महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
१२६-
षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
राजा मान्धाताकी उत्पत्ति और संक्षिप्त चरित्र
युधिष्ठिर उवाच
मान्धाता राजशार्दूलस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ।
कथं जातो महाब्रह्मन् यौवनाश्वो नृपोत्तमः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— ब्राह्मणश्रेष्ठ! युवनाश्वके पुत्र नृपश्रेष्ठ मान्धाता तीनों लोकोंमें विख्यात थे। उनकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई थी? ॥ १ ॥
कथं चैनां परां काष्ठां प्राप्तवानमितद्युतिः ।
यस्य लोकास्त्रयो वश्या विष्णोरिव महात्मनः ॥ २ ॥
अमित तेजस्वी मान्धाताने यह सर्वोच्च स्थिति कैसे प्राप्त कर ली थी? सुना है, परमात्मा विष्णुके समान महाराज मान्धाताके वशमें तीनों लोक थे ॥ २ ॥
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं चरितं तस्य धीमतः ।
(सत्यकीर्तेर्हि मान्धातुः कथ्यमानं त्वयानघ ।)
यथा मान्धातृशब्दश्च तस्य शक्रसमद्युतेः ।
जन्म चाप्रतिवीर्यस्य कुशलो ह्यसि भाषितुम् ॥ ३ ॥
निष्पाप महर्षे! मैं आपके मुखसे उन सत्यकीर्ति एवं बुद्धिमान् राजा मान्धाताका वह सब चरित्र सुनना चाहता हूँ। इन्द्रके समान तेजस्वी और अनुपम पराक्रमी उन नरेशका 'मान्धाता' नाम कैसे हुआ? और उनके जन्मका वृत्तान्त क्या है? बताइये; क्योंकि आप ये सब बातें बतानेमें कुशल हैं ॥ ३ ॥
लोमश उवाच
शृणुष्वावहितो राजन् राज्ञस्तस्य महात्मनः ।
यथा मान्धातृशब्दो वै लोकेषु परिगीयते ॥ ४ ॥
लोमशजीने कहा— राजन्! लोकमें उन महामना नरेशका 'मान्धाता' नाम कैसे प्रचलित हुआ? यह बतलाता हूँ, ध्यान देकर सुनो ॥ ४ ॥
इक्ष्वाकुवंशप्रभवो युवनाश्वो महीपतिः ।
सोऽयजत् पृथिवीपालः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ॥ ५ ॥
इक्ष्वाकुवंशमें युवनाश्व नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। भूपाल युवनाश्वने प्रचुर दक्षिणावाले बहुत-से यज्ञोंका अनुष्ठान किया ॥ ५ ॥
अश्वमेधसहस्रं च प्राप्य धर्मभृतां वरः ।
अन्यैश्च क्रतुभिर्मुख्यैरयजत् स्वाप्तदक्षिणैः ॥ ६ ॥
वे धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ थे। उन्होंने एक सहस्र अश्वमेधयज्ञ पूर्ण करके बहुत दक्षिणाके साथ दूसरे-दूसरे श्रेष्ठ यज्ञोंद्वारा भी भगवान्की आराधना की ॥ ६ ॥ अनपत्यस्तु राजर्षिः स महात्मा महाव्रतः। मन्त्रिष्वाधाय तद् राज्यं वननित्यो बभूव ह ॥ ७ ॥ शास्त्रदृष्टेन विधिना संयोज्यात्मानमात्मवान्। स कदाचिन्नृपो राजन्नुपवासेन दुःखितः ॥ ८ ॥ पिपासाशुष्कहृदयः प्रविवेशाश्रमं भृगोः। तामेव रात्रिं राजेन्द्र महात्मा भृगुनन्दनः ॥ ९ ॥ इष्टिं चकार सौद्युम्नेर्महर्षिः पुत्रकारणात् । सम्भृतो मन्त्रपूतेन वारिणा कलशो महान् ॥ १० ॥ वे महामना राजर्षि महान् व्रतका पालन करनेवाले थे तो भी उनके कोई संतान नहीं हुई। तब वे मनस्वी नरेश राज्यका भार मन्त्रियोंपर रखकर शास्त्रीय विधिके अनुसार अपने-आपको परमात्म-चिन्तनमें लगाकर सदा वनमें ही रहने लगे। एक दिनकी बात है, राजा युवनाश्व उपवासके कारण दुःखित हो गये। प्याससे उनका हृदय सूखने लगा। उन्होंने जल पीनेकी इच्छासे रातके समय महर्षि भृगुके आश्रममें प्रवेश किया। राजेन्द्र! उसी रातमें महात्मा भृगुनन्दन महर्षि च्यवनने सुद्युम्नकुमार युवनाश्वको पुत्रकी प्राप्ति करानेके लिये एक इष्टि की थी। उस इष्टिके समय महर्षिने मन्त्रपूत जलसे एक बहुत बड़े कलशको भरकर रख दिया था ॥ ७—१० ॥ तत्रातिष्ठत राजेन्द्र पूर्वमेव समाहितः । यत् प्राश्य प्रसवेत् तस्य पत्नी शक्रसमं सुतम् ॥ ११ ॥ महाराज! वह कलशका जल पहलेसे ही आश्रमके भीतर इस उद्देश्यसे रखा गया था कि उसे पीकर राजा युवनाश्वकी रानी इन्द्रके समान शक्तिशाली पुत्रको जन्म दे सके ॥ ११ ॥ तं न्यस्य वेद्यां कलशं सुषुपुस्ते महर्षयः। रात्रिजागरणाच्छ्रान्तान् सौद्युम्निः समतीत्य तान् ॥ १२ ॥ उस कलशको वेदीपर रखकर सभी महर्षि सो गये थे। रातमें देरतक जागनेके कारण वे सब-के-सब थके हुए थे। युवनाश्व उन्हें लाँघकर आगे बढ़ गये ॥ १२ ॥ शुष्ककण्ठः पिपासार्तः पानीयार्थी भृशं नृपः। तं प्रविश्याश्रमं शान्तः पानीयं सोऽभ्ययाचत ॥ १३ ॥ वे प्याससे पीड़ित थे। उनका कण्ठ सूख गया था। पानी पीनेकी अत्यन्त अभिलाषासे वे उस आश्रमके भीतर गये और शान्तभावसे जलके लिये याचना करने लगे ॥ १३ ॥ तस्य श्रान्तस्य शुष्केण कण्ठेन क्रोशतस्तदा। नाश्रौषीत् कश्चन तदा शकुनेरिव वाशतः ॥ १४ ॥
राजा थककर सूखे कण्ठसे पानीके लिये चिल्ला रहे थे, परंतु उस समय चें-चें करनेवाले पक्षीकी भाँति उनकी चीख-पुकार कोई भी न सुन सका ॥ १४ ॥
ततस्तं कलशं दृष्ट्वा जलपूर्णं स पार्थिवः ।
अभ्यद्रवत वेगेन पीत्वा चाम्भो व्यवासृजत् ॥ १५ ॥
तदनन्तर जलसे भरे हुए पूर्वोक्त कलशपर उनकी दृष्टि पड़ी। देखते ही वे बड़े वेगसे उसकी ओर दौड़े और (इच्छानुसार) पीकर उन्होंने बचे हुए जलको वहीं गिरा दिया ॥ १५ ॥
स पीत्वा शीतलं तोयं पिपासार्तो महीपतिः ।
निर्वाणमगमद् धीमान् सुसुखी चाभवत् तदा ॥ १६ ॥
राजा युवनाश्व प्याससे बड़ा कष्ट पा रहे थे। वह शीतल जल पीकर उन्हें बड़ी शान्ति मिली। वे बुद्धिमान् नरेश उस समय जल पीनेसे बहुत सुखी हुए ॥ १६ ॥
ततस्ते प्रत्यबुध्यन्त मुनयः सतपोधनाः ।
निस्तोयं तं च कलशं ददृशुः सर्व एव ते ॥ १७ ॥
तत्पश्चात् तपोधन च्यवन मुनिके सहित सब मुनि जाग उठे। उन सबने उस कलशको जलसे शून्य देखा ॥
कस्य कर्मेदमिति ते पर्यपृच्छन् समागताः ।
युवनाश्वो ममेत्येवं सत्यं समभिपद्यत ॥ १८ ॥
फिर तो वे सब एकत्र हो गये और एक-दूसरेसे पूछने लगे—'यह किसका कर्म है?' युवनाश्वने सामने आकर कहा—'यह मेरा ही कर्म है।' इस प्रकार उन्होंने सत्यको स्वीकार कर लिया ॥ १८ ॥
न युक्तमिति तं प्राह भगवान् भार्गवस्तदा ।
सुतार्थं स्थापिता ह्यापस्तपसा चैव सम्भृताः ॥ १९ ॥
मया ह्यात्राहितं ब्रह्म तप आस्थाय दारुणम् ।
पुत्रार्थं तव राजर्षे महाबलपराक्रम ॥ २० ॥
तब भगवान् च्यवनने कहा—'महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न राजर्षि युवनाश्व! यह तुमने ठीक नहीं किया। इस कलशमें मैंने तुम्हें ही पुत्र प्रदान करनेके लिये तपस्यासे संस्कारयुक्त किया हुआ जल रखा था और कठोर तपस्या करके उसमें ब्रह्मतेजकी स्थापना की थी ॥ १९-२० ॥
महाबलो महावीर्यस्तपोबलसमन्वितः ।
यः शक्रमपि वीर्येण गमयेद् यमसादनम् ॥ २१ ॥
अनेन विधिना राजन् मयैतदुपपादितम् ।
अब्भक्षणं त्वया राजन् न युक्तं कृतमद्य वै ॥ २२ ॥
‘राजन्! उक्त विधिसे इस जलको मैंने ऐसा शक्तिसम्पन्न कर दिया था कि इसको पीनेसे एक महाबली, महापराक्रमी और तपोबल सम्पन्न पुत्र उत्पन्न हो जो अपने बल-पराक्रमसे देवराज इन्द्रको भी यमलोक पहुँचा सके। उसी जलको तुमने आज पी लिया, यह अच्छा नहीं किया ।। २१-२२ ।।
न त्वद्य शक्यमस्माभिरेतत् कर्तुमतोऽन्यथा।
नूनं दैवकृतं ह्येतद् यदेवं कृतवानसि ।। २३ ।।
‘अब हमलोग इसके प्रभावको टालने या बदलनेमें असमर्थ हैं। तुमने जो ऐसा कार्य कर डाला है, इसमें निश्चय ही दैवकी प्रेरणा है ।। २३ ।।
