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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 438)

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त्रिषष्टितमोऽध्यायः

दमयन्तीका विलाप तथा अजगर एवं व्याधसे उसके प्राण एवं सतीत्वकी रक्षा तथा दमयन्तीके पातिव्रत्यधर्मके प्रभावसे व्याधका विनाश

बृहदश्व उवाच

अपक्रान्ते नले राजन् दमयन्ती गतक्लमा ।
अबुध्यत वरारोहा संत्रस्ता विजने वने ॥ १ ॥
अपश्यमाना भर्तारं शोकदुःखसमन्विता ।
प्राक्रोशदुच्चैः संत्रस्ता महाराजेति नैषधम् ॥ २ ॥
**बृहदश्व मुनि कहते हैं—**राजन्! नलके चले जानेपर जब दमयन्तीकी थकावट दूर हो गयी, तब उसकी आँख खुली। उस निर्जन वनमें अपने स्वामीको न देखकर सुन्दरी दमयन्ती भयातुर और दुःख-शोकसे व्याकुल हो गयी। उसने भयभीत होकर निषधनरेश नलको 'महाराज! आप कहाँ हैं?' यह कहकर बड़े जोरसे पुकारा ॥ १-२ ॥

हा नाथ हा महाराज हा स्वामिन् किं जहासि माम् ।
हा हतास्मि विनष्टास्मि भीतास्मि विजने वने ॥ ३ ॥
'हा नाथ! हा महाराज! हा स्वामिन्! आप मुझे क्यों त्याग रहे हैं? हाय! मैं मारी गयी, नष्ट हो गयी, इस जनशून्य वनमें मुझे बड़ा भय लग रहा है ॥ ३ ॥

ननु नाम महाराज धर्मज्ञः सत्यवागसि ।
कथमुक्त्वा तथा सत्यं सुप्तामुत्सृज्य कानने ॥ ४ ॥
'महाराज! आप तो धर्मज्ञ और सत्यवादी हैं; फिर वैसी सच्ची प्रतिज्ञा करके आज आप इस जंगलमें मुझे सोती छोड़कर कैसे चले गये? ॥ ४ ॥

कथमुत्सृज्य गन्तासि दक्षां भार्यामनुव्रताम् ।
विशेषतोऽनपकृते परेणापकृते सति ॥ ५ ॥
'मैं आपकी सेवामें कुशल और अनुरक्त भार्या हूँ। विशेषतः मेरे द्वारा आपका कोई अपराध भी नहीं हुआ है। यदि कोई अपराध हुआ है, तो वह दूसरेके ही द्वारा, मुझसे नहीं; तो भी आप मुझे त्यागकर क्यों चले जा रहे हैं? ॥ ५ ॥

शक्यसे ता गिरः सम्यक् कर्तुं मयि नरेश्वर ।
यास्तेषां लोकपालानां संनिधौ कथिताः पुरा ॥ ६ ॥
'नरेश्वर! आपने पहले स्वयंवरसभामें उन लोकपालोंके निकट जो बातें कहीं थीं, क्या आप उन्हें आज मेरे प्रति सत्य सिद्ध कर सकेंगे? ॥ ६ ॥

नाकाले विहितो मृत्युर्मर्त्यानां पुरुषर्षभ । तत्र कान्ता त्वयोत्सृष्टा मुहूर्तंमपि जीवति ॥ ७ ॥ ‘पुरुषशिरोमणे! मनुष्योंकी मृत्यु असमयमें नहीं होती, तभी तो आपकी यह प्रियतमा आपसे परित्यक्त होकर दो घड़ी भी जी रही है ॥ ७ ॥ पर्याप्तः परिहासोऽयमेतावान् पुरुषर्षभ । भीताहमतिदुर्धर्ष दर्शयात्मानमीश्वर ॥ ८ ॥ ‘पुरुषश्रेष्ठ! यहाँ इतना ही परिहास बहुत है। अत्यन्त दुर्धर्ष वीर! मैं बहुत डर गयी हूँ। प्राणेश्वर! अब मुझे अपना दर्शन दीजिये ॥ ८ ॥ दृश्यसे दृश्यसे राजन्नेष दृष्टोऽसि नैषध । आवार्य गुल्मैरात्मानं किं मां न प्रतिभाषसे ॥ ९ ॥ ‘राजन्! निषधनरेश! आप दीख रहे हैं, दीख रहे हैं, यह दिखायी दिये। लताओंद्वारा अपनेको छिपाकर आप मुझसे बात क्यों नहीं कर रहे हैं? ॥ ९ ॥ नृशंसं बत राजेन्द्र यन्मामेवंगतामिह । विलपन्तीं समागम्य नाश्वासयसि पार्थिव ॥ १० ॥ ‘राजेन्द्र! मैं इस प्रकार भय और चिन्तामें पड़कर यहाँ विलाप कर रही हूँ और आप आकर आश्वासन भी नहीं देते! भूपाल! यह तो आपकी बड़ी निर्दयता है ॥ १० ॥ न शोचाम्यहमात्मानं न चान्यदपि किंचन । कथं नु भवितास्येक इति त्वां नृप शोचिमि ॥ ११ ॥ ‘नरेश्वर! मैं अपने लिये शोक नहीं करती। मुझे दूसरी किसी बातका भी शोक नहीं है। मैं केवल आपके लिये शोक कर रही हूँ कि आप अकेले कैसी शोचनीय दशामें पड़ जायेंगे! ॥ ११ ॥ कथं नु राजंस्तृषितः क्षुधितः श्रमकर्षितः । सायाह्ने वृक्षमूलेषु मामपश्यन् भविष्यसि ॥ १२ ॥ ‘राजन्! आप भूखे-प्यासे और परिश्रमसे थके-माँदे होकर जब सायंकाल किसी वृक्षके नीचे आकर विश्राम करेंगे, उस समय मुझे अपने पास न देखकर आपकी कैसी दशा हो जायगी?’ ॥ १२ ॥ ततः सा तीव्रशोकार्ता प्रदीप्तेव च मन्युना । इतश्चेतश्च रुदती पर्यधावत दुःखिता ॥ १३ ॥ तदनन्तर प्रचण्ड शोकसे पीड़ित हो क्रोधाग्निसे दग्ध होती हुई-सी दमयन्ती अत्यन्त दुःखी हो रोने और इधर-उधर दौड़ने लगी ॥ १३ ॥ मुहुरुत्पतते बाला मुहुः पतति विह्वला । मुहुरालीयते भीता मुहुः क्रोशति रोदिति ॥ १४ ॥

