महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
तदनन्तर पाण्डुनन्दन महाबाहु अर्जुनने अपना सुन्दर धनुष हाथमें लेकर सभी भाइयों और धौम्य मुनिको दाहिने करके वहाँसे प्रस्थान किया ।। ३७ ।। तस्य मार्गादपाक्रामन् सर्वभूतानि गच्छतः । युक्तस्यैन्द्रेण योगेन पराक्रान्तस्य शुष्मिणः ।। ३८ ।। महान् पराक्रमी और महाबली अर्जुनके यात्रा करते समय उनके मार्गसे समस्त प्राणी दूर हट जाते थे; क्योंकि वे इन्द्रसे मिला देनेवाली प्रतिस्मृति नामक योगविद्यासे युक्त थे ।। ३८ ।। सोऽगच्छत् पर्वतांस्तात तपोधननिषेवितान् । दिव्यं हैमवतं पुण्यं देवजुष्टं परंतपः ।। ३९ ।। परंतप अर्जुन तपस्वी महात्माओंद्वारा सेवित पर्वतोंके मार्गसे होते हुए दिव्य, पवित्र तथा देवसेवित हिमालय पर्वतपर जा पहुँचे ।। ३९ ।। अगच्छत् पर्वतं पुण्यमेकाह्नैव महामनाः । मनोजवगतिर्भूत्वा योगयुक्तो यथानिलः ।। ४० ।। महामना अर्जुन योगयुक्त होनेके कारण मनके समान तीव्र वेगसे चलनेमें समर्थ हो गये थे, अतः वे वायुके समान एक ही दिनमें उस पुण्य पर्वतपर पहुँच गये ।। ४० ।। हिमवन्तमतिक्रम्य गन्धमादनमेव च । अत्यक्रामत् स दुर्गाणि दिवारात्रमतन्द्रितः ।। ४१ ।। हिमालय और गन्धमादन पर्वतको लाँघकर उन्होंने आलस्यरहित हो दिन-रात चलते हुए और भी बहुत-से दुर्गम स्थानोंको पार किया ।। ४१ ।। इन्द्रकीलं समासाद्य ततोऽतिष्ठद् धनंजयः । अन्तरिक्षेऽतिशुश्राव तिष्ठेति स वचस्तदा ।। ४२ ।। तदनन्तर इन्द्रकील पर्वतपर पहुँचकर अर्जुनने आकाशमें उच्च स्वरसे गूँजती हुई एक वाणी सुनी— ‘तिष्ठ' (यहीं ठहर जाओ)। तब वे वहीं ठहर गये ।। ४२ ।। तच्छ्रुत्वा सर्वतो दृष्टिं चारयामास पाण्डवः । अथापश्यत् सव्यसाची वृक्षमूले तपस्विनम् ।। ४३ ।। वह वाणी सुनकर पाण्डुनन्दन अर्जुनने चारों ओर दृष्टिपात किया। इतनेहीमें उन्हें वृक्षके मूलभागमें बैठे हुए एक तपस्वी महात्मा दिखायी दिये ।। ४३ ।। ब्राह्म्या श्रिया दीप्यमानं पिङ्गलं जटिलं कृशम् । सोऽब्रवीदर्जुनं तत्र स्थितं दृष्ट्वा महातपाः ।। ४४ ।। वे अपने ब्रह्मतेजसे उद्भासित हो रहे थे। उनकी अंगकान्ति पिंगलवर्णकी थी। सिरपर जटा बढ़ी हुई थी और शरीर अत्यन्त कृश था। उन महातपस्वीने अर्जुनको वहाँ खड़े हुए देखकर पूछा— ।। ४४ ।। कस्त्वं तातेह सम्प्राप्तो धनुष्मान् कवची शरी ।
निबद्धासितलत्राणः क्षत्रधर्ममनुव्रतः ॥ ४५ ॥ नेह शस्त्रेण कर्तव्यं शान्तानामेष आलयः । विनीतक्रोधहर्षाणां ब्राह्मणानां तपस्विनाम् ॥ ४६ ॥ 'तात! तुम कौन हो? जो धनुष-बाण, कवच, तलवार तथा दस्तानेसे सुसज्जित हो क्षत्रियधर्मका अनुगमन करते हुए यहाँ आये हो। यहाँ अस्त्र-शस्त्रकी आवश्यकता नहीं है। यह तो क्रोध और हर्षको जीते हुए तपस्यामें तत्पर शान्त ब्राह्मणोंका स्थान है ॥ ४५-४६ ॥ नेहास्ति धनुषा कार्यं न संग्रामोऽत्र कर्हिचित् । निक्षिपैतद् धनुस्तात प्राप्तोऽसि परमां गतिम् ॥ ४७ ॥ 'यहाँ कभी कोई युद्ध नहीं होता, इसलिये यहाँ तुम्हारे धनुषका कोई काम नहीं है। तात! यह धनुष यहीं फेंक दो, अब तुम उत्तम गतिको प्राप्त हो चुके हो ॥ ४७ ॥ ओजसा तेजसा वीर यथा नान्यः पुमान् क्वचित् । तथा हसन्निवाभीक्ष्णं ब्राह्मणोऽर्जुनमब्रवीत् । न चैनं चालयामास धैर्यात् सुधृतनिश्चयम् ॥ ४८ ॥ 'वीर! ओज और तेजमें तुम्हारे-जैसा दूसरा कोई पुरुष नहीं है!' इस प्रकार उन ब्रह्मर्षिने हँसते हुए-से बार-बार अर्जुनसे धनुषको त्याग देनेकी बात कही। परंतु अर्जुन धनुष न त्यागनेका दृढ़ निश्चय कर चुके थे; अतः ब्रह्मर्षि उन्हें धैर्यसे विचलित नहीं कर सके ॥ तमुवाच ततः प्रीतः स द्विजः प्रहसन्निव । वरं वृणीष्व भद्रं ते शक्रोऽहमरिसूदन ॥ ४९ ॥ तब उन ब्राह्मण देवताने पुनः प्रसन्न होकर उनसे हँसते हुए-से कहा—'शत्रुसूदन! तुम्हारा भला हो, मैं साक्षात् इन्द्र हूँ, मुझसे कोई वर माँगो' ॥ ४९ ॥ एवमुक्तः सहस्राक्षं प्रत्युवाच धनंजयः । प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा शूरः कुरुकुलोद्वहः ॥ ५० ॥ यह सुनकर कुरुकुलरत्न शूरवीर अर्जुनने सहस्र नेत्रधारी इन्द्रसे हाथ जोड़कर प्रणामपूर्वक कहा— ॥ ५० ॥ ईप्सितो ह्येष वै कामो वरं चैनं प्रयच्छ मे । त्वत्तोऽद्य भगवन्तस्त्रं कृत्स्नमिच्छामि वेदितुम् ॥ ५१ ॥ 'भगवन्! मैं आपसे सम्पूर्ण अस्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ, यही मेरा अभीष्ट मनोरथ है; अतः मुझे यही वर दीजिये' ॥ ५१ ॥ प्रत्युवाच महेन्द्रस्तं प्रीतात्मा प्रहसन्निव । इह प्राप्तस्य किं कार्यमस्त्रैस्तव धनंजय ॥ ५२ ॥ कामान् वृणीष्व लोकांस्त्वं प्राप्तोऽसि परमां गतिम् । एवमुक्तः प्रत्युवाच सहस्राक्षं धनंजयः ॥ ५३ ॥
