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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प

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सप्ताधिकद्विशततमोऽध्यायः

कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन

मार्कण्डेय उवाच

चिन्तयित्वा तदाश्चर्यं स्त्रिया प्रोक्तमशेषतः ।
विनिन्दन् स स्वमात्मानमागस्कृत इवाबभौ ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! उस पतिव्रता देवीकी कही हुई सारी बातोंपर विचार करके कौशिक ब्राह्मणको बड़ा आश्चर्य हुआ। वह अपने-आपको धिक्कारता हुआ अपराधी-सा जान पड़ने लगा ॥ १ ॥

चिन्तयानः स्वधर्मस्य सूक्ष्मां गतिमथाब्रवीत् ।
श्रद्दधानेन वै भाव्यं गच्छामि मिथिलामहम् ॥ २ ॥
फिर अपने धर्मकी सूक्ष्म गतिपर विचार करके वह मन-ही-मन बोला—'मुझे (उस सतीके कथनपर) श्रद्धा और विश्वास करना चाहिये; अतः मैं अवश्य मिथिला जाऊँगा ॥ २ ॥

कृतात्मा धर्मवित् तस्यां व्याधो निवसते किल ।
तं गच्छाम्यहमद्यैव धर्मं प्रष्टुं तपोधनम् ॥ ३ ॥
'कहते हैं, वहाँ एक पुण्यात्मा धर्मज्ञ व्याध निवास करता है। मैं उस तपोधन व्याधसे धर्मकी बात पूछनेके लिये आज ही उसके पास जाऊँगा' ॥ ३ ॥

इति संचित्य मनसा श्रद्दधानः स्त्रिया वचः ।
बलाकाप्रत्ययेनासौ धर्म्यैश्च वचनैः शुभैः ॥ ४ ॥
सम्प्रतस्थे स मिथिलां कौतूहलसमन्वितः ।
मन-ही-मन ऐसा निश्चय करके वह कौतूहलवश मिथिलापुरीकी ओर चल दिया। पतिव्रता स्त्री बगुली पक्षीवाली घटना स्वयं जान गयी थी और उसने धर्मानुकूल शुभ वचनोंद्वारा उपदेश दिया था, इन कारणोंसे उसकी बातोंपर कौशिक ब्राह्मणकी बड़ी श्रद्धा हो गयी थी ॥ ४ १/२ ॥

अतिक्रामन्नरण्यानि ग्रामांश्च नगराणि च ॥ ५ ॥
ततो जगाम मिथिलां जनकेन सुरक्षिताम् ।
धर्मसेतुसमाकीर्णां यज्ञोत्सववतीं शुभाम् ॥ ६ ॥

वह अनेकानेक जंगलों, गाँवों तथा नगरोंको पार करता हुआ राजा जनकके द्वारा सुरक्षित, धर्मकी मर्यादासे व्याप्त तथा यज्ञसम्बन्धी उत्सवोंसे सुशोभित सुन्दर मिथिलापुरीमें जा पहुँचा ॥ ५-६ ॥

गोपुराट्टालकवतीं हर्म्यप्राकारशोभनाम् ।
प्रविश्य नगरीं रम्यां विमानैर्बहुभिर्युताम् ॥ ७ ॥
पण्यैश्च बहुभिर्युक्तां सुविभक्तमहापथाम् ।
अश्वै रथैस्तथा नागैर्योधैश्च बहुभिर्युताम् ॥ ८ ॥
हृष्टपुष्टजनाकीर्णां नित्योत्सवसमाकुलाम् ।
सोऽपश्यद् बहुवृत्तान्तां ब्राह्मणः समतिक्रमन् ॥ ९ ॥
बहुत-से गोपुर, अट्टालिकाएँ, महल और चहारदीवारियाँ उस नगरकी शोभा बढ़ा रही थीं। वह रमणीय पुरी बहुत-से विमानोंसे युक्त थी तथा बहुत-सी दुकानें उस पुरीका सौन्दर्य बढ़ाती थीं। सुन्दर ढंगसे बनायी हुई बड़ी-बड़ी सड़कें शोभा पा रही थीं। बहुसंख्यक घोड़े, रथ, हाथी और सैनिकोंसे संयुक्त मिथिलापुरी हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरी हुई थी। वहाँ नित्य नाना प्रकारके उत्सव होते रहते थे और अनेक प्रकारकी घटनाएँ घटित होती थीं। ब्राह्मणने उस पुरीमें प्रवेश करके सब ओर घूम-घामकर उसे अच्छी तरह देखा ॥

धर्मव्याधमपृच्छच्च स चास्य कथितो द्विजैः ।
अपश्यत् तत्र गत्वा तं सूनामध्ये व्यवस्थितम् ॥ १० ॥
मार्गमाहिषमांसानि विक्रीणन्तं तपस्विनम् ।
आकुलत्वाच्च क्रेतॄणामेकान्ते संस्थितो द्विजः ॥ ११ ॥
वहाँ उसने लोगोंसे धर्मव्याधका पता पूछा और ब्राह्मणोंने उसे उसका स्थान बता दिया। कौशिकने वहाँ जाकर देखा कि तपस्वी धर्मव्याध कसाईखानेमें बैठकर सूअर, भैंसे आदि पशुओंका मांस बेच रहा है। वहाँ ग्राहकोंकी भीड़ लगी हुई थी, इसलिये कौशिक एकान्तमें जाकर खड़ा हो गया ॥ १०-११ ॥

स तु ज्ञात्वा द्विजं प्राप्तं सहसा सम्भ्रमोत्थितः ।
आजगाम यतो विप्रः स्थित एकान्तदर्शने ॥ १२ ॥
ब्राह्मणको आया हुआ जानकर व्याध सहसा शीघ्रतापूर्वक उठ खड़ा हुआ और उस स्थानपर आ गया जहाँ ब्राह्मण एकान्त स्थानमें खड़ा था ॥ १२ ॥

व्याध उवाच

अभिवादये त्वां भगवन् स्वागतं ते द्विजोत्तम ।
अहं व्याधो हि भद्रं ते किं करोमि प्रशाधि माम् ॥ १३ ॥
व्याध बोला— भगवन्! मैं आपके चरणोंमें प्रणाम करता हूँ। द्विजश्रेष्ठ! आपका स्वागत है। मैं ही वह व्याध हूँ (जिसकी खोजमें आपने यहाँतक आनेका कष्ट किया है)।

आपका भला हो, आज्ञा दीजिये, मैं क्या सेवा करूँ? ।। १३ ।।

एकपत्न्या यदुक्तोऽसि गच्छ त्वं मिथिलामिति । जानाम्येतदहं सर्वं यदर्थं त्वमिहागतः ।। १४ ।। उस पतिव्रता देवीने जो आपसे यह कहकर भेजा है कि 'तुम मिथिलापुरीको जाओ।' वह सब मैं जानता हूँ। आप जिस उद्देश्यसे यहाँ पधारे हैं, वह भी मुझे मालूम है ।। १४ ।। श्रुत्वा च तस्य तद् वाक्यं स विप्रो भृशविस्मितः । द्वितीयमिदमाश्चर्यमित्यचिन्तयत द्विजः ।। १५ ।। व्याधकी वह बात सुनकर ब्राह्मणको बड़ा विस्मय हुआ। वह मन-ही-मन सोचने लगा—'यह दूसरा आश्चर्य दृष्टिगोचर हुआ है' ।। १५ ।। अदेशस्थं हि ते स्थानमिति व्याधोऽब्रवीदिदम् । गृहं गच्छाव भगवन् यदि ते रोचतेऽनघ ।। १६ ।। इसके बाद व्याधने कहा—'भगवन्! यह स्थान आपके ठहरनेयोग्य नहीं है। अनघ! यदि आपकी रुचि हो तो हम दोनों हमारे घरपर चलें' ।। १६ ।। मार्कण्डेय उवाच बाढमित्येव तं विप्रो हृष्टो वचनमब्रवीत् । अग्रतस्तु द्विजं कृत्वा स जगाम गृहं प्रति ।। १७ ।।

**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! यह सुनकर ब्राह्मणको बड़ा हर्ष हुआ। उसने व्याधसे कहा—'बहुत अच्छा, ऐसा ही करो।' तब व्याध ब्राह्मणको आगे करके घरकी ओर चला ॥ १७ ॥