दमयन्ती बार-बार उठती और बार-बार विह्वल होकर गिर पड़ती थी। वह कभी भयभीत होकर छिपती और कभी जोर-जोरसे रोने-चिल्लाने लगती थी ।। १४ ।। अतीव शोकसंतप्ता मुहुर्निःश्वस्य विह्वला । उवाच भैमी निःश्वस्य रुदत्यथ पतिव्रता ।। १५ ।। अत्यन्त शोकसंतप्त हो बार-बार लंबी साँसें खींचती हुई व्याकुल पतिव्रता दमयन्ती दीर्घ निःश्वास लेकर रोती हुई बोली- ।। १५ ।। यस्याभिशापाद् दुःखार्तो दुःखं विन्दति नैषधः । तस्य भूतस्य नो दुःखाद् दुःखमप्यधिकं भवेत् ।। १६ ।। ‘जिसके अभिशापसे निषधनरेश नल दुःखसे पीड़ित हो क्लेश-पर-क्लेश उठाते जा रहे हैं, उस प्राणीको हमलोगोंके दुःखसे भी अधिक दुःख प्राप्त हो ।। १६ ।। अपापचेतसं पापो य एवं कृतवान् नलम् । तस्माद् दुःखतरं प्राप्य जीवत्वसुखजीविकाम् ।। १७ ।। ‘जिस पापीने पुण्यात्मा राजा नलको इस दशामें पहुँचाया है, वह उनसे भी भारी दुःखमें पड़कर दुःखी ही जिंदगी बितावे' ।। १७ ।। एवं तु विलपन्ती सा राज्ञो भार्या महात्मनः । अन्वेषमाणा भर्तारं वने श्वापदसेविते ।। १८ ।। उन्मत्तवद् भीमसुता विलपन्ती इतस्ततः । हा हा राजन्निति मुहुरितश्चेतश्च धावति ।। १९ ।। इस प्रकार विलाप करती तथा हिंस्र जन्तुओंसे भरे हुए वनमें अपने पतिको ढूँढ़ती हुई महामना राजा नलकी पत्नी भीमकुमारी दमयन्ती उन्मत्त हुई रोती-बिलखती और ‘हा राजन्! हा महाराज' ऐसा बार-बार कहती हुई इधर-उधर दौड़ने लगी ।। १८-१९ ।। तां क्रन्दमानामत्यर्थं कुररीमिव वाशतीम् । करुणं बहु शोचन्तीं विलपन्तीं मुहुर्मुहुः ।। २० ।। सहसाभ्यागतां भैमीमभ्याशपरिवर्तिनीम् । जग्राहाजगरो ग्राहो महाकायः क्षुधान्वितः ।। २१ ।। वह कुररी पक्षीकी भाँति जोर-जोरसे करुण क्रन्दन कर रही थी और अत्यन्त शोक करती हुई बार-बार विलाप कर रही थी। वहाँसे थोड़ी ही दूरपर एक विशालकाय भूखा अजगर बैठा था। उसने बार-बार चक्कर लगाती सहसा निकट आयी हुई भीमकुमारी दमयन्तीको (पैरोंकी ओरसे) निगलना आरम्भ कर दिया ।। २०-२१ ।। सा ग्रस्यमाना ग्राहेण शोकेन च परिप्लुता । नात्मानं शोचति तथा यथा शोचति नैषधम् ।। २२ ।। शोकमें डूबी हुई वैदर्भीको अजगर निगल रहा था, तो भी वह अपने लिये उतना शोक नहीं कर रही थी, जितना शोक उसे निषधनरेश नलके लिये था ।। २२ ।।

हा नाथ मामिह वने ग्रस्यमानामनाथवत् । ग्राहेणानेन विजने किमर्थं नानुधावसि ।। २३ ।। (वह विलाप करती हुई कहने लगी—) 'हा नाथ! इस निर्जन वनमें यह अजगर सर्प मुझे अनाथकी भाँति निगल रहा है। आप मेरी रक्षाके लिये दौड़कर आते क्यों नहीं हैं? ।। २३ ।।

कथं भविष्यसि पुनर्मामनुस्मृत्य नैषध । कथं भवाञ्जगामाद्य मामुत्सृज्य वने प्रभो ।। २४ ।। 'निषधनरेश! यदि मैं मर गयी, तो मुझे बार-बार याद करके आपकी कैसी दशा हो जायगी? प्रभो! आज मुझे वनमें छोड़कर आप क्यों चले गये? ।। २४ ।।

पापान्मुक्तः पुनर्लब्ध्वा बुद्धिं चेतो धनानि च । श्रान्तस्य ते क्षुधार्तस्य परिम्लानस्य नैषध । कः श्रमं राजशार्दूल नाशयिष्यति तेऽनघ ।। २५ ।। 'निष्पाप निषधनरेश! इस संकटसे मुक्त होनेपर जब आपको पुनः शुद्ध बुद्धि, चेतना और धन आदिकी प्राप्ति होगी, उस समय मेरे बिना आपकी क्या दशा होगी? नृपप्रवर! जब आप भूखसे पीड़ित हो थके-माँदे एवं अत्यन्त खिन्न होंगे, उस समय आपकी उस थकावटको कौन दूर करेगा?' ।। २५ ।।

ततः कश्चिन्मृगव्याधो विचरन् गहने वने । आक्रन्दमानां संश्रुत्य जवेनाभिससार ह ।। २६ ।। इसी समय कोई व्याध उस गहन वनमें विचर रहा था। वह दमयन्तीका करुण क्रन्दन सुनकर बड़े वेगसे उधर आया ।। २६ ।।

तां तु दृष्ट्वा तथा ग्रस्तामुरगेणायतेक्षणाम्। त्वरमाणो मृगव्याधः समभिक्रम्य वेगतः ।। २७ ।। मुखतः पाटयामास शस्त्रेण निशितेन च । निर्विचेष्टं भुजङ्गं तं विशस्य मृगजीवनः ।। २८ ।। मोक्षयित्वा स तां व्याधः प्रक्षाल्य सलिलेन ह । समाश्वास्य कृताहारामथ पप्रच्छ भारत ।। २९ ।। उस विशाल नयनोंवाली युवतीको अजगरके द्वारा उस प्रकार निगली जाती हुई देख व्याधने बड़ी उतावलीके साथ वेगसे दौड़कर तीखे शस्त्रसे शीघ्र ही उस अजगरका मुख फाड़ दिया। वह अजगर छटपटाकर चेष्टारहित हो गया। मृगोंको मारकर जीविका चलानेवाले उस व्याधने सर्पके टुकड़े-टुकड़े करके दमयन्तीको छुड़ाया। फिर जलसे उसके सर्पग्रस्त शरीरको धोकर उसे आश्वासन दे उसके लिये भोजनकी व्यवस्था कर दी। भारत! जब वह भोजन कर चुकी, तब व्याधने उससे पूछा— ।। २७—२९ ।। कस्य त्वं मृगशावाक्षि कथं चाभ्यागता वनम् । कथं चेदं महत् कृच्छ्रं प्राप्तवत्यसि भामिनि ।। ३० ।। ‘मृगलोचने! तुम किसकी स्त्री हो और कैसे वनमें चली आयी हो? भामिनि! किस प्रकार तुम्हें यह महान् कष्ट प्राप्त हुआ है?’ ।। ३० ।। दमयन्ती तथा तेन पृच्छ्यमाना विशाम्पते ।