पिपासितेन याः पीता विधिमन्त्रपुरस्कृताः।
आपस्त्वया महाराज मत्तपोवीर्यसम्भृताः ।। २४ ।।
ताभ्यस्त्वमात्मना पुत्रमीदृशं जनयिष्यसि ।
विधास्यामो वयं तत्र तवेष्टिं परमाद्भुताम् ।। २५ ।।
यथा शक्रसमं पुत्रं जनयिष्यसि वीर्यवान् ।
गर्भधारणजं वापि न खेदं समवाप्स्यसि ।। २६ ।।
‘महाराज! तुमने प्याससे व्याकुल होकर जो मेरे तपोबलसे संचित तथा विधिपूर्वक मन्त्रसे अभिमन्त्रित जलको पी लिया है, उसके कारण तुम अपने ही पेटसे तथाकथित इन्द्रविजयी पुत्रको जन्म दोगे। इस उद्देश्यकी सिद्धिके लिये हम तुम्हारी इच्छाके अनुरूप अत्यन्त अद्भुत यज्ञ करायेंगे जिससे तुम स्वयं भी शक्तिशाली रहकर इन्द्रके समान पराक्रमी पुत्र उत्पन्न कर सकोगे और गर्भधारणजनित कष्टका भी तुम्हें अनुभव न होगा’ ।। २४—२६ ।।
ततो वर्षशते पूर्णे तस्य राज्ञो महात्मनः ।
वामं पार्श्वं विनिर्भिद्य सुतः सूर्य इव स्थितः ।। २७ ।।
निष्चक्राम महातेजा न च तं मृत्युराविशत् ।
युवनाश्वं नरपतिं तदद्भुतमिवाभवत् ।। २८ ।।
तदनन्तर पूरे सौ वर्ष बीतनेपर उन महात्मा राजा युवनाश्वकी बायीं कोख फाड़कर एक सूर्यके समान महातेजस्वी बालक बाहर निकला तथा राजाकी मृत्यु भी नहीं हुई। यह एक अद्भुत-सी बात हुई ।। २७-२८ ।।
ततः शक्रो महातेजास्तं दिदृक्षुरुपागमत् ।
ततो देवा महेन्द्रं तमपृच्छन् धास्यतीति किम् ।। २९ ।।
तत्पश्चात् महातेजस्वी इन्द्र उस बालकको देखनेके लिये वहाँ आये। उस समय देवताओंने महेन्द्रसे पूछा—यह बालक क्या पीयेगा? ।। २९ ।।
प्रदेशिनीं ततोऽस्यास्ये शक्रः समभिसंदधे । मामयं धास्यतीत्येवं भाषिते चैव वज्रिणा ।। ३० ।। मान्धातेति च नामास्य चक्रुः सेन्द्रा दिवौकसः ।। ३१ ।। प्रदेशिनीं शक्रदत्तामास्वाद्य स शिशुस्तदा । अवर्धत महातेजाः किष्कून् राजंस्त्रयोदश ।। ३२ ।। तब इन्द्रने अपनी तर्जनी अंगुली बालकके मुँहमें डाल दी और कहा—'माम् अयं धाता।' 'अर्थात् यह मुझे ही पीयेगा' वज्रधारी इन्द्रके ऐसा कहनेपर इन्द्र आदि सब देवताओंने मिलकर उस बालकका नाम 'मान्धाता' रख दिया। राजन्! इन्द्रकी दी हुई प्रदेशिनी (तर्जनी) अंगुलिका रसास्वादन करके वह महातेजस्वी शिशु तेरह बित्ता बढ़ गया ।। ३०—३२ ।।
वेदास्तं सधनुर्वेदा दिव्यान्यस्त्राणि चेश्वरम् । उपतस्थुर्महाराज ध्यातमात्रस्य सर्वशः ।। ३३ ।। महाराज! उस समय शक्तिशाली मान्धाताके चिन्तन करनेमात्रसे ही धनुर्वेदसहित सम्पूर्ण वेद और दिव्य अस्त्र (ईश्वरकी कृपासे) उपस्थित हो गये ।। ३३ ।।
आजगवं नाम धनुः शतः शृङ्गोद्भवाश्च ये । अभैद्यं कवचं चैव सद्यस्तमुपशिश्रियुः ।। ३४ ।।
आजगव नामक धनुष, सींगके बने हुए बाण और अभेद्य कवच—सभी तत्काल उनकी सेवामें आ गये।। सोऽभिषिक्तो मघवता स्वयं शक्रेण भारत। धर्मेण व्यजयल्लोकांस्त्रीन् विष्णुरिव विक्रमैः।। ३५ ।। भारत! साक्षात् देवराज इन्द्रने मान्धाताका राज्याभिषेक किया। भगवान् विष्णुने जैसे तीन पगोंद्वारा त्रिलोकीको नाप लिया था, उसी प्रकार मान्धाताने भी धर्मके द्वारा तीनों लोकोंको जीत लिया।। ३५ ।। तस्याप्रतिहतं चक्रं प्रावर्तत महात्मनः। रत्नानि चैव राजर्षिं स्वयमेवोपतस्थिरे ।। ३६ ।। उन महात्मा नरेशका शासनचक्र सर्वत्र बेरोक-टोक चलने लगा। सारे रत्न राजर्षि मान्धाताके यहाँ स्वयं उपस्थित हो जाते थे।। ३६ ।। तस्यैवं वसुसम्पूर्णा वसुधा वसुधाधिप। तेनेष्टं विविधैर्यज्ञैर्बहुभिः स्वाप्तदक्षिणैः ।। ३७ ।। युधिष्ठिर! इस प्रकार उनके लिये यह सारी पृथ्वी धन-रत्नोंसे परिपूर्ण थी। उन्होंने पर्याप्त दक्षिणावाले नाना