प्रविश्य च गृहं रम्यमासनेनाभिपूजितः ।
अर्घ्येण च स वै तेन व्याधेन द्विजसत्तमः ॥ १८ ॥
व्याधका घर बहुत सुन्दर था। वहाँ पहुँचकर उस व्याधने ब्राह्मणको बैठनेके लिये आसन दिया और अर्घ्य देकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मणकी आदरसहित पूजा की ॥ १८ ॥

ततः सुखोपविष्टं व्याधं वचनमब्रवीत् ।
कर्मैतद् वै न सदृशं भवतः प्रतिभाति मे ।
अनुतप्ये भृशं तात तव घोरेण कर्मणा ॥ १९ ॥
सुखपूर्वक बैठ जानेपर ब्राह्मणने व्याधसे कहा—'तात! यह मांस बेचनेका काम निश्चय ही तुम्हारे योग्य नहीं है। मुझे तो तुम्हारे इस घोर कर्मसे बहुत संताप हो रहा है' ॥ १९ ॥

व्याध उवाच

कुलोचितमिदं कर्म पितृपैतामहं परम् ।
वर्तमानस्य मे धर्मे स्वे मन्युं मा कृथा द्विज ॥ २० ॥
**व्याध बोला—**ब्रह्मन्! यह काम मेरे बाप-दादोंके समयसे होता चला आ रहा है। मेरे कुलके लिये जो उचित है वही धंधा मैंने भी अपनाया है। मैं अपने धर्मका ही पालन कर रहा हूँ; अतः आप मुझपर क्रोध न करें ॥ २० ॥

विधात्रा विहितं पूर्वं कर्म स्वमनुपालयन् ।
प्रयत्नाच्च गुरू वृद्धौ शुश्रूषेऽहं द्विजोत्तम ॥ २१ ॥
द्विजश्रेष्ठ! विधाताने इस कुलमें जन्म देकर मेरे लिये जो कार्य प्रस्तुत किया है, उसका पालन करता हुआ मैं अपने बूढ़े माता-पिताकी बड़े यत्नसे सेवा करता रहता हूँ ॥ २१ ॥

सत्यं वदे नाभ्यसूये यथाशक्ति ददामि च ।
देवतातिथिभृत्यानामवशिष्टेन वर्तये ॥ २२ ॥
सत्य बोलता हूँ। किसीकी निन्दा नहीं करता और अपनी शक्तिके अनुसार दान भी करता हूँ। देवताओं, अतिथियों और भरण-पोषणके योग्य कुटुम्बिजनों तथा सेवकोंको भोजन देकर जो बचता है उसीसे शरीरका निर्वाह करता हूँ ॥ २२ ॥

न कुत्सयाम्यहं किंचिन्न गर्हे बलवत्तरम् ।
कृतमन्वेति कर्तारं पुरा कर्म द्विजोत्तम ॥ २३ ॥
द्विजश्रेष्ठ! किसीके दोषोंकी चर्चा नहीं करता और अपनेसे बलिष्ठ पुरुषकी निन्दा नहीं करता, क्योंकि पहलेके किये हुए शुभाशुभ कर्मोंका परिणाम स्वयं कर्ताको ही भोगना पड़ता है ॥ २३ ॥

कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यमिह लोकस्य जीवनम् । दण्डनीतिस्त्रयी विद्या तेन लोको भवत्युत ॥ २४ ॥ कृषि, गोरक्षा, वाणिज्य, दण्डनीति और त्रयीविद्या—ऋक्, यजु, सामके अनुसार यज्ञादिका अनुष्ठान करना और कराना ये लोगोंकी जीविकाके साधन हैं। इनसे ही लौकिक और पारलौकिक उन्नति सम्भव होती है ॥ २४ ॥

कर्म शूद्रे कृषिर्वैश्ये संग्रामः क्षत्रिये स्मृतः । ब्रह्मचर्यं तपो मन्त्राः सत्यं च ब्राह्मणे सदा ॥ २५ ॥ शूद्रका कर्तव्य है सेवा-कर्म, वैश्यका कार्य है खेती और युद्ध करना क्षत्रियका कर्म माना गया है। ब्रह्मचर्य, तपस्या, मन्त्र-जप, वेदाध्ययन तथा सत्यभाषण—ये सदा ब्राह्मणके पालन करनेयोग्य धर्म हैं ॥ २५ ॥

राजा प्रशास्ति धर्मेण स्वकर्मनिरताः प्रजाः । विकर्माणश्च ये केचित् तान् युनक्ति स्वकर्मसु ॥ २६ ॥ राजा अपने-अपने वर्णाश्रमोचित कर्ममें लगी हुई प्रजाका धर्मपूर्वक शासन करता है और जो कोई अपने कर्मोंसे गिरकर विपरीत दिशामें जा रहे हों उन्हें पुनः अपने कर्तव्यके पालनमें लगाता है ॥ २६ ॥

भेतव्यं हि सदा राज्ञः प्रजानामधिपा हि ते । वारयन्ति विकर्मस्थं नृपा मृगमिवेषुभिः ॥ २७ ॥ इसलिये राजाओंसे सदा डरते रहना चाहिये; क्योंकि वे प्रजाके स्वामी हैं। जो लोग धर्मके विपरीत कार्य करते हैं, उन्हें राजा दण्डद्वारा उसी प्रकार पापसे रोकते हैं, जैसे बाणोंद्वारा वे हिंसक पशुओंको हिंसासे रोकते हैं ॥

जनकस्येह विप्रर्षे विकर्मस्थो न विद्यते । स्वकर्मनिरता वर्णाश्चत्वारोऽपि द्विजोत्तम ॥ २८ ॥ ब्रह्मर्षे! यह राजा जनकका नगर है, यहाँ कोई भी ऐसा नहीं है जो वर्ण-धर्मके विरुद्ध आचरण करे। द्विजश्रेष्ठ! यहाँ चारों वर्णोंके लोग अपना-अपना कर्म करते हैं ॥ २८ ॥

स एष जनको राजा दुर्वृत्तमपि चेत् सुतम् । दण्ड्यं दण्डे निक्षिपति तथा न ग्लाति धार्मिकम् ॥ २९ ॥ ये राजा जनक दुराचारीको, वह अपना पुत्र ही क्यों न हो, दण्डनीय मानकर दण्ड देते ही हैं तथा किसी भी धर्मात्माको कष्ट नहीं पहुँचने देते हैं ॥ २९ ॥

सुयुक्तचारो नृपतिः सर्वं धर्मेण पश्यति । श्रीश्च राज्यं च दण्डश्च क्षत्रियाणां द्विजोत्तम ॥ ३० ॥ विप्रवर! राजा जनकने सब ओर गुप्तचर लगा रखे हैं, अतः उनके द्वारा वे धर्मानुसार सबपर दृष्टि रखते हैं। सम्पत्तिका उपार्जन, राज्यकी रक्षा तथा अपराधियोंको दण्ड देना—ये क्षत्रियोंके कर्तव्य हैं ॥ ३० ॥