सर्वमेतद् यथावृत्तमाचचक्षेऽस्य भारत ॥ ३१ ॥ भरतवंशी नरेश युधिष्ठिर! व्याधके पूछनेपर दमयन्तीने उसे सारा वृत्तान्त यथार्थरूपसे कह सुनाया ॥ ३१ ॥ तामर्धवस्त्रसंवीतां पीनश्रोणिपयोधराम् । सुकुमारानवद्याङ्गीं पूर्णचन्द्रनिभाननाम् ॥ ३२ ॥ अरालपक्ष्मिनयनां तथा मधुरभाषिणीम् । लक्षयित्वा मृगव्याधः कामस्य वशमीयिवान् ॥ ३३ ॥ स्थूल नितम्ब और स्तनोंवाली विदर्भकुमारीने आधे वस्त्रसे ही अपने अंगोंको ढँक रखा था। पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली दमयन्तीका एक-एक अंग सुकुमार एवं निर्दोष था। उसकी आँखें तिरछी बरौनियोंसे सुशोभित थीं और वह बड़े मधुर स्वरमें बोल रही थी। इन सब बातोंकी ओर लक्ष्य करके वह व्याध कामके अधीन हो गया ॥ ३२-३३ ॥ तामेवं श्लक्ष्णया वाचा लुब्धको मृदुपूर्वया । सान्त्वयामास कामार्तस्तदबुध्यत भाविनी ॥ ३४ ॥ वह मधुर एवं कोमल वाणीसे उसे अपने अनुकूल बनानेके लिये भाँति-भाँतिके आश्वासन देने लगा। वह व्याध उस समय कामवेदनासे पीड़ित हो रहा था। सती दमयन्तीने उसके दूषित मनोभावको समझ लिया ॥ ३४ ॥ दमयन्त्यपि तं दुष्टमुपलभ्य पतिव्रता । तीव्ररोषसमाविष्टा प्रजज्वालेव मन्युना ॥ ३५ ॥ पतिव्रता दमयन्ती भी उसकी दुष्टताको समझकर तीव्र क्रोधके वशीभूत हो मानो रोषाग्निसे प्रज्वलित हो उठी ॥ ३५ ॥

अध्याय (पृष्ठ 444)

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सती दमयन्तीके तेजसे पापी व्याधका विनाश

स तु पापमतिः क्षुद्रः प्रधर्षयितुमातुरः ।

दुर्धर्षां तर्कयामास दीप्तामग्निशिखामिव ॥ ३६ ॥ यद्यपि वह नीच पापात्मा व्याध उसपर बलात्कार करनेके लिये व्याकुल हो गया था, परंतु दमयन्ती अग्निशिखाकी भाँति उद्दीप्त हो रही थी; अतः उसका स्पर्श करना उसको अत्यन्त दुष्कर प्रतीत हुआ ॥ ३६ ॥

दमयन्ती तु दुःखार्ता पतिराज्यविनाकृता । अतीतवाक्पथे काले शशापैनं रुषान्विता ॥ ३७ ॥ पति तथा राज्य दोनोंसे वंचित होनेके कारण दमयन्ती अत्यन्त दुःखसे आतुर हो रही थी। इधर व्याधकी कुचेष्टा वाणीद्वारा रोकनेपर रुक सके, ऐसी प्रतीत नहीं होती थी। तब (उस व्याधपर अत्यन्त रुष्ट हो) उसने उसे शाप दे दिया— ॥ ३७ ॥

यद्यहं नैषधादन्यं मनसापि न चिन्तये । तथायं पततां क्षुद्रो परासुर्मृगजीवनः ॥ ३८ ॥ ‘यदि मैं निषधराज नलके सिवा दूसरे किसी पुरुषका मनसे भी चिन्तन नहीं करती होऊँ, तो इसके प्रभावसे यह तुच्छ व्याध प्राणशून्य होकर गिर पड़े’ ॥ ३८ ॥

उक्तमात्रे तु वचने तथा स मृगजीवनः । व्यसुः पपात मेदिन्यामग्निदग्ध इव द्रुमः ॥ ३९ ॥ दमयन्तीके इतना कहते ही वह व्याध आगसे जले हुए वृक्षकी भाँति प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३९ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि अजगरग्रस्तदमयन्तीमोचने त्रिषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें अजगरग्रस्तदमयन्तीमोचनविषयक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६३ ॥

अध्याय (पृष्ठ 447)

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चतुःषष्टितमोऽध्यायः

दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट

बृहदश्व उवाच

सा निहत्य मृगव्याधं प्रतस्थे कमलेक्षणा ।
वनं प्रतिभयं शून्यं झिल्लिकागणनादितम् ॥ १ ॥
**बृहदश्व मुनि कहते हैं—**राजन्! व्याधका विनाश करके वह कमलनयनी राजकुमारी झिल्लियोंकी झंकारसे गूँजते हुए निर्जन एवं भयंकर वनमें आगे बढ़ी ॥ १ ॥

सिंहद्वीपिरुरुव्याघ्रमहिषर्क्षगणैर्युतम् ।
नानापक्षिगणाकीर्णं म्लेच्छतस्करसेवितम् ॥ २ ॥
वह वन सिंह, चीतों, रुरुमृग, व्याघ्र, भैंसों तथा रीछ आदि पशुओंसे युक्त एवं भाँति-भाँतिके पक्षि-समुदायसे व्याप्त था। वहाँ म्लेच्छ और तस्करोंका निवास था ॥ २ ॥

शालवेणुधवाश्वत्थतिन्दुकैङ्गुदकिंशुकैः ।
अर्जुनारिष्टसंछन्नं स्यन्दनैश्च सशाल्मलैः ॥ ३ ॥
जम्बाम्रलोध्रखदिरसालवेत्रसमाकुलम् ।
पद्मकामलकप्लक्षकदम्बोदुम्बरावृतम् ॥ ४ ॥
बदरीबिल्वसंछन्नं न्यग्रोधैश्च समाकुलम् ।
प्रियालतालखर्जूरहरीतकबिभीतकैः ॥ ५ ॥
शाल, वेणु, धव, पीपल, तिन्दुक, इंगुद, पलाश, अर्जुन, अरिष्ट, स्यन्दन (तिनिश), सेमल, जामुन, आम, लोध, खैर, साखू, बेंत, पद्मक, आँवला, पाकर, कदम्ब, गूलर, बेर, बेल, बरगद, प्रियाल, ताल, खजूर, हर्रे तथा बहेड़े आदि वृक्षोंसे वह विशाल वन परिपूर्ण हो रहा था ॥

नानाधातुशतैर्नद्धान् विविधानपि चाचलान् ।
निकुञ्जान् परिसंघुष्टान् दरीश्चाद्भुतदर्शनाः ॥ ६ ॥
दमयन्तीने वहाँ सैकड़ों धातुओंसे संयुक्त नाना प्रकारके पर्वत, पक्षियोंके कलरवोंसे गुंजायमान कितने ही निकुंज और अद्भुत कन्दराएँ देखीं ॥ ६ ॥

नदीः सरांसि वापीश्च विविधांश्च मृगद्विजान् ।
सा बहून् भीमरूपांश्च पिशाचोरगराक्षसान् ॥ ७ ॥
पल्वलानि तडागानि गिरिकूटानि सर्वशः ।
सरितो निर्झरांश्चैव ददर्शाद्भुतदर्शनान् ॥ ८ ॥

