महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविचरते हुए मेरे ऊपर इन्द्रसारथि वीरवर मातलि बड़े प्रसन्न हुए ।। १४-१५ ।। बध्यमानास्ततस्तैस्तु हयैस्तेन रथेन च । अगमन् प्रक्षयं केचिन्न्यवर्तन्त तथा परे ।। १६ ।। मेरे उन घोड़ों तथा उस दिव्य रथसे कुचल जानेके कारण भी कितने ही दानव मारे गये और बहुत-से युद्ध छोड़कर भाग गये ।। १६ ।। स्पर्धमाना इवास्माभिर्निवातकवचा रणे । शरवर्षैः शरार्तं मां महद्भिः प्रत्यवारयन् ।। १७ ।। ततोऽहं लघुभिश्चित्रैर्ब्रह्मास्त्रपरिमन्त्रितैः । व्यधमं सायकैराशु शतशोऽथ सहस्रशः ।। १८ ।। निवातकवचोंने संग्राममें हमलोगोंसे होड़-सी लगा रखी थी। मैं बाणोंके आघातसे पीड़ित था, तो भी उन्होंने बड़ी भारी बाणवर्षा करके मेरी प्रगतिको रोकने-की चेष्टा की। तब मैंने अद्भुत और शीघ्रगामी बाणोंको ब्रह्मास्त्रसे अभिमन्त्रित करके चलाया और उनके द्वारा शीघ्र ही सैकड़ों तथा हजारों दानवोंका संहार करने लगा ।। १७-१८ ।। ततः सम्पीड़यनास्ते क्रोधाविष्टा महारथाः । अपीडयन् मां सहिताः शरशूलासिवृष्टिभिः ।। १९ ।। तदनन्तर मेरे बाणोंसे पीड़ित होकर वे महारथी दैत्य क्रोधसे आग-बबूला हो उठे और एक साथ संगठित हो खड्ग, शूल तथा बाणोंकी वर्षाद्वारा मुझे घायल करने लगे ।। १९ ।। ततोऽहमस्त्रमातिष्ठं परमं तिग्मतेजसम् । दयितं देवराजस्य माधवं नाम भारत ।। २० ।। भारत! यह देख मैंने देवराज इन्द्रके परम प्रिय माधव नामक प्रचण्ड तेजस्वी अस्त्रका आश्रय लिया ।। २० ।। ततः खड्गांस्त्रिशूलांश्च तोमरांश्च सहस्रशः । अस्त्रवीर्येण शतधा तैर्मुक्तानहमच्छिदम् ।। २१ ।। तब उस अस्त्रके प्रभावसे मैंने दैत्योंके चलाये हुए सहस्रों खड्ग, त्रिशूल और तोमरोंके सौ-सौ टुकड़े कर डाले ।। २१ ।। छित्त्वा प्रहरणान्येषां ततस्तानपि सर्वशः । प्रत्यविध्यमहं रोषाद् दशभिर्दशभिः शरैः ।। २२ ।। तत्पश्चात् दानवोंके समस्त अस्त्र-शस्त्रोंका उच्छेद करके मैंने रोषवश उन सबको भी दस-दस बाणोंसे घायल करके बदला चुकाया ।। २२ ।। गाण्डीवाद्धि तदा संख्ये यथा भ्रमरपङ्क्तयः । निष्पतन्ति महाबाणास्तन्मातलिरपूजयत् ।। २३ ।। उस समय मेरे गाण्डीव धनुषसे बड़े-बड़े बाण उस युद्ध-भूमिमें इस प्रकार छूटते थे, मानो वृक्षसे झुंड-के-झुंड भौंरे उड़ रहे हों। मातलिने मेरे इस कार्यकी बड़ी प्रशंसा