राजानो हि स्वधर्मेण श्रियमिच्छन्ति भूयसीम् । सर्वेषामेव वर्णानां त्राता राजा भवत्युत ॥ ३१ ॥ राजालोग अपने धर्मका पालन करते हुए ही प्रचुर सम्पत्ति पानेकी इच्छा रखते हैं और राजा सभी वर्णोंका रक्षक होता है ॥ ३१ ॥ परेण हि हतान् ब्रह्मन् वराहमहिषानहम् । न स्वयं हन्मि विप्रर्षे विक्रीणामि सदा त्वहम् ॥ ३२ ॥ ब्रह्मन्! मैं स्वयं किसी जीवकी हिंसा नहीं करता। सदा दूसरोंके मारे हुए सूअर और भैंसोंका मांस बेचता हूँ ॥ ३२ ॥ न भक्षयामि मांसानि ऋतुगामी तथा ह्यहम् । सदोपवासी च तथा नक्तभोजी सदा द्विज ॥ ३३ ॥ मैं स्वयं मांस कभी नहीं खाता। ऋतुकाल प्राप्त होनेपर ही पत्नी-समागम करता हूँ। द्विजप्रवर! मैं दिनमें सदा ही उपवास और रातमें भोजन करता हूँ ॥ ३३ ॥ अशीलश्चापि पुरुषो भूत्वा भवति शीलवान् । प्राणिहिंसारतश्चापि भवते धार्मिकः पुनः ॥ ३४ ॥ शीलसे रहित पुरुष भी कभी शीलवान् हो जाता है। प्राणियोंकी हिंसामें अनुरक्त मनुष्य भी फिर धर्मात्मा हो जाता है ॥ ३४ ॥ व्यभिचारान्नरेन्द्राणां धर्मः संकीर्यते महान् । अधर्मो वर्धते चापि संकीर्यन्ते ततः प्रजाः ॥ ३५ ॥ राजाओंके व्यभिचार-दोषसे धर्म अत्यन्त संकीर्ण हो जाता है और अधर्म बढ़ जाता है, इससे प्रजामें वर्णसंकरता आ जाती है ॥ ३५ ॥ भेरुण्डा वामनाः कुब्जाः स्थूलशीर्षास्तथैव च । क्लीबाश्चान्धाश्च बधिरा जायन्तेऽत्युच्चलोचनाः ॥ ३६ ॥ उस दशामें भयंकर आकृतिवाले, बौने, कुबड़े, मोटे मस्तकवाले, नपुंसक, अंधे, बहरे और अधिक ऊँचे नेत्रोंवाले मनुष्य उत्पन्न होते हैं ॥ ३६ ॥ पार्थिवानामधर्मत्वात् प्रजानामभवः सदा । स एष राजा जनकः प्रजा धर्मेण पश्यति ॥ ३७ ॥ राजाओंके अधर्मपरायण होनेसे प्रजाकी सदा अवनति होती है। हमारे ये राजा जनक समस्त प्रजाको धर्मपूर्ण दृष्टिसे ही देखते हैं ॥ ३७ ॥ अनुगृह्णन् प्रजाः सर्वा स्वधर्मनिरताः सदा । (पात्येव राजा जनकः पितृवज्जनसत्तम ।) ये चैव मां प्रशंसन्ति ये च निन्दन्ति मानवाः ॥ ३८ ॥ सर्वान् सुपरिणीतेन कर्मणा तोषयाम्यहम् ।

नरश्रेष्ठ! राजा जनक सदा स्वधर्ममें तत्पर रहनेवाली सम्पूर्ण प्रजापर अनुग्रह रखते हुए उसका पिताकी भाँति सदा पालन करते हैं। जो लोग मेरी प्रशंसा करते हैं और जो निन्दा करते हैं, उन सबको अपने सद्व्यवहारसे संतुष्ट रखता हूँ ।। ३८ ।।

ये जीवन्ति स्वधर्मेण संयुज्जन्ति च पार्थिवाः ।। ३९ ।।
न किंचिदुपजीवन्ति दान्ता उत्थानशीलिनः ।
जो राजा अपने धर्मका पालन करते हुए जीवन-निर्वाह करते हैं, धर्ममें ही संयुक्त रहते हैं, किसी दूसरेकी कोई वस्तु अपने उपयोगमें नहीं लाते तथा सदा अपनी इन्द्रियोंपर संयम रखते हैं, वे ही उन्नतिशील होते हैं ।। ३९ १/२ ।।

शक्त्यान्नदानं सततं तितिक्षा धर्मनित्यता ।। ४० ।।
यथार्हं प्रति पूजा च सर्वभूतेषु वै सदा ।
त्यागान्नान्यत्र मर्त्यानां गुणास्तिष्ठन्ति पूरुषे ।। ४१ ।।
अपनी शक्तिके अनुसार सदा दूसरोंको अन्न देना, दूसरोंके अपराध तथा शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वोंको सहन करना, सदा धर्ममें दृढ़तापूर्वक लगे रहना तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें सभी पूजनीय पुरुषोंका यथायोग्य पूजन करना—ये मनुष्योंके सद्गुण पुरुषमें स्वार्थत्यागके बिना नहीं रह पाते हैं ।। ४०-४१ ।।

मृषा वादं परिहरेत् कुर्यात् प्रियमयाचितः ।
न च कामान्न संरम्भान्न द्वेषाद् धर्ममुत्सृजेत् ।। ४२ ।।
झूठ बोलना छोड़ दे, बिना कहे ही दूसरोंका प्रिय करे, काम, क्रोध तथा द्वेषसे भी कभी धर्मका परित्याग न करे ।। ४२ ।।

प्रिये नातिभृशं हृष्येदप्रिये न च संज्वरेत् ।
न मुह्येदर्थकृच्छ्रेषु न च धर्मं परित्यजेत् ।। ४३ ।।
प्रिय वस्तुकी प्राप्ति होनेपर हर्षसे फूल न उठे, अपने मनके विपरीत कोई बात हो जाय तो दुःख न माने—चिन्तित न हो, अर्थसंकट आ जाय तो भी मोहके वशीभूत हो घबराये नहीं और किसीभी अवस्थामें अपना धर्म न छोड़े ।। ४३ ।।

कर्म चेत्किंचिदन्यत् स्यादितरन्न तदाचरेत् ।
यत् कल्याणमभिध्यायेत् तत्रात्मानं नियोजयेत् ।। ४४ ।।
यदि भूलसे कभी कोई निन्दित कर्म बन जाय तो फिर दुबारा वैसा काम न करे। अपने मन और बुद्धिसे विचार करनेपर जो कल्याणकारी प्रतीत हो, उसी कार्यमें अपनेको लगावे ।। ४४ ।।

न पापे प्रतिपापः स्यात् साधुरेव सदा भवेत् ।
आत्मनैव हतः पापो यः पापं कर्तुमिच्छति ।। ४५ ।।
यदि कोई अपने साथ बुरा बर्ताव करे तो स्वयं भी बदलेमें उसके साथ बुराई न करे। सबके साथ सदा सद्व्यवहार ही करे। जो पापी दूसरोंका अहित करना चाहता है वह स्वयं

ही नष्ट हो जाता है ॥ ४५ ॥ कर्म चैतदसाधूनां वृजिनानामसाधुवत् । न धर्मोऽस्तीति मन्वानाः शुचीनवहसन्ति ये ॥ ४६ ॥ अश्रद्दधाना धर्मस्य ते नश्यन्ति न संशयः । महादृतिरिवाध्मातः पापो भवति नित्यदा ॥ ४७ ॥ यह (दूसरोंका अहित करना) तो दुराचारीकी भाँति दुर्व्यसनोंमें आसक्त हुए पापी पुरुषोंका ही कार्य है। 'धर्म कोई चीज नहीं है' ऐसा मानकर जो शुद्ध आचार-विचारवाले श्रेष्ठ पुरुषोंकी हँसी उड़ाते हैं, वे धर्मपर अश्रद्धा रखनेवाले मनुष्य निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं। पापी मनुष्य लुहारकी बड़ी धौंकनीके समान सदा ऊपरसे फूले दिखायी देते हैं (परंतु वास्तवमें सारहीन होते हैं) ॥ ४६-४७ ॥ (साधुः सन्नतिमानेव सर्वत्र द्विजसत्तम ।) मूढानामवलिप्तानामसारं भावितं भवेत् । दर्शयत्यन्तरात्मा तं दिवा रूपमिवांशुमान् ॥ ४८ ॥ द्विजश्रेष्ठ! उत्तम पुरुष सर्वत्र विनयशील ही होता है। अहंकारी मूढ़ मनुष्योंकी सोची हुई प्रत्येक बात निःसार होती है। जैसे सूर्य दिनके रूपको प्रकट कर देता है, उसी प्रकार मूर्खोंकी अन्तरात्मा ही उनके यथार्थ स्वरूपका दर्शन करा देती है ॥ ४८ ॥ न लोके राजते मूर्खः केवलात्मप्रशंसया । अपि चेह श्रिया हीनः कृतविद्यः प्रकाशते ॥ ४९ ॥ मूर्ख मनुष्य केवल अपनी प्रशंसाके बलसे जगत्-में प्रतिष्ठा नहीं पाता है, विद्वान् पुरुष कान्तिहीन हो तो भी संसारमें उसकी ख्याति बढ़ जाती है ॥ ४९ ॥ अब्रुवन् कस्यचिन्निन्दामात्मपूजामवर्णयन् । न कश्चिद् गुणसम्पन्नः प्रकाशो भुवि दृश्यते ॥ ५० ॥ किसी दूसरेकी निन्दा न करे, अपनी मान-प्रतिष्ठाकी प्रशंसा न करे, कोई भी गुणवान् पुरुष पर निन्दा और आत्मप्रशंसाका त्याग किये बिना इस भूमण्डलमें सम्मानित हुआ हो, यह नहीं देखा जाता है ॥ ५० ॥ विकर्मणा तप्यमानः पापाद् विपरिमुच्यते । न तत् कुर्यां पुनरिति द्वितीयात् परिमुच्यते ॥ ५१ ॥ जो मनुष्य पापकर्म बन जानेपर सच्चे हृदयसे पश्चात्ताप करता है, वह उस पापसे छूट जाता है तथा 'फिर कभी ऐसा कर्म नहीं करूँगा' ऐसा दृढ़ निश्चय कर लेनेपर वह भविष्यमें होनेवाले दूसरे पापसे भी बच जाता है ॥ ५१ ॥ कर्मणा येन तेनेह पापाद् द्विजवरोत्तम । एवं श्रुतिरियं ब्रह्मन् धर्मेषु प्रतिदृश्यते ॥ ५२ ॥