प्रकारके बहुसंख्यक यज्ञोंद्वारा भगवान्की समाराधना की।। ३७ ।। चितचैत्यो महातेजा धर्मान् प्राप्य च पुष्कलान्। शक्रस्यार्धासनं राजँल्लब्धवानमितद्युतिः ।। ३८ ।। राजन्! महातेजस्वी एवं परम कान्तिमान् राजा मान्धाताने यज्ञमण्डपोंका निर्माण करके पर्याप्त धर्मका सम्पादन किया और उसीके फलसे स्वर्गलोकमें इन्द्रका आधा सिंहासन प्राप्त कर लिया।। ३८ ।। एकाहात् पृथिवी तेन धर्मनित्येन धीमता। विजिता शासनादेव सरत्नाकरपत्तना ।। ३९ ।। उन धर्मपरायण बुद्धिमान् नरेशने केवल शासनमात्रसे एक ही दिनमें समुद्र, खान और नगरोंसहित सारी पृथ्वीपर विजय प्राप्त कर ली।। ३९ ।। तस्य चैत्यैर्महाराज ऋतूनां दक्षिणावताम्। चतुरन्ता मही व्याप्ता नासीत् किंचिदनावृतम् ।। ४० ।। महाराज! उनके दक्षिणायुक्त यज्ञोंके चैत्यों (यज्ञमण्डपों)-से चारों ओरकी पृथ्वी भर गयी थी, कहीं कोई भी स्थान ऐसा नहीं था जो उनके यज्ञमण्डपोंसे घिरा न हो।। ४० ।। तेन पद्मसहस्राणि गवां दश महात्मना। ब्राह्मणानां महाराज दत्तानीति प्रचक्षते ।। ४१ ।। महाराज! महात्मा राजा मान्धाताने दस हजार पद्म गौएँ ब्राह्मणोंको दानमें दी थीं, ऐसा जानकार-लोग कहते हैं।। ४१ ।।
तेन द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां महात्मना । वृष्टं सस्यविवृद्ध्यर्थं मिषतो वज्रपाणिनः ॥ ४२ ॥ उन महामना नरेशने बारह वर्षोंतक होनेवाली अनावृष्टिके समय वज्रधारी इन्द्रके देखते-देखते खेतीकी उन्नतिके लिये स्वयं पानीकी वर्षा की थी ॥ ४२ ॥
तेन सोमकुलोत्पन्नो गान्धाराधिपतिर्महान् । गर्जन्निव महामेघः प्रमथ्य निहतः शरैः ॥ ४३ ॥ उन्होंने महामेघके समान गर्जते हुए महापराक्रमी चन्द्रवंशी गान्धारराजको बाणोंसे घायल करके मार डाला था ॥ ४३ ॥
प्रजाश्चतुर्विधास्तेन त्राता राजन् कृतात्मना । तेनात्मतपसा लोकास्तापिताश्चातितेजसा ॥ ४४ ॥ युधिष्ठिर! वे अपने मनको वशमें रखते थे। उन्होंने अपने तपोबलसे देवता, मनुष्य, तिर्यक् और स्थावर—चार प्रकारकी प्रजाकी रक्षा की थी; साथ ही अपने अत्यन्त तेजसे सम्पूर्ण लोकोंको संतप्त कर दिया था ॥
तस्यैतद् देवयजनं स्थानमादित्यवर्चसः । पश्य पुण्यतमे देशे कुरुक्षेत्रस्य मध्यतः ॥ ४५ ॥ (तथा त्वमपि राजेन्द्र मान्धातेव महीपतिः । धर्मं कृत्वा महीं रक्षन् स्वर्गलोकमवाप्स्यसि ॥) सूर्यके समान तेजस्वी उन्हीं महाराज मान्धाताके देवयज्ञका यह स्थान है जो कुरुक्षेत्रकी सीमाके भीतर परम पवित्र प्रदेशमें स्थित है, इसका दर्शन करो। राजेन्द्र! महाराज मान्धाताकी भाँति तुम भी धर्मपूर्वक पृथ्वीकी रक्षा करते रहनेपर अक्षय स्वर्गलोक प्राप्त कर लोगे ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं मान्धातुश्चरितं महत् । जन्म चाग्र्यं महीपाल यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ ४६ ॥ भूपाल! तुम मुझसे जिसके विषयमें पूछ रहे थे, वह मान्धाताका उत्तम जन्मवृत्तान्त और उनका महान् चरित्र सब कुछ तुम्हें सुना दिया ॥ ४६ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तः स कौन्तेयो लोमशेन महर्षिणा । पप्रच्छानन्तरं भूयः सोमकं प्रति भारत ॥ ४७ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—भारत! महर्षि लोमशके ऐसा कहनेपर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने पुनः सोमकके विषयमें प्रश्न किया ॥ ४७ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां मान्धातोपाख्याने षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें मान्धातोपाख्यानविषयक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२६ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४८ १/३ श्लोक हैं)
