भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1161

स्वर्गसे लेकर पृथ्वीतक एक सूत्रमें आबद्ध-सी होकर पृथ्वीपर सब ओर जलकी धाराएँ लगातार गिर रही थीं, जिन्होंने वहाँ मुझे मोहमें डाल दिया था ॥ ७ ॥ तत्रोपदिष्टमिन्द्रेण दिव्यमस्त्रं विशोषणम् । दीप्तं प्राहिणवं घोरमशुष्यत् तेन तज्जलम् ॥ ८ ॥ तब मैंने वहाँ देवराज इन्द्रके द्वारा प्राप्त हुए दिव्य विशोषणास्त्रका प्रयोग किया, जो अत्यन्त तेजस्वी और भयंकर था। उससे वर्षाका वह सारा जल सूख गया ॥ ८ ॥ हतेऽश्मवर्षे च मया जलवर्षे च शोषिते । मुमुचुर्दानवा मायामग्निं वायुं च भारत ॥ ९ ॥ भारत! जब मैंने पत्थरोंकी वर्षा शान्त कर दी और पानीकी वर्षाको भी सोख लिया, तब दानवलोग मुझपर मायामय अग्नि और वायुका प्रयोग करने लगे ॥ ९ ॥ ततोऽहमग्निं व्यधमं सलिलास्त्रेण सर्वशः । शैलेन च महास्त्रेण वायोर्वेगमधारयम् ॥ १० ॥ फिर तो मैंने वारुणास्त्रसे वह सारी आग बुझा दी और महान् शैलास्त्रका प्रयोग करके मायामय वायुका वेग कुण्ठित कर दिया ॥ १० ॥ तस्यां प्रतिहतायां ते दानवा युद्धदुर्मदाः । प्राकुर्वन् विविधां मायां यौगपद्येन भारत ॥ ११ ॥ भारत! उस मायाका निवारण हो जानेपर वे रणोन्मत्त दानव एक ही समय अनेक प्रकारकी मायाका प्रयोग करने लगे ॥ ११ ॥ ततो वर्षं प्रादुरभूत् सुमहल्लोमहर्षणम् । अस्त्राणां घोररूपाणामग्नेर्वायोस्तथाश्मनाम् ॥ १२ ॥ फिर तो भयानक अस्त्रोंकी तथा अग्नि, वायु और पत्थरोंकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी जो रोंगटे खड़े कर देनेवाली थी ॥ १२ ॥ सा तु मायामयी वृष्टिः पीडयामास मां युधि । अथ घोरं तमस्तीव्रं प्रादुरासीत् समन्ततः ॥ १३ ॥ उस मायामयी वर्षाने युद्धमें मुझे बड़ी पीड़ा दी। तदनन्तर चारों ओर महाभयानक अन्धकार छा गया ॥ १३ ॥ तमसा संवृते लोके घोरेण परुषेण च । हरयो विमुखाश्चासन् प्रास्खलच्चापि मातलिः ॥ १४ ॥ घोर एवं दुःसह तिमिरराशिसे सम्पूर्ण लोकोंके आच्छादित हो जानेपर मेरे रथके घोड़े युद्धसे विमुख हो गये और मातलि भी लड़खड़ाने लगे ॥ १४ ॥ हस्ताद्धि रश्मयश्चास्य प्रतोदः प्रापतद् भुवि । असकृच्चाह मां भीतः क्वासीति भरतर्षभ ॥ १५ ॥