महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 277)
षट्त्रिंशोऽध्यायः
युधिष्ठिरका भीमसेनको समझाना, व्यासजीका आगमन और युधिष्ठिरको प्रतिस्मृतिविद्याप्रदान तथा पाण्डवोंका पुनः काम्यकवनगमन
वैशम्पायन उवाच
भीमसेनवचः श्रुत्वा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
निःश्वस्य पुरुषव्याघ्रः सम्प्रदध्यौ परंतपः ॥ १ ॥
श्रुता मे राजधर्माश्च वर्णानां च विनिश्चयाः ।
आयत्यां च तदात्वे च यः पश्यति स पश्यति ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! भीमसेनकी बात सुनकर शत्रुओंको संताप देनेवाले पुरुषसिंह कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर लम्बी साँस लेकर मन-ही-मन विचार करने लगे—‘मैंने राजाओंके धर्म एवं वर्णोंके सुनिश्चित सिद्धान्त भी सुने हैं, परंतु जो भविष्य और वर्तमान दोनोंपर दृष्टि रखता है, वही यथार्थदर्शी है ॥ १-२ ॥
धर्मस्य जानमानोऽहं गतिमग्र्यां सुदुर्विदाम् ।
कथं बलात् करिष्यामि मेरोरिव विमर्दनम् ॥ ३ ॥
‘धर्मकी श्रेष्ठ गति अत्यन्त दुर्बोध है, उसे जानता हुआ भी मैं कैसे बलपूर्वक मेरु पर्वतके समान महान् उस धर्मका मर्दन करूँगा’ ॥ ३ ॥
स मुहूर्तंमिव ध्यात्वा विनिश्चित्येतिकृत्यताम् ।
भीमसेनमिदं वाक्यमपदान्तरमब्रवीत् ॥ ४ ॥
इस प्रकार दो घड़ीतक विचार करनेके पश्चात् अपनेको क्या करना है, इसका निश्चय करके युधिष्ठिरने भीमसेनसे अविलम्ब यह बात कही ॥ ४ ॥
युधिष्ठिर उवाच
एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि भारत ।
इदमन्यत् समादत्स्व वाच्यं मे वाक्यकोविद ॥ ५ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**महाबाहु भरतकुलतिलक वाक्यविशारद भीम! तुम जैसा कह रहे हो, वह ठीक है, तथापि मेरी यह दूसरी बात भी मानो ॥ ५ ॥
महापापानि कर्माणि यानि केवलसाहसात् ।
आरभ्यन्ते भीमसेन व्यथन्ते तानि भारत ॥ ६ ॥
भरतनन्दन भीमसेन! जो महान् पापमय कर्म केवल साहसके भरोसे आरम्भ किये जाते हैं, वे सभी कष्टदायक होते हैं ॥ ६ ॥
सुमन्त्रिते सुविक्रान्ते सुकृते सुविचारिते । सिध्यन्त्यर्था महाबाहो दैवं चात्र प्रदक्षिणम् ॥ ७ ॥ महाबाहो! अच्छी तरहसे सलाह और विचार करके पूरा पराक्रम प्रकट करते हुए सुन्दररूपसे जो कार्य किये जाते हैं, वे सफल होते हैं और उसमें दैव भी अनुकूल हो जाता है ॥ ७ ॥
यत् तु केवलचापल्याद् बलदर्पोत्थितः स्वयम् । आरब्धव्यमिदं कार्यं मन्यसे शृणु तत्र मे ॥ ८ ॥ तुम स्वयं बलके घमण्डसे उन्मत्त हो जो केवल चपलतावश स्वयं इस युद्धरूपी कार्यको अभी आरम्भ करनेके योग्य मान रहे हो, उसके विषयमें मेरी बात सुनो ॥ ८ ॥
भूरिश्रवाः शलश्चैव जलसंधश्च वीर्यवान् । भीष्मो द्रोणश्च कर्णश्च द्रोणपुत्रश्च वीर्यवान् ॥ ९ ॥ धार्तराष्ट्रा दुराधर्षा दुर्योधनपुरोगमाः । सर्व एव कृतास्त्राश्च सततं चाततायिनः ॥ १० ॥ राजानः पार्थिवाश्चैव येऽस्माभिरुपतापिताः । संश्रिताः कौरवं पक्षं जातस्नेहाश्च तं प्रति ॥ ११ ॥ भूरिश्रवा, शल, पराक्रमी जलसंध, भीष्म, द्रोण, कर्ण, बलवान् अश्वत्थामा तथा सदाके आततायी दुर्योधन आदि दुर्धर्ष धृतराष्ट्रपुत्र—ये सभी अस्त्र-विद्याके ज्ञाता हैं एवं हमने जिन राजाओं तथा भूमिपालोंको युद्धमें कष्ट पहुँचाया है, वे सभी कौरवपक्षमें मिल गये हैं और उधर ही उनका स्नेह हो गया है ॥ ९—११ ॥
दुर्योधनहिते युक्ता न तथास्मासु भारत । पूर्णकोशा बलोपेताः प्रयतिष्यन्ति संगरे ॥ १२ ॥ भारत! वे दुर्योधनके हितमें ही संलग्न होंगे; हमलोगोंके प्रति उनका वैसा सद्भाव नहीं हो सकता। उनका खजाना भरा-पूरा है और वे सैनिक-शक्तिसे भी सम्पन्न हैं, अतः वे युद्ध छिड़नेपर हमारे विरुद्ध ही प्रयत्न करेंगे ॥ १२ ॥
सर्वे कौरवसैन्यस्य सपुत्रामात्यसैनिकाः । संविभक्ता हि मात्राभिर्भोगैरपि च सर्वशः ॥ १३ ॥ मन्त्रियों और पुत्रोंके सहित कौरवसेनाके सभी सैनिकोंको दुर्योधनकी ओरसे पूरे वेतन और सब प्रकारकी उपभोग-सामग्रीका वितरण किया गया है ॥ १३ ॥
दुर्योधनेन ते वीरा मानिताश्च विशेषतः । प्राणांस्त्यक्ष्यन्ति संग्रामे इति मे निश्चिता मतिः ॥ १४ ॥ इतना ही नहीं, दुर्योधनने उन वीरोंका विशेष आदर-सत्कार भी किया है। अतः मेरा यह विश्वास है कि वे उसके लिये संग्राममें (हँसते-हँसते) प्राण दे देंगे ॥ १४ ॥
समा यद्यपि भीष्मस्य वृत्तिरस्मासु तेषु च ।
द्रोणस्य च महाबाहो कृपस्य च महात्मनः ।। १५ ।। अवश्यं राजपिण्डस्तैर्निर्वेश्य इति मे मतिः । तस्मात् त्यक्ष्यन्ति संग्रामे प्राणानपि सुदुस्त्यजान् ।। १६ ।। महाबाहो! यद्यपि पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण तथा महामना कृपाचार्यका आन्तरिक स्नेह धृतराष्ट्रके पुत्रों तथा हमलोगोंपर एक-सा ही है, तथापि वे राजा दुर्योधनका दिया हुआ अन्न खाते हैं, अतः उसका ऋण अवश्य चुकायेंगे, ऐसा मुझे प्रतीत होता है। युद्ध छिड़नेपर वे भी दुर्योधनके पक्षसे ही लड़कर अपने दुस्त्यज प्राणोंका भी परित्याग कर देंगे ।। १५-१६ ।। सर्वे दिव्यास्त्रविद्वांसः सर्वे धर्मपरायणाः । अजेयाश्चेति मे बुद्धिरपि देवैः सवासवैः ।। १७ ।। वे सब-के-सब दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता और धर्मपरायण हैं। मेरी बुद्धिमें तो यहाँतक आता है कि इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता भी उन्हें परास्त नहीं कर सकते ।। १७ ।। अमर्षी नित्यसंरब्धस्तत्र कर्णो महारथः । सर्वास्त्रविदनाधृष्यो ह्यभेद्यकवचावृतः ।। १८ ।। उस पक्षमें महारथी कर्ण भी है, जो हमारे प्रति सदा अमर्ष और क्रोधसे भरा रहता है। वह सब अस्त्रोंका ज्ञाता, अजेय तथा अभेद्य कवचसे सुरक्षित है ।। १८ ।। अनिर्जित्य रणे सर्वानैतान् पुरुषसत्तमान् । अशक्यो ह्यसहायेन हन्तुं दुर्योधनस्त्वया ।। १९ ।। इन समस्त वीर पुरुषोंको युद्धमें परास्त किये बिना तुम अकेले दुर्योधनको नहीं मार सकते ।। १९ ।। न निद्रामधिगच्छामि चिन्तयानो वृकोदर । अतिसर्वान् धनुर्ग्राहान् सूतपुत्रस्य लाघवम् ।। २० ।। वृकोदर! सूतपुत्र कर्णके हाथोंकी फुर्ती समस्त धनुर्धरोंसे बढ़-चढ़कर है। उसका स्मरण करके मुझे अच्छी तरह नींद नहीं आती है ।। २० ।।
वैशम्पायन उवाच
एतद् वचनमाज्ञाय भीमसेनोऽत्यमर्षणः । बभूव विमनास्त्रस्तो न चैवोवाच किंचन ।। २१ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! युधिष्ठिरका यह वचन सुनकर अत्यन्त क्रोधी भीमसेन उदास और शंकायुक्त हो गये। फिर उनके मुँहसे कोई बात नहीं निकली ।। २१ ।। तयोः संवदतोरेवं तदा पाण्डवयोर्द्वयोः । आजगाम महायोगी व्यासः सत्यवतीसुतः ।। २२ ।।
दोनों पाण्डवोंमें इस प्रकार बातचीत हो ही रही थी कि महायोगी सत्यवतीनन्दन व्यास वहाँ आ पहुँचे ।। २२ ।। सोऽभिगम्य यथान्यायं पाण्डवैः प्रतिपूजितः । युधिष्ठिरमिदं वाक्यमुवाच वदतां वरः ।। २३ ।। पाण्डवोंने उठकर उनकी अगवानी की और यथायोग्य पूजन किया। तत्पश्चात् वक्ताओंमें श्रेष्ठ व्यासजी युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले— ।। २३ ।।
व्यास उवाच
युधिष्ठिर महाबाहो वेद्मि ते हृदयस्थितम् । मनीषया ततः क्षिप्रमागतोऽस्मि नरर्षभ ।। २४ ।। **व्यासजीने कहा—**नरश्रेष्ठ महाबाहु युधिष्ठिर! मैं ध्यानके द्वारा तुम्हारे मनका भाव जान चुका हूँ। इसलिये शीघ्रतापूर्वक यहाँ आया हूँ ।। २४ ।। भीष्माद् द्रोणात् कृपात् कर्णाद् द्रोणपुत्राच्च भारत । दुर्योधनान्नृपसुतात् तथा दुःशासनादपि ।। २५ ।। यत् ते भयममित्रघ्न हृदि सम्परिवर्तते । तत् तेऽहं नाशयिष्यामि विधिदृष्टेन कर्मणा ।। २६ ।। शत्रुहन्ता भारत! भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन और दुःशासनसे भी जो तुम्हारे मनमें भय समा गया है, उसे मैं शास्त्रीय उपायसे नष्ट कर दूँगा ।। २५-२६ ।। तच्छ्रुत्वा धृतिमास्थाय कर्मणा प्रतिपादय । प्रतिपाद्य तु राजेन्द्र ततः क्षिप्रं ज्वरं जहि ।। २७ ।। राजेन्द्र! उस उपायको सुनकर धैर्यपूर्वक प्रयत्नद्वारा उसका अनुष्ठान करो। उसका अनुष्ठान करके शीघ्र ही अपनी मानसिक चिन्ताका परित्याग कर दो ।। २७ ।। तत एकान्तमुन्नीय पाराशर्यो युधिष्ठिरम् । अब्रवीदुपपन्नार्थमिदं वाक्यविशारदः ।। २८ ।। तदनन्तर प्रवचनकुशल पराशरनन्दन व्यासजी युधिष्ठिरको एकान्तमें ले गये और उनसे यह युक्तियुक्त वचन बोले— ।। २८ ।। श्रेयसस्ते परः कालः प्राप्तो भरतसत्तम । येनाभिभविता शत्रून् रणे पार्थो धनुर्धरः ।। २९ ।। ‘भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे कल्याणका सर्वश्रेष्ठ समय आया है, जिससे धनुर्धर अर्जुन युद्धमें शत्रुओंको पराजित कर देंगे ।। २९ ।। गृहाणेमां मया प्रोक्तां सिद्धिं मूर्तिमतीमिव । विद्यां प्रतिस्मृतिं नाम प्रपन्नाय ब्रवीमि ते ।। ३० ।।
'मेरी दी हुई इस प्रतिस्मृति नामक विद्याको ग्रहण करो, जो मूर्तिमती सिद्धिके समान
है। तुम मेरे शरणागत हो, इसलिये मैं तुम्हें इस विद्याका उपदेश करता हूँ ।। ३० ।।
यामवाप्य महाबाहुरर्जुनः साधयिष्यति ।
अस्त्रहेतोर्महेन्द्रं च रुद्रं चैवाभिगच्छतु ।। ३१ ।।
वरुणं च कुबेरं च धर्मराजं च पाण्डव ।
शक्तो ह्येष सुरान् द्रष्टुं तपसा विक्रमेण च ।। ३२ ।।
'जिसे तुमसे पाकर महाबाहु अर्जुन अपना सब कार्य सिद्ध करेंगे। पाण्डुनन्दन! ये
अर्जुन दिव्यास्त्रोंकी प्राप्तिके लिये देवराज इन्द्र, रुद्र, वरुण, कुबेर तथा धर्मराजके पास
जायँ। ये अपनी तपस्या और पराक्रमसे देवताओंको प्रत्यक्ष देखनेमें समर्थ
होंगे ।। ३१-३२ ।।
ऋषिरेष महातेजा नारायणसहायवान् ।
पुराणः शाश्वतो देवस्त्वजेयो जिष्णुरच्युतः ।। ३३ ।।
अस्त्राणीन्द्राच्च रुद्राच्च लोकपालेभ्य एव च ।
समादाय महाबाहुर्महत् कर्म करिष्यति ।। ३४ ।।
'भगवान् नारायण जिनके सखा हैं, वे पुरातन महर्षि महातेजस्वी नर ही अर्जुन हैं।
सनातन देव, अजेय, विजयशील तथा अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले हैं। महाबाहु
अर्जुन इन्द्र, रुद्र तथा अन्य लोकपालोंसे दिव्यास्त्र प्राप्त करके महान् कार्य
करेंगे ।। ३३-३४ ।।
वनादस्माच्च कौन्तेय वनमन्यद् विचिन्त्यताम् ।
निवासाथार्य यत् युक्तं भवेद् वः पृथिवीपते ।। ३५ ।।
'कुन्तीकुमार! पृथिवीपते! अब तुम अपने निवासके लिये इस वनसे किसी दूसरे वनमें,
जो तुम्हारे लिये उपयोगी हो, जानेकी बात सोचो ।। ३५ ।।
एकत्र चिरवासो हि न प्रीतिजननो भवेत् ।
तापसानां च सर्वेषां भवेदुद्वेगकारकः ।। ३६ ।।
'एक ही स्थानपर अधिक दिनोंतक रहना प्रायः रुचिकर नहीं होता। इसके सिवा, यहाँ
तुम्हारा चिरनिवास समस्त तपस्वी महात्माओंके लिये तपमें विघ्न पड़नेके कारण