न लोभान्न पुनः कामान्न देवत्वं पुनः सुखम् ।
न च सर्वामरैश्वर्यं कामये त्रिदशाधिप ॥ ५४ ॥
भ्रातॄंस्तान् विपिने त्यक्त्वा वैरमप्रतियात्य च ।
अकीर्तिं सर्वलोकेषु गच्छेयं शाश्वतीः समाः ॥ ५५ ॥
तब महेन्द्रने प्रसन्नचित्त हो हँसते हुए-से कहा—'धनंजय! जब तुम यहाँतक आ पहुँचे, तब तुम्हें अस्त्रोंको लेकर क्या करना है? अब इच्छानुसार उत्तम लोक माँग लो; क्योंकि तुम्हें उत्तम गति प्राप्त हुई है।' यह सुनकर धनंजयने पुनः देवराजसे कहा—'देवेश्वर! मैं अपने भाइयोंको वनमें छोड़कर (शत्रुओंसे) वैरका बदला लिये बिना लोभ अथवा कामनाके वशीभूत हो न तो देवत्व चाहता हूँ, न सुख और न सम्पूर्ण देवताओंका ऐश्वर्य प्राप्त कर लेनेकी ही मेरी इच्छा है। यदि मैंने वैसा किया तो सदाके लिये सम्पूर्ण लोकोंमें मुझे महान् अपयश प्राप्त होगा' ॥ ५२—५५ ॥
एवमुक्तः प्रत्युवाच वृत्रहा पाण्डुनन्दनम् ।
सान्त्वयञ्श्लक्ष्णया वाचा सर्वलोकनमस्कृतः ॥ ५६ ॥
अर्जुनके ऐसा कहनेपर विश्ववन्दित, वृत्र-विनाशक इन्द्रने मधुर वाणीमें अर्जुनको सान्त्वना देते हुए कहा— ॥ ५६ ॥
यदा द्रक्ष्यसि भूतेशं त्र्यक्षं शूलधरं शिवम् ।
तदा दातास्मि ते तात दिव्यान्यस्त्राणि सर्वशः ॥ ५७ ॥
'तात! जब तुम्हें तीन नेत्रोंसे विभूषित त्रिशूलधारी भूतनाथ भगवान् शिवका दर्शन होगा, तब मैं तुम्हें सम्पूर्ण दिव्यास्त्र प्रदान करूँगा ॥ ५७ ॥
क्रियतां दर्शने यत्नो देवस्य परमेष्ठिनः ।
दर्शनात् तस्य कौन्तेय संसिद्धः स्वर्गमेष्यसि ॥ ५८ ॥
'कुन्तीकुमार! तुम उन परमेश्वर महादेवजीका दर्शन पानेके लिये प्रयत्न करो। उनके दर्शनसे पूर्णतः सिद्ध हो जानेपर तुम स्वर्गलोकमें पधारोगे' ॥ ५८ ॥
इत्युक्त्वा फाल्गुनं शक्रो जगामादर्शनं पुनः ।
अर्जुनोऽप्यथ तत्रैव तस्थौ योगसमन्वितः ॥ ५९ ॥
अर्जुनसे ऐसा कहकर इन्द्र पुनः अदृश्य हो गये। तत्पश्चात् अर्जुन योगयुक्त हुए वहीं रहने लगे ॥ ५९ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि इन्द्रदर्शने सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें इन्द्रदर्शनविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥
(कैरातपर्व)
(कैरातपर्व)
अष्टात्रिंशोऽध्यायः
अर्जुनकी उग्र तपस्या और उसके विषयमें ऋषियोंका भगवान् शंकरके साथ वार्तालाप
जनमेजय उवाच
भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि पार्थस्याक्लिष्टकर्मणः ।
विस्तरेण कथामेतां यथास्त्राण्युपलब्धवान् ॥ १ ॥
**जनमेजय बोले—**भगवन्! अनायास ही महान् कर्म करनेवाले कुन्तीनन्दन अर्जुनकी यह कथा मैं विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ; उन्होंने किस प्रकार अस्त्र प्राप्त किये? ॥ १ ॥
यथा च पुरुषव्याघ्रो दीर्घबाहुर्धनंजयः ।
वनं प्रविष्टस्तेजस्वी निर्मनुष्यमभीतवत् ॥ २ ॥
पुरुषसिंह महाबाहु तेजस्वी धनंजय उस निर्जन वनमें निर्भयके समान कैसे चले गये थे? ॥ २ ॥
किं च तेन कृतं तत्र वसता ब्रह्मवित्तम ।
कथं च भगवान् स्थाणुर्देवराजश्च तोषितः ॥ ३ ॥
ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! उस वनमें रहकर पार्थने क्या किया? भगवान् शंकर तथा देवराज इन्द्रको कैसे संतुष्ट किया? ॥ ३ ॥
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं त्वत्प्रसादाद् द्विजोत्तम ।
त्वं हि सर्वज्ञ दिव्यं च मानुषं चैव वेत्थ ह ॥ ४ ॥
विप्रवर! मैं आपकी कृपासे ये सब बातें सुनना चाहता हूँ। सर्वज्ञ! आप दिव्य और मानुष सभी वृत्तान्तों-को जानते हैं ॥ ४ ॥
अत्यद्भुततमं ब्रह्मन् रोमहर्षणमर्जुनः ।
भवेन सह संग्रामं चकाराप्रतिमं किल ॥ ५ ॥
पुरा प्रहरतां श्रेष्ठः संग्रामेष्वपराजितः ।
यच्छ्रुत्वा नरसिंहाना दैन्यहर्षातिविस्मयात् ॥ ६ ॥
शूराणामपि पार्थानां हृदयानि चकम्पिरे ।
यद् यच्च कृतवानन्यत् पार्थस्तदखिलं वद ॥ ७ ॥
ब्रह्मन्! मैंने सुना है, कभी संग्राममें परास्त न होनेवाले, योद्धाओंमें श्रेष्ठ अर्जुनने पूर्वकालमें भगवान् शंकरके साथ अत्यन्त अद्भुत, अनुपम और रोमांचकारी युद्ध किया था, जिसे सुनकर मनुष्योंमें श्रेष्ठ शूरवीर कुन्तीपुत्रोंके हृदयोंमें भी दैन्य, हर्ष और विस्मयके कारण कँपकँपी छा गयी थी। अर्जुनने और भी जो-जो कार्य किये हों, वे सब भी मुझे बताइये ॥ ५—७ ॥
न ह्यस्य निन्दितं जिष्णोः सुसूक्ष्ममपि लक्षये ।