विप्रवर! शास्त्रविहित (जप, तप, यज्ञ, दान आदि) किसी भी कर्मका निष्कामभावसे आचरण करनेपर पापसे छुटकारा मिल सकता है। ब्रह्मन्! धर्मके विषयमें ऐसी श्रुति देखी जाती है ॥ ५२ ॥

पापान्‍यबुद्ध्वेह पुरा कृतानि
प्राग् धर्मशीलोऽपि विहन्ति पश्चात् ।
धर्मो राजन् नुदते पूरुषाणां
यत् कुर्वते पापमिह प्रमादात् ॥ ५३ ॥

पहलेका धर्मशील पुरुष भी यदि अनजानमें यहाँ कोई पाप कर बैठे तो वह पीछे (निष्काम पुण्यकर्मद्वारा) उस पापको नष्ट कर देता है। राजन्! मनुष्योंका धर्म ही यहाँ प्रमादवश किये हुए उनके पापोंको दूर कर देता है ॥ ५३ ॥

पापं कृत्वा हि मन्येत नाहमस्मीति पूरुषः ।
तं तु देवाः प्रपश्यन्ति स्वस्यैवान्तरपूरुषः ॥ ५४ ॥

जो मनुष्य पाप करके भी यह मानता है कि ‘मैं पापी नहीं हूँ।’ वह भूल करता है; क्योंकि देवता उसे और उसके पापको देखते हैं तथा उसीके भीतर बैठा हुआ परमात्मा भी देखता ही है ॥ ५४ ॥

चिकीर्षेदेव कल्याणं श्रद्दधानोऽनसूयकः ।
वसनस्येव छिद्राणि साधूनां विवृणोति यः ॥ ५५ ॥
(अपश्यन्नात्मनो दोषान् स पापः प्रेत्य नश्यति ॥)

श्रद्धालु मनुष्य दूसरोंके दोष देखना छोड़कर सदा सबके हितकी ही इच्छा करे। जो पापी अपने दोषोंकी ओरसे आँखें बंद करके सदा दूसरे श्रेष्ठ पुरुषोंके दोषोंको ही कपड़ेके छेदोंकी भाँति अधिकाधिक प्रकट करता और बढ़ाता है, वह मृत्युके पश्चात् नष्ट हो जाता है—परलोकमें उसे कोई सुख नहीं मिलता है ॥ ५५ ॥

पापं चेत् पुरुषः कृत्वा कल्याणमभिपद्यते ।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो महाभ्रेणेव चन्द्रमाः ॥ ५६ ॥

यदि मनुष्य पाप करके भी कल्याणकारी कर्ममें लग जाता है, तो वह महामेघसे मुक्त हुए चन्द्रमाकी भाँति सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ५६ ॥

यथाऽऽदित्यः समुद्यन् वै तमः पूर्वं व्यपोहति ।
एवं कल्याणमातिष्ठन् सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५७ ॥

जैसे सूर्य उदय होनेपर पहलेके अन्धकारको नष्ट कर देते हैं, उसी प्रकार कल्याणकारी शुभ कर्मका निष्कामभावसे अनुष्ठान करनेवाला पुरुष सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥ ५७ ॥

पापानां विद्ध्यधिष्ठानं लोभमेव द्विजोत्तम ।
लुब्धाः पापं व्यवस्यन्ति नरा नातिबहुश्रुताः ॥ ५८ ॥

विप्रवर! लोभको ही पापोंका घर समझो। जिन्होंने अधिकतर शास्त्रोंका श्रवण नहीं किया है, वे लोभी मनुष्य ही पाप करनेका विचार रखते हैं ॥ ५८ ॥ अधर्मा धर्मरूपेण तृणैः कूपा इवावृताः । तेषां दमः पवित्राणि प्रलापा धर्मसंश्रिताः । सर्वं हि विद्यते तेषु शिष्टाचारः सुदुर्लभः ॥ ५९ ॥ तिनकेसे ढके हुए कुओंकी भाँति धर्मकी आड़में कितने ही अधर्म चल रहे हैं। धर्मात्माके वेशमें रहनेवाले इन अधार्मिक मनुष्योंमें इन्द्रिय-संयम, पवित्रता और धर्मसम्बन्धी चर्चा आदि सभी गुण तो होते हैं, परंतु उनमें शिष्टाचार (श्रेष्ठ पुरुषोंका-सा आचार-व्यवहार) अत्यन्त दुर्लभ है ॥ ५९ ॥

मार्कण्डेय उवाच

स तु विप्रो महाप्राज्ञो धर्मव्याधमपृच्छत । शिष्टाचारं कथमहं विद्यामिति नरोत्तम ॥ ६० ॥ **मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तदनन्तर परम बुद्धिमान् कौशिकने धर्मव्याधसे पूछा—'नरश्रेष्ठ! मुझे शिष्टाचारका ज्ञान कैसे हो? ॥ ६० ॥

एतदिच्छामि भद्रं ते श्रोतुं धर्मभृतां वर । त्वत्तो महामते व्याध तद् ब्रवीहि यथातथम् ॥ ६१ ॥ 'धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महामते व्याध! तुम्हारा भला हो, मैं ये सब बातें तुमसे सुनना चाहता हूँ। अतः यथार्थ रूपसे इनका वर्णन करो' ॥ ६१ ॥

व्याध उवाच

यज्ञो दानं तपो वेदाः सत्यं च द्विजसत्तम । पञ्चैतानि पवित्राणि शिष्टाचारेषु सर्वदा ॥ ६२ ॥ **व्याधने कहा—**द्विजश्रेष्ठ! यज्ञ, दान, तपस्या, वेदोंका स्वाध्याय और सत्यभाषण—ये पाँच पवित्र वस्तुएँ शिष्ट पुरुषोंके आचार-व्यवहारमें सदा देखी गयी हैं ॥ ६२ ॥

कामक्रोधौ वशे कृत्वा दम्भं लोभमनार्जवम् । धर्ममित्येव संतुष्टास्ते शिष्टाः शिष्टसम्मताः ॥ ६३ ॥ जो काम, क्रोध, लोभ, दम्भ और कुटिलताको वशमें करके केवल धर्मको ही अपनाकर संतुष्ट रहते हैं, वे शिष्ट कहलाते हैं और उन्हींका शिष्ट पुरुष आदर करते हैं ॥ ६३ ॥

न तेषां विद्यतेऽवृत्तं यज्ञस्वाध्यायशीलिनाम् । आचारपालनं चैव द्वितीयं शिष्टलक्षणम् ॥ ६४ ॥ वे निरन्तर यज्ञ और स्वाध्यायमें लगे रहते हैं। उनमें स्वेच्छाचार नहीं होता। सदाचारका पालन शिष्ट पुरुषोंका दूसरा लक्षण है ॥ ६४ ॥

