भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1446

तेषामहीनसत्त्वानां दुष्कराचारकर्मणाम् । स्वैः कर्मभिः सत्कृतानां घोरत्वं सम्प्रणश्यति ॥ ८० ॥ जो सत्त्वगुणसे सम्पन्न हैं, जिनके आचार और कर्म पापियोंके लिये कठिन हैं तथा जो संसारमें अपने सत्कर्मोंके द्वारा सत्कृत हैं, उनके हिंसा आदि दोष स्वतः नष्ट हो जाते हैं ॥ ८० ॥

तं सदाचारमाश्र्चर्य पुराणं शाश्वतं ध्रुवम् । धर्मं धर्मेण पश्यन्तः स्वर्गं यान्ति मनीषिणः ॥ ८१ ॥ जिसका श्रेष्ठ पुरुषोंने पालन किया है, जो अनादि, सनातन और नित्य है, उस धर्मको धर्मदृष्टिसे ही देखनेवाले मनीषी पुरुष स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ ८१ ॥

आस्तिका मानहीनाश्च द्विजातिजनपूजकाः । श्रुतवृत्तोपसम्पन्नाः सन्तः स्वर्गनिवासिनः ॥ ८२ ॥ जो आस्तिक, अहंकारशून्य, ब्राह्मणोंका समादर करनेवाले, विद्वान् और सदाचारसे सम्पन्न हैं, वे श्रेष्ठ पुरुष स्वर्गमें निवास करते हैं ॥ ८२ ॥

वेदोक्तः परमो धर्मो धर्मशास्त्रेषु चापरः । शिष्टाचारश्च शिष्टानां त्रिविधं धर्मलक्षणम् । जिसका वेदोंमें वर्णन है, वह धर्मका पहला लक्षण है। धर्मशास्त्रोंमें जिसका प्रतिपादन किया गया है, वह धर्मका दूसरा लक्षण है और शिष्टाचार धर्मका तीसरा लक्षण है। इस प्रकार शिष्ट पुरुषोंने धर्मके तीन लक्षण स्वीकार किये हैं ॥ ८२ १/२ ॥

धारणं चापि विद्यानां तीर्थानामवगाहनम् ॥ ८३ ॥ क्षमा सत्यार्जवं शौचं सतामाचारदर्शनम् । सब विद्याओंका अध्ययन, सब तीर्थोंमें स्नान, क्षमा, सत्य, सरलता और शौच (पवित्रता)—ये श्रेष्ठ पुरुषोंके आचारको लक्षित करानेवाले हैं ॥ ८३ १/२ ॥

सर्वभूतदयावन्तो अहिंसानिरताः सदा ॥ ८४ ॥ परुषं च न भाषन्ते सदा सन्तो द्विजप्रियाः । जो समस्त प्राणियोंपर दया करते, सदा अहिंसा-धर्मके पालनमें तत्पर रहते और कभी किसीसे कटु वचन नहीं बोलते, ऐसे संत सदा समस्त द्विजोंके प्रिय होते हैं ॥ ८४ १/२ ॥

शुभानामशुभानां च कर्मणां फलसंचये ॥ ८५ ॥ विपाकमभिजानन्ति ते शिष्टाः शिष्टसम्मताः । जो शुभ और अशुभ कर्मोंके फलसंचयसे सम्बन्ध रखनेवाले परिणामको जानते हैं, वे शिष्ट कहे गये हैं और शिष्ट पुरुषोंमें उनका समादर होता है ॥ ८५ १/२ ॥

न्यायोपेता गुणोपेताः सर्वलोकहितैषिणः ॥ ८६ ॥ सन्तः स्वर्गजितः शुक्लाः संनिविष्टाश्च सत्पथे ।