उद्वेगकारक होगा ।। ३६ ।।
मृगाणामुपयोगश्च वीरुदौषधिसंक्षयः ।
बिभर्षि च बहून् विप्रान् वेदवेदाङ्गपारगान् ।। ३७ ।।
'यहाँके हिंसक पशुओंके उपयोग—मारनेका काम हो चुका है तथा तुम बहुत-से वेद-
वेदांगोंके पारगामी विद्वान् ब्राह्मणोंका भरण-पोषण करते हो (और हवन करते हो),
इसलिये यहाँ लता-गुल्म और ओषधियोंका क्षय हो गया है' ।। ३७ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा प्रपन्नाय शुचये भगवान् प्रभुः । प्रोवाच लोकतत्त्वज्ञो योगी विद्यामनुत्तमाम् ॥ ३८ ॥ धर्मराजाय धीमान् स व्यासः सत्यवतीसुतः । अनुज्ञाय च कौन्तेयं तत्रैवान्तरधीयत ॥ ३९ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! ऐसा कहकर लोकतत्त्वके ज्ञाता एवं शक्तिशाली योगी परम बुद्धिमान् सत्यवतीनन्दन भगवान् व्यासजीने अपनी शरणमें आये हुए पवित्र धर्मराज युधिष्ठिरको उस अत्युत्तम विद्याका उपदेश किया और कुन्तीकुमारकी अनुमति लेकर फिर वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ३८-३९ ॥ युधिष्ठिरस्तु धर्मात्मा तद् ब्रह्म मनसा यतः । धारयामास मेधावी काले काले सदाभ्यसन् ॥ ४० ॥ धर्मात्मा मेधावी संयतचित्त युधिष्ठिरने उस वेदोक्त मन्त्रको मनसे धारण किया और समय-समयपर सदा उसका अभ्यास करने लगे ॥ ४० ॥ स व्यासवाक्यमुदितो वनाद् द्वैतवनात् ततः । ययौ सरस्वतीकूले काम्यकं नाम काननम् ॥ ४१ ॥ तदनन्तर वे व्यासजीकी आज्ञासे प्रसन्नतापूर्वक द्वैतवनसे काम्यकवनमें चले गये, जो सरस्वतीके तटपर सुशोभित है ॥ ४१ ॥ तमन्वयुर्महाराज शिक्षाक्षरविशारदाः । ब्राह्मणास्तपसा युक्ता देवेन्द्रमृषयो यथा ॥ ४२ ॥ महाराज! जैसे महर्षिगण देवराज इन्द्रका अनुसरण करते हैं, वैसे ही वेदादि शास्त्रोंकी शिक्षा तथा अक्षर ब्रह्मतत्त्वके ज्ञानमें निपुण बहुत-से तपस्वी ब्राह्मण राजा युधिष्ठिरके साथ उस वनमें गये ॥ ४२ ॥ ततः काम्यकमासाद्य पुनस्ते भरतर्षभ । न्यविशन्त महात्मानः सामात्याः सपरिच्छदाः ॥ ४३ ॥ भरतश्रेष्ठ! वहाँसे काम्यकवनमें आकर मन्त्रियों और सेवकोंसहित वे महात्मा पाण्डव पुनः वहीं बस गये ॥ ४३ ॥ तत्र ते न्यवसन् राजन् किंचित् कालं मनस्विनः । धनुर्वेदपरा वीराः शृण्वन्तो वेदमुत्तमम् ॥ ४४ ॥ राजन्! वहाँ धनुर्वेदके अभ्यासमें तत्पर हो उत्तम वेदमन्त्रोंका उद्घोष सुनते हुए उन मनस्वी पाण्डवोंने कुछ कालतक निवास किया ॥ ४४ ॥ चरन्तो मृगयां नित्यं शुद्धैर्बाणैर्मृगार्थिनः । पितृदैवतविप्रेभ्यो निर्वपन्तो यथाविधि ॥ ४५ ॥ वे प्रतिदिन हिंसक पशुओंको मारनेके लिये शुद्ध (शास्त्रानुकूल) बाणोंद्वारा शिकार खेलते थे एवं शास्त्रकी विधिके अनुसार नित्य पितरों तथा देवताओंको अपना-अपना भाग
देते थे अर्थात् नित्य श्राद्ध और नित्य होम करते थे ।। ४५ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि काम्यकवनगमने षट्त्रिंशोऽध्यायः ।। ३६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें काम्यकवनगमनविषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३६ ।।
अर्जुनका सब भाई आदिसे मिलकर इन्द्रकील पर्वतपर जाना एवं इन्द्रका दर्शन करना
सप्तत्रिंशोऽध्यायः
अर्जुनका सब भाई आदिसे मिलकर इन्द्रकील पर्वतपर जाना एवं इन्द्रका दर्शन करना
वैशम्पायन उवाच
कस्यचित् त्वथ कालस्य धर्मराजो युधिष्ठिरः । संस्मृत्य मुनिसंदेशमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥ विविक्ते विदितप्रज्ञमर्जुनं पुरुषर्षभ । सान्त्वपूर्वं स्मितं कृत्वा पाणिना परिसंस्पृशन् ॥ २ ॥ स मुहूर्तमेव ध्यात्वा वनवासमरिंदमः । धनंजयं धर्मराजो रहसीदमुवाच ह ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— नरश्रेष्ठ जनमेजय! कुछ कालके अनन्तर धर्मराज युधिष्ठिरको व्यासजीके संदेशका स्मरण हो आया। तब उन्होंने परम बुद्धिमान् अर्जुनसे एकान्तमें वार्तालाप किया। शत्रुओंका दमन करनेवाले धर्मराज युधिष्ठिरने दो घड़ीतक वनवासके विषयमें चिन्तन करके किंचित् मुसकराते हुए अर्जुनके शरीरको हाथसे स्पर्श किया और एकान्तमें उन्हें सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा ॥ १—३ ॥
युधिष्ठिर उवाच
भीष्मे द्रोणे कृपे कर्णे द्रोणपुत्रे च भारत । धनुर्वेदश्चतुष्पाद एतेष्वद्य प्रतिष्ठितः ॥ ४ ॥
युधिष्ठिरने कहा— भारत! आजकल पितामह भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण और अश्वत्थामा—इन सबमें चारों पादोंसे युक्त सम्पूर्ण धनुर्वेद प्रतिष्ठित है ॥ ४ ॥
दैवं ब्राह्मं मानुषं च सयत्नं सचिकित्सितम् । सर्वास्त्राणां प्रयोगं च अभिजानन्ति कृत्स्नशः ॥ ५ ॥
वे दैव, ब्राह्म और मानुष तीनों पद्धतियोंके अनुसार सम्पूर्ण अस्त्रोंके प्रयोगकी सारी कलाएँ जानते हैं। उन अस्त्रोंके ग्रहण और धारणरूप प्रयत्नसे तो वे परिचित हैं ही, शत्रुओंद्धारा प्रयुक्त हुए अस्त्रोंकी चिकित्सा (निवारणके उपाय)-को भी जानते हैं ॥ ५ ॥
ते सर्वे धृतराष्ट्रस्य पुत्रेण परिसान्त्विताः । संविभक्ताश्च तुष्टाश्च गुरुवत् तेषु वर्तते ॥ ६ ॥
उन सबको धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनने बड़े आश्वासनके साथ रखा है और उपभोगकी सामग्री देकर संतुष्ट किया है। इतना ही नहीं, वह उनके प्रति गुरुजनोचित बर्ताव करता है ॥ ६ ॥