सोमक और जन्तुका उपाख्यान
सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
सोमक और जन्तुका उपाख्यान
युधिष्ठिर उवाच
कथं वीर्यः स राजाभूत् सोमको वदतां वर ।
कर्माण्यस्य प्रभावं च श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**वक्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! राजा सोमकका बल-पराक्रम कैसा था? मैं उनके कर्म और प्रभावका यथार्थ वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
लोमश उवाच
युधिष्ठिरासीन्नृपतिः सोमको नाम धार्मिकः ।
तस्य भार्याशतं राजन् सदृशीनामभूत् तदा ॥ २ ॥
**लोमशजीने कहा—**युधिष्ठिर! सोमक नामसे प्रसिद्ध एक धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। उनकी सौ रानियाँ थीं। वे सभी रूप-अवस्था आदिमें प्रायः एक समान थीं ॥ २ ॥
स वै यत्नेन महता तासु पुत्रं महीपतिः ।
कंचिन्नासादयामास कालेन महता ह्यपि ॥ ३ ॥
परंतु दीर्घकालतक महान् प्रयत्न करते रहनेपर भी वे अपनी उन रानियोंके गर्भसे कोई पुत्र न प्राप्त कर सके ॥ ३ ॥
कदाचित् तस्य वृद्धस्य घटमानस्य यत्नतः ।
जन्तुर्नाम सुतस्तस्मिन् स्त्रीशते समजायत ॥ ४ ॥
राजा सोमक वृद्धावस्थामें भी इसके लिये निरन्तर यत्नशील थे; अतः किसी समय उनकी सौ स्त्रियोंमेंसे किसी एकके गर्भसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम था जन्तु ॥ ४ ॥
तं जातं मातरः सर्वाः परिवार्य समासतः ।
सततं पृष्ठतः कृत्वा कामभोगान् विशाम्पते ॥ ५ ॥
राजन्! उसके जन्म लेनेके पश्चात् सभी माताएँ काम-भोगकी ओरसे मुँह मोड़कर सदा उसी बच्चेके पास उसे सब ओरसे घेरकर बैठी रहती थीं ॥ ५ ॥
ततः पिपीलिका जन्तुं कदाचिददशत् स्फिचि ।
स दष्टो व्यनदन्नादं तेन दुःखेन बालकः ॥ ६ ॥
एक दिन एक चींटीने जन्तुके कटिभागमें डँस लिया। चींटीके काटनेपर उसकी पीड़ासे विकल हो जन्तु सहसा रोने लगा ॥ ६ ॥
ततस्ता मातरः सर्वाः प्राक्रोशन् भृशदुःखिताः ।
प्रवार्य जन्तुं सहसा स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥ ७ ॥ इससे उसकी सब माताएँ भी सहसा जन्तुके शरीरसे चींटीको हटाकर अत्यन्त दुखी हो जोर-जोरसे रोने लगीं। उनके रोदनकी वह सम्मिलित ध्वनि बड़ी भयंकर प्रतीत हुई ॥ ७ ॥ तमार्तनादं सहसा शुश्राव स महीपतिः । अमात्यपर्षदो मध्ये उपविष्टः सहर्त्विजा ॥ ८ ॥ उस समय राजा सोमक पुरोहितके साथ मन्त्रियोंकी सभामें बैठे थे। उन्होंने अकस्मात् वह आर्तनाद सुना ॥ ततः प्रस्थापयामास किमेतदिति पार्थिवः । तस्मै क्षत्ता यथावृत्तमाचचक्षे सुतं प्रति ॥ ९ ॥ सुनकर राजाने 'यह क्या हो गया?' इस बातका पता लगानेके लिये द्वारपालको भेजा। द्वारपालने लौटकर राजकुमारसे सम्बन्ध रखनेवाली पूर्वोक्त घटनाका यथावत् वृत्तान्त कह सुनाया ॥ ९ ॥ त्वरमाणः स चोत्थाय सोमकः सह मन्त्रिभिः । प्रविश्यान्तःपुरं पुत्रमाश्वासयदरिंदमः ॥ १० ॥ तब शत्रुदमन राजा सोमकने मन्त्रियोंसहित उठकर बड़ी उतावलीके साथ अन्तःपुरमें प्रवेश किया और पुत्रको आश्वासन दिया ॥ १० ॥ सान्त्वयित्वा तु तं पुत्रं निष्क्रम्यान्तःपुरान्नृपः । ऋत्विजा सहितो राजन् सहामात्य उपाविशत् ॥ ११ ॥ बेटेको सान्त्वना देकर राजा अन्तःपुरसे बाहर निकले और पुरोहित तथा मन्त्रियोंके साथ पुनः मन्त्रणा-गृहमें जा बैठे ॥ ११ ॥
सोमक उवाच
