महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर पाण्डुनन्दन महाबाहु अर्जुनने अपना सुन्दर धनुष हाथमें लेकर सभी भाइयों और धौम्य मुनिको दाहिने करके वहाँसे प्रस्थान किया ।। ३७ ।। तस्य मार्गादपाक्रामन् सर्वभूतानि गच्छतः । युक्तस्यैन्द्रेण योगेन पराक्रान्तस्य शुष्मिणः ।। ३८ ।। महान् पराक्रमी और महाबली अर्जुनके यात्रा करते समय उनके मार्गसे समस्त प्राणी दूर हट जाते थे; क्योंकि वे इन्द्रसे मिला देनेवाली प्रतिस्मृति नामक योगविद्यासे युक्त थे ।। ३८ ।। सोऽगच्छत् पर्वतांस्तात तपोधननिषेवितान् । दिव्यं हैमवतं पुण्यं देवजुष्टं परंतपः ।। ३९ ।। परंतप अर्जुन तपस्वी महात्माओंद्वारा सेवित पर्वतोंके मार्गसे होते हुए दिव्य, पवित्र तथा देवसेवित हिमालय पर्वतपर जा पहुँचे ।। ३९ ।। अगच्छत् पर्वतं पुण्यमेकाह्नैव महामनाः । मनोजवगतिर्भूत्वा योगयुक्तो यथानिलः ।। ४० ।। महामना अर्जुन योगयुक्त होनेके कारण मनके समान तीव्र वेगसे चलनेमें समर्थ हो गये थे, अतः वे वायुके समान एक ही दिनमें उस पुण्य पर्वतपर पहुँच गये ।। ४० ।। हिमवन्तमतिक्रम्य गन्धमादनमेव च । अत्यक्रामत् स दुर्गाणि दिवारात्रमतन्द्रितः ।। ४१ ।। हिमालय और गन्धमादन पर्वतको लाँघकर उन्होंने आलस्यरहित हो दिन-रात चलते हुए और भी बहुत-से दुर्गम स्थानोंको पार किया ।। ४१ ।। इन्द्रकीलं समासाद्य ततोऽतिष्ठद् धनंजयः । अन्तरिक्षेऽतिशुश्राव तिष्ठेति स वचस्तदा ।। ४२ ।। तदनन्तर इन्द्रकील पर्वतपर पहुँचकर अर्जुनने आकाशमें उच्च स्वरसे गूँजती हुई एक वाणी सुनी— ‘तिष्ठ' (यहीं ठहर जाओ)। तब वे वहीं ठहर गये ।। ४२ ।। तच्छ्रुत्वा सर्वतो दृष्टिं चारयामास पाण्डवः । अथापश्यत् सव्यसाची वृक्षमूले तपस्विनम् ।। ४३ ।। वह वाणी सुनकर पाण्डुनन्दन अर्जुनने चारों ओर दृष्टिपात किया। इतनेहीमें उन्हें वृक्षके मूलभागमें बैठे हुए एक तपस्वी महात्मा दिखायी दिये ।। ४३ ।। ब्राह्म्या श्रिया दीप्यमानं पिङ्गलं जटिलं कृशम् । सोऽब्रवीदर्जुनं तत्र स्थितं दृष्ट्वा महातपाः ।। ४४ ।। वे अपने ब्रह्मतेजसे उद्भासित हो रहे थे। उनकी अंगकान्ति पिंगलवर्णकी थी। सिरपर जटा बढ़ी हुई थी और शरीर अत्यन्त कृश था। उन महातपस्वीने अर्जुनको वहाँ खड़े हुए देखकर पूछा— ।। ४४ ।। कस्त्वं तातेह सम्प्राप्तो धनुष्मान् कवची शरी ।