भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 290

निबद्धासितलत्राणः क्षत्रधर्ममनुव्रतः ॥ ४५ ॥ नेह शस्त्रेण कर्तव्यं शान्तानामेष आलयः । विनीतक्रोधहर्षाणां ब्राह्मणानां तपस्विनाम् ॥ ४६ ॥ 'तात! तुम कौन हो? जो धनुष-बाण, कवच, तलवार तथा दस्तानेसे सुसज्जित हो क्षत्रियधर्मका अनुगमन करते हुए यहाँ आये हो। यहाँ अस्त्र-शस्त्रकी आवश्यकता नहीं है। यह तो क्रोध और हर्षको जीते हुए तपस्यामें तत्पर शान्त ब्राह्मणोंका स्थान है ॥ ४५-४६ ॥ नेहास्ति धनुषा कार्यं न संग्रामोऽत्र कर्हिचित् । निक्षिपैतद् धनुस्तात प्राप्तोऽसि परमां गतिम् ॥ ४७ ॥ 'यहाँ कभी कोई युद्ध नहीं होता, इसलिये यहाँ तुम्हारे धनुषका कोई काम नहीं है। तात! यह धनुष यहीं फेंक दो, अब तुम उत्तम गतिको प्राप्त हो चुके हो ॥ ४७ ॥ ओजसा तेजसा वीर यथा नान्यः पुमान् क्वचित् । तथा हसन्निवाभीक्ष्णं ब्राह्मणोऽर्जुनमब्रवीत् । न चैनं चालयामास धैर्यात् सुधृतनिश्चयम् ॥ ४८ ॥ 'वीर! ओज और तेजमें तुम्हारे-जैसा दूसरा कोई पुरुष नहीं है!' इस प्रकार उन ब्रह्मर्षिने हँसते हुए-से बार-बार अर्जुनसे धनुषको त्याग देनेकी बात कही। परंतु अर्जुन धनुष न त्यागनेका दृढ़ निश्चय कर चुके थे; अतः ब्रह्मर्षि उन्हें धैर्यसे विचलित नहीं कर सके ॥ तमुवाच ततः प्रीतः स द्विजः प्रहसन्निव । वरं वृणीष्व भद्रं ते शक्रोऽहमरिसूदन ॥ ४९ ॥ तब उन ब्राह्मण देवताने पुनः प्रसन्न होकर उनसे हँसते हुए-से कहा—'शत्रुसूदन! तुम्हारा भला हो, मैं साक्षात् इन्द्र हूँ, मुझसे कोई वर माँगो' ॥ ४९ ॥ एवमुक्तः सहस्राक्षं प्रत्युवाच धनंजयः । प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा शूरः कुरुकुलोद्वहः ॥ ५० ॥ यह सुनकर कुरुकुलरत्न शूरवीर अर्जुनने सहस्र नेत्रधारी इन्द्रसे हाथ जोड़कर प्रणामपूर्वक कहा— ॥ ५० ॥ ईप्सितो ह्येष वै कामो वरं चैनं प्रयच्छ मे । त्वत्तोऽद्य भगवन्तस्त्रं कृत्स्नमिच्छामि वेदितुम् ॥ ५१ ॥ 'भगवन्! मैं आपसे सम्पूर्ण अस्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ, यही मेरा अभीष्ट मनोरथ है; अतः मुझे यही वर दीजिये' ॥ ५१ ॥ प्रत्युवाच महेन्द्रस्तं प्रीतात्मा प्रहसन्निव । इह प्राप्तस्य किं कार्यमस्त्रैस्तव धनंजय ॥ ५२ ॥ कामान् वृणीष्व लोकांस्त्वं प्राप्तोऽसि परमां गतिम् । एवमुक्तः प्रत्युवाच सहस्राक्षं धनंजयः ॥ ५३ ॥