धिगस्त्विहैकपुत्रत्वमपुत्रत्वं वरं भवेत् । नित्यातुरत्वाद् भूतानां शोक एवैकपुत्रता ॥ १२ ॥ उस समय सोमकने कहा— इस संसारमें किसी पुरुषके एक ही पुत्रका होना धिक्कारका विषय है। एक पुत्र होनेकी अपेक्षा तो पुत्रहीन रह जाना ही अच्छा है। एक ही संतान हो तो सब प्राणी उसके लिये सदा आकुल-व्याकुल रहते हैं, अतः एक पुत्रका होना शोक ही है ॥ इदं भार्याशतं ब्रह्मन् परीक्ष्य सदृशं प्रभो । पुत्रार्थिना मया वोढं न तासां विद्यते प्रजा ॥ १३ ॥ ब्रह्मन्! मैंने अच्छी तरह जाँच-बूझकर पुत्रकी इच्छासे अपने योग्य सौ स्त्रियोंके साथ विवाह किया, किंतु उनके कोई संतान नहीं हुई ॥ १३ ॥ एकः कथंचिदुत्पन्नः पुत्रो जन्तुरयं मम ।
यतमानासु सर्वासु किं नु दुःखमतः परम् ॥ १४ ॥ यद्यपि मेरी सभी रानियाँ संतानके लिये यत्नशील थीं, तथापि किसी तरह मेरे यही एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम जन्तु है। इससे बढ़कर दुःख और क्या हो सकता है? ॥ १४ ॥
वयश्च समतीतं मे सभार्यस्य द्विजोत्तम । आसां प्राणाः समायत्ता मम चात्रैकपुत्रके ॥ १५ ॥ द्विजश्रेष्ठ! मेरी तथा इन रानियोंकी अधिक अवस्था बीत गयी, किंतु अभीतक मेरे और उन पत्नियोंके प्राण केवल इस एक पुत्रमें ही बसते हैं ॥ १५ ॥
स्यात्तु कर्म तथा युक्तं येन पुत्रशतं भवेत् । महता लघुना वापि कर्मणा दुष्करेण वा ॥ १६ ॥ क्या कोई ऐसा उपयोगी कर्म हो सकता है जिससे मेरे सौ पुत्र हो जायँ। भले ही वह कर्म महान् हो, लघु हो अथवा अत्यन्त दुष्कर हो ॥ १६ ॥
ऋत्विगुवाच
अस्ति चैतादृशं कर्म येन पुत्रशतं भवेत् । यदि शक्नोषि तत् कर्तुमथ वक्ष्यामि सोमक ॥ १७ ॥ **पुरोहितने कहा—**सोमक! ऐसा कर्म है जिससे तुम्हें सौ पुत्र हो सकते हैं। यदि तुम उसे कर सको तो बताऊँगा ॥ १७ ॥
सोमक उवाच
कार्यं वा यदि वाकार्यं येन पुत्रशतं भवेत् । कृतमेवेति तद् विद्धि भगवान् प्रब्रवीतु मे ॥ १८ ॥ **सोमकने कहा—**भगवन्! आप वह कर्म मुझे बताइये जिससे सौ पुत्र हो सकते हैं। वह करनेयोग्य हो या न हो, मेरेद्वारा उसे किया हुआ ही जानिये ॥ १८ ॥
ऋत्विगुवाच
यजस्व जन्तुना राजंस्त्वं मया वितते क्रतौ । ततः पुत्रशतं श्रीमद् भविष्यत्यचिरेण ते ॥ १९ ॥ **पुरोहितने कहा—**राजन्! मैं एक यज्ञ आरम्भ करवाऊँगा, उसमें तुम अपने पुत्र जन्तुकी आहुति देकर यजन करो। इससे शीघ्र ही तुम्हें सौ परम सुन्दर पुत्र प्राप्त होंगे ॥ १९ ॥
वपायां हूयमानायां धूममाघ्राय मातरः । ततस्ताः सुमहावीर्याञ्जनयिष्यन्ति ते सुतान् ॥ २० ॥
जिस समय उसकी चर्बीकी आहुति दी जायगी उस समय उसके धूएँको सूँघ लेनेपर सब माताएँ (गर्भवती हो) आपके लिये अत्यन्त पराक्रमी पुत्रोंको जन्म देंगी ॥ २० ॥
तस्यामेव तु ते जन्तुर्भविता पुनरात्मजः ।
उत्तरे चास्य सौवर्णं लक्ष्म पार्श्वे भविष्यति ॥ २१ ॥
आपका पुत्र जन्तु पुनः अपनी माताके ही पेटसे उत्पन्न होगा। उस समय उसकी बायीं पसलीमें एक सुनहरा चिह्न होगा ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां जन्तूपाख्याने सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें जन्तूपाख्यानविषयक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२७ ॥
१२८-
अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
सोमकको सौ पुत्रोंकी प्राप्ति तथा सोमक और पुरोहितका समानरूपसे नरक और पुण्यलोकोंका उपभोग करना
सोमक उवाच
ब्रह्मन् यद् यद् यथा कार्यं तत् कुरुष्व तथा तथा ।
पुत्रकामतया सर्वं करिष्यामि वचस्तव ॥ १ ॥
**सोमकने कहा—**ब्रह्मन्! जो-जो कार्य जैसे-जैसे करना हो, वह उसी प्रकार कीजिये। मैं पुत्रकी कामनासे आपकी समस्त आज्ञाओंका पालन करूँगा॥ १ ॥
लोमश उवाच