चरितं तस्य शूरस्य तन्मे सर्वं प्रकीर्तय ॥ ८ ॥
शूरवीर अर्जुनका अत्यन्त सूक्ष्म चरित्र भी ऐसा नहीं दिखायी देता है, जिसमें थोड़ी-सी भी निन्दाके लिये स्थान हो; अतः वह सब मुझसे कहिये ॥ ८ ॥
वैशम्पायन उवाच
कथयिष्यामि ते तात कथामेतां महात्मनः ।
दिव्यां पौरवशार्दूल महतीमद्भुतोपमाम् ॥ ९ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— तात! पौरवश्रेष्ठ! महात्मा अर्जुनकी यह कथा दिव्य, अद्भुत और महत्त्वपूर्ण है; इसे मैं तुम्हें सुनाता हूँ ॥ ९ ॥
गात्रसंस्पर्शसम्बद्धां त्र्यम्बकेण सहानुघ ।
पार्थस्य देवदेवेन शृणु सम्यक् समागमम् ॥ १० ॥
अनघ! देवदेव महादेवजीके साथ अर्जुनके शरीरका जो स्पर्श हुआ था, उससे सम्बन्ध रखनेवाली यह कथा है। तुम उन दोनोंके मिलनका यह वृत्तान्त भलीभाँति सुनो ॥ १० ॥
युधिष्ठिरनियोगात् स जगामामितविक्रमः ।
शक्रं सुरेश्वरं द्रष्टुं देवदेवं च शंकरम् ॥ ११ ॥
दिव्यं तद् धनुरादाय खड्गं च कनकत्सरुम् ।
महाबलो महाबाहुरर्जुनः कार्यसिद्धये ॥ १२ ॥
दिशं ह्युदीचीं कौरव्यो हिमवच्छिखरं प्रति ।
ऐन्द्रिः स्थिरमना राजन् सर्वलोकमहारथः ॥ १३ ॥
राजन्! अमित पराक्रमी, महाबली, महाबाहु, कुरुकुलभूषण, इन्द्रपुत्र अर्जुन, जो सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात महारथी और सुस्थिर चित्तवाले थे, युधिष्ठिरकी आज्ञासे देवराज इन्द्र तथा देवाधिदेव भगवान् शंकरका दर्शन करनेके लिये कार्यकी सिद्धिका उद्देश्य लेकर अपने उस दिव्य (गाण्डीव) धनुष और सोनेकी मूँठवाले खड्गको हाथमें लिये उत्तर दिशामें हिमालय पर्वतकी ओर चले ॥ ११—१३ ॥
त्वरया परया युक्तस्तपसे धृतनिश्चयः ।
वनं कण्टकितं घोरमेक एवान्वपद्यत ॥ १४ ॥
तपस्याके लिये दृढ़ निश्चय करके बड़ी उतावलीके साथ जाते हुए वे अकेले ही एक भयंकर कण्टकाकीर्ण वनमें पहुँचे ॥ १४ ॥ नानापुष्पफलोपेतं नानापक्षिनिषेवितम् । नानामृगगणाकीर्णं सिद्धचारणसेवितम् ॥ १५ ॥ जो नाना प्रकारके फल-फूलोंसे भरा था, भाँति-भाँतिके पक्षी जहाँ कलरव कर रहे थे, अनेक जातियोंके मृग उस वनमें सब ओर विचरते रहते थे तथा कितने ही सिद्ध और चारण निवास कर रहे थे ॥ १५ ॥ ततः प्रयाते कौन्तेये वनं मानुषवर्जितम् । शङ्खानां पटहानां च शब्दः समभवद् दिवि ॥ १६ ॥ तदनन्तर कुन्तीनन्दन अर्जुनके उस निर्जन वनमें पहुँचते ही आकाशमें शंखों और नगाड़ोंका गम्भीर घोष गूँज उठा ॥ १६ ॥ पुष्पवर्षं च सुमहन्निपपात महीतले । मेघजालं च विततं छादयामास सर्वतः ॥ १७ ॥ सोऽतीत्य वनदुर्गाणि संनिकर्षे महागिरेः । शुशुभे हिमवत्पृष्ठे वसमानोऽर्जुनस्तदा ॥ १८ ॥ पृथ्वीपर फूलोंकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी। मेघोंकी घटा घिरकर आकाशमें सब ओर छा गयी। उन दुर्गम वनस्थलियोंको लाँघकर अर्जुन हिमालयके पृष्ठभागमें एक महान् पर्वतके निकट निवास करते हुए शोभा पाने लगे ॥ १७-१८ ॥ तत्रापश्यद् द्रुमान् फुल्लान् विहगैर्वल्गुनादितान् । नदीश्च विपुलावर्ता वैदूर्यविमलप्रभाः ॥ १९ ॥ वहाँ उन्होंने फूलोंसे सुशोभित बहुत-से वृक्ष देखे, जो पक्षियोंके मधुर शब्दसे गुंजायमान हो रहे थे। उन्होंने वैदूर्यमणिके समान स्वच्छ जलसे भरी हुई शोभामयी कितनी ही नदियाँ देखीं, जिनमें बहुत-सी भँवरें उठ रही थीं ॥ १९ ॥ हंसकारण्डवोद्गीताः सारसाभिरुतास्तथा । पुंस्कोकिलरुताश्चैव क्रौञ्चबर्हिणनादिताः ॥ २० ॥ हंस, कारण्डव तथा सारस आदि पक्षी वहाँ मीठी बोली बोलते थे। तटवर्ती वृक्षोंपर कोयल मनोहर शब्द बोल रही थी। क्रौंचके कलरव और मयूरोंकी केकाध्वनि भी वहाँ सब ओर गूँजती रहती थी ॥ २० ॥ मनोहरवनोपेतास्तस्मिन्नतिरथोऽर्जुनः । पुण्यशीतामलजलाः पश्यन् प्रीतमनाभवत् ॥ २१ ॥ उन नदियोंके आस-पास मनोहर वनश्रेणी सुशोभित होती थी। हिमालयके उस शिखरपर पवित्र, शीतल और निर्मल जलसे भरी हुई उन सुन्दर सरिताओंका दर्शन करके अतिरथी अर्जुनका मन प्रसन्नतासे खिल उठा ॥ २१ ॥
