महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतां तु दृष्ट्वा तथा ग्रस्तामुरगेणायतेक्षणाम्। त्वरमाणो मृगव्याधः समभिक्रम्य वेगतः ।। २७ ।। मुखतः पाटयामास शस्त्रेण निशितेन च । निर्विचेष्टं भुजङ्गं तं विशस्य मृगजीवनः ।। २८ ।। मोक्षयित्वा स तां व्याधः प्रक्षाल्य सलिलेन ह । समाश्वास्य कृताहारामथ पप्रच्छ भारत ।। २९ ।। उस विशाल नयनोंवाली युवतीको अजगरके द्वारा उस प्रकार निगली जाती हुई देख व्याधने बड़ी उतावलीके साथ वेगसे दौड़कर तीखे शस्त्रसे शीघ्र ही उस अजगरका मुख फाड़ दिया। वह अजगर छटपटाकर चेष्टारहित हो गया। मृगोंको मारकर जीविका चलानेवाले उस व्याधने सर्पके टुकड़े-टुकड़े करके दमयन्तीको छुड़ाया। फिर जलसे उसके सर्पग्रस्त शरीरको धोकर उसे आश्वासन दे उसके लिये भोजनकी व्यवस्था कर दी। भारत! जब वह भोजन कर चुकी, तब व्याधने उससे पूछा— ।। २७—२९ ।। कस्य त्वं मृगशावाक्षि कथं चाभ्यागता वनम् । कथं चेदं महत् कृच्छ्रं प्राप्तवत्यसि भामिनि ।। ३० ।। ‘मृगलोचने! तुम किसकी स्त्री हो और कैसे वनमें चली आयी हो? भामिनि! किस प्रकार तुम्हें यह महान् कष्ट प्राप्त हुआ है?’ ।। ३० ।। दमयन्ती तथा तेन पृच्छ्यमाना विशाम्पते ।