ततः स याजयामास सोमकं तेन जन्तुना ।
मातरस्तु बलात् पुत्रमपाकर्षुः कृपान्विताः ॥ २ ॥
हा हताः स्मेति वाशन्त्यस्तीव्रशोकसमाहताः ।
रुदन्त्यः करुणं वापि गृहीत्वा दक्षिणे करे ॥ ३ ॥
सव्ये पाणौ गृहीत्वा तु याजकोऽपि स्म कर्षति ।
कुररीणामिवार्तानां समाकृष्य तु तं सुतम् ॥ ४ ॥
विशस्य चैनं विधिवद् वपामस्य जुहाव सः ।
वपायां हूयमानायां गन्धमाघ्राय मातरः ॥ ५ ॥
आर्ता निपेतुः सहसा पृथिव्यां कुरुनन्दन ।
सर्वाश्च गर्भानलभंस्ततस्ताः परमाङ्गनाः ॥ ६ ॥
**लोमशजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तब पुरोहितने राजा सोमकसे जन्तुकी बलि देकर किये जानेवाले यज्ञको प्रारम्भ करवाया। उस समय करुणामयी माताएँ अत्यन्त शोकसे व्याकुल हो ‘हाय! हम मारी गयीं’ ऐसा कहकर रोती हुई अपने पुत्र जन्तुको बलपूर्वक अपनी ओर खींच रही थीं। वे करुण स्वरमें रोती हुई बालकके दाहिने हाथको पकड़कर खींचती थीं और पुरोहितजी उसके बायें हाथको पकड़कर अपनी ओर खींच रहे थे। सब रानियाँ शोकसे आतुर हो कुररी पक्षीकी भाँति विलाप कर रही थीं और पुरोहितने उस बालकको छीनकर उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले तथा विधिपूर्वक उसकी चर्बियोंकी आहुति दी। कुरुनन्दन! चर्बीकी आहुतिके समय बालककी माताएँ धूमकी गन्ध सूँघकर सहसा शोकपीडित हो पृथ्वीपर गिर पड़ीं। तदनन्तर वे सब सुन्दरी रानियाँ गर्भवती हो गयीं ॥ २—६ ॥
ततो दशसु मासेषु सोमकस्य विशाम्पते ।
जज्ञे पुत्रशतं पूर्णं तासु सर्वासु भारत ॥ ७ ॥
युधिष्ठिर! तदनन्तर दस मास बीतनेपर उन सबके गर्भसे राजा सोमकके सौ पुत्र हुए ॥ ७ ॥
जन्तुर्ज्येष्ठः समभवज्जनित्र्यामेव पार्थिव ।
स तासामिष्ट एवासीन्न तथा ते निजाः सुताः ॥ ८ ॥
राजन्! सोमकका ज्येष्ठ पुत्र जन्तु अपनी माताके ही गर्भसे प्रकट हुआ, वही उन सब रानियोंको विशेष प्रिय था। उन्हें अपने पुत्र उतने प्यारे नहीं लगते थे ॥ ८ ॥
तच्च लक्षणमस्यासीत् सौवर्णं पार्श्व उत्तरे ।
तस्मिन् पुत्रशते चाग्र्यः स बभूव गुणैरपि ॥ ९ ॥
उसकी दाहिनी पसलीमें पूर्वोक्त सुनहरा चिह्न स्पष्ट दिखायी देता था। राजाके सौ पुत्रोंमें अवस्था और गुणोंकी दृष्टिसे भी वही श्रेष्ठ था ॥ ९ ॥
ततः स लोकमगमत् सोमकस्य गुरुः परम् ।
अथ काले व्यतीते तु सोमकोऽप्यगमत् परम् ॥ १० ॥
अथ तं नरके घोरे पच्यमानं ददर्श सः ।
तमपृच्छत् किमर्थं त्वं नरके पच्यसे द्विज ॥ ११ ॥
तदनन्तर कुछ कालके पश्चात् सोमकके पुरोहित परलोकवासी हो गये। थोड़े दिनोंके बाद राजा सोमक भी परलोकवासी हो गये। यमलोकमें जानेपर सोमकने देखा, पुरोहितजी घोर नरककी आगमें पकाये जा रहे हैं। उन्हें उस अवस्थामें देखकर सोमकने पूछा—‘ब्रह्मन्! आप नरककी आगमें कैसे पकाये जा रहे हैं?’ ॥
तमब्रवीद् गुरुः सोऽथ पच्यमानोऽग्निना भृशम् ।
त्वं मया याजितो राजंस्तस्येदं कर्मणः फलम् ॥ १२ ॥
एतच्छ्रुत्वा स राजर्षिर्धर्मराजमथाब्रवीत् ।
अहमत्र प्रवेक्ष्यामि मुच्यतां मम याजकः ॥ १३ ॥
मत्कृते हि महाभागः पच्यते नरकाग्निना ।
(सोऽहमात्मानमाधास्ये नरकान्मुच्यतां गुरुः ।)
तब नरकाग्निसे अधिक संतप्त होते हुए पुरोहितने कहा—‘राजन्! मैंने तुम्हें जो (तुम्हारे पुत्रकी आहुति देकर) यज्ञ करवाया था, उसी कर्मका यह फल है’ यह सुनकर राजर्षि सोमकने धर्मराजसे कहा—‘भगवन्! मैं इस नरकमें प्रवेश करूँगा। आप मेरे पुरोहितको छोड़ दीजिये। वे महाभाग मेरे ही कारण नरकाग्निमें पक रहे हैं। अतः मैं अपने-आपको नरकमें रखूँगा, परंतु मेरे गुरुजीको उससे छुटकारा मिल जाना चाहिये’ ॥ १२-१३ १/२ ॥