कितनी ही नदियों, सरोवरों, बावलियों तथा नाना प्रकारके मृगों और पक्षियोंको देखा। उसने बहुत-से भयानक रूपवाले पिशाच, नाग तथा राक्षस देखे। कितने ही गड्ढों, पोखरों और पर्वतशिखरोंका अवलोकन किया। सरिताओं और अद्भुत झरनोंको देखा ॥ ७-८ ॥

यूथशो ददृशे चात्र विदर्भाधिपनन्दिनी ।
महिषांश्च वराहांश्च ऋक्षांश्च वनपन्नगान् ॥ ९ ॥
तेजसा यशसा लक्ष्म्या स्थित्या च परया युता ।
वैदर्भी विचरत्येका नलमान्वेषती तदा ॥ १० ॥
विदर्भराजनन्दिनीने उस वनमें झुंड-के-झुंड भैंसे, सूअर, रीछ और जंगली साँप देखे। तेज, यश, शोभा और परम धैर्यसे युक्त विदर्भकुमारी उस समय अकेली विचरती और नलको ढूँढ़ती थी ॥ ९-१० ॥

नाबिभ्यत् सा नृपसुता भैमी तत्राथ कस्यचित् ।
दारुणामटवीं प्राप्य भर्तृव्यसनपीडिता ॥ ११ ॥
वह पतिके विरहरूपी संकटसे संतप्त थी। अतः राजकुमारी दमयन्ती उस भयंकर वनमें प्रवेश करके भी किसी जीव-जन्तुसे भयभीत नहीं हुई ॥ ११ ॥

विदर्भतनया राजन् विललाप सुदुःखिता ।
भर्तृशोकपरीताङ्गी शिलातलमथाश्रिता ॥ १२ ॥
राजन्! विदर्भकुमारी दमयन्तीके अंग-अंगमें पतिके वियोगका शोक व्याप्त हो गया था, इसलिये वह अत्यन्त दुःखित हो एक शिलाके नीचे भागमें बैठकर बहुत विलाप करने लगी— ॥ १२ ॥

दमयन्त्युवाच

व्यूढोरस्क महाबाहो नैषधानां जनाधिप ।
क्व नु राजन् गतोऽस्यद्य विसृज्य विजने वने ॥ १३ ॥
अश्वमेधादिभिर्वीर क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ।
कथमिष्ट्वा नरव्याघ्र मयि मिथ्या प्रवर्तसे ॥ १४ ॥
दमयन्ती बोली—चौड़ी छातीवाले महाबाहु निषधनरेश महाराज! आज इस निर्जन वनमें (मुझ अकेलीको) छोड़कर आप कहाँ चले गये? नरश्रेष्ठ! वीरशिरोमणे! प्रचुर दक्षिणावाले अश्वमेध आदि यज्ञोंका अनुष्ठान करके भी आप मेरे साथ मिथ्या बर्ताव क्यों कर रहे हैं? ॥ १३-१४ ॥

यत् त्वयोक्तं नरश्रेष्ठ तत् समक्षं महाद्युते ।
स्मर्तुमर्हसि कल्याण वचनं पार्थिवर्षभ ॥ १५ ॥
महातेजस्वी कल्याणमय राजाओंमें उत्तम नरश्रेष्ठ! आपने मेरे सामने जो बात कही थी, अपनी उस बातका स्मरण करना उचित है ॥ १५ ॥

यच्चोक्तं विहगैर्हंसैः समीपे तव भूमिप । मत्समक्षं यदुक्तं च तदवेक्षितुमर्हसि ॥ १६ ॥ भूमिपाल! आकाशचारी हंसोंने आपके समीप तथा मेरे सामने जो बातें कही थीं, उनपर विचार कीजिये ॥ १६ ॥ चत्वार एकतो वेदाः साङ्गोपाङ्गाः सविस्तराः । स्वधीता मनुजव्याघ्र सत्यमेकं किलैकतः ॥ १७ ॥ नरसिंह! एक ओर अंग और उपांगोंसहित विस्तारपूर्वक चारों वेदोंका स्वाध्याय हो और दूसरी ओर केवल सत्यभाषण हो तो वह निश्चय ही उससे बढ़कर है ॥ १७ ॥ तस्मादर्हसि शत्रुघ्न सत्यं कर्तुं नरेश्वर । उक्तवानसि यद् वीर मत्सकाशे पुरा वचः ॥ १८ ॥ अतः शत्रुहन्ता नरेश्वर! वीर! आपने पहले मेरे समीप जो बातें कही हैं, उन्हें सत्य करना चाहिये ॥ १८ ॥ हा वीर नल नामाहं नष्टा किल तवानघ । अस्यामटव्यां घोरायां किं मां न प्रतिभाषसे ॥ १९ ॥ हा निष्पाप वीर नल! आपकी मैं दमयन्ती इस भयंकर वनमें नष्ट हो रही हूँ, आप मेरी बातका उत्तर क्यों नहीं देते? ॥ १९ ॥ कर्षयत्येष मां रौद्रो व्यात्तास्यो दारुणाकृतिः । अरण्यराट् क्षुधाविष्टः किं मां न त्रातुमर्हसि ॥ २० ॥ यह भयानक आकृतिवाला क्रूर सिंह भूखसे पीड़ित हो मुँह बाये खड़ा है और मुझपर आक्रमण करना चाहता है, क्या आप मेरी रक्षा नहीं कर सकते? ॥ २० ॥ न मे त्वदन्या काचिद्धि प्रियास्तीत्यब्रवीः सदा । तामृतां कुरु कल्याण पुरोक्तां भारतीं नृप ॥ २१ ॥ कल्याणमय नरेश! आप पहले जो सदा यह कहते थे कि तुम्हारे सिवा दूसरी कोई भी स्त्री मुझे प्रिय नहीं है, अपनी उस बातको सत्य कीजिये ॥ २१ ॥ उन्मत्तां विलपन्तीं मां भार्यामिष्टां नराधिप । ईप्सितामीप्सितोऽसि त्वं किं मां न प्रतिभाषसे ॥ २२ ॥ महाराज! मैं आपकी प्रिय पत्नी हूँ और आप मेरे प्रियतम पति हैं, ऐसी दशामें भी मैं यहाँ उन्मत्त विलाप कर रही हूँ तो भी आप मेरी बातका उत्तर क्यों नहीं देते? ॥ २२ ॥ कृशां दीनां विवर्णां च मलिनां वसुधाधिप । वस्त्रार्धप्रावृतामेकां विलपन्तीमनाथवत् ॥ २३ ॥ यूथभ्रष्टामिवैकां मां हरिणीं पृथुलोचन । न मानयसि मामार्य रुदन्तीमरिकर्शन ॥ २४ ॥

पृथ्वीनाथ! मैं दीन, दुर्बल, कान्तिहीन और मलिन होकर आधे वस्त्रसे अपने अंगोंको ढककर अकेली अनाथ-सी विलाप कर रही हूँ। विशाल नेत्रोंवाले शत्रुसूदन आर्य! मेरी दशा अपने झुंडसे बिछुड़ी हुई हरिणीकी-सी हो रही है। मैं यहाँ अकेली रो रही हूँ। परंतु आप मेरा मान नहीं रखते हैं ।। २३-२४ ।।