रमणीये वनोद्देशे रममाणोऽर्जुनस्तदा । तपस्युग्रे वर्तमान उग्रतेजा महामनाः ॥ २२ ॥ उग्र तेजस्वी महामना अर्जुन वहाँ वनके रमणीय प्रदेशोंमें घूम-फिरकर बड़ी कठोर तपस्यामें संलग्न हो गये ॥ २२ ॥ दर्भचीरं निवस्याथ दण्डाजिनविभूषितः । शीर्णं च पतितं भूमौ पर्णं समुपयुक्तवान् ॥ २३ ॥ कुशाका ही चीर धारण किये तथा दण्ड और मृगचर्मसे विभूषित अर्जुन पृथ्वीपर गिरे हुए सूखे पत्तोंका ही भोजनके स्थानमें उपयोग करते थे ॥ २३ ॥ पूर्णे पूर्णे त्रिरात्रे तु मासमेकं फलाशनः । द्विगुणेन हि कालेन द्वितीयं मासमत्ययात् ॥ २४ ॥ एक मासतक वे तीन-तीन रातके बाद केवल फलाहार करके रहे। दूसरे मासको उन्होंने पहलेकी अपेक्षा दूने-दूने समयपर अर्थात् छः-छः रातके बाद फलाहार करके व्यतीत किया ॥ २४ ॥ तृतीयमपि मासं स पक्षेणाहारमाचरन् । चतुर्थे त्वथ सम्प्राप्ते मासे भरतसत्तमः ॥ २५ ॥ वायुभक्षो महाबाहुरभवत् पाण्डुनन्दनः । ऊर्ध्वबाहुर्निरालम्बः पादाङ्गुष्ठाग्रविष्ठितः ॥ २६ ॥ तीसरा महीना पंद्रह-पंद्रह दिनमें भोजन करके बिताया। चौथा महीना आनेपर भरतश्रेष्ठ पाण्डुनन्दन महाबाहु अर्जुन केवल वायु पीकर रहने लगे। वे दोनों भुजाएँ ऊपर उठाये बिना किसी सहारेके पैरके अंगूठेके अग्रभागके बलपर खड़े रहे ॥ २५-२६ ॥ सदोपस्पर्शनाच्चास्य बभूवुरमितौजसः । विद्युदम्भोरुहनिभा जटास्तस्य महात्मनः ॥ २७ ॥ अमित तेजस्वी महात्मा अर्जुनके सिरकी जटाएँ नित्य स्नान करनेके कारण विद्युत् और कमलोंके समान हो गयी थीं ॥ २७ ॥ ततो महर्षयः सर्वे जग्मुर्देवं पिनाकिनम् । निवेदयिषवः पार्थं तपस्युग्रे समास्थितम् ॥ २८ ॥ तदनन्तर भयंकर तपस्यामें लगे हुए अर्जुनके विषयमें कुछ निवेदन करनेकी इच्छासे वहाँ रहनेवाले सभी महर्षि पिनाकधारी महादेवजीकी सेवामें गये ॥ २८ ॥ तं प्रणम्य महादेवं शशंसुः पार्थकर्म तत् । एष पार्थो महातेजा हिमवत्पृष्ठमास्थितः ॥ २९ ॥ उग्रे तपसि दुष्पारे स्थितो धूमायन् दिशः । तस्य देवेश न वयं विद्मः सर्वे चिकीर्षितम् ॥ ३० ॥
उन्होंने महादेवजीको प्रणाम करके अर्जुनका वह तपरूप कर्म कह सुनाया। वे बोले—'भगवन्! ये महातेजस्वी कुन्तीपुत्र अर्जुन हिमालयके पृष्ठभागमें स्थित हो अपार एवं उग्र तपस्यामें संलग्न हैं और सम्पूर्ण दिशाओंको धूमाच्छादित कर रहे हैं। देवेश्वर! वे क्या करना चाहते हैं, इस विषयमें हमलोगोंमेंसे कोई कुछ नहीं जानता है ।। २९-३० ।।
संतापयति नः सर्वानसौ साधु निवार्यताम् ।
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा मुनीनां भावितात्मनाम् ।। ३१ ।।
उमापतिर्भूतपतिर्वाक्यमेतदुवाच ह ।
'वे अपनी तपस्याके संतापसे हम सब महर्षियोंको संतप्त कर रहे हैं। अतः आप उन्हें तपस्यासे सद्भावपूर्वक निवृत्त कीजिये।' पवित्र चित्तवाले उन महर्षियोंका यह वचन सुनकर भूतनाथ भगवान् शंकर इस प्रकार बोले— ।। ३१ १/२ ।।
महादेव उवाच
न वो विषादः कर्तव्यः फाल्गुनं प्रति सर्वशः ।। ३२ ।।
शीघ्रं गच्छत संहृष्टा यथागतमतन्द्रिताः ।
अहमस्य विजानामि संकल्पं मनसि स्थितम् ।। ३३ ।।
**महादेवजीने कहा—**महर्षियो! तुम्हें अर्जुनके विषयमें किसी प्रकारका विषाद करनेकी आवश्यकता नहीं है। तुरन्त आलस्यरहित हो शीघ्र ही प्रसन्नतापूर्वक जैसे आये हो, वैसे ही लौट जाओ। अर्जुनके मनमें जो संकल्प है, मैं उसे भलीभाँति जानता हूँ ।। ३२-३३ ।।
नास्य स्वर्गस्पृहा काचिन्नैश्वर्यस्य तथाऽऽयुषः ।
यत् तस्य काङ्क्षितं सर्वं तत् करिष्येऽहमद्य वै ।। ३४ ।।
उन्हें स्वर्गलोककी कोई इच्छा नहीं है, वे ऐश्वर्य तथा आयु भी नहीं चाहते। वे जो कुछ पाना चाहते हैं, वह सब मैं आज ही पूर्ण करूँगा ।। ३४ ।।
वैशम्पायन उवाच
तच्छ्रुत्वा शर्ववचनमृषयः सत्यवादिनः ।
प्रहृष्टमनसो जग्मुर्यथा स्वान् पुनरालयान् ।। ३५ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**भगवान् शंकरका यह वचन सुनकर वे सत्यवादी महर्षि प्रसन्नचित्त हो फिर अपने आश्रमोंको लौट गये ।। ३५ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कैरातपर्वणि मुनिशङ्करसंवादे अष्टात्रिंशोऽध्यायः ।। ३८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कैरातपर्वमें महर्षियों तथा भगवान् शंकरके संवादसे सम्बन्ध रखनेवाला अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३८ ।।
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अध्याय (पृष्ठ 298)
एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः
भगवान् शंकर और अर्जुनका युद्ध, अर्जुनपर उनका प्रसन्न होना एवं अर्जुनके द्वारा भगवान् शंकरकी स्तुति
वैशम्पायन उवाच
गतेषु तेषु सर्वेषु तपस्विषु महात्मसु ।
पिनाकपाणिर्भगवान् सर्वपापहरो हरः ॥ १ ॥
कैरातं वेषमास्थाय काञ्चनद्रुमसंनिभम् ।
विभ्राजमानो विपुलो गिरिर्मेरुरिवापरः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उन सब तपस्वी महात्माओंके चले जानेपर सर्वपापहारी, पिनाक-पाणि, भगवान् शंकर किरातवेष धारण करके सुवर्णमय वृक्षके सदृश दिव्य कान्तिसे उद्भासित होने लगे। उनका शरीर दूसरे मेरुपर्वतके समान दीप्तिमान् और विशाल था ॥ १-२ ॥
