महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1162, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंउनके हाथसे घोड़ोंके लगाम और चाबुक पृथ्वीपर गिर पड़े और वे भयभीत होकर बार-बार मुझसे पूछने लगे— 'भरतश्रेष्ठ अर्जुन! तुम कहाँ हो?' ॥ १५ ॥ मां च भीराविशत् तीव्रा तस्मिन् विगतचेतसि । स च मां विगतज्ञानः संत्रस्तमिदमब्रवीत् ॥ १६ ॥ मातलिके बेसुध होनेपर मेरे मनमें भी अत्यन्त भय समा गया। तब सुध-बुध खोये हुए मातलिने मुझ भयभीत योद्धासे इस प्रकार कहा— ॥ १६ ॥ सुराणामसुराणां च संग्रामः सुमहानभूत् । अमृतार्थं पुरा पार्थ स च दृष्टो मयानघ ॥ १७ ॥ 'निष्पाप कुन्तीकुमार! प्राचीन कालमें अमृतकी प्राप्तिके लिये देवताओं और दैत्योंमें अत्यन्त घोर संग्राम हुआ था, जिसे मैंने अपनी आँखों देखा है ॥ १७ ॥ शम्बरस्य वधे घोरः संग्रामः सुमहानभूत् । सारथ्यं देवराजस्य तत्रापि कृतवानहम् ॥ १८ ॥ 'शम्बरासुरके वधके समय भी अत्यन्त भयानक युद्ध हुआ था। उसमें भी मैंने देवराज इन्द्रके सारथिका कार्य सँभाला था ॥ १८ ॥ तथैव वृत्रस्य वधे संगृहीता हया मया । वैरोचनेर्महायुद्धं दृष्टं चापि सुदारुणम् ॥ १९ ॥ 'इसी प्रकार वृत्रासुरके वधके समय भी मैंने ही घोड़ोंकी बागडोर हाथमें ली थी। विरोचनकुमार बलिका अत्यन्त भयंकर महासंग्राम भी मेरा देखा हुआ है ॥ १९ ॥ एते मया महाघोराः संग्रामाः पर्युपासिताः । न चापि विगतज्ञानोऽभूतपूर्वोऽस्मि पाण्डव ॥ २० ॥ 'ये बड़े-बड़े भयानक युद्ध मैंने देखे हैं, उनमें भाग लिया है, परंतु पाण्डुनन्दन! आजसे पहले कभी भी मैं इस प्रकार अचेत नहीं हुआ था ॥ २० ॥ पितामहेन संहारः प्रजानां विहितो ध्रुवम् । न हि युद्धमिदं युक्तमन्यत्र जगतः क्षयात् ॥ २१ ॥ 'जान पड़ता है, विधाताने आज समस्त प्रजाका संहार निश्चित किया है, अवश्य ऐसी ही बात है। जगत्के संहारके अतिरिक्त अन्य समयमें ऐसे भयानक युद्धका होना सम्भव नहीं है' ॥ २१ ॥ तस्य तद् वचनं श्रुत्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना । मोहयिष्यन् दानवानामहं मायाबलं महत् ॥ २२ ॥ अब्रुवं मातलिं भीतं पश्य मे भुजयोर्बलम् । अस्त्राणां च प्रभावं वै धनुषो गाण्डिवस्य च ॥ २३ ॥ अद्यास्त्रमाययैतेषां मायामेतां सुदारुणाम् । विनिहन्मि तमश्चोग्रं मा भैः सूत स्थिरो भव ॥ २४ ॥