गुरुशुश्रूषणं सत्यमक्रोधो दानमेव च ।

एतच्चतुष्टयं ब्रह्मन् शिष्टाचारेषु नित्यदा ॥ ६५ ॥ ब्रह्मन्! शिष्टाचारी पुरुषोंमें गुरुकी सेवा, सत्य-भाषण, क्रोधका अभाव तथा दान—ये चार सद्गुण सदा रहते हैं ॥ ६५ ॥

शिष्टाचारे मनः कृत्वा प्रतिष्ठाप्य च सर्वशः । यामयं लभते वृत्तिं सा न शक्या ह्यतोऽन्यथा ॥ ६६ ॥ मनुष्य शिष्ट पुरुषोंके उपर्युक्त आचारमें मनको सब प्रकारसे स्थापित करके जिस उत्तम स्थितिको प्राप्त करता है उसकी उपलब्धि और किसी प्रकारसे नहीं हो सकती ॥ ६६ ॥

वेदस्योपनिषत् सत्यं सत्यस्योपनिषद् दमः । दमस्योपनिषत् त्यागः शिष्टाचारेषु नित्यदा ॥ ६७ ॥ वेदका सार है सत्य, सत्यका सार है इन्द्रिय-संयम और इन्द्रिय-संयमका सार है त्याग। यह त्याग शिष्ट पुरुषोंके आचारमें सदा विद्यमान रहता है ॥ ६७ ॥

ये तु धर्मानसूयन्ते बुद्धिमोहान्विता नराः । अपथा गच्छतां तेषामनुयाता च पीड्यते ॥ ६८ ॥ जो मनुष्य बुद्धिमोहसे युक्त होकर धर्ममें दोष देखते हैं वे स्वयं तो कुमार्गगामी होते ही हैं, उनके पीछे चलनेवाला मनुष्य भी कष्ट पाता है ॥ ६८ ॥

ये तु शिष्टाः सुनियताः श्रुतित्यागपरायणाः । धर्मपन्थानमारूढाः सत्यधर्मपरायणाः ॥ ६९ ॥ जो शिष्ट हैं वे सदा ही नियमित जीवन व्यतीत करते हैं, वेदोंके स्वाध्यायमें तत्पर और त्यागी होते हैं। धर्मके मार्गपर ही चलते हैं और सत्यधर्मको ही अपना परम आश्रय मानते हैं ॥ ६९ ॥

नियच्छन्ति परां बुद्धिं शिष्टाचारान्विता जनाः । उपाध्यायमते युक्ताः स्थित्या धर्मार्थदर्शिनः ॥ ७० ॥ शिष्टाचारपरायण मनुष्य अपनी उत्तम बुद्धिको भी संयममें रखते हैं, गुरुके सिद्धान्तके अनुसार चलते हैं और मर्यादामें स्थित होकर धर्म और अर्थपर दृष्टि रखते हैं ॥ ७० ॥

नास्तिकान् भिन्नमर्यादान् क्रूरान् पापमतौ स्थितान् । त्यज तान् ज्ञानमाश्रित्य धार्मिकानुपसेव्य च ॥ ७१ ॥ इसलिये तुम नास्तिक, धर्मकी मर्यादा भंग करनेवाले, क्रूर तथा पापपूर्ण विचार रखनेवाले पुरुषोंका साथ छोड़ दो और ज्ञानका आश्रय लेकर धर्मात्मा पुरुषोंकी सेवामें रहो ॥ ७१ ॥

कामलोभग्रहाकीर्णां पञ्चेन्द्रियजलां नदीम् । नावं धृतिमयीं कृत्वा जन्मदुर्गाणि संतर ॥ ७२ ॥ यह शरीर एक नदी है। पाँच इन्द्रियाँ इसमें जल हैं। काम और लोभरूपी मगर इसके भीतर भरे पड़े हैं। जन्म और मृत्युके दुर्गम प्रदेशमें यह नदी बह रही है। तुम धैर्यकी नावपर

बैठो और इसके दुर्गम स्थानों—जन्म आदि क्लेशोंको पार कर जाओ ॥ ७२ ॥ क्रमेण संचितो धर्मो बुद्धियोगमयो महान् । शिष्टाचारे भवेत् साधू रागः शुक्लेव वाससि ॥ ७३ ॥ जैसे कोई भी रंग सफेद कपड़ेपर ही अच्छी तरह खिलता है, उसी प्रकार शिष्टाचारका पालन करनेवाले पुरुषमें ही क्रमशः संचित किया हुआ बुद्धियोगमय महान् धर्म भलीभाँति प्रकाशित होता है ॥ ७३ ॥ अहिंसा सत्यवचनं सर्वभूतहितं परम् । अहिंसा परमो धर्मः स च सत्ये प्रतिष्ठितः । सत्ये कृत्वा प्रतिष्ठां तु प्रवर्तन्ते प्रवृत्तयः ॥ ७४ ॥ अहिंसा और सत्यभाषण—ये समस्त प्राणियोंके लिये अत्यन्त हितकर हैं। अहिंसा सबसे महान् धर्म है, परंतु वह सत्यमें ही प्रतिष्ठित है। सत्यके ही आधारपर श्रेष्ठ पुरुषोंके सभी कार्य आरम्भ होते हैं ॥ ७४ ॥ सत्यमेव गरीयस्तु शिष्टाचारनिषेवितम् । आचारश्च सतां धर्मः संतश्चाचारलक्षणाः ॥ ७५ ॥ अतः शिष्ट पुरुषोंके आचारमें गृहीत सत्य ही सबसे अधिक गौरवकी वस्तु है। सदाचार ही श्रेष्ठ पुरुषोंका धर्म है। सदाचारसे ही संतोंकी पहचान होती है ॥ ७५ ॥ यो यथाप्रकृतिर्जन्तुः स स्वां प्रकृतिमश्रुते । पापात्मा क्रोधकामादीन् दोषान्प्राप्नोत्यनात्मवान् ॥ ७६ ॥ जिस जीवकी जैसी प्रकृति होती है, वह अपनी प्रकृतिका ही अनुसरण करता है। अपने मनको वशमें न रखनेवाला पापात्मा पुरुष ही काम, क्रोध आदि दोषोंको प्राप्त होता है ॥ ७६ ॥ आरम्भो न्याययुक्तो यः स हि धर्म इति स्मृतः । अनाचारस्त्वधर्मेति एतच्छिष्टानुशासनम् ॥ ७७ ॥ ‘जो आरम्भ न्याययुक्त हो, वही धर्म कहा गया है। इसके विपरीत जो अनाचार है, वह अधर्म है’—ऐसा शिष्ट पुरुषोंका कथन है ॥ ७७ ॥ अक्रुद्ध्यन्तोऽनसूयन्तो निरहङ्कारमत्सराः । ऋजवः शमसम्पन्नाः शिष्टाचारा भवन्ति ते ॥ ७८ ॥ जिनमें क्रोधका अभाव है, जो दूसरोंके दोष नहीं देखते, जिनमें अहंकार और ईर्ष्याका अभाव है, जो सरल तथा मनोनिग्रहसे सम्पन्न हैं, वे शिष्टाचारी कहलाते हैं ॥ ७८ ॥ त्रैविद्यवृद्धाः शुचयो वृत्तवन्तो मनस्विनः । गुरुशुश्रूषवो दान्ताः शिष्टाचारा भवन्त्युत ॥ ७९ ॥ ‘जो तीनों वेदोंके विद्वानोंमें श्रेष्ठ, पवित्र, सदाचारी, मनस्वी, गुरुसेवक और जितेन्द्रिय हैं, वे शिष्टाचारी कहे जाते हैं ॥ ७९ ॥

तेषामहीनसत्त्वानां दुष्कराचारकर्मणाम् । स्वैः कर्मभिः सत्कृतानां घोरत्वं सम्प्रणश्यति ॥ ८० ॥ जो सत्त्वगुणसे सम्पन्न हैं, जिनके आचार और कर्म पापियोंके लिये कठिन हैं तथा जो संसारमें अपने सत्कर्मोंके द्वारा सत्कृत हैं, उनके हिंसा आदि दोष स्वतः नष्ट हो जाते हैं ॥ ८० ॥

