महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1163, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंमातलिका यह वचन सुनकर मैंने स्वयं ही अपने-आपको सँभाला और दानवोंके उस महान् मायाबलका निवारण करते हुए भयभीत मातलिसे कहा—‘सूत! आप डरें मत। स्थिरतापूर्वक रथपर बैठे रहें और देखें, मेरी इन भुजाओंमें कितना बल है? मेरे गाण्डीव धनुष तथा अस्त्रोंका कैसा प्रभाव है? आज मैं अपने अस्त्रोंकी मायासे इन दानवोंकी इस भयंकर माया तथा घोर अन्धकारका विनाश किये देता हूँ’ ॥ २२—२४ ॥
एवमुक्त्वाहमसृजमस्त्रमायां नराधिप ।
मोहिनीं सर्वभूतानां हिताय त्रिदिवौकसाम् ॥ २५ ॥
नरेश्वर! ऐसा कहकर मैंने देवताओंके हितके लिये अस्त्रसम्बन्धिनी मायाकी सृष्टि की, जो समस्त प्राणियोंको मोहमें डालनेवाली थी ॥ २५ ॥
पीड्यमानासु मायासु तासु तास्वसुरोत्तमाः ।
पुनर्बहुविधा मायाः प्राकुर्वन्नमितौजसः ॥ २६ ॥
उससे असुरोंकी वे सारी मायाएँ नष्ट हो गयीं। तब उन अमित तेजस्वी दानवराजाओंने पुनः नाना प्रकारकी मायाएँ प्रकट कीं ॥ २६ ॥
पुनः प्रकाशमभवत् तमसा ग्रस्यते पुनः ।
भवत्यदर्शनो लोकः पुनरप्सु निमज्जति ॥ २७ ॥
इससे कभी तो प्रकाश छा जाता था और कभी सब कुछ अन्धकारमें विलीन हो जाता था। कभी सम्पूर्ण जगत् अदृश्य हो जाता और कभी जलमें डूब जाता था ॥ २७ ॥
सुसंगृहीतैर्हरिभिः प्रकाशे सति मातलिः ।
व्यचरत् स्यन्दनाग्र्येण संग्रामे लोमहर्षणे ॥ २८ ॥
तदनन्तर प्रकाश होनेपर मातलिने घोड़ोंको काबूमें करके अपने श्रेष्ठ रथके द्वारा उस रोमांचकारी संग्राममें विचरना प्रारम्भ किया ॥ २८ ॥
ततः पर्यपतन्नुग्रा निवातकवचा मयि ।
तानहं विवरं दृष्ट्वा प्राहिण्वं यमसादनम् ॥ २९ ॥
तब भयानक निवातकवच चारों ओरसे मेरे ऊपर टूट पड़े। उस समय मैंने अवसर देख-देखकर उन सबको यमलोक भेज दिया ॥ २९ ॥
वर्तमाने तथा युद्धे निवातकवचान्तके ।
नापश्यं सहसा सर्वान् दानवान् माययाऽऽवृतान् ॥ ३० ॥
वह युद्ध निवातकवचोंके लिये विनाशकारी था। अभी युद्ध हो ही रहा था कि सहसा सारे दानव अन्तर्धानी मायासे छिप गये। अतः मैं किसीको भी देख न सका ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि मायायुद्धे एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७१ ॥