सर्वयोधेषु चैवास्य सदा प्रीतिरनुत्तमा ।
आचार्या मानितास्तुष्टाः शान्तिं व्यवहरन्त्युत ॥ ७ ॥
अन्य सम्पूर्ण योद्धाओंपर भी दुर्योधन सदा ही बहुत प्रेम रखता है। उसके द्वारा सम्मानित और संतुष्ट किये हुए आचार्यगण उसके लिये सदा शान्तिका प्रयत्न करते हैं ॥ ७ ॥
शक्तिं न हापयिष्यन्ति ते काले प्रतिपूजिताः ।
अद्य चेयं मही कृत्स्ना दुर्योधनवशानुगा ॥ ८ ॥
सग्रामनगरा पार्थ ससागरवनाकरा ।
भवानेव प्रियोऽस्माकं त्वयि भारः समाहितः ॥ ९ ॥
जो लोग उसके द्वारा समय-समयपर समादृत हुए हैं, वे कभी उसकी शक्ति क्षीण नहीं होने देंगे । पार्थ! आज यह सारी पृथ्वी ग्राम, नगर, समुद्र, वन तथा खानोंसहित दुर्योधनके वशमें है। तुम्हीं हम सब लोगोंके अत्यन्त प्रिय हो। हमारे उद्धारका सारा भार तुमपर ही है ॥ ८-९ ॥
अत्र कृत्यं प्रपश्यामि प्राप्तकालमरिंदम ।
कृष्णद्वैपायनात् तात गृहीतोपनिषन्मया ॥ १० ॥
शत्रुदमन! अब इस समयके योग्य जो कर्तव्य मुझे उचित दिखायी देता है, उसे सुनो। तात! मैंने श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीसे एक रहस्यमयी विद्या प्राप्त की है ॥ १० ॥
तया प्रयुक्तया सम्यग् जगत् सर्वं प्रकाशते ।
तेन त्वं ब्रह्मणा तात संयुक्तः सुसमाहितः ॥ ११ ॥
देवतानां यथाकालं प्रसादं प्रतिपालय ।
तपसा योजयात्मानमुग्रेण भरतर्षभ ॥ १२ ॥
धनुष्मात् कवची खड्गी मुनिः साधुव्रते स्थितः ।
न कस्यचित् ददन्मार्गं गच्छ तातोत्तरां दिशम् ॥ १३ ॥
उसका विधिवत् प्रयोग करनेपर समस्त जगत् अच्छी प्रकारसे ज्यों-का-त्यों स्पष्ट दीखने लगता है। तात! उस मन्त्र-विद्यासे युक्त एवं एकाग्रचित्त होकर तुम यथासमय देवताओंकी प्रसन्नता प्राप्त करो। भरतश्रेष्ठ! अपने-आपको उग्र तपस्यामें लगाओ। धनुष, कवच और खड्ग धारण किये साधु-व्रतके पालनमें स्थित हो मौनावलम्बनपूर्वक किसीको आक्रमणका मार्ग न देते हुए उत्तर दिशाकी ओर जाओ ॥ ११—१३ ॥
इन्द्रे ह्यस्त्राणि दिव्यानि समस्तानि धनंजय ।
वृत्राद् भीतैर्बलं देवैस्तदा शक्रे समर्पितम् ॥ १४ ॥
धनंजय! इन्द्रको समस्त दिव्यास्त्रोंका ज्ञान है। वृत्रासुरसे डरे हुए सम्पूर्ण देवताओंने उस समय अपनी सारी शक्ति इन्द्रको ही समर्पित कर दी थी ॥ १४ ॥
तान्येकस्थानि सर्वाणि ततस्त्वं प्रतिपत्स्यसे ।
शक्रमेव प्रपद्यस्व स तेऽस्त्राणि प्रदास्यति ।। १५ ।।
दीक्षितोऽद्यैव गच्छ त्वं द्रष्टुं देव पुरंदरम् ।
वे सब दिव्यास्त्र एक ही स्थानमें हैं, तुम उन्हें वहींसे प्राप्त कर लोगे; अतः तुम इन्द्रकी ही शरण लो। वही तुम्हें सब अस्त्र प्रदान करेंगे। आज ही दीक्षा ग्रहण करके तुम देवराज इन्द्रके दर्शनकी इच्छासे यात्रा करो ।। १५ १/२ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा धर्मराजस्तमध्यापयत प्रभुः ।। १६ ।।
दीक्षितं विधिनानेन धृतवाक्कायमानसम् ।
अनुजज्ञे तदा वीरं भ्राता भ्रातरमग्रजः ।। १७ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! ऐसा कहकर शक्तिशाली धर्मराज युधिष्ठिरने मन, वाणी और शरीरको संयममें रखकर दीक्षा ग्रहण करनेवाले अर्जुनको विधिपूर्वक पूर्वोक्त प्रतिस्मृति-विद्याका उपदेश किया। तदनन्तर बड़े भाई युधिष्ठिरने अपने वीर भाई अर्जुनको वहाँसे प्रस्थान करनेकी आज्ञा दी ।। १६-१७ ।।
निदेशाद् धर्मराजस्य द्रष्टुकामः पुरंदरम् ।
धनुर्गाण्डीवमादाय तथाक्षय्ये महेषुधी ।। १८ ।।
कवची सतलत्राणो बद्धगोधाङ्गुलित्रवान् ।
हुत्वाग्निं ब्राह्मणांन्निष्कैः स्वस्ति वाच्य महाभुजः ।। १९ ।।
प्रातिष्ठत महाबाहुः प्रगृहीतशरासनः ।
वधाय धार्तराष्ट्राणां निःश्वस्योर्ध्वमुदीक्ष्य च ।। २० ।।
धर्मराजकी आज्ञासे देवराज इन्द्रका दर्शन करनेकी इच्छा मनमें रखकर महाबाहु धनंजयने अग्निमें आहुति दी और स्वर्णमुद्राओंकी दक्षिणा देकर ब्राह्मणोंसे स्वस्ति-वाचन कराया तथा गाण्डीव धनुष और दो महान् अक्षय तूणीर साथ ले कवच, तलत्राण (जूते) तथा अंगुलियोंकी रक्षाके लिये गोहके चमड़ेका बना हुआ अंगुलित्र धारण किया। इसके बाद ऊपरकी ओर देख लंबी साँस खींचकर धृतराष्ट्रपुत्रोंके वधके लिये महाबाहु अर्जुन धनुष हाथमें लिये वहाँसे प्रस्थित हुए ।। १८—२० ।।
तं दृष्ट्वा तत्र कौन्तेयं प्रगृहीतशरासनम् ।
अब्रुवन् ब्राह्मणाः सिद्धा भूतान्यन्तर्हितानि च ।। २१ ।।
कुन्तीनन्दन अर्जुनको वहाँ धनुष लिये जाते देख सिद्धों, ब्राह्मणों तथा अदृश्य भूतोंने कहा— ।। २१ ।।
क्षिप्रमाप्नुहि कौन्तेय मनसा यद् यदिच्छसि ।
अब्रुवन् ब्राह्मणाः पार्थमिति कृत्वा जयाशिषः ।। २२ ।।
संसाधयस्व कौन्तेय ध्रुवोऽस्तु विजयस्तव ।
'कुन्तीकुमार! तुम अपने मनमें जो-जो इच्छा रखते हो, वह सब तुम्हें शीघ्र प्राप्त हो।' इसके बाद ब्राह्मणोंने अर्जुनको विजयसूचक आशीर्वाद देते हुए कहा—'कुन्तीपुत्र! तुम अपना अभीष्ट साधन करो, तुम्हें अवश्य विजय प्राप्त हो' ।। २२ १/२ ।।
तं तथा प्रस्थितं वीरं शालस्कन्धोरुमर्जुनम् ।। २३ ।।
मनांस्यादाय सर्वेषां कृष्णा वचनमब्रवीत् ।
शालवृक्षके समान कंधे और जाँघोंसे सुशोभित वीर अर्जुनको इस प्रकार सबके चित्तको चुराकर प्रस्थान करते देख द्रौपदी इस प्रकार बोली ।। २३ १/२ ।।
कृष्णोवाच
यत् ते कुन्ती महाबाहो जातस्यैच्छद् धनंजय ।। २४ ।।