तं सदाचारमाश्र्चर्य पुराणं शाश्वतं ध्रुवम् । धर्मं धर्मेण पश्यन्तः स्वर्गं यान्ति मनीषिणः ॥ ८१ ॥ जिसका श्रेष्ठ पुरुषोंने पालन किया है, जो अनादि, सनातन और नित्य है, उस धर्मको धर्मदृष्टिसे ही देखनेवाले मनीषी पुरुष स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ ८१ ॥

आस्तिका मानहीनाश्च द्विजातिजनपूजकाः । श्रुतवृत्तोपसम्पन्नाः सन्तः स्वर्गनिवासिनः ॥ ८२ ॥ जो आस्तिक, अहंकारशून्य, ब्राह्मणोंका समादर करनेवाले, विद्वान् और सदाचारसे सम्पन्न हैं, वे श्रेष्ठ पुरुष स्वर्गमें निवास करते हैं ॥ ८२ ॥

वेदोक्तः परमो धर्मो धर्मशास्त्रेषु चापरः । शिष्टाचारश्च शिष्टानां त्रिविधं धर्मलक्षणम् । जिसका वेदोंमें वर्णन है, वह धर्मका पहला लक्षण है। धर्मशास्त्रोंमें जिसका प्रतिपादन किया गया है, वह धर्मका दूसरा लक्षण है और शिष्टाचार धर्मका तीसरा लक्षण है। इस प्रकार शिष्ट पुरुषोंने धर्मके तीन लक्षण स्वीकार किये हैं ॥ ८२ १/२ ॥

धारणं चापि विद्यानां तीर्थानामवगाहनम् ॥ ८३ ॥ क्षमा सत्यार्जवं शौचं सतामाचारदर्शनम् । सब विद्याओंका अध्ययन, सब तीर्थोंमें स्नान, क्षमा, सत्य, सरलता और शौच (पवित्रता)—ये श्रेष्ठ पुरुषोंके आचारको लक्षित करानेवाले हैं ॥ ८३ १/२ ॥

सर्वभूतदयावन्तो अहिंसानिरताः सदा ॥ ८४ ॥ परुषं च न भाषन्ते सदा सन्तो द्विजप्रियाः । जो समस्त प्राणियोंपर दया करते, सदा अहिंसा-धर्मके पालनमें तत्पर रहते और कभी किसीसे कटु वचन नहीं बोलते, ऐसे संत सदा समस्त द्विजोंके प्रिय होते हैं ॥ ८४ १/२ ॥

शुभानामशुभानां च कर्मणां फलसंचये ॥ ८५ ॥ विपाकमभिजानन्ति ते शिष्टाः शिष्टसम्मताः । जो शुभ और अशुभ कर्मोंके फलसंचयसे सम्बन्ध रखनेवाले परिणामको जानते हैं, वे शिष्ट कहे गये हैं और शिष्ट पुरुषोंमें उनका समादर होता है ॥ ८५ १/२ ॥

न्यायोपेता गुणोपेताः सर्वलोकहितैषिणः ॥ ८६ ॥ सन्तः स्वर्गजितः शुक्लाः संनिविष्टाश्च सत्पथे ।

जो न्यायपरायण, सद्गुणसम्पन्न, सब लोगोंका हित चाहनेवाले, हिंसारहित और सन्मार्गपर चलनेवाले हैं, वे श्रेष्ठ पुरुष स्वर्गलोकपर विजय पाते हैं।। ८६ १/२ ।।
दातारः संविभक्तारो दीनानुग्रहकारिणः ।। ८७ ।।
सर्वपूज्याः श्रुतधनास्तथैव च तपस्विनः ।
सर्वभूतदयावन्तस्ते शिष्टाः शिष्टसम्मताः ।। ८८ ।।
जो सबको दान देनेवाले, अपने कुटुम्बीजनोंमें प्रत्येक वस्तुको समानरूपसे बाँटकर उसका उपयोग करनेवाले, दीनजनोंपर कृपाभाव बनाये रखनेवाले, शास्त्रज्ञानके धनी, सबके लिये समादरणीय, तपस्वी और समस्त प्राणियोंके प्रति दयालु हैं, वे श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा सम्मानित शिष्ट कहे गये हैं ।। ८७-८८ ।।
दानशिष्टाः सुखाँल्लोकानाप्नुवन्तीह च श्रियम् ।
पीडया च कलत्रस्य भृत्यानां च समाहिताः ।। ८९ ।।
अतिशक्त्या प्रयच्छन्ति सन्तः सद्भिः समागताः ।
लोकयात्रां च पश्यन्तो धर्ममात्महितानि च ।। ९० ।।
जो दानसे अवशिष्ट वस्तुका उपयोग करनेवाले हैं, वे श्रेष्ठ पुरुष इस लोकमें सम्पत्ति और परलोकमें सुखमय लोक प्राप्त करते हैं। शिष्ट पुरुषोंके पास जब उत्तम पुरुष कुछ माँगनेके लिये पधारते हैं, उस समय वे अपनी स्त्री तथा कुटुम्बी जनोंको कष्ट देकर सभी मनोयोगपूर्वक अपनी शक्तिसे अधिक दान देते हैं। न्यायपूर्वक लोकयात्राका निर्वाह कैसे हो? धर्मकी रक्षा और आत्माका कल्याण किस प्रकार हो? इन्हीं बातोंकी ओर उनकी दृष्टि रहती है ।। ८९-९० ।।
एवं सन्तो वर्तमानास्त्वेधन्ते शाश्वतीः समाः ।
अहिंसा सत्यवचनमानृशंस्यमथार्जवम् ।। ९१ ।।
अद्रोहो नाभिमानश्च ह्रीस्तितिक्षा दमः शमः ।
धीमन्तो धृतिमन्तश्च भूतानामनुकम्पकाः ।। ९२ ।।
अकामद्वेषसंयुक्तास्ते सन्तो लोकसाक्षिणः ।
ऐसा बर्ताव करनेवाले संत पुरुष अनन्त कालतक उन्नतिकी ओर अग्रसर होते रहते हैं। जो अहिंसा, सत्यभाषण, कोमलता, सरलता, अद्रोह, अहंकारका त्याग, लज्जा, क्षमा, शम, दम—इन गुणोंसे युक्त बुद्धिमान्, धैर्यवान् समस्त प्राणियोंपर अनुग्रह करनेवाले तथा राग-द्वेषसे रहित हैं, वे संत सम्पूर्ण लोकोंके लिये प्रमाणभूत हैं ।।
त्रीण्येव तु पदान्याहुः सतां व्रतमनुत्तमम् ।। ९३ ।।
न चैव द्रुह्येद् दद्याच्च सत्यं चैव सदा वदेत् ।
श्रेष्ठ पुरुष तीन ही पद बताते हैं—किसीसे द्रोह न करे, दान करे और सदा सत्य ही बोले। यह श्रेष्ठ पुरुषोंका सर्वोत्तम व्रत है ।। ९३ १/२ ।।
सर्वत्र च दयावन्तः सन्तः करुणवेदिनः ।। ९४ ।।