श्रीमद् धनुरुपादाय शरांश्चाशीविषोपमान् ।
निष्पपात महावेगो दहनो देहवानिव ॥ ३ ॥
वे एक शोभायमान धनुष और सर्पोंके समान विषाक्त बाण लेकर बड़े वेगसे चले। मानो साक्षात् अग्निदेव ही देह धारण करके निकले हों ॥ ३ ॥
देव्या सहोमया श्रीमान् समानव्रतवेषया ।
नानावेषधरैर्हृष्टैर्भूतैरनुगतस्तदा ॥ ४ ॥
किरातवेषसंछन्नः स्त्रीभिश्चापि सहस्रशः ।
अशोभत तदा राजन् स देशोऽतीव भारत ॥ ५ ॥
उनके साथ भगवती उमा भी थीं, जिनका व्रत और वेष भी उन्हींके समान था। अनेक प्रकारके वेष धारण किये भूतगण भी प्रसन्नतापूर्वक उनके पीछे हो लिये थे। इस प्रकार किरातवेषमें छिपे हुए श्रीमान् शिव सहस्रों स्त्रियोंसे घिरकर बड़ी शोभा पा रहे थे। भरतवंशी राजन्! उस समय वह प्रदेश उन सबके चलने-फिरनेसे अत्यन्त सुशोभित हो रहा था ॥ ४-५ ॥
क्षणेन तद् वनं सर्वं निःशब्दमभवत् तदा ।
नादः प्रस्रवणानां च पक्षिणां चाप्युपारमत् ॥ ६ ॥
एक ही क्षणमें वह सारा वन शब्दरहित हो गया। झरनों और पक्षियोंतककी आवाज बंद हो गयी ॥ ६ ॥
स संनिकर्षमागम्य पार्थस्याक्लिष्टकर्मणः ।
मूकं नाम दनोः पुत्रं ददर्शाद्भुतदर्शनम् ॥ ७ ॥
वाराहं रूपमास्थाय तर्कयन्तमिवार्जुनम् ।
हन्तुं परं दीप्यमानं तमुवाचाथ फाल्गुनः ॥ ८ ॥
गाण्डीवं धनुरादाय शरांश्चाशीविषोपमान् ।
सज्यं धनुर्वरं कृत्वा ज्याघोषेण निनादयन् ॥ ९ ॥
अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले कुन्तीपुत्र अर्जुनके निकट आकर भगवान् शंकरने अद्भुत दीखनेवाले मूक नामक अद्भुत दानवको देखा, जो सूअरका रूप धारण करके अत्यन्त तेजस्वी अर्जुनको मार डालनेका उपाय सोच रहा था; उस समय अर्जुनने गाण्डीव धनुष और विषैले सर्पोंके समान भयंकर बाण हाथमें ले धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाकर उसकी टंकारसे दिशाओंको प्रतिध्वनित करके कहा— ॥ ७–९ ॥
यन्मां प्रार्थयसे हन्तुमनागसमिहागतम् ।
तस्मात् त्वां पूर्वमेवाहं नेताद्य यमसादनम् ॥ १० ॥
‘अरे! तू यहाँ आये हुए मुझ निरपराधको मारनेकी घातमें लगा है, इसीलिये मैं आज पहले ही तुझे यमलोक भेज दूँगा’ ॥ १० ॥
दृष्ट्वा तं प्रहरिष्यन्तं फाल्गुनं दृढधन्विनम् ।
कि
जैसे पर्वतपर बिजलीकी गड़गड़ाहट और वज्रपातका भयंकर शब्द होता है, उसी प्रकार उन दोनों बाणोंके आघातका शब्द हुआ ।। १५ ।। स विद्धो बहुभिर्बाणैर्दीप्तास्यैः पन्नगैरिव । ममार राक्षसं रूपं भूयः कृत्वा विभीषणम् ।। १६ ।। इस प्रकार प्रज्वलित मुखवाले सर्पोंके समान अनेक बाणोंसे घायल होकर वह दानव फिर अपने भयानक राक्षसरूपको प्रकट करते हुए मर गया ।। १६ ।। स ददर्श ततो जिष्णुः पुरुषं काञ्चनप्रभम् । किरातवेषसंच्छन्नं स्त्रीसहायममित्रहा ।। १७ ।। तमब्रवीत् प्रीतमनाः कौन्तेयः प्रहसन्निव । को भवानटते शून्ये वने स्त्रीगणसंवृतः ।। १८ ।। इसी समय शत्रुनाशक अर्जुनने सुवर्णके समान कान्तिमान् एक तेजस्वी पुरुषको देखा, जो स्त्रियोंके साथ आकर अपनेको किरातवेषमें छिपाये हुए थे। तब कुन्तीकुमारने प्रसन्नचित्त होकर हँसते हुए-से कहा—‘आप कौन हैं जो इस सूने वनमें स्त्रियोंसे घिरे हुए घूम रहे हैं? ।। १७-१८ ।। न त्वमस्मिन् वने घोरे बिभेषि कनकप्रभ । किमर्थं च त्वया विद्धो वराहो मत्परिग्रहः ।। १९ ।। ‘सुवर्णके समान दीप्तिमान् पुरुष! क्या आपको इस भयानक वनमें भय नहीं लगता? यह सूअर तो मेरा लक्ष्य था, आपने क्यों उसपर बाण मारा? ।। १९ ।। मयाभिपन्नः पूर्वं हि राक्षसोऽयमिहागतः । कामात् परिभवाद् वापि न मे जीवन् विमोक्ष्यसे ।। २० ।। ‘यह राक्षस पहले यहीं मेरे पास आया था और मैंने इसे काबूमें कर लिया था। आपने किसी कामनासे इस शूकरको मारा हो या मेरा तिरस्कार करनेके लिये। किसी दशामें भी मैं आपको जीवित नहीं छोड़ूँगा ।। २० ।। न ह्येष मृगयाधर्मो यस्त्वयाद्य कृतो मयि । तेन त्वां भ्रंशयिष्यामि जीवितात् पर्वताश्रयम् ।। २१ ।। ‘यह मृगयाका धर्म नहीं है, जो आज आपने मेरे साथ किया है। आप पर्वतके निवासी हैं तो भी उस अपराधके कारण मैं आपको जीवनसे वंचित कर दूँगा’ ।। २१ ।। इत्युक्तः पाण्डवेयेन किरातः प्रहसन्निव । उवाच श्लक्ष्णया वाचा पाण्डवं सव्यसाचिनम् ।। २२ ।। पाण्डुनन्दन अर्जुनके इस प्रकार कहनेपर किरात-वेषधारी भगवान् शंकर जोर-जोरसे हँस पड़े और सव्यसाची पाण्डवसे मधुर वाणीमें बोले— ।। २२ ।। न मत्कृते त्वया वीर भीः कार्या वनमन्तिकात् । इयं भूमिः सदास्माकमुचिता वसतां वने ।। २३ ।।
