भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1156

मार्गान् बहुविधांस्तत्र विचेरुर्वातरंहसः । सुसंयता मातलिना प्रामथ्नन्त दितेः सुतान् ॥ ८ ॥ सारथिसे प्रेरित होकर वे अश्व नाना प्रकारकी चालें दिखाते हुए वायुके समान वेगसे चलने लगे। मातलिने उन्हें अच्छी तरह काबूमें कर रखा था। उन सबने वहाँ दितिके पुत्रोंको रौंद डाला ॥ ८ ॥

शतं शतास्ते हरयस्तस्मिन् युक्ता महारथे । शान्ता मातलिना यत्ता व्यचरन्नल्पका इव ॥ ९ ॥ अर्जुनके उस विशाल रथमें दस हजार घोड़े जुते हुए थे, तो भी मातलिने उन्हें इस प्रकार वशमें कर रखा था कि वे अल्पसंख्यक अश्वोंकी भाँति शान्तभावसे विचरते थे ॥ ९ ॥

तेषां चरणपातेन रथनेमिस्वनेन च । मम बाणनिपातैश्च हतास्ते शतशोऽसुराः ॥ १० ॥ उन घोड़ोंके पैरोंकी मार पड़नेसे, रथके पहियेकी घर्घराहट होनेसे तथा मेरे बाणोंकी चोट खानेसे सैकड़ों दैत्य मर गये ॥ १० ॥

गतासवस्तथैवान्ये प्रगृहीतशरासनाः । हतसारथयस्तत्र व्यकृष्यन्त तुरंगमैः ॥ ११ ॥ इसी प्रकार वहाँ दूसरे बहुत-से असुर हाथमें धनुष-बाण लिये प्राणरहित हो गये थे और उनके सारथि भी मारे गये थे, उस दशामें सारथिशून्य घोड़े उनके निर्जीव शरीरको खींचे लिये जाते थे ॥ ११ ॥

ते दिशो विदिशः सर्वे प्रतिरुध्य प्रहारिणः । अभ्यघ्नन् विविधैः शस्त्रैस्ततो मे व्यथितं मनः ॥ १२ ॥ तब वे समस्त दानव सारी दिशाओं और विदिशाओंको रोककर भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा मुझपर घातक प्रहार करने लगे। इससे मेरे मनमें बड़ी व्यथा हुई ॥ १२ ॥

ततोऽहं मातलेर्वीर्यमपश्यं परमाद्भुतम् । अश्वांस्तथा वेगवतो यदयत्नादधारयत् ॥ १३ ॥ उस समय मैंने मातलिकी अत्यन्त अद्भुत शक्ति देखी। उन्होंने वैसे वेगशाली अश्वोंको बिना किसी प्रयासके ही काबूमें कर लिया ॥ १३ ॥

ततोऽहं लघुभिश्चित्रैरस्त्रैस्तानसुरान् रणे । चिच्छेद सायुधान् राजन् शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १४ ॥ एवं मे चरतस्तत्र सर्वयत्नेन शत्रुहन् । प्रीतिमानभवद् वीरो मातलिः शक्रसारथिः ॥ १५ ॥ राजन्! तब मैंने उस रणभूमिने अस्त्र-शस्त्रधारी सैकड़ों तथा सहस्रों असुरोंको विचित्र एवं शीघ्रगामी बाणोंद्वारा मार गिराया। शत्रुदमन नरेश! इस प्रकार पूर्ण प्रयत्नपूर्वक युद्धमें