गच्छन्तीह सुसंतुष्टा धर्मपन्थानमुत्तमम् । शिष्टाचारा महात्मानो येषां धर्मः सुनिश्चितः ॥ ९५ ॥ जो सर्वत्र दया करते हैं, जिनके हृदयमें करुणाकी अनुभूति होती है, वे श्रेष्ठ पुरुष इस लोकमें अत्यन्त संतुष्ट रहकर धर्मके उत्तम पथपर चलते हैं। जिन्होंने धर्मको अपनाये रखनेका दृढ़ निश्चय कर लिया है, वे ही महात्मा सदाचारी हैं ॥ ९४-९५ ॥ अनसूया क्षमा शान्तिः संतोषः प्रियवादिता । कामक्रोधपरित्यागः शिष्टाचारनिषेवणम् ॥ ९६ ॥ कर्म च श्रुतसम्पन्नं सतां मार्गमनुत्तमम् । दोषदृष्टिका अभाव, क्षमा, शान्ति, संतोष, प्रियभाषण और काम-क्रोधका त्याग, शिष्टाचारका सेवन और शास्त्रके अनुकूल कर्म करना—यह श्रेष्ठ पुरुषोंका अति उत्तम मार्ग है ॥ ९६ १/२ ॥ शिष्टाचारं निषेवन्ते नित्यं धर्ममनुव्रताः ॥ ९७ ॥ प्रज्ञाप्रासादारुह्य मुच्यन्ते महतो भयात् । प्रेक्षन्तो लोकवृत्तानि विविधानि द्विजोत्तम ॥ ९८ ॥ अतिपुण्यानि पापानि तानि द्विजवरोत्तम । द्विजश्रेष्ठ! जो धर्मात्मा पुरुष सदा शिष्टाचारका सेवन करते हैं और प्रज्ञारूपी प्रासादपर आरूढ़ हो भाँति-भाँतिके लोकचरित्रोंका निरीक्षण तथा अत्यन्त पुण्य एवं पापकर्मोंकी समीक्षा करते हैं, वे महान् भयसे मुक्त हो जाते हैं ॥ ९७-९८ १/२ ॥ एतत् ते सर्वमाख्यातं यथाप्रज्ञं यथाश्रुतम् । शिष्टाचारगुणं ब्रह्मन् पुरस्कृत्य द्विजर्षभ ॥ ९९ ॥ ब्रह्मन्! विप्रवर! इस प्रकार शिष्टाचारके गुणोंके सम्बन्धमें मैंने जैसा जाना और सुना है, वह सब आपसे कह सुनाया है ॥ ९९ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे सप्ताधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें ब्राह्मणव्याधसंवादविषयक दो सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०७ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/२ श्लोक मिलाकर कुल १०० १/२ श्लोक हैं)

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अष्टाधिकद्विशततमोऽध्यायः

धर्मव्याधद्वारा हिंसा और अहिंसाका विवेचन

मार्कण्डेय उवाच

स तु विप्रमथोवाच धर्मव्याधो युधिष्ठिर ।
यदहमाचरे कर्म घोरमेतदसंशयम् ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तदनन्तर धर्मव्याधने कौशिक ब्राह्मणसे कहा—'मैं जो यह मांस बेचनेका व्यवसाय कर रहा हूँ, वास्तवमें यह अत्यन्त घोर कर्म है, इसमें संशय नहीं है ॥ १ ॥

विधिस्तु बलवान् ब्रह्मन् दुस्तरं हि पुरा कृतम् ।
पुरा कृतस्य पापस्य कर्मदोषो भवत्ययम् ॥ २ ॥
दोषस्यैतस्य वै ब्रह्मन् विघाते यत्नवानहम् ।
'किंतु ब्रह्मन्! दैव बलवान् है। पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मका ही नाम दैव है। उससे पार पाना बहुत कठिन है। यह जो कर्मदोषजनित व्याधके घर जन्म हुआ है, यह मेरे पूर्वजन्ममें किये हुए पापका ही फल है। ब्रह्मन्! मैं इस दोषके निवारणके लिये प्रयत्नशील हूँ ॥ २ १/२ ॥

विधिना हि हते पूर्वं निमित्तं घातको भवेत् ॥ ३ ॥
'क्योंकि विधाताके द्वारा पहलेसे ही जीवकी मृत्यु निश्चित की जाती है; किंतु घातक (कसाई अथवा व्याध) उसमें निमित्त बन जाता है अर्थात् जो स्वेच्छासे ज्ञानपूर्वक जीवहिंसा करता है, वह घातक व्यर्थ ही निमित्त बनकर दोषका भागी होता है ॥ ३ ॥

निमित्तभूता हि वयं कर्मणोऽस्य द्विजोत्तम ।
येषां हतानां मांसानि विक्रीणामीह वै द्विज ॥ ४ ॥
तेषामपि भवेद् धर्म उपयोगे न भक्षणे ।
देवतातिथिभृत्यानां पितॄणां चापि पूजनम् ॥ ५ ॥
'द्विजश्रेष्ठ! इस कार्यमें हम निमित्तमात्र हैं। ब्रह्मन्! मैं जिन मारे गये प्राणियोंका मांस बेचता हूँ, उनके जीते-जी यदि उनका सदुपयोग किया जाता तो बड़ा धर्म होता। मांस-भक्षणमें तो धर्मका नाम भी नहीं है (उलटे महान् अधर्म होता है)। देवता, अतिथि, भरणीय कुटुम्बीजन और पितरोंका पूजन (आदर-सत्कार) अवश्य धर्म है ॥ ४-५ ॥

ओषध्यो वीरुधश्चैव पशवो मृगपक्षिणः ।
अनादिभूता भूतानामित्यपि श्रूयते श्रुतिः ॥ ६ ॥
ओषधियाँ, अन्न, तृण, लता, पशु, मृग और पक्षी आदि सभी वस्तुएँ सम्पूर्ण प्राणियोंके अनादि-कालसे उपयोगमें आती रहती हैं—ऐसी श्रुति भी सुनी जाती है ॥ ६ ॥

आत्ममांसप्रसादेन शिबिरौशीनरो नृपः । स्वर्गं सुदुर्गमं प्राप्तः क्षमावान् द्विजसत्तम ॥ ७ ॥ द्विजश्रेष्ठ! उशीनरके पुत्र क्षमाशील (और दयालु) राजा शिबिने (एक भूखे बाजको कबूतरके बदले) अपने शरीरका मांस अर्पित कर दिया था और उसीके प्रसादसे उन्हें परम दुर्लभ स्वर्गलोककी प्राप्ति हुई थी ॥ ७ ॥ स्वधर्म इति कृत्वा तु न त्यजामि द्विजोत्तम । पुरा कृतमिति ज्ञात्वा जीवाम्येतेन कर्मणा ॥ ८ ॥ 'विप्रवर! मैं अपना स्वधर्म समझकर यह धंधा नहीं छोड़ रहा हूँ। पहलेसे मेरे पूर्वज यही करते आये हैं, ऐसा समझकर मैं इसी कर्मसे जीवन-निर्वाह करता हूँ ॥ ८ ॥ स्वकर्म त्यजतो ब्रह्मन्नधर्म इह दृश्यते । स्वकर्मनिरतो यस्तु धर्मः स इति निश्चयः ॥ ९ ॥ 'ब्रह्मन्! अपने कर्मका परित्याग करनेवालेको यहाँ अधर्मकी प्राप्ति देखी जाती है। जो अपने कर्ममें तत्पर है, उसीका बर्ताव धर्मपूर्ण है, ऐसा सिद्धान्त है ॥ ९ ॥ पूर्वं हि विहितं कर्म देहिनं न विमुञ्चति । धात्रा विधिरयं दृष्टो बहुधा कर्मनिर्णये ॥ १० ॥ 'पहलेका किया हुआ कर्म देहधारी मनुष्यको नहीं छोड़ता है। बहुधा कर्मका निर्णय करते समय विधाताने इसी विधिको अपने सामने रखा है ॥ १० ॥ द्रष्टव्या तु भवेत् प्रज्ञा क्रूरे कर्मणि वर्तता । कथं कर्म शुभं कुर्यां कथं मुच्ये पराभवात् ॥ ११ ॥ 'जो क्रूर कर्ममें लगा हुआ है, उसे सदा यह सोचते रहना चाहिये कि 'मैं कैसे शुभ कर्म करूँ और किस प्रकार इस निन्दित कर्मसे छुटकारा पाऊँ' ॥ ११ ॥ कर्मणस्तस्य घोरस्य बहुधा निर्णयो भवेत् । दाने च सत्यवाक्ये च गुरुशुश्रूषणे तथा ॥ १२ ॥ द्विजातिपूजने चाहं धर्मे च निरतः सदा । अभिमानातिवादाभ्यां निवृत्तोऽस्मि द्विजोत्तम ॥ १३ ॥ 'बार-बार ऐसा करनेसे उस घोर कर्मसे छूटनेके विषयमें कोई निश्चित उपाय प्राप्त हो जाता है। द्विजश्रेष्ठ! मैं दान, सत्यभाषण, गुरुसेवा, ब्राह्मणपूजन तथा धर्मपालनमें सदा तत्पर रहकर अभिमान और अतिवादसे दूर रहता हूँ ॥ १२-१३ ॥ कृषिं साध्विति मन्यन्ते तत्र हिंसा परा स्मृता । कर्षन्तो लाङ्गलैः पुंसो घ्नन्ति भूमिशयान् बहून् । जीवानन्यांश्च बहुशस्तत्र किं प्रतिभाति ते ॥ १४ ॥ कुछ लोग खेतीको उत्तम मानते हैं, परंतु उसमें भी बहुत बड़ी हिंसा होती है। हल चलानेवाले मनुष्य धरतीके भीतर शयन करनेवाले बहुत-से प्राणियोंकी हत्या कर डालते हैं।

