लिया ।। २५ ।। शरवेगान्निहत्याहमस्त्रैरस्त्रविघातिभिः । ज्वलद्भिः परमैः शीघ्रैस्तानविध्यं सहस्रशः ।। २६ ।। तब मैंने अस्त्र-विनाशक अस्त्रोंद्वारा उनकी बाणवर्षाके वेगको शान्त करके अत्यन्त शीघ्रगामी एवं प्रज्वलित बाणोंद्वारा सहस्रों दैत्योंको घायल कर दिया ।। २६ ।। तेषां छिन्नानि गात्राणि विसृजन्ति स्म शोणितम् । प्रावृषीवाभिवृष्टानि शृङ्गाण्यथ धराभृताम् ।। २७ ।। उनके कटे हुए अंग उसी प्रकार रक्तकी धारा बहाते थे, जैसे वर्षा-ऋतुमें वृष्टिके जलसे भीगे हुए पर्वतोंके शिखर (गेरू आदि धातुओंसे मिश्रित) जलकी धारा बहाते हैं ।। २७ ।। इन्द्राशनिसमस्पर्शैर्वेगवद्भिरजिह्मगैः । मद्बाणैर्वध्यमानास्ते समुद्विग्नाः स्म दानवाः ।। २८ ।। मेरे बाणोंका स्पर्श इन्द्रके वज्रके समान था। वे बड़े वेगसे छूटते और सीधे जाकर शत्रुको अपना निशाना बनाते थे। उनकी चोट खाकर वे समस्त दानव भयसे व्याकुल हो उठे ।। २८ ।। शतधा भिन्नदेहास्ते क्षीणप्रहरणौजसः । ततो निवातकवचा मामयुध्यन्त मायया ।। २९ ।। उन दैत्योंके शरीरके सौ-सौ टुकड़े हो गये थे। उनके अस्त्र-शस्त्र कट गये और उत्साह नष्ट हो गया था। ऐसी अवस्थामें निवातकवचोंने मेरे साथ माया-युद्ध आरम्भ कर दिया ।। २९ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १७० ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें एक सौ सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १७० ।।

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