‘वीर! तुम हमारे लिये वनके निकट आनेके कारण भय न करो। हम तो वनवासी हैं, अतः हमारे लिये इस भूमिपर विचरना सदा उचित ही है ॥ २३ ॥ त्वया तु दुष्करः कस्मादिह वासः प्ररोचितः । वयं तु बहुसत्त्वेऽस्मिन् निवसामस्तपोधन ॥ २४ ॥ ‘किंतु तुमने यहाँका दुष्कर निवास कैसे पसंद किया? तपोधन! हम तो अनेक प्रकारके जीव-जन्तुओंसे भरे हुए इस वनमें सदा ही रहते हैं ॥ २४ ॥ भवांस्तु कृष्णवर्त्माभः सुकुमारः सुखोचितः । कथं शून्यमिमं देशमेकाकी विचरिष्यति ॥ २५ ॥ ‘तुम्हारे अंगोंकी प्रभा प्रज्वलित अग्निके समान जान पड़ती है। तुम सुकुमार हो और सुख भोगनेके योग्य प्रतीत होते हो। इस निर्जन प्रदेशमें किसलिये अकेले विचर रहे हो?’ ॥ २५ ॥
अर्जुन उवाच गाण्डीवमाश्रयं कृत्वा नाराचांश्चाग्निसंनिभान् । निवसामि महारण्ये द्वितीय इव पावकिः ॥ २६ ॥ **अर्जुनने कहा—**मैं गाण्डीव धनुष और अग्निके समान तेजस्वी बाणोंका आश्रय लेकर इस महान् वनमें द्वितीय कार्तिकेयकी भाँति (निर्भय) निवास करता हूँ ॥ २६ ॥ एष चापि मया जन्तुर्मृगरूपं समाश्रितः । राक्षसो निहतो घोरो हन्तुं मामिह चागतः ॥ २७ ॥ यह प्राणी हिंसक पशुका रूप धारण करके मुझे ही मारनेके लिये यहाँ आया था, अतः इस भयंकर राक्षसको मैंने मार गिराया है ॥ २७ ॥
किरात उवाच मयैष धन्वन्निर्मुक्तैस्ताडितः पूर्वमेव हि । बाणैरभिहतः शेते नीतश्च यमसादनम् ॥ २८ ॥ **किरातरूपधारी शिव बोले—**मैंने अपने धनुषद्वारा छोड़े हुए बाणोंसे पहले ही इसे घायल कर दिया था। मेरे ही बाणोंकी चोट खाकर यह सदाके लिये सो रहा है और यमलोकमें पहुँच गया ॥ २८ ॥ ममैष लक्ष्यभूतो हि मम पूर्वपरिग्रहः । ममैव च प्रहारेण जीविताद् व्यपरोपितः ॥ २९ ॥ मैंने ही पहले इसे अपने बाणोंका निशाना बनाया, अतः तुमसे पहले इसपर मेरा अधिकार स्थापित हो चुका था। मेरे ही तीव्र प्रहारसे इस दानवको अपने प्राणोंसे हाथ धोना पड़ा है ॥ २९ ॥ दोषान् स्वान् नार्हसेऽन्यस्मै वक्तुं स्वबलदर्पितः ।
अवलिप्तोऽसि मन्दात्मन् न मे जीवन् विमोक्ष्यसे ॥ ३० ॥
मन्दबुद्धे! तुम अपने बलके घमंडमें आकर अपने दोष दूसरेपर नहीं मढ़ सकते। तुम्हें अपनी शक्तिपर बड़ा गर्व है; अतः अब तुम मेरे हाथसे जीवित नहीं बच सकते ॥ ३० ॥
स्थिरो भवस्व मोक्ष्यामि सायकानशनीनिव ।
घटस्व परया शक्त्या मुञ्च त्वमपि सायकान् ॥ ३१ ॥
धैर्यपूर्वक सामने खड़े रहो, मैं वज्रके समान भयानक बाण छोड़ूँगा। तुम भी अपनी पूरी शक्ति लगाकर मुझे जीतनेका प्रयास करो। मेरे ऊपर अपने बाण छोड़ो ॥ ३१ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा किरातस्यार्जुनस्तदा ।
रोषमाहारयामास ताडयामास चेषुभिः ॥ ३२ ॥
किरातकी वह बात सुनकर उस समय अर्जुनको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने बाणोंसे उसपर प्रहार आरम्भ किया ॥ ३२ ॥
ततो हृष्टेन मनसा प्रतिजग्राह सायकान् ।
भूयो भूय इति प्राह मन्दमन्देत्युवाच ह ॥ ३३ ॥
प्रहरस्व शरानेतान् नाराचान् मर्मभेदिनः ।
तब किरातने प्रसन्नचित्तसे अर्जुनके छोड़े हुए सभी बाणोंको पकड़ लिया और कहा—‘ओ मूर्ख! और बाण मार और बाण मार, इन मर्मभेदी नाराचोंका प्रहार कर’ ॥ ३३ १/२ ॥
इत्युक्तो बाणवर्षं स मुमोच सहसार्जुनः ॥ ३४ ॥
उसके ऐसा कहनेपर अर्जुनने सहसा बाणोंकी झड़ी लगा दी ॥ ३४ ॥
ततस्तौ तत्र संरब्धौ राजमानौ मुहुर्मुहुः ।
शरैराशीविषाकारैस्ततक्षाते परस्परम् ॥ ३५ ॥
तदनन्तर वे दोनों क्रोधमें भरकर बारंबार सर्पाकार बाणोंद्वारा एक-दूसरेको घायल करने लगे। उस समय उन दोनोंकी बड़ी शोभा होने लगी ॥ ३५ ॥
ततोऽर्जुनः शरवर्षं किराते समवासृजत् ।
तत् प्रसन्नेन मनसा प्रतिजग्राह शङ्करः ॥ ३६ ॥
तत्पश्चात् अर्जुनने किरातपर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ की; परंतु भगवान् शंकरने प्रसन्नचित्तसे उन सब बाणोंको ग्रहण कर लिया ॥ ३६ ॥
मुहूर्तं शरवर्षं तत् प्रतिगृह्य पिनाकधृक् ।
अक्षतेन शरीरेण तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥ ३७ ॥
पिनाकधारी शिव दो ही घड़ीमें सारी बाण-वर्षाको अपनेमें लीन करके पर्वतकी भाँति अविचल भावसे खड़े रहे। उनके शरीरपर तनिक भी चोट या क्षति नहीं पहुँची थी ॥ ३७ ॥
स दृष्ट्वा बाणवर्षं तु मोघीभूतं धनंजयः ।
परमं विस्मयं चक्रे साधु साध्विति चाब्रवीत् ॥ ३८ ॥
अपनी की हुई सारी बाण-वर्षा व्यर्थ हुई देख धनंजयको बड़ा आश्चर्य हुआ। वे किरातको साधुवाद देने लगे और बोले— ॥ ३८ ॥
अहोऽयं सुकुमाराङ्गो हिमवच्छिखराश्रयः ।