इनके सिवा और भी बहुत-से जीवोंका वध वे करते रहते हैं। इस विषयमें आप क्या समझते हैं? ।। धान्यबीजानि यान्याहुर्व्रीह्यादीनि द्विजोत्तम।
सर्वाण्येतानि जीवानि तत्र किं प्रतिभाति ते ।। १५ ।।
‘द्विजश्रेष्ठ! धान आदि जितने अन्नके बीज हैं, वे सब-के-सब जीव ही हैं; अतः इस विषयमें आप क्या समझते हैं? ।। १५ ।।
अध्याक्रम्य पशूंश्चापि घ्नन्ति वै भक्षयन्ति च ।
वृक्षांस्तथौषधींश्चापि छिन्दन्ति पुरुषा द्विज ।। १६ ।।
जीवा हि बहवो ब्रह्मन् वृक्षेषु च फलेषु च।
उदके बहवश्चापि तत्र किं प्रतिभाति ते ।। १७ ।।
‘विप्रवर! कितने ही मनुष्य पशुओंपर आक्रमण करके उन्हें मारते और खाते हैं। वृक्षों तथा ओषधियों (अन्नके पौधों)-को काटते हैं। वृक्षों और फलोंमें भी बहुत-से जीव रहते हैं। जलमें भी नाना प्रकारके जीव रहते हैं। ब्रह्मन्! उनके विषयमें आप क्या समझते हैं? ।। १६-१७ ।।
सर्वं व्याप्तमिदं ब्रह्मन् प्राणिभिः प्राणिजीवनैः।
मत्स्यान् ग्रसन्ते मत्स्याश्च तत्र किं प्रतिभाति ते ।। १८ ।।
‘जीवोंसे ही जीवन-निर्वाह करनेवाले जीवोंद्वारा यह सारा जगत् व्याप्त है। मत्स्य मत्स्योंतकको अपना ग्रास बना लेते हैं। उनके विषयमें आप क्या समझते हैं? ।। १८ ।।
सत्त्वैः सत्त्वानि जीवन्ति बहुधा द्विजसत्तम ।
प्राणिनोऽन्योन्यभक्षाश्च तत्र किं प्रतिभाति ते ।। १९ ।।
‘द्विजश्रेष्ठ! बहुधा जीव जीवोंसे ही जीवन धारण करते हैं और प्राणी स्वयं ही एक-दूसरेको अपना आहार बना लेते हैं। उनके विषयमें आप क्या समझते हैं? ।। १९ ।।
चङ्क्रम्यमाणा जीवांश्च धरणीसंश्रितान् बहून् ।
पद्भ्यां घ्नन्ति नरा विप्र तत्र किं प्रतिभाति ते ।। २० ।।
‘मनुष्य चलते-फिरते समय धरतीके बहुत-से जीव-जन्तुओंको (असावधानीपूर्वक) पैरोंसे मार देते हैं। ब्रह्मन्! उनके विषयमें आप क्या समझते हैं? ।। २० ।।
उपविष्टाः शयानाश्च घ्नन्ति जीवाननेकशः ।
ज्ञानविज्ञानवन्तश्च तत्र किं प्रतिभाति ते ।। २१ ।।
‘ज्ञान-विज्ञानसम्पन्न पुरुष भी (अनजानमें) बैठते-सोते समय अनेक जीवोंकी हिंसा कर बैठते हैं। उनके विषयमें आप क्या समझते हैं? ।। २१ ।।
जीवैर्ग्रस्तमिदं सर्वमाकाशं पृथिवी तथा।
अविज्ञानाच्च हिंसन्ति तत्र किं प्रतिभाति ते ।। २२ ।।

‘आकाशसे लेकर पृथ्वीतक यह सारा जगत् जीवोंसे भरा हुआ है। कितने ही मनुष्य अनजानमें भी जीवहिंसा करते हैं। इस विषयमें आप क्या समझते हैं? ।। २२ ।। अहिंसेति यदुक्तं हि पुरुषैर्विस्मितैः पुरा । के न हिंसन्ति जीवान् वै लोकेऽस्मिन् द्विजसत्तम । बहु संचित्य इति वै नास्ति कश्चिदहिंसकः ।। २३ ।। ‘पूर्वकालके अभिमानशून्य श्रेष्ठ पुरुषोंने जो अहिंसाका उपदेश किया है (उसका तत्त्व समझना चाहिये; क्योंकि) द्विजश्रेष्ठ! (स्थूल दृष्टिसे देखा जाय तो) इस संसारमें कौन जीवहिंसा नहीं करते हैं? बहुत सोच-विचारकर मैं इस निश्चयपर पहुँचा हूँ कि कोई भी (क्रियाशील मनुष्य) अहिंसक नहीं है ।। २३ ।। अहिंसायां तु निरता यतयो द्विजसत्तम । कुर्वन्त्येव हि हिंसां ते यत्नादल्पतरा भवेत् ।। २४ ।। ‘द्विजश्रेष्ठ! यतिलोग अहिंसा-धर्मके पालनमें तत्पर होते हैं, परंतु वे भी हिंसा कर ही डालते हैं (अर्थात् उनके द्वारा भी हिंसा हो ही जाती है)। अवश्य ही यत्नपूर्वक चेष्टा करनेसे हिंसाकी मात्रा बहुत कम हो सकती है ।। २४ ।। आलक्ष्याश्चैव पुरुषाः कुले जाता महागुणाः । महाघोराणि कर्माणि कृत्वा लज्जन्ति वै द्विज ।। २५ ।। ‘ब्रह्मन्! उत्तम कुलमें उत्पन्न, परम सद्गुणसम्पन्न और श्रेष्ठ माने जानेवाले पुरुष भी अत्यन्त भयानक कर्म करके लज्जाका अनुभव करते ही हैं ।। २५ ।। सुहृदः सुहृदोऽन्यांश्च दुर्हृदश्चापि दुर्हृदः । सम्यक् प्रवृत्तान् पुरुषान् न सम्यगनुपश्यतः ।। २६ ।। ‘मित्र दूसरे मित्रोंको और शत्रु अपने शत्रुओंको, वे अच्छे कर्ममें लगे हुए हों तो भी अच्छी दृष्टिसे नहीं देखते ।। २६ ।। समृद्धैश्च न नन्दन्ति बान्धवा बान्धवैरपि । गुरूंश्चैव विनिन्दन्ति मूढाः पण्डितमानिनः ।। २७ ।। ‘बन्धु-बान्धव अपने समृद्धिशाली बान्धवोंसे भी प्रसन्न नहीं रहते। अपनेको पण्डित माननेवाले मूढ़ मनुष्य गुरुजनोंकी भी निन्दा करते हैं ।। २७ ।। बहु लोके विपर्यस्तं दृश्यते द्विजसत्तम । धर्मयुक्तमधर्मं च तत्र किं प्रतिभाति ते ।। २८ ।। ‘द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार जगत्में अनेक उलटी बातें दिखायी देती हैं। अधर्म भी धर्मसे युक्त प्रतीत होता है। इस विषयमें आप क्या समझते हैं? ।। २८ ।। वक्तुं बहुविधं शक्यं धर्माधर्मेषु कर्मसु । स्वकर्मनिरतो यो हि स यशः प्राप्नुयान्महत् ।। २९ ।।

‘धर्म और अधर्मसम्बन्धी कार्योंके विषयमें और भी बहुत-सी बातें कही जा सकती हैं। अतएव जो अपने कुलोचित कर्ममें लगा हुआ है, वही महान् यशका भागी होता है’ ॥ २९ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि पतिव्रतोपाख्याने ब्राह्मणव्याधसंवादे अष्टाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें पतिव्रतोपाख्यानके प्रसंगमें ब्राह्मणव्याधसंवादविषयक दो सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०८ ॥