महाराज महारण्ये अहमेकाकिनी सती ।
दमयन्त्यभिभाषे त्वां किं मां न प्रतिभाषसे ।। २५ ।।
महाराज! इस महान् वनमें मैं सती दमयन्ती अकेली आपको पुकार रही हूँ, आप मुझे उत्तर क्यों नहीं देते? ।। २५ ।।

कुलशीलोपसम्पन्न चारुसर्वाङ्गशोभन ।
नाद्य त्वां प्रतिपश्यामि गिरावस्मिन् नरोत्तम ।। २६ ।।
नरश्रेष्ठ! आप उत्तम कुल और श्रेष्ठ शीलस्वभावसे सम्पन्न हैं। आप अपने सम्पूर्ण मनोहर अंगोंसे सुशोभित होते हैं। आज इस पर्वतशिखरपर मैं आपको नहीं देख पाती हूँ ।। २६ ।।

वने चास्मिन् महाघोरे सिंहव्याघ्रनिषेविते ।
शयानमुपविष्टं वा स्थितं वा निषधाधिप ।। २७ ।।
निषधनरेश! इस महाभयंकर वनमें, जहाँ सिंह-व्याघ्र रहते हैं, आप कहीं सोये हैं, बैठे हैं अथवा खड़े हैं? ।। २७ ।।

प्रस्थितं वा नरश्रेष्ठ मम शोकविवर्धन ।
कं नु पृच्छामि दुःखार्ता त्वदर्थे शोककर्शिता ।। २८ ।।
मेरे शोकको बढ़ानेवाले नरश्रेष्ठ! आप यहीं हैं या कहीं अन्यत्र चल दिये, यह मैं किससे पूछूँ? आपके लिये शोकसे दुर्बल होकर मैं अत्यन्त दुःखसे आतुर हो रही हूँ ।। २८ ।।

कच्चिद् दृष्टस्त्वयारण्ये संगतयेह नलो नृपः ।
को नु मे वाथ प्रष्टव्यो वनेऽस्मिन् प्रस्थितं नलम् ।। २९ ।।
‘क्या तुमने इस वनमें राजा नलसे मिलकर उन्हें देखा है?’ ऐसा प्रश्न अब मैं इस वनमें प्रस्थान करनेवाले नलके विषयमें किससे करूँ? ।। २९ ।।

अभिरूपं महात्मानं परव्यूहविनाशनम् ।
यमन्वेषसि राजानं नलं पद्मानिभेक्षणम् ।। ३० ।।
अयं स इति कस्याद्य श्रोष्यामि मधुरां गिरम्।
‘शत्रुओंके व्यूहका नाश करनेवाले जिन परम सुन्दर कमलनयन महात्मा राजा नलको तू खोज रही है, वे यही तो हैं, ऐसी मधुर वाणी आज मैं किसके मुखसे सुनूँगी?’ ।। ३० १/२ ।।

अरण्यराडयं श्रीमांश्चतुर्दंष्ट्रो महाहनुः ।। ३१ ।।
शार्दूलोऽभिमुखोऽभ्येति व्रजाम्येनमशङ्किता ।

भवान् मृगाणामधिपस्त्वमस्मिन् कानने प्रभुः ॥ ३२ ॥ वह वनका राजा कान्तिमान् सिंह मेरे सामने चला आ रहा है, इसके चार दाढ़ें और विशाल थोड़ी है। मैं निःशंक होकर इसके सामने जा रही हूँ और कहती हूँ, 'आप मृगोंके राजा और इस वनके स्वामी हैं ॥ ३१-३२ ॥

विदर्भराजतनयां दमयन्तीति विद्धि माम् । निषधाधिपतेर्भार्या नलस्यामित्रघातिनः ॥ ३३ ॥ 'मैं विदर्भराजकुमारी दमयन्ती हूँ। मुझे शत्रुघाती निषधनरेश नलकी पत्नी समझिये ॥ ३३ ॥

पतिमन्वेषतीमेकां कृपणां शोककर्षिताम् । आश्वासय मृगेन्द्रह यदि दृष्टस्त्वया नलः ॥ ३४ ॥ 'मृगेन्द्र! मैं इस वनमें अकेली पतिकी खोजमें भटक रही हूँ तथा शोकसे पीड़ित एवं दीन हो रही हूँ। यदि आपने नलको यहाँ कहीं देखा हो तो उनका कुशल-समाचार बताकर मुझे आश्वासन दीजिये ॥ ३४ ॥

अथवा त्वं वनपते नलं यदि न शंससि । मां खादय मृगश्रेष्ठ दुःखादस्माद् विमोचय ॥ ३५ ॥ 'अथवा वनराज मृगश्रेष्ठ! यदि आप नलके विषयमें कुछ नहीं बताते हैं तो मुझे खा जायँ और इस दुःखसे छुटकारा दे दें' ॥ ३५ ॥

श्रुत्वारण्ये विलपितं न मामाश्वासयत्ययम् । यात्येतां स्वादुसलिलामापगां सागरंगमाम् ॥ ३६ ॥ अहो! इस घोर वनमें मेरा विलाप सुनकर भी यह सिंह मुझे सान्त्वना नहीं देता। यह तो स्वादिष्ट जलसे भरी हुई इस समुद्रगामिनी नदीकी ओर जा रहा है ॥

इमं शिलोच्चयं पुण्यं शृङ्गैर्बहुभिरुच्छ्रितैः । विराजद्भिरिवानेकैरनेकवर्णैर्मनोरमैः ॥ ३७ ॥ अच्छा, इस पवित्र पर्वतसे ही पूछती हूँ। यह बहुत-से ऊँचे-ऊँचे शोभाशाली बहुरंगे एवं मनोरम शिखरोंद्वारा सुशोभित है ॥ ३७ ॥

नानाधातुसमाकीर्णं विविधोपलभूषितम् । अस्यारण्यस्य महतः केतुभूतमिवोत्थितम् ॥ ३८ ॥ अनेक प्रकारके धातुओंसे व्याप्त और भाँति-भाँतिके शिला-खण्डोंसे विभूषित है। यह पर्वत इस महान् वनकी ऊपर उठी हुई पताकाके समान जान पड़ता है ॥ ३८ ॥

सिंहशार्दूलमातङ्गवराहर्क्षमृगायुतम् । पतत्रिभिर्बहुविधैः समन्तादनुनादितम् ॥ ३९ ॥ यह सिंह, व्याघ्र, हाथी, सूअर, रीछ और मृगोंसे परिपूर्ण है। इसके चारों ओर अनेक प्रकारके पक्षी कलरव कर रहे हैं ॥ ३९ ॥