गाण्डीवमुक्तान् नाराचान् प्रतिगृह्णात्यविह्वलः ॥ ३९ ॥
‘अहो! हिमालयके शिखरपर निवास करनेवाले इस किरातके अंग तो बड़े सुकुमार हैं, तो भी यह गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाणोंको ग्रहण कर लेता है और तनिक भी व्याकुल नहीं होता ॥ ३९ ॥
कोऽयं देवो भवेत् साक्षाद् रुद्रो यक्षः सुरोऽसुरः ।
विद्यते हि गिरिश्रेष्ठे त्रिदशानां समागमः ॥ ४० ॥
‘यह कौन है? साक्षात् भगवान् रुद्रदेव, यक्ष, देवता अथवा असुर तो नहीं है। इस श्रेष्ठ पर्वतपर देवताओंका आना-जाना होता रहता है ॥ ४० ॥
न हि मद्बाणजालानामुत्सृष्टानां सहस्रशः ।
शक्तोऽन्यः सहितुं वेगमृते देवं पिनाकिनम् ॥ ४१ ॥
‘मैंने सहस्रों बार जिन बाण-समूहोंकी वृष्टि की है, उनका वेग पिनाकधारी भगवान् शंकरके सिवा दूसरा कोई नहीं सह सकता ॥ ४१ ॥
देवो वा यदि वा यक्षो रुद्रादन्यो व्यवस्थितः ।
अहमेनं शरैस्तीक्ष्णैर्नयामि यमसादनम् ॥ ४२ ॥
‘यदि यह रुद्रदेवसे भिन्न व्यक्ति है तो यह देवता हो या यक्ष—मैं इसे तीखे बाणोंसे मारकर अभी यमलोक भेजता हूँ’ ॥ ४२ ॥
ततो हृष्टमना जिष्णुर्नाराचान् मर्मभेदिनः ।
व्यसृजच्छतधा राजन् मयूखानिव भास्करः ॥ ४३ ॥
राजन्! यह सोचकर प्रसन्नचित्त अर्जुनने सहस्रों किरणोंको फैलानेवाले भगवान् भास्करकी भाँति सैकड़ों मर्मभेदी नाराचोंका प्रहार किया ॥ ४३ ॥
तान् प्रसन्नेन मनसा भगवाँल्लोकभावनः ।
शूलपाणिः प्रत्यगृह्णाच्छिलावर्षमिवाचलः ॥ ४४ ॥
परंतु त्रिशूलधारी भूतभावन भगवान् भवने हर्षभरे हृदयसे उन सब नाराचोंको उसी प्रकार आत्मसात् कर लिया, जैसे पर्वत पत्थरोंकी वर्षाको ॥ ४४ ॥
अध्याय (पृष्ठ 304)
क्षणेन क्षीणबाणोऽथ संवृत्तः फाल्गुनस्तदा । भीश्चैनमाविशत् तीव्रा तं दृष्ट्वा शरसंक्षयम् ॥ ४५ ॥ उस समय एक ही क्षणमें अर्जुनके सारे बाण समाप्त हो चले। उन बाणोंका इस प्रकार विनाश देखकर उनके मनमें बड़ा भय समा गया ॥ ४५ ॥ चिन्तयामास जिष्णुस्तु भगवन्तं हुताशनम् । पुरस्तादक्षयौ दत्तौ तूणौ येनास्य खाण्डवे ॥ ४६ ॥ विजयी अर्जुनने उस समय भगवान् अग्निदेवका चिन्तन किया, जिन्होंने खाण्डववनमें प्रत्यक्ष दर्शन देकर उन्हें दो अक्षय तूणीर प्रदान किये थे ॥ ४६ ॥ किं नु मोक्ष्यामि धनुषा यन्मे बाणाः क्षयं गताः । अयं च पुरुषः कोऽपि बाणान् ग्रसति सर्वशः ॥ ४७ ॥ हत्वा चैनं धनुष्कोट्या शूलाग्रेणेव कुञ्जरम् । नयामि दण्डधारस्य यमस्य सदनं प्रति ॥ ४८ ॥ वे मन-ही-मन सोचने लगे, ‘मेरे सारे बाण नष्ट हो गये, अब मैं धनुषसे क्या चलाऊँगा। यह कोई अद्भुत पुरुष है, जो मेरे सारे बाणोंको खाये जा रहा है। अच्छा, अब मैं शूलके अग्रभागसे घायल किये जानेवाले हाथीकी भाँति इसे धनुषकी कोटि (नोक)-से मारकर दण्डधारी यमराजके लोकमें पहुँचा देता हूँ’ ॥ ४७-४८ ॥
प्रगृह्याथ धनुष्कोट्या ज्यापाशेनावकृष्य च । मुष्टिभिश्चापि हतवान् वज्रकल्पैर्महाद्युतिः ॥ ४९ ॥ ऐसा विचारकर महातेजस्वी अर्जुनने किरातको अपने धनुषकी कोटिसे पकड़कर उसकी प्रत्यञ्चामें उसके शरीरको फँसाकर खींचा और वज्रके समान दुःसह मुष्टिप्रहारसे पीड़ित करना प्रारम्भ किया ॥ ४९ ॥
सम्प्रयुद्धो धनुष्कोट्या कौन्तेयः परवीरहा । तदप्यस्य धनुर्दिव्यं जग्राह गिरिगोचरः ॥ ५० ॥ शत्रु-वीरोंका संहार करनेवाले कुन्तीकुमार अर्जुनने जब धनुषकी कोटिसे प्रहार किया, तब उस पर्वतीय किरातने अर्जुनके उस दिव्य धनुषको भी अपनेमें लीन कर लिया ॥ ५० ॥
ततोऽर्जुनो ग्रस्तधनुः खड्गपाणिरतिष्ठत । युद्धस्यान्तमभीप्सन् वै वेगेनाभिजगाम तम् ॥ ५१ ॥ तदनन्तर धनुषके ग्रस्त हो जानेपर अर्जुन हाथमें तलवार लेकर खड़े हो गये और युद्धका अन्त कर देनेकी इच्छासे वेगपूर्वक उसपर आक्रमण किया ॥ ५१ ॥
तस्य मूर्ध्नि शितं खड्गमसक्तं पर्वतेष्वपि । मुमोच भुजवीर्येण विक्रम्य कुरुनन्दनः ॥ ५२ ॥ उनकी वह तलवार पर्वतोंपर भी कुण्ठित नहीं होती थी। कुरुनन्दन अर्जुनने अपने भुजाओंकी पूरी शक्ति लगाकर किरातके मस्तकपर उस तीक्ष्ण धारवाली तलवारसे वार किया ॥ ५२ ॥
तस्य मूर्धानमासाद्य पफालासिवरो हि सः । ततो वृक्षैः शिलाभिश्च योधयामास फाल्गुनः ॥ ५३ ॥ परंतु उसके मस्तकसे टकराते ही वह उत्तम तलवार टूक-टूक हो गयी। तब अर्जुनने वृक्षों और शिलाओंसे युद्ध करना आरम्भ किया ॥ ५३ ॥
तदा वृक्षान् महाकायः प्रत्यगृह्णादथो शिलाः । किरातरूपी भगवांस्ततः पार्थो महाबलः ॥ ५४ ॥ मुष्टिभिर्वज्रसंकाशैर्धूममुत्पादयन् मुखे । प्रजहार दुराधर्षे किरातसमरूपिणि ॥ ५५ ॥ तब विशालकाय किरातरूपी भगवान् शंकरने उन वृक्षों और शिलाओंको भी ग्रहण कर लिया। यह देखकर महाबली कुन्तीकुमार अपने वज्रतुल्य मुक्कोंसे दुर्धर्ष किरात-सदृश रूपवाले भगवान् शिवपर प्रहार करने लगे। उस समय क्रोधके आवेशसे अर्जुनके मुखसे धूम प्रकट हो रहा था ॥ ५४-५५ ॥