तत् तेऽस्तु सर्वं कौन्तेय यथा च स्वयमिच्छसि ।
द्रौपदीने कहा—कुन्तीकुमार महाबाहु धनंजय! आपके जन्म लेनेके समय आर्या कुन्तीने अपने मनमें आपके लिये जो-जो इच्छाएँ की थीं तथा आप स्वयं भी अपने हृदयमें जो-जो मनोरथ रखते हों, वे सब आपको प्राप्त हों ।। २४ १/२ ।।
मास्माकं क्षत्रियकुले जन्म कश्चिदवाप्नुयात् ।। २५ ।।
ब्राह्मणेभ्यो नमो नित्यं येषां भैक्ष्येण जीविका ।
हमलोगोंमेंसे कोई भी क्षत्रिय-कुलमें उत्पन्न न हो। उन ब्राह्मणोंको नमस्कार है, जिनका भिक्षासे ही निर्वाह हो जाता है ।। २५ १/२ ।।
इदं मे परमं दुःखं यः स पापः सुयोधनः ।। २६ ।।
दृष्ट्वा मां गौरिति प्राह प्रहसन् राजसंसदि ।
नाथ! मुझे सबसे बढ़कर दुःख इस बातसे हुआ है कि उस पापी दुर्योधनने राजाओंसे भरी हुई सभामें मेरी ओर देखकर और मुझे 'गाय' (अनेक पुरुषोंके उपभोगमें आनेवाली) कहकर मेरा उपहास किया ।। २६ १/२ ।।
तस्माद् दुःखादिदं दुःखं गरीय इति मे मतिः ।। २७ ।।
यत् तत् परिषदो मध्ये बह्वयुक्तमभाषत ।
उस दुःखसे भी बढ़कर महान् कष्ट मुझे इस बातसे हुआ कि उसने भरी सभामें मेरे प्रति बहुत-सी अनुचित बातें कहीं ।। २७ १/२ ।।
नूनं ते भ्रातरः सर्वे त्वत्कथाभिः प्रजागरे ।। २८ ।।
रंस्यन्ते वीर कर्माणि कथयन्तः पुनः पुनः ।
नैव नः पार्थ भोगेषु न धने नोत जीविते ।। २९ ।।
तुष्टिर्बुद्धिर्भवित्री वा त्वयि दीर्घप्रवासिनि ।
त्वयि नः पार्थ सर्वेषां सुखदुःखे समाहिते ।। ३० ।।
जीवितं मरणं चैव राज्यमैश्वर्यमेव च ।
आपृष्टो मेऽसि कौन्तेय स्वस्ति प्राप्नुहि भारत ॥ ३१ ॥
वीरवर! निश्चय ही आपके चले जानेके बाद आपके सभी भाई जागते समय आपहीके पराक्रमकी चर्चा बार-बार करते हुए अपना मन बहलायेंगे। पार्थ! दीर्घकालके लिये आपके प्रवासी हो जानेपर हमारा मन न तो भोगोंमें लगेगा और न धनमें ही। इस जीवनमें भी कोई रस नहीं रह जायगा। आपके बिना हम इन वस्तुओंसे संतोष नहीं पा सकेंगे। पार्थ! हम सबके सुख-दुःख, जीवन-मरण तथा राज्य-ऐश्वर्य आपपर ही निर्भर हैं। भरतकुलतिलक! कुन्तीकुमार! मैंने आपको विदा दी; आप कल्याणको प्राप्त हों ॥ २८—३१ ॥
बलवद्भिर्विरुद्धं न कार्यमेतत् त्वयानघ ।
प्रयाह्यविघ्नेनैवाशु विजयाय महाबल ।
नमो धात्रे विधात्रे च स्वस्ति गच्छ ह्यनामयम् ॥ ३२ ॥
निष्पाप महाबली आर्यपुत्र! आप बलवानोंसे विरोध न करें, यह मेरा अनुरोध है। विघ्न-बाधाओंसे रहित हो विजयप्राप्तिके लिये शीघ्र यात्रा कीजिये। धाता और विधाताको नमस्कार है। आप कुशल और स्वस्थतापूर्वक प्रस्थान कीजिये ॥ ३२ ॥
ह्रीः श्रीः कीर्तिर्द्युतिः पुष्टिर्मा लक्ष्मीः सरस्वती ।
इमा वै तव पान्थस्य पालयन्तु धनंजय ॥ ३३ ॥
धनंजय! ह्री, श्री, कीर्ति, द्युति, पुष्टि, उमा, लक्ष्मी और सरस्वती—ये सब देवियाँ मार्गमें जाते समय आपकी रक्षा करें ॥ ३३ ॥
ज्येष्ठापचायी ज्येष्ठस्य भ्रातुर्वचनकारकः ।
प्रपद्येऽहं वसून् रुद्रान्रादित्यान् समरुद्गणान् ॥ ३४ ॥
विश्वेदेवांस्तथा साध्याञ्छान्त्यर्थं भरतर्षभ ।
स्वस्ति तेऽस्त्वन्तरिक्षेभ्यः पार्थिवेभ्यश्च भारत ॥ ३५ ॥
दिव्येभ्यश्चैव भूतेभ्यो ये चान्ये परिपन्थिनः ।
आप बड़े भाईका आदर करनेवाले हैं, उनकी आज्ञाके पालक हैं। भरतश्रेष्ठ! मैं आपकी शान्तिके लिये वसु, रुद्र, आदित्य, मरुद्गण, विश्वेदेव तथा साध्य देवताओंकी शरण लेती हूँ। भारत! भौम, आन्तरिक्ष तथा दिव्य भूतोंसे और दूसरे भी जो मार्गमें विघ्न डालनेवाले प्राणी हैं, उन सबसे आपका कल्याण हो ॥ ३४-३५½ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वाऽऽशिषः कृष्णा विरराम यशस्विनी ॥ ३६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! ऐसी मंगलकामना करके यशस्विनी द्रौपदी चुप हो गयी ॥ ३६ ॥
ततः प्रदक्षिणं कृत्वा भ्रातॄन् धौम्यं च पाण्डवः ।
प्रतिष्ठत महाबाहुः प्रगृह्य रुचिरं धनुः ॥ ३७ ॥
तदनन्तर पाण्डुनन्दन महाबाहु अर्जुनने अपना सुन्दर धनुष हाथमें लेकर सभी भाइयों और धौम्य मुनिको दाहिने करके वहाँसे प्रस्थान किया ।। ३७ ।। तस्य मार्गादपाक्रामन् सर्वभूतानि गच्छतः । युक्तस्यैन्द्रेण योगेन पराक्रान्तस्य शुष्मिणः ।। ३८ ।। महान् पराक्रमी और महाबली अर्जुनके यात्रा करते समय उनके मार्गसे समस्त प्राणी दूर हट जाते थे; क्योंकि वे इन्द्रसे मिला देनेवाली प्रतिस्मृति नामक योगविद्यासे युक्त थे ।। ३८ ।। सोऽगच्छत् पर्वतांस्तात तपोधननिषेवितान् । दिव्यं हैमवतं पुण्यं देवजुष्टं परंतपः ।। ३९ ।। परंतप अर्जुन तपस्वी महात्माओंद्वारा सेवित पर्वतोंके मार्गसे होते हुए दिव्य, पवित्र तथा देवसेवित हिमालय पर्वतपर जा पहुँचे ।। ३९ ।। अगच्छत् पर्वतं पुण्यमेकाह्नैव महामनाः । मनोजवगतिर्भूत्वा योगयुक्तो यथानिलः ।। ४० ।। महामना अर्जुन योगयुक्त होनेके कारण मनके समान तीव्र वेगसे चलनेमें समर्थ हो गये थे, अतः वे वायुके समान एक ही दिनमें उस पुण्य पर्वतपर पहुँच गये ।। ४० ।। हिमवन्तमतिक्रम्य गन्धमादनमेव च । अत्यक्रामत् स दुर्गाणि दिवारात्रमतन्द्रितः ।। ४१ ।। हिमालय और गन्धमादन पर्वतको लाँघकर उन्होंने आलस्यरहित हो दिन-रात चलते हुए और भी बहुत-से दुर्गम स्थानोंको पार किया ।। ४१ ।। इन्द्रकीलं समासाद्य ततोऽतिष्ठद् धनंजयः । अन्तरिक्षेऽतिशुश्राव तिष्ठेति