किंशुकाशोकबकुलपुन्नागैरुपशोभितम् । कर्णिकारधवप्लक्षैः सुपुष्पैरुपशोभितम् ॥ ४० ॥ पलाश, अशोक, बकुल, पुन्नाग, कनेर, धव तथा प्लक्ष आदि सुन्दर फूलोंवाले वृक्षोंसे वह पर्वत सुशोभित हो रहा है ॥ ४० ॥ सरिद्भिः सविहङ्गाभिः शिखरैश्च समाकुलम् । गिरिराजमिमं तावत् पृच्छामि नृपतिं प्रति ॥ ४१ ॥ यह पर्वत अनेक सरिताओं, सुन्दर पक्षियों और शिखरोंसे परिपूर्ण है। अब मैं इसी गिरिराजसे महाराज नलका समाचार पूछती हूँ ॥ ४१ ॥ भगवन्नचलश्रेष्ठ दिव्यदर्शन विश्रुत । शरण्य बहुकल्याण नमस्तेऽस्तु महीधर ॥ ४२ ॥ ‘भगवन्! अचलप्रवर! दिव्य दृष्टिवाले! विख्यात! सबको शरण देनेवाले परम कल्याणमय महीधर! आपको नमस्कार है ॥ ४२ ॥ प्रणमाम्यभिगम्याहं राजपुत्रीं निबोध माम् । राज्ञः स्नुषां राजभार्यां दमयन्तीति विश्रुताम् ॥ ४३ ॥ ‘मैं निकट आकर आपके चरणोंमें प्रणाम करती हूँ। आप मेरा परिचय इस प्रकार जानें, मैं राजाकी पुत्री, राजाकी पुत्रवधू तथा राजाकी ही पत्नी हूँ। मेरी ‘दमयन्ती’ नामसे प्रसिद्धि है ॥ ४३ ॥ राजा विदर्भाधिपतिः पिता मम महारथः । भीमो नाम क्षितिपतिश्चातुर्वर्ण्यस्य रक्षिता ॥ ४४ ॥ ‘विदर्भदेशके स्वामी महारथी भीम नामक राजा मेरे पिता हैं। वे पृथ्वीके पालक तथा चारों वर्णोंके रक्षक हैं ॥ ४४ ॥ राजसूयाश्वमेधानां क्रतूनां दक्षिणावताम् । आहर्ता पार्थिवश्रेष्ठः पृथुचार्वञ्चितेक्षणः ॥ ४५ ॥ ‘उन्होंने (प्रचुर) दक्षिणावाले राजसूय तथा अश्वमेध नामक यज्ञोंका अनुष्ठान किया है। वे भूमिपालोंमें श्रेष्ठ हैं। उनके नेत्र बड़े, चंचल और सुन्दर हैं ॥ ४५ ॥ ब्रह्मण्यः साधुवृत्तश्च सत्यवागनसूयकः । शीलवान् वीर्यसम्पन्नः पृथुश्रीर्धर्मविच्छुचिः ॥ ४६ ॥ ‘वे ब्राह्मणभक्त, सदाचारी, सत्यवादी, किसीके दोषको न देखनेवाले, शीलवान्, पराक्रमी, प्रचुर सम्पत्तिके स्वामी, धर्मज्ञ तथा पवित्र हैं ॥ ४६ ॥ सम्यग् गोप्ता विदर्भाणां निर्जितारिगणः प्रभुः । तस्य मां विद्धि तनयां भगवंस्त्वामुपस्थिताम् ॥ ४७ ॥ ‘वे विदर्भदेशकी जनताका अच्छी तरह पालन करनेवाले हैं। उन्होंने समस्त शत्रुओंको जीत लिया है, वे बड़े शक्तिशाली हैं। भगवन्! मुझे उन्हींकी पुत्री जानिये। मैं आपकी सेवामें

(एक जिज्ञासा लेकर) उपस्थित हुई हूँ॥ ४७॥ निषधेषु महाराजः श्वशुरो मे नरोत्तमः। गृहीतनामा विख्यातो वीरसेन इति स्म ह॥ ४८॥ 'निषधदेशके महाराज मेरे श्वशुर थे, वे प्रातः-स्मरणीय नरश्रेष्ठ वीरसेनके नामसे विख्यात थे॥ ४८॥ तस्य राज्ञः सुतो वीरः श्रीमान् सत्यपराक्रमः। क्रमप्राप्तं पितुः स्वं यो राज्यं समनुशास्ति ह॥ ४९॥ 'उन्हीं महाराज वीरसेनके एक वीर पुत्र हैं, जो बड़े ही सुन्दर और सत्यपराक्रमी हैं। वे वंशपरम्परासे प्राप्त अपने पिताके राज्यका पालन करते हैं॥ ४९॥ नलो नामारिहा श्यामः पुण्यश्लोक इति श्रुतः। ब्रह्मण्यो वेदविद् वाग्मी पुण्यकृत् सोमपोऽग्निमान् ॥ ५० ॥ 'उनका नाम नल है। शत्रुदमन, श्यामसुन्दर राजा नल पुण्यश्लोक कहे जाते हैं। वे बड़े ब्राह्मणभक्त, वेदवेत्ता, वक्ता, पुण्यात्मा, सोमपान करनेवाले और अग्निहोत्री हैं॥ ५०॥ यष्टा दाता च योद्धा च सम्यक् चैव प्रशासिता। तस्य मामबलां श्रेष्ठां विद्धि भार्यामिहागताम्॥ ५१॥ त्यक्तश्रियं भर्तृहीनामनाथां व्यसनान्विताम्। अन्वेषमाणां भर्तारं त्वं मां पर्वतसत्तम॥ ५२॥ 'वे एक अच्छे यज्ञकर्ता, उत्तम दाता, शूरवीर योद्धा और श्रेष्ठ शासक हैं, आप मुझे उन्हींकी श्रेष्ठ पत्नी समझ लीजिये। मैं अबला नारी आपके निकट यहाँ उन्हींकी कुशल पूछनेके लिये आयी हूँ। गिरिराज! (मेरे स्वामी मुझे छोड़कर कहीं चले गये हैं।) मैं धन-सम्पत्तिसे वंचित, पतिदेवसे रहित, अनाथ और संकटोंकी मारी हुई हूँ। इस वनमें अपने पतिकी ही खोज कर रही हूँ॥ ५१-५२॥ समुल्लिखद्भिरेतैर्हि त्वया शृङ्गशतैर्नृपः। कच्चिद् दृष्टोऽचलश्रेष्ठ वनेऽस्मिन् दारुणे नलः॥ ५३॥ 'पर्वतश्रेष्ठ! क्या आपने इन सैकड़ों गगनचुम्बी शिखरोंद्वारा इस भयानक वनमें कहीं राजा नलको देखा है? ॥ ५३ ॥ गजेन्द्रविक्रमो धीमान् दीर्घबाहुरमर्षणः। विक्रान्तः सत्त्ववान् वीरो भर्ता मम महायशाः॥ ५४॥ निषधानामधिपतिः कच्चिद् दृष्टस्त्वया नलः। विलपतीं किमेकां मां पर्वतश्रेष्ठ विह्वलाम्॥ ५५॥ गिरा नाश्वासयस्यद्य स्वां सुतामिव दुःखिताम्।