ततः शक्राशनिसमैर्मुष्टिभिर्भृशदारुणैः । किरातरूपी भगवानर्दयामास फाल्गुनम् ॥ ५६ ॥
तदनन्तर किरातरूपी भगवान् शिव भी अत्यन्त दारुण और इन्द्रके वज्रके समान दुःसह मुक्कोंसे मारकर अर्जुनको पीड़ा देने लगे ॥ ५६ ॥ ततश्चटचटाशब्दः सुघोरः समजायत । पाण्डवस्य च मुष्टीनां किरातस्य च युध्यतः ॥ ५७ ॥ फिर तो घमासान युद्धमें लगे हुए पाण्डुनन्दन अर्जुन तथा किरातरूपी शिवके मुक्कोंका एक-दूसरेके शरीरपर प्रहार होनेसे बड़ा भयंकर 'चट-चट' शब्द होने लगा ॥ ५७ ॥ सुमुहूर्तं तु तद् युद्धमभवल्लोमहर्षणम् । भुजप्रहारसंयुक्तं वृत्रवासवयोरिव ॥ ५८ ॥ वृत्रासुर और इन्द्रके समान उन दोनोंका वह रोमांचकारी बाहुयुद्ध दो घड़ीतक चलता रहा ॥ ५८ ॥ जघानाथ ततो जिष्णुः किरातमुरसा बली । पाण्डवं च विचेष्टं तं किरातोऽप्यहनद् बली ॥ ५९ ॥ तत्पश्चात् बलवान् वीर अर्जुनने अपनी छातीसे किरातको बड़े जोरसे मारा, तब महाबली किरातने भी विपरीत चेष्टा करनेवाले पाण्डुनन्दन अर्जुनपर आघात किया ॥ ५९ ॥ तयोर्भुजविनिष्पेषात् संघर्षेणोरसोस्तथा । समजायत गात्रेषु पावकोऽङ्गारधूमवान् ॥ ६० ॥ उन दोनोंकी भुजाओंके टकराने और वक्षःस्थलोंके संघर्षसे उनके अंगोंमें धूम और चिनगारियोंके साथ आग प्रकट हो जाती थी ॥ ६० ॥ तत एनं महादेवः पीड्य गात्रैः सुपीडितम् । तेजसा व्यक्रमद् रोषाच्चेतस्तस्य विमोहयन् ॥ ६१ ॥ तदनन्तर! महादेवजीने अपने अंगोंसे दबाकर अर्जुनको अच्छी तरह पीड़ा दी और उनके चित्तको मूर्च्छित-सा करते हुए उन्होंने तेज तथा रोषसे उनके ऊपर अपना पराक्रम प्रकट किया ॥ ६१ ॥ ततोऽभिपीडितैर्गात्रैः पिण्डीकृत इवाबभौ । फाल्गुनो गात्रसंरुद्धो देवदेवेन भारत ॥ ६२ ॥ भारत! तदनन्तर देवाधिदेव महादेवजीके अंगोंसे अवरुद्ध हो अर्जुन अपने पीड़ित अवयवोंके साथ मिट्टीके लोंदे-से दिखायी देने लगे ॥ ६२ ॥ निरुच्छ्वासोऽभवच्चैव संनिरुद्धो महात्मना । पपात भूम्यां निश्चेष्टो गतसत्त्व इवाभवत् ॥ ६३ ॥ महात्मा भगवान् शंकरके द्वारा भलीभाँति नियन्त्रित हो जानेके कारण अर्जुनकी श्वासक्रिया बंद हो गयी। वे निष्प्राणकी भाँति चेष्टाहीन होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ६३ ॥
स मुहूर्तं तथा भूत्वा सचेताः पुनरुत्थितः ।
रुधिरेणाप्लुताङ्गस्तु पाण्डवो भृशदुःखितः ॥ ६४ ॥
दो घड़ीतक उसी अवस्थामें पड़े रहनेके पश्चात् जब अर्जुनको चेत हुआ, तब वे उठकर खड़े हो गये। उस समय उनका सारा शरीर खूनसे लथपथ हो रहा था और वे बहुत दुःखी हो गये थे ॥ ६४ ॥
शरण्यं शरणं गत्वा भगवन्तं पिनाकिनम् ।
मृण्मयं स्थण्डिलं कृत्वा माल्येनापूजयद् भवम् ॥ ६५ ॥
तब वे शरणागतवत्सल पिनाकधारी भगवान् शिवकी शरणमें गये और मिट्टीकी वेदी बनाकर उसीपर पार्थिव शिवकी स्थापना करके पुष्पमालाके द्वारा उनका पूजन किया ॥ ६५ ॥
तच्च माल्यं तदा पार्थः किरातशिरसि स्थितम् ।
अपश्यत् पाण्डवश्रेष्ठो हर्षेण प्रकृतिं गतः ॥ ६६ ॥
कुन्तीकुमारने जो माला पार्थिव शिवपर चढ़ायी थी, वह उन्हें किरातके मस्तकपर पड़ी दिखायी दी। यह देखकर पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुन हर्षसे उल्लसित हो अपने आपेमें आ गये ॥ ६६ ॥
पपात पादयोस्तस्य ततः प्रीतोऽभवद् भवः ।
उवाच चैनं वचसा मेघगम्भीरगीर्हरः ।
जातविस्मयमालोक्य तपःक्षीणाङ्गसंहतिम् ॥ ६७ ॥
और किरातरूपी भगवान् शंकरके चरणोंमें गिर पड़े। उस समय तपस्याके कारण उनके समस्त अवयव क्षीण हो रहे थे और वे महान् आश्चर्यमें पड़ गये थे, उन्हें इस अवस्थामें देखकर सर्वपापहारी भगवान् भव उनपर बहुत प्रसन्न हुए और मेघके समान गम्भीर वाणीमें बोले ॥ ६७ ॥
भव उवाच
भो भोः फाल्गुन तुष्टोऽस्मि कर्मणाप्रतिमेन ते ।
शौर्येणानेन धृत्या च क्षत्रियो नास्ति ते समः ॥ ६८ ॥
**भगवान् शिवने कहा—**फाल्गुन! मैं तुम्हारे इस अनुपम पराक्रम, शौर्य और धैर्यसे बहुत संतुष्ट हूँ। तुम्हारे समान दूसरा कोई क्षत्रिय नहीं है ॥ ६८ ॥
समं तेजश्च वीर्यं च ममाद्य तव चानघ ।
प्रीतस्तेऽहं महाबाहो पश्य मां भरतर्षभ ॥ ६९ ॥
अनघ! तुम्हारा तेज और पराक्रम आज मेरे समान सिद्ध हुआ है। महाबाहु भरतश्रेष्ठ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। मेरी ओर देखो ॥ ६९ ॥
ददामि ते विशालाक्ष चक्षुः पूर्वऋषिर्भवान् ।