स वचस्तदा ।। ४२ ।। तदनन्तर इन्द्रकील पर्वतपर पहुँचकर अर्जुनने आकाशमें उच्च स्वरसे गूँजती हुई एक वाणी सुनी— ‘तिष्ठ' (यहीं ठहर जाओ)। तब वे वहीं ठहर गये ।। ४२ ।। तच्छ्रुत्वा सर्वतो दृष्टिं चारयामास पाण्डवः । अथापश्यत् सव्यसाची वृक्षमूले तपस्विनम् ।। ४३ ।। वह वाणी सुनकर पाण्डुनन्दन अर्जुनने चारों ओर दृष्टिपात किया। इतनेहीमें उन्हें वृक्षके मूलभागमें बैठे हुए एक तपस्वी महात्मा दिखायी दिये ।। ४३ ।। ब्राह्म्या श्रिया दीप्यमानं पिङ्गलं जटिलं कृशम् । सोऽब्रवीदर्जुनं तत्र स्थितं दृष्ट्वा महातपाः ।। ४४ ।। वे अपने ब्रह्मतेजसे उद्भासित हो रहे थे। उनकी अंगकान्ति पिंगलवर्णकी थी। सिरपर जटा बढ़ी हुई थी और शरीर अत्यन्त कृश था। उन महातपस्वीने अर्जुनको वहाँ खड़े हुए देखकर पूछा— ।। ४४ ।। कस्त्वं तातेह सम्प्राप्तो धनुष्मान् कवची शरी ।
निबद्धासितलत्राणः क्षत्रधर्ममनुव्रतः ॥ ४५ ॥ नेह शस्त्रेण कर्तव्यं शान्तानामेष आलयः । विनीतक्रोधहर्षाणां ब्राह्मणानां तपस्विनाम् ॥ ४६ ॥ 'तात! तुम कौन हो? जो धनुष-बाण, कवच, तलवार तथा दस्तानेसे सुसज्जित हो क्षत्रियधर्मका अनुगमन करते हुए यहाँ आये हो। यहाँ अस्त्र-शस्त्रकी आवश्यकता नहीं है। यह तो क्रोध और हर्षको जीते हुए तपस्यामें तत्पर शान्त ब्राह्मणोंका स्थान है ॥ ४५-४६ ॥ नेहास्ति धनुषा कार्यं न संग्रामोऽत्र कर्हिचित् । निक्षिपैतद् धनुस्तात प्राप्तोऽसि परमां गतिम् ॥ ४७ ॥ 'यहाँ कभी कोई युद्ध नहीं होता, इसलिये यहाँ तुम्हारे धनुषका कोई काम नहीं है। तात! यह धनुष यहीं फेंक दो, अब तुम उत्तम गतिको प्राप्त हो चुके हो ॥ ४७ ॥ ओजसा तेजसा वीर यथा नान्यः पुमान् क्वचित् । तथा हसन्निवाभीक्ष्णं ब्राह्मणोऽर्जुनमब्रवीत् । न चैनं चालयामास धैर्यात् सुधृतनिश्चयम् ॥ ४८ ॥ 'वीर! ओज और तेजमें तुम्हारे-जैसा दूसरा कोई पुरुष नहीं है!' इस प्रकार उन ब्रह्मर्षिने हँसते हुए-से बार-बार अर्जुनसे धनुषको त्याग देनेकी बात कही। परंतु अर्जुन धनुष न त्यागनेका दृढ़ निश्चय कर चुके थे; अतः ब्रह्मर्षि उन्हें धैर्यसे विचलित नहीं कर सके ॥ तमुवाच ततः प्रीतः स द्विजः प्रहसन्निव । वरं वृणीष्व भद्रं ते शक्रोऽहमरिसूदन ॥ ४९ ॥ तब उन ब्राह्मण देवताने पुनः प्रसन्न होकर उनसे हँसते हुए-से कहा—'शत्रुसूदन! तुम्हारा भला हो, मैं साक्षात् इन्द्र हूँ, मुझसे कोई वर माँगो' ॥ ४९ ॥ एवमुक्तः सहस्राक्षं प्रत्युवाच धनंजयः । प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा शूरः कुरुकुलोद्वहः ॥ ५० ॥ यह सुनकर कुरुकुलरत्न शूरवीर अर्जुनने सहस्र नेत्रधारी इन्द्रसे हाथ जोड़कर प्रणामपूर्वक कहा— ॥ ५० ॥ ईप्सितो ह्येष वै कामो वरं चैनं प्रयच्छ मे । त्वत्तोऽद्य भगवन्तस्त्रं कृत्स्नमिच्छामि वेदितुम् ॥ ५१ ॥ 'भगवन्! मैं आपसे सम्पूर्ण अस्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ, यही मेरा अभीष्ट मनोरथ है; अतः मुझे यही वर दीजिये' ॥ ५१ ॥ प्रत्युवाच महेन्द्रस्तं प्रीतात्मा प्रहसन्निव । इह प्राप्तस्य किं कार्यमस्त्रैस्तव धनंजय ॥ ५२ ॥ कामान् वृणीष्व लोकांस्त्वं प्राप्तोऽसि परमां गतिम् । एवमुक्तः प्रत्युवाच सहस्राक्षं धनंजयः ॥ ५३ ॥
न लोभान्न पुनः कामान्न देवत्वं पुनः सुखम् ।
न च सर्वामरैश्वर्यं कामये त्रिदशाधिप ॥ ५४ ॥
भ्रातॄंस्तान् विपिने त्यक्त्वा वैरमप्रतियात्य च ।
अकीर्तिं सर्वलोकेषु गच्छेयं शाश्वतीः समाः ॥ ५५ ॥
तब महेन्द्रने प्रसन्नचित्त हो हँसते हुए-से कहा—'धनंजय! जब तुम यहाँतक आ पहुँचे, तब तुम्हें अस्त्रोंको लेकर क्या करना है? अब इच्छानुसार उत्तम लोक माँग लो; क्योंकि तुम्हें उत्तम गति प्राप्त हुई है।' यह सुनकर धनंजयने पुनः देवराजसे कहा—'देवेश्वर! मैं अपने भाइयोंको वनमें छोड़कर (शत्रुओंसे) वैरका बदला लिये बिना लोभ अथवा कामनाके वशीभूत हो न तो देवत्व चाहता हूँ, न सुख और न सम्पूर्ण देवताओंका ऐश्वर्य प्राप्त कर लेनेकी ही मेरी इच्छा है। यदि मैंने वैसा किया तो सदाके लिये सम्पूर्ण लोकोंमें मुझे महान् अपयश प्राप्त होगा' ॥ ५२—५५ ॥
एवमुक्तः प्रत्युवाच वृत्रहा पाण्डुनन्दनम् ।
सान्त्वयञ्श्लक्ष्णया वाचा सर्वलोकनमस्कृतः ॥ ५६ ॥
अर्जुनके ऐसा कहनेपर विश्ववन्दित, वृत्र-विनाशक इन्द्रने मधुर वाणीमें अर्जुनको सान्त्वना देते हुए कहा— ॥ ५६ ॥
यदा द्रक्ष्यसि भूतेशं त्र्यक्षं शूलधरं शिवम् ।
तदा दातास्मि ते तात दिव्यान्यस्त्राणि सर्वशः ॥ ५७ ॥
'तात! जब तुम्हें तीन नेत्रोंसे विभूषित त्रिशूलधारी भूतनाथ भगवान् शिवका दर्शन होगा, तब मैं तुम्हें सम्पूर्ण दिव्यास्त्र प्रदान करूँगा ॥ ५७ ॥
क्रियतां दर्शने यत्नो देवस्य परमेष्ठिनः ।
दर्शनात् तस्य कौन्तेय संसिद्धः स्वर्गमेष्यसि ॥ ५८ ॥
'कुन्तीकुमार! तुम उन परमेश्वर महादेवजीका दर्शन पानेके लिये प्रयत्न करो। उनके दर्शनसे पूर्णतः सिद्ध हो जानेपर तुम स्वर्गलोकमें पधारोगे' ॥ ५८ ॥
इत्युक्त्वा फाल्गुनं शक्रो जगामादर्शनं पुनः ।
अर्जुनोऽप्यथ तत्रैव तस्थौ योगसमन्वितः ॥ ५९ ॥
अर्जुनसे ऐसा कहकर इन्द्र पुनः अदृश्य हो गये। तत्पश्चात् अर्जुन योगयुक्त हुए वहीं रहने लगे ॥ ५९ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि इन्द्रदर्शने सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें इन्द्रदर्शनविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥
(कैरातपर्व)
(कैरातपर्व)
अष्टात्रिंशोऽध्यायः
अर्जुनकी उग्र तपस्या और उसके विषयमें ऋषियोंका भगवान् शंकरके साथ वार्तालाप
जनमेजय उवाच
भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि पार्थस्याक्लिष्टकर्मणः ।
विस्तरेण कथामेतां यथास्त्राण्युपलब्धवान् ॥ १ ॥
**जनमेजय बोले—**भगवन्! अनायास ही महान् कर्म करनेवाले कुन्तीनन्दन अर्जुनकी यह कथा मैं विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ; उन्होंने किस प्रकार अस्त्र प्राप्त किये? ॥ १ ॥
यथा च पुरुषव्याघ्रो दीर्घबाहुर्धनंजयः ।
वनं प्रविष्टस्तेजस्वी निर्मनुष्यमभीतवत् ॥ २ ॥
पुरुषसिंह महाबाहु तेजस्वी धनंजय उस निर्जन वनमें निर्भयके समान कैसे चले गये थे? ॥ २ ॥
किं च तेन कृतं तत्र वसता ब्रह्मवित्तम ।
कथं च भगवान् स्थाणुर्देवराजश्च तोषितः ॥ ३ ॥
ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! उस वनमें रहकर पार्थने क्या किया? भगवान् शंकर तथा देवराज इन्द्रको कैसे संतुष्ट किया? ॥ ३ ॥
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं त्वत्प्रसादाद् द्विजोत्तम ।
त्वं हि सर्वज्ञ दिव्यं च मानुषं चैव वेत्थ ह ॥ ४ ॥
विप्रवर! मैं आपकी कृपासे ये सब बातें सुनना चाहता हूँ। सर्वज्ञ! आप दिव्य और मानुष सभी वृत्तान्तों-को जानते हैं ॥ ४ ॥
अत्यद्भुततमं ब्रह्मन् रोमहर्षणमर्जुनः ।
भवेन सह संग्रामं चकाराप्रतिमं किल ॥ ५ ॥
पुरा प्रहरतां श्रेष्ठः संग्रामेष्वपराजितः ।
यच्छ्रुत्वा नरसिंहाना दैन्यहर्षातिविस्मयात् ॥ ६ ॥
शूराणामपि पार्थानां हृदयानि चकम्पिरे ।
यद् यच्च कृतवानन्यत् पार्थस्तदखिलं वद ॥ ७ ॥
ब्रह्मन्! मैंने सुना है, कभी संग्राममें परास्त न होनेवाले, योद्धाओंमें श्रेष्ठ अर्जुनने पूर्वकालमें भगवान् शंकरके साथ अत्यन्त अद्भुत, अनुपम और रोमांचकारी युद्ध किया था, जिसे सुनकर मनुष्योंमें श्रेष्ठ शूरवीर कुन्तीपुत्रोंके हृदयोंमें भी दैन्य, हर्ष और विस्मयके कारण कँपकँपी छा गयी थी। अर्जुनने और भी जो-जो कार्य किये हों, वे सब भी मुझे बताइये ॥ ५—७ ॥
न ह्यस्य निन्दितं जिष्णोः सुसूक्ष्ममपि लक्षये ।
चरितं तस्य शूरस्य तन्मे सर्वं प्रकीर्तय ॥ ८ ॥
शूरवीर अर्जुनका अत्यन्त सूक्ष्म चरित्र भी ऐसा नहीं दिखायी देता है, जिसमें थोड़ी-सी भी निन्दाके लिये स्थान हो; अतः वह सब मुझसे कहिये ॥ ८ ॥
वैशम्पायन उवाच
कथयिष्यामि ते तात कथामेतां महात्मनः ।
दिव्यां पौरवशार्दूल महतीमद्भुतोपमाम् ॥ ९ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— तात! पौरवश्रेष्ठ! महात्मा अर्जुनकी यह कथा दिव्य, अद्भुत और महत्त्वपूर्ण है; इसे मैं तुम्हें सुनाता हूँ ॥ ९ ॥
गात्रसंस्पर्शसम्बद्धां त्र्यम्बकेण सहानुघ ।
पार्थस्य देवदेवेन शृणु सम्यक् समागमम् ॥ १० ॥
अनघ! देवदेव महादेवजीके साथ अर्जुनके शरीरका जो स्पर्श हुआ था, उससे सम्बन्ध रखनेवाली यह कथा है। तुम उन दोनोंके मिलनका यह वृत्तान्त भलीभाँति सुनो ॥ १० ॥
युधिष्ठिरनियोगात् स जगामामितविक्रमः ।
शक्रं सुरेश्वरं द्रष्टुं देवदेवं च शंकरम् ॥ ११ ॥
दिव्यं तद् धनुरादाय खड्गं च कनकत्सरुम् ।
महाबलो महाबाहुरर्जुनः कार्यसिद्धये ॥ १२ ॥
दिशं ह्युदीचीं कौरव्यो हिमवच्छिखरं प्रति ।
ऐन्द्रिः स्थिरमना राजन् सर्वलोकमहारथः ॥ १३ ॥
राजन्! अमित पराक्रमी, महाबली, महाबाहु, कुरुकुलभूषण, इन्द्रपुत्र अर्जुन, जो सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात महारथी और सुस्थिर चित्तवाले थे, युधिष्ठिरकी आज्ञासे देवराज इन्द्र तथा देवाधिदेव भगवान् शंकरका दर्शन करनेके लिये कार्यकी सिद्धिका उद्देश्य लेकर अपने उस दिव्य (गाण्डीव) धनुष और सोनेकी मूँठवाले खड्गको हाथमें लिये उत्तर दिशामें हिमालय पर्वतकी ओर चले ॥ ११—१३ ॥
त्वरया परया युक्तस्तपसे धृतनिश्चयः ।
वनं कण्टकितं घोरमेक एवान्वपद्यत ॥ १४ ॥
तपस्याके लिये दृढ़ निश्चय करके बड़ी उतावलीके साथ जाते हुए वे अकेले ही एक भयंकर कण्टकाकीर्ण वनमें पहुँचे ॥ १४ ॥ नानापुष्पफलोपेतं नानापक्षिनिषेवितम् । नानामृगगणाकीर्णं सिद्धचारणसेवितम् ॥ १५ ॥ जो नाना प्रकारके फल-फूलोंसे भरा था, भाँति-भाँतिके पक्षी जहाँ कलरव कर रहे थे, अनेक जातियोंके मृग उस वनमें सब ओर विचरते रहते थे तथा कितने ही सिद्ध और चारण निवास कर रहे थे ॥ १५ ॥ ततः प्रयाते कौन्तेये वनं मानुषवर्जितम् । शङ्खानां पटहानां च शब्दः समभवद् दिवि ॥ १६ ॥ तदनन्तर कुन्तीनन्दन अर्जुनके उस निर्जन वनमें पहुँचते ही आकाशमें शंखों और नगाड़ोंका गम्भीर घोष गूँज उठा ॥ १६ ॥ पुष्पवर्षं च सुमहन्निपपात महीतले । मेघजालं च विततं छादयामास सर्वतः ॥ १७ ॥ सोऽतीत्य वनदुर्गाणि संनिकर्षे महागिरेः । शुशुभे हिमवत्पृष्ठे वसमानोऽर्जुनस्तदा ॥ १८ ॥ पृथ्वीपर फूलोंकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी। मेघोंकी घटा घिरकर आकाशमें सब ओर छा गयी। उन दुर्गम वनस्थलियोंको लाँघकर अर्जुन हिमालयके पृष्ठभागमें एक महान् पर्वतके निकट निवास करते हुए शोभा पाने लगे ॥ १७-१८ ॥ तत्रापश्यद् द्रुमान् फुल्लान् विहगैर्वल्गुनादितान् । नदीश्च विपुलावर्ता वैदूर्यविमलप्रभाः ॥ १९ ॥ वहाँ उन्होंने फूलोंसे सुशोभित बहुत-से वृक्ष देखे, जो पक्षियोंके मधुर शब्दसे गुंजायमान हो रहे थे। उन्होंने वैदूर्यमणिके समान स्वच्छ जलसे भरी हुई शोभामयी कितनी ही नदियाँ देखीं, जिनमें बहुत-सी भँवरें उठ रही थीं ॥ १९ ॥ हंसकारण्डवोद्गीताः सारसाभिरुतास्तथा । पुंस्कोकिलरुताश्चैव क्रौञ्चबर्हिणनादिताः ॥ २० ॥ हंस, कारण्डव तथा सारस आदि पक्षी वहाँ मीठी बोली बोलते थे। तटवर्ती वृक्षोंपर कोयल मनोहर शब्द बोल रही थी। क्रौंचके कलरव और मयूरोंकी केकाध्वनि भी वहाँ सब ओर गूँजती रहती थी ॥ २० ॥ मनोहरवनोपेतास्तस्मिन्नतिरथोऽर्जुनः । पुण्यशीतामलजलाः पश्यन् प्रीतमनाभवत् ॥ २१ ॥ उन नदियोंके आस-पास मनोहर वनश्रेणी सुशोभित होती थी। हिमालयके उस शिखरपर पवित्र, शीतल और निर्मल जलसे भरी हुई उन सुन्दर सरिताओंका दर्शन करके अतिरथी अर्जुनका मन प्रसन्नतासे खिल उठा ॥ २१ ॥
रमणीये वनोद्देशे रममाणोऽर्जुनस्तदा । तपस्युग्रे वर्तमान उग्रतेजा महामनाः ॥ २२ ॥ उग्र तेजस्वी महामना अर्जुन वहाँ वनके रमणीय प्रदेशोंमें घूम-फिरकर बड़ी कठोर तपस्यामें संलग्न हो गये ॥ २२ ॥ दर्भचीरं निवस्याथ दण्डाजिनविभूषितः । शीर्णं च पतितं भूमौ पर्णं समुपयुक्तवान् ॥ २३ ॥ कुशाका ही चीर धारण किये तथा दण्ड और मृगचर्मसे विभूषित अर्जुन पृथ्वीपर गिरे हुए सूखे पत्तोंका ही भोजनके स्थानमें उपयोग करते थे ॥ २३ ॥ पूर्णे पूर्णे त्रिरात्रे तु मासमेकं फलाशनः । द्विगुणेन हि कालेन द्वितीयं मासमत्ययात् ॥ २४ ॥ एक मासतक वे तीन-तीन रातके बाद केवल फलाहार करके रहे। दूसरे मासको उन्होंने पहलेकी अपेक्षा दूने-दूने समयपर अर्थात् छः-छः रातके बाद फलाहार करके व्यतीत किया ॥ २४ ॥ तृतीयमपि मासं स पक्षेणाहारमाचरन् । चतुर्थे त्वथ सम्प्राप्ते मासे भरतसत्तमः ॥ २५ ॥ वायुभक्षो महाबाहुरभवत् पाण्डुनन्दनः । ऊर्ध्वबाहुर्निरालम्बः पादाङ्गुष्ठाग्रविष्ठितः ॥ २६ ॥ तीसरा महीना पंद्रह-पंद्रह दिनमें भोजन करके बिताया। चौथा महीना आनेपर भरतश्रेष्ठ पाण्डुनन्दन महाबाहु अर्जुन केवल वायु पीकर रहने लगे। वे दोनों भुजाएँ ऊपर उठाये बिना किसी सहारेके पैरके अंगूठेके अग्रभागके बलपर खड़े रहे ॥ २५-२६ ॥ सदोपस्पर्शनाच्चास्य बभूवुरमितौजसः । विद्युदम्भोरुहनिभा जटास्तस्य महात्मनः ॥ २७ ॥ अमित तेजस्वी महात्मा अर्जुनके सिरकी जटाएँ नित्य स्नान करनेके कारण विद्युत् और कमलोंके समान हो गयी थीं ॥ २७ ॥ ततो महर्षयः सर्वे जग्मुर्देवं पिनाकिनम् । निवेदयिषवः पार्थं तपस्युग्रे समास्थितम् ॥ २८ ॥ तदनन्तर भयंकर तपस्यामें लगे हुए अर्जुनके विषयमें कुछ निवेदन करनेकी इच्छासे वहाँ रहनेवाले सभी महर्षि पिनाकधारी महादेवजीकी सेवामें गये ॥ २८ ॥ तं प्रणम्य महादेवं शशंसुः पार्थकर्म तत् । एष पार्थो महातेजा हिमवत्पृष्ठमास्थितः ॥ २९ ॥ उग्रे तपसि दुष्पारे स्थितो धूमायन् दिशः । तस्य देवेश न वयं विद्मः सर्वे चिकीर्षितम् ॥ ३० ॥
उन्होंने महादेवजीको प्रणाम करके अर्जुनका वह तपरूप कर्म कह सुनाया। वे बोले—'भगवन्! ये महातेजस्वी कुन्तीपुत्र अर्जुन हिमालयके पृष्ठभागमें स्थित हो अपार एवं उग्र तपस्यामें संलग्न हैं और सम्पूर्ण दिशाओंको धूमाच्छादित कर रहे हैं। देवेश्वर! वे क्या करना चाहते हैं, इस विषयमें हमलोगोंमेंसे कोई कुछ नहीं जानता है ।। २९-३० ।।
संतापयति नः सर्वानसौ साधु निवार्यताम् ।
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा मुनीनां भावितात्मनाम् ।। ३१ ।।
उमापतिर्भूतपतिर्वाक्यमेतदुवाच ह ।
'वे अपनी तपस्याके संतापसे हम सब महर्षियोंको संतप्त कर रहे हैं। अतः आप उन्हें तपस्यासे सद्भावपूर्वक निवृत्त कीजिये।' पवित्र चित्तवाले उन महर्षियोंका यह वचन सुनकर भूतनाथ भगवान् शंकर इस प्रकार बोले— ।। ३१ १/२ ।।
महादेव उवाच
न वो विषादः कर्तव्यः फाल्गुनं प्रति सर्वशः ।। ३२ ।।
शीघ्रं गच्छत संहृष्टा यथागतमतन्द्रिताः ।
अहमस्य विजानामि संकल्पं मनसि स्थितम् ।। ३३ ।।
**महादेवजीने कहा—**महर्षियो! तुम्हें अर्जुनके विषयमें किसी प्रकारका विषाद करनेकी आवश्यकता नहीं है। तुरन्त आलस्यरहित हो शीघ्र ही प्रसन्नतापूर्वक जैसे आये हो, वैसे ही लौट जाओ। अर्जुनके मनमें जो संकल्प है, मैं उसे भलीभाँति जानता हूँ ।। ३२-३३ ।।
नास्य स्वर्गस्पृहा काचिन्नैश्वर्यस्य तथाऽऽयुषः ।
यत् तस्य काङ्क्षितं सर्वं तत् करिष्येऽहमद्य वै ।। ३४ ।।
उन्हें स्वर्गलोककी कोई इच्छा नहीं है, वे ऐश्वर्य तथा आयु भी नहीं चाहते। वे जो कुछ पाना चाहते हैं, वह सब मैं आज ही पूर्ण करूँगा ।। ३४ ।।
वैशम्पायन उवाच
तच्छ्रुत्वा शर्ववचनमृषयः सत्यवादिनः ।
प्रहृष्टमनसो जग्मुर्यथा स्वान् पुनरालयान् ।। ३५ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**भगवान् शंकरका यह वचन सुनकर वे सत्यवादी महर्षि प्रसन्नचित्त हो फिर अपने आश्रमोंको लौट गये ।। ३५ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कैरातपर्वणि मुनिशङ्करसंवादे अष्टात्रिंशोऽध्यायः ।। ३८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कैरातपर्वमें महर्षियों तथा भगवान् शंकरके संवादसे सम्बन्ध रखनेवाला अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३८ ।।