'मेरे महायशस्वी स्वामी निषधराज नल गजराजकी-सी चालसे चलते हैं। वे बड़े बुद्धिमान्, महाबाहु, अमर्षशील (दुःखको न सह सकनेवाले), पराक्रमी, धैर्यवान् तथा वीर हैं। क्या आपने कहीं उन्हें देखा है? गिरिश्रेष्ठ! मैं आपकी पुत्रीके समान हूँ और (पतिके वियोगसे बहुत ही) दुःखी हूँ। क्या आप व्याकुल होकर अकेली विलाप करती हुई मुझ अबलाको आज अपनी वाणीद्वारा आश्वासन न देंगे?' ।। ५४-५५१/२ ।।

वीर विक्रान्त धर्मज्ञ सत्यसंध महीपते ।। ५६ ।।
यद्यस्यस्मिन् वने राजन् दर्शयात्मानमात्मना ।
वीर! धर्मज्ञ! सत्यप्रतिज्ञ और पराक्रमी महीपाल! यदि आप इसी वनमें हैं तो राजन्! अपने-आपको प्रकट करके मुझे दर्शन दीजिये ।। ५६१/२ ।।

कदा सुस्निग्धगम्भीरां जीमूतस्वनसंनिभाम् ।। ५७ ।।
श्रोश्यामि नैषधस्याहं वाचं ताममृतोपमाम् ।
वैदर्भरीत्येव विस्पष्टां शुभां राज्ञो महात्मनः ।। ५८ ।।
आम्नायसारिणीमृद्धां मम शोकविनाशिनीम् ।
मैं कब निषधराज नलकी मेघ-गर्जनाके समान स्निग्ध, गम्भीर, अमृतोपम वह मधुर वाणी सुनूँगी। उन महामना राजाके मुखसे 'वैदर्भि!' इस सम्बोधनसे युक्त शुभ, स्पष्ट, वेदके अनुकूल, सुन्दर पद और अर्थसे युक्त तथा मेरे शोकका विनाश करनेवाली वाणी मुझे कब सुनायी देगी ।। ५७-५८१/२ ।।

भीतामाश्वासयत मां नृपते धर्मवत्सल ।। ५९ ।।
धर्मवत्सल नरेश्वर! मुझ भयभीत अबलाको आश्वासन दीजिये ।। ५९ ।।

इति सा तं गिरिश्रेष्ठमुक्त्वा पार्थिवनन्दिनी ।
दमयन्ती ततो भूयो जगाम दिशमुत्तराम् ।। ६० ।।
इस प्रकार उस श्रेष्ठ पर्वतसे कहकर वह राजकुमारी दमयन्ती फिर वहाँसे उत्तर दिशाकी ओर चल दी ।। ६० ।।

सा गत्वा त्रीनहोरात्रान् ददर्श परमाङ्गना ।
तापसारण्यमतुलं दिव्यकाननशोभितम् ।। ६१ ।।
लगातार तीन दिन और तीन रात चलनेके पश्चात् उस श्रेष्ठ नारीने तपस्वियोंसे युक्त एक वन देखा, जो अनुपम तथा दिव्य वनसे सुशोभित था ।। ६१ ।।

वसिष्ठभृग्वत्रिसमैस्तापसैरुपशोभितम् ।
नियतैः संयताहारैर्दमशौचसमन्वितैः ।। ६२ ।।
तथा वसिष्ठ, भृगु और अत्रिके समान नियम-परायण, मिताहारी तथा (शम,) दम, शौच आदिसे सम्पन्न तपस्वियोंसे वह शोभायमान हो रहा था ।। ६२ ।।

अब्भक्षैर्वायुभक्षैश्च पत्राहारैस्तथैव च ।
जितेन्द्रियैर्महाभागैः स्वर्गमार्गदिदृक्षुभिः ।। ६३ ।।

वहाँ कुछ तपस्वीलोग केवल जल पीकर रहते थे और कुछ लोग वायु पीकर। कितने ही केवल पत्ते चबाकर रहते थे। वे जितेन्द्रिय महाभाग स्वर्गलोकके मार्गका दर्शन करना चाहते थे ।। ६३ ।।
वल्कलाजिनसंवीतैर्मुनिभिः संयतेन्द्रियैः ।
तापसाध्युषितं रम्यं ददर्शाश्रममण्डलम् ।। ६४ ।।
वल्कल और मृगचर्म धारण करनेवाले उन जितेन्द्रिय मुनियोंसे सेवित एक रमणीय आश्रममण्डल दिखायी दिया, जिसमें प्रायः तपस्वीलोग ही निवास करते थे ।। ६४ ।।
नानामृगगणैर्जुष्टं शाखामृगगणायुतम् ।
तापसैः समुपेतं च सा दृष्ट्वैव समाश्वसत् ।। ६५ ।।
उस आश्रममें नाना प्रकारके मृगों और वानरोंके समुदाय भी विचरते रहते थे। तपस्वी महात्माओंसे भरे हुए उस आश्रमको देखते ही दमयन्तीको बड़ी सान्त्वना मिली ।। ६५ ।।
सुभ्रूः सुकेशी सुश्रोणी सुकुचा सुद्विजानना ।
वर्चस्विनी सुप्रतिष्ठा स्वसितायतलोचना ।। ६६ ।।
उसकी भौंहें बड़ी सुन्दर थीं। केश मनोहर जान पड़ते थे। नितम्बभाग, स्तन, दन्तपंक्ति और मुख सभी सुन्दर थे। उसके मनोहर कजरारे नेत्र विशाल थे। वह तेजस्विनी और प्रतिष्ठित थी ।। ६६ ।।
सा विवेशाश्रमपदं वीरसेनसुतप्रिया ।
योषिद्रत्नं महाभागा दमयन्ती तपस्विनी ।। ६७ ।।
महाराज वीरसेनकी पुत्रवधू रमणीशिरोमणि महाभागा तपस्विनी उस दमयन्तीने आश्रमके भीतर प्रवेश किया ।। ६७ ।।
साभिवाद्य तपोवृद्धान् विनयावनता स्थिता ।
स्वागतं त इति प्रोक्ता तैः सर्वैस्तापसोत्तमैः ।। ६८ ।।
वहाँ तपोवृद्ध महात्माओंको प्रणाम करके वह उनके समीप विनीतभावसे खड़ी हो गयी। तब वहाँके सभी श्रेष्ठ तपस्वीजनोंने उससे कहा—'देवि! तुम्हारा स्वागत है' ।। ६८ ।।
पूजां चास्या यथान्यायं कृत्वा तत्र तपोधनाः ।
आस्यतामित्यथोचुस्ते ब्रूहि किं करवामहे ।। ६९ ।।
तदनन्तर वहाँ दमयन्तीका यथोचित आदर-सत्कार करके उन तपोधनोंने कहा—'शुभे! बैठो, बताओ, हम तुम्हारा कौन-सा कार्य सिद्ध करें' ।। ६९ ।।
तानुवाच वरारोहा कच्चिद् भगवतामिह ।
तपःस्वग्निषु धर्मेषु मृगपक्षिषु चानघाः ।। ७० ।।
कुशलं वो महाभागाः स्वधर्माचरणेषु च ।
तैरुक्ता कुशलं भद्रे सर्वत्रेति यशस्विनि ।। ७१ ।।

