महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1445, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंबैठो और इसके दुर्गम स्थानों—जन्म आदि क्लेशोंको पार कर जाओ ॥ ७२ ॥ क्रमेण संचितो धर्मो बुद्धियोगमयो महान् । शिष्टाचारे भवेत् साधू रागः शुक्लेव वाससि ॥ ७३ ॥ जैसे कोई भी रंग सफेद कपड़ेपर ही अच्छी तरह खिलता है, उसी प्रकार शिष्टाचारका पालन करनेवाले पुरुषमें ही क्रमशः संचित किया हुआ बुद्धियोगमय महान् धर्म भलीभाँति प्रकाशित होता है ॥ ७३ ॥ अहिंसा सत्यवचनं सर्वभूतहितं परम् । अहिंसा परमो धर्मः स च सत्ये प्रतिष्ठितः । सत्ये कृत्वा प्रतिष्ठां तु प्रवर्तन्ते प्रवृत्तयः ॥ ७४ ॥ अहिंसा और सत्यभाषण—ये समस्त प्राणियोंके लिये अत्यन्त हितकर हैं। अहिंसा सबसे महान् धर्म है, परंतु वह सत्यमें ही प्रतिष्ठित है। सत्यके ही आधारपर श्रेष्ठ पुरुषोंके सभी कार्य आरम्भ होते हैं ॥ ७४ ॥ सत्यमेव गरीयस्तु शिष्टाचारनिषेवितम् । आचारश्च सतां धर्मः संतश्चाचारलक्षणाः ॥ ७५ ॥ अतः शिष्ट पुरुषोंके आचारमें गृहीत सत्य ही सबसे अधिक गौरवकी वस्तु है। सदाचार ही श्रेष्ठ पुरुषोंका धर्म है। सदाचारसे ही संतोंकी पहचान होती है ॥ ७५ ॥ यो यथाप्रकृतिर्जन्तुः स स्वां प्रकृतिमश्रुते । पापात्मा क्रोधकामादीन् दोषान्प्राप्नोत्यनात्मवान् ॥ ७६ ॥ जिस जीवकी जैसी प्रकृति होती है, वह अपनी प्रकृतिका ही अनुसरण करता है। अपने मनको वशमें न रखनेवाला पापात्मा पुरुष ही काम, क्रोध आदि दोषोंको प्राप्त होता है ॥ ७६ ॥ आरम्भो न्याययुक्तो यः स हि धर्म इति स्मृतः । अनाचारस्त्वधर्मेति एतच्छिष्टानुशासनम् ॥ ७७ ॥ ‘जो आरम्भ न्याययुक्त हो, वही धर्म कहा गया है। इसके विपरीत जो अनाचार है, वह अधर्म है’—ऐसा शिष्ट पुरुषोंका कथन है ॥ ७७ ॥ अक्रुद्ध्यन्तोऽनसूयन्तो निरहङ्कारमत्सराः । ऋजवः शमसम्पन्नाः शिष्टाचारा भवन्ति ते ॥ ७८ ॥ जिनमें क्रोधका अभाव है, जो दूसरोंके दोष नहीं देखते, जिनमें अहंकार और ईर्ष्याका अभाव है, जो सरल तथा मनोनिग्रहसे सम्पन्न हैं, वे शिष्टाचारी कहलाते हैं ॥ ७८ ॥ त्रैविद्यवृद्धाः शुचयो वृत्तवन्तो मनस्विनः । गुरुशुश्रूषवो दान्ताः शिष्टाचारा भवन्त्युत ॥ ७९ ॥ ‘जो तीनों वेदोंके विद्वानोंमें श्रेष्ठ, पवित्र, सदाचारी, मनस्वी, गुरुसेवक और जितेन्द्रिय हैं, वे शिष्टाचारी कहे जाते हैं ॥ ७९ ॥