महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 443, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्वमेतद् यथावृत्तमाचचक्षेऽस्य भारत ॥ ३१ ॥ भरतवंशी नरेश युधिष्ठिर! व्याधके पूछनेपर दमयन्तीने उसे सारा वृत्तान्त यथार्थरूपसे कह सुनाया ॥ ३१ ॥ तामर्धवस्त्रसंवीतां पीनश्रोणिपयोधराम् । सुकुमारानवद्याङ्गीं पूर्णचन्द्रनिभाननाम् ॥ ३२ ॥ अरालपक्ष्मिनयनां तथा मधुरभाषिणीम् । लक्षयित्वा मृगव्याधः कामस्य वशमीयिवान् ॥ ३३ ॥ स्थूल नितम्ब और स्तनोंवाली विदर्भकुमारीने आधे वस्त्रसे ही अपने अंगोंको ढँक रखा था। पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली दमयन्तीका एक-एक अंग सुकुमार एवं निर्दोष था। उसकी आँखें तिरछी बरौनियोंसे सुशोभित थीं और वह बड़े मधुर स्वरमें बोल रही थी। इन सब बातोंकी ओर लक्ष्य करके वह व्याध कामके अधीन हो गया ॥ ३२-३३ ॥ तामेवं श्लक्ष्णया वाचा लुब्धको मृदुपूर्वया । सान्त्वयामास कामार्तस्तदबुध्यत भाविनी ॥ ३४ ॥ वह मधुर एवं कोमल वाणीसे उसे अपने अनुकूल बनानेके लिये भाँति-भाँतिके आश्वासन देने लगा। वह व्याध उस समय कामवेदनासे पीड़ित हो रहा था। सती दमयन्तीने उसके दूषित मनोभावको समझ लिया ॥ ३४ ॥ दमयन्त्यपि तं दुष्टमुपलभ्य पतिव्रता । तीव्ररोषसमाविष्टा प्रजज्वालेव मन्युना ॥ ३५ ॥ पतिव्रता दमयन्ती भी उसकी दुष्टताको समझकर तीव्र क्रोधके वशीभूत हो मानो रोषाग्निसे प्रज्वलित हो उठी ॥ ३५ ॥