उस समय सुन्दर अंगोंवाली दमयन्तीने उनसे कहा—'भगवन्! निष्पाप महाभागगण! यहाँ तप, अग्निहोत्र, धर्म, मृग और पक्षियोंके पालन तथा अपने धर्मके आचरण आदि विषयोंमें आपलोग सकुशल हैं न?' तब उन महात्माओंने कहा—'भद्रे! यशस्विनि! सर्वत्र कुशल है ।। ७०-७१ ।।

ब्रूहि सर्वानवद्याङ्गि का त्वं किं च चिकीर्षसि ।
दृष्ट्वैव ते परं रूपं द्युतिं च परमामिह ।। ७२ ।।
विस्मयो नः समुत्पन्नः समाश्वसिहि मा शुचः ।
अस्यारण्यस्य देवी त्वमुताहोऽस्य महीभृतः ।। ७३ ।।
'सर्वांगसुन्दरी! बताओ, तुम कौन हो और क्या करना चाहती हो? तुम्हारे उत्तम रूप और परम सुन्दर कान्तिको यहाँ देखकर हमें बड़ा विस्मय हो रहा है। धैर्य धारण करो, शोक न करो। तुम इस वनकी देवी हो या इस पर्वतकी अधिदेवता ।। ७२-७३ ।।

अस्याश्च नद्याः कल्याणि वद सत्यमनिन्दिते ।
साब्रवीत् तानृषीन् नाहमरण्यस्यास्य देवता ।। ७४ ।।
न चाप्यस्य गिरेर्विप्रा नैव नद्याश्च देवता ।
मानुषीं मां विजानीत यूयं सर्वे तपोधनाः ।। ७५ ।।
'अनिन्दिते! कल्याणि! अथवा तुम इस नदीकी अधिष्ठात्री देवी हो, सच-सच बताओ।' दमयन्तीने उन ऋषियोंसे कहा—'तपस्याके धनी ब्राह्मणो! न तो मैं इस वनकी देवी हूँ, न पर्वतकी अधिदेवता और न इस नदीकी ही देवी हूँ। आप सब लोग मुझे मानवी समझें ।। ७४-७५ ।।

विस्तरेणाभिधास्यामि तन्मे शृणुत सर्वशः ।
विदर्भेषु महीपालो भीमो नाम महीपतिः ।। ७६ ।।
'मैं विस्तारपूर्वक अपना परिचय दे रही हूँ, आपलोग सुनें। विदर्भदेशमें भीम नामसे प्रसिद्ध एक भूमिपाल हैं ।। ७६ ।।

तस्य मां तनयां सर्वे जानीत द्विजसत्तमाः ।
निषधाधिपतिर्धीमान् नलो नाम महायशाः ।। ७७ ।।
वीरः संग्रामजिद् विद्वान् मम भर्ता विशाम्पतिः ।
देवताभ्यर्चनपरो द्विजातिजनवत्सलः ।। ७८ ।।
'द्विजवरो! आप सब महात्मा जान लें, मैं उन्हीं महाराजकी पुत्री हूँ। निषधदेशके स्वामी, संग्रामविजयी, वीर, विद्वान्, बुद्धिमान्, प्रजापालक महायशस्वी राजा नल मेरे पति हैं। वे देवताओंके पूजनमें संलग्न रहते हैं और ब्राह्मणोंके प्रति उनके हृदयमें बड़ा स्नेह है ।। ७७-७८ ।।

गोप्ता निषधवंशस्य महातेजा महाबलः ।
सत्यवान् धर्मवित् प्राज्ञः सत्यसंधोऽरिमर्दनः ।। ७९ ।।

ब्रह्मण्यो दैवतपरः श्रीमान् परपुरंजयः । नलो नाम नृपश्रेष्ठो देवराजसमद्युतिः ॥ ८० ॥ मम भर्ता विशालाक्षः पूर्णेन्दुवदनोऽरिहा । आहर्ता क्रतुमुख्यानां वेदवेदाङ्गपारगः ॥ ८१ ॥ 'वे निषधकुलके रक्षक, महातेजस्वी, महाबली, सत्यवादी, धर्मज्ञ, विद्वान्, सत्यप्रतिज्ञ, शत्रुमर्दक, ब्राह्मणभक्त, देवोपासक, शोभा और सम्पत्तिसे युक्त तथा शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले हैं। मेरे स्वामी नृपश्रेष्ठ नल देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी हैं। उनके नेत्र विशाल हैं, उनका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान सुन्दर है, वे शत्रुओंका संहार करनेवाले, बड़े-बड़े यज्ञोंके आयोजक और वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् हैं ॥ ७९—८१ ॥

सपत्नानां मृधे हन्ता रविसोमसमप्रभः । स कैश्चिन्निकृतिप्रज्ञैरनार्यैरकृतात्मभिः ॥ ८२ ॥ आहूय पृथिवीपालः सत्यधर्मपरायणः । देवने कुशलैर्जिह्मैर्हृतं राज्यं वसूनि च ॥ ८३ ॥ 'युद्धमें उन्होंने कितने ही शत्रुओंका संहार किया है। वे सूर्य और चन्द्रमाके समान तेजस्वी और कान्तिमान् हैं। एक दिन कुछ कपटकुशल, अजितेन्द्रिय, अनार्य, कुटिल तथा द्यूतनिपुण जुआरियोंने उन सत्य-धर्मपरायण महाराज नलको जूएके लिये आवाहन करके उनके सारे राज्य और धनका अपहरण कर लिया ॥

तस्य मामवगच्छध्वं भार्यां राजर्षभस्य वै । दमयन्तीति विख्यातां भर्तृदर्शनलालसाम् ॥ ८४ ॥ 'आप दमयन्ती नामसे विख्यात मुझे उन्हीं नृपश्रेष्ठ नलकी पत्नी जानें। मैं अपने स्वामीके दर्शनके लिये उत्सुक हो रही हूँ ॥ ८४ ॥

सा वनानि गिरींश्चैव सरांसि सरितस्तथा । पल्वलानि च सर्वाणि तथारण्यानि सर्वशः ॥ ८५ ॥ अन्वेषमाणा भर्तारं नलं रणविशारदम् । महात्मानं कृतास्त्रं च विचरामीह दुःखिता ॥ ८६ ॥ 'मेरे पति महामना नल युद्धकलामें कुशल और सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके विद्वान् हैं। मैं उन्हींकी खोज करती हुई वन, पर्वत, सरोवर, नदी, गड्ढे और सभी जंगलोंमें दुःखी होकर घूमती हूँ ॥ ८५-८६ ॥

कच्चिद् भगवतां रम्यं तपोवनमिदं नृपः । भवेत् प्राप्तो नलो नाम निषधानां जनाधिपः ॥ ८७ ॥ यत्कृतेऽहमिदं ब्रह्मन् प्रपन्ना भृशदारुणम् । वनं प्रतिभयं घोरं शार्दूलमृगसेवितम् ॥ ८८ ॥