महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहा नाथ मामिह वने ग्रस्यमानामनाथवत् । ग्राहेणानेन विजने किमर्थं नानुधावसि ।। २३ ।। (वह विलाप करती हुई कहने लगी—) 'हा नाथ! इस निर्जन वनमें यह अजगर सर्प मुझे अनाथकी भाँति निगल रहा है। आप मेरी रक्षाके लिये दौड़कर आते क्यों नहीं हैं? ।। २३ ।।
कथं भविष्यसि पुनर्मामनुस्मृत्य नैषध । कथं भवाञ्जगामाद्य मामुत्सृज्य वने प्रभो ।। २४ ।। 'निषधनरेश! यदि मैं मर गयी, तो मुझे बार-बार याद करके आपकी कैसी दशा हो जायगी? प्रभो! आज मुझे वनमें छोड़कर आप क्यों चले गये? ।। २४ ।।
पापान्मुक्तः पुनर्लब्ध्वा बुद्धिं चेतो धनानि च । श्रान्तस्य ते क्षुधार्तस्य परिम्लानस्य नैषध । कः श्रमं राजशार्दूल नाशयिष्यति तेऽनघ ।। २५ ।। 'निष्पाप निषधनरेश! इस संकटसे मुक्त होनेपर जब आपको पुनः शुद्ध बुद्धि, चेतना और धन आदिकी प्राप्ति होगी, उस समय मेरे बिना आपकी क्या दशा होगी? नृपप्रवर! जब आप भूखसे पीड़ित हो थके-माँदे एवं अत्यन्त खिन्न होंगे, उस समय आपकी उस थकावटको कौन दूर करेगा?' ।। २५ ।।
ततः कश्चिन्मृगव्याधो विचरन् गहने वने । आक्रन्दमानां संश्रुत्य जवेनाभिससार ह ।। २६ ।। इसी समय कोई व्याध उस गहन वनमें विचर रहा था। वह दमयन्तीका करुण क्रन्दन सुनकर बड़े वेगसे उधर आया ।। २६ ।।