धर्म उवाच
नान्यः कर्तुः फलं राजन्नुपभुङ्क्ते कदाचन । इमानि तव दृश्यन्ते फलानि वदतां वर ॥ १४ ॥ धर्मने कहा— राजन्! कर्ताके सिवा दूसरा कोई उसके किये हुए कर्मोंका फल कभी नहीं भोगता है। वक्ताओंमें श्रेष्ठ महाराज! तुम्हें अपने पुण्यकर्मोंके फलस्वरूप जो ये पुण्य लोक प्राप्त हुए हैं, प्रत्यक्ष दिखायी देते हैं ॥ १४ ॥
सोमक उवाच
पुण्यान्न कामये लोकानृतेऽहं ब्रह्मवादिनम् । इच्छाम्यहमनेनैव सह वस्तुं सुरालये ॥ १५ ॥ नरके वा धर्मराज कर्मणास्य समो ह्यहम् । पुण्यापुण्यफलं देव सममस्त्वावयोरिदम् ॥ १६ ॥ सोमक बोले— धर्मराज! मैं अपने वेदवेत्ता पुरोहितके बिना पुण्यलोकोंमें जानेकी इच्छा नहीं रखता। स्वर्गलोक हो या नरक—मैं कहीं भी इन्हींके साथ रहना चाहता हूँ। देव! मेरे पुण्यकर्मोंपर इनका मेरे समान ही अधिकार है। हम दोनोंको यह पुण्य और पापका फल समानरूपसे मिलना चाहिये ॥ १५-१६ ॥
धर्मराज उवाच
यद्येवमीप्सितं राजन् भुङ्क्ष्वास्य सहितः फलम् । तुल्यकालं सहानेन पश्चात् प्राप्स्यसि सद्गतिम् ॥ १७ ॥ धर्मराज बोले— राजन्! यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो इनके साथ रहकर उतने ही समयतक तुम भी पापकर्मोंका फल भोगो, इसके बाद तुम्हें उत्तम गति प्राप्त होगी ॥ १७ ॥
लोमश उवाच
स चकार तथा सर्वं राजा राजीवलोचनः । क्षीणपापश्च तस्मात् स विमुक्तो गुरुणा सह ॥ १८ ॥ लोमशजी कहते हैं— युधिष्ठिर! तब कमलनयन राजा सोमकने धर्मराजके कथनानुसार सब कार्य किया और भोगद्वारा पाप नष्ट हो जानेपर वे पुरोहितके साथ ही नरकसे छूट गये ॥ १८ ॥ लेभे कामाञ्छुभान् राजन् कर्मणा निर्जितान् स्वयम् । सह तेनैव विप्रेण गुरुणा स गुरुप्रियः ॥ १९ ॥ तत्पश्चात् उन गुरुप्रेमी नरेशने अपने गुरुके साथ ही पुण्यकर्मोंद्वारा स्वयं प्राप्त किये हुए पुण्य-लोकके शुभ भोगोंका उपभोग किया ॥ १९ ॥ एष तस्याश्रमः पुण्यो य एषोऽग्रे विराजते ।
क्षान्त उष्यात्र षड्ररात्रं प्राप्नोति सुगतिं नरः ॥ २० ॥ यह उन्हीं राजा सोमकका पवित्र आश्रम है जो सामने ही सुशोभित हो रहा है। यहाँ क्षमाशील होकर छः रात निवास करनेसे मनुष्य उत्तम गति प्राप्त कर लेता है ॥ एतस्मिन्नपि राजेन्द्र वत्स्यामो विगतज्वराः । षड्ररात्रं नियतात्मानः सज्जीभव कुरूद्वह ॥ २१ ॥ कुरुश्रेष्ठ! हम सब लोग इस आश्रममें छः राततक मन और इन्द्रियोंपर संयम रखते हुए निश्चिन्त होकर निवास करेंगे। तुम इसके लिये तैयार हो जाओ ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां जन्तूपाख्याने अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें जन्तूपाख्यानविषयक एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२८ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल २१ १/२ श्लोक हैं)
१२९-
एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
कुरुक्षेत्रके द्वारभूत प्लक्षप्रस्रवण नामक यमुनातीर्थ एवं सरस्वतीतीर्थकी महिमा
लोमश उवाच
अस्मिन् किल स्वयं राजन्निष्टवान् वै प्रजापतिः ।
सत्रमिष्टीकृतं नाम पुरा वर्षसहस्रिकम् ।। १ ।।
लोमशजी कहते हैं—युधिष्ठिर! पूर्वकालमें यहाँ साक्षात् प्रजापतिने इष्टीकृत नामक सत्रका एक सहस्र वर्षोंतक चालू रहनेवाला अनुष्ठान किया था ।। १ ।।
अम्बरीषश्च नाभाग इष्टवान् यमुनामनु ।
यत्रेष्ट्वा दश पद्मानि सदस्येभ्योऽभिसृष्टवान् ।। २ ।।
यज्ञैश्च तपसा चैव परां सिद्धिमवाप सः ।
यहीं यमुनाके तटपर नाभागपुत्र अम्बरीषने भी यज्ञ किया था और यज्ञ पूर्ण होनेके पश्चात् सदस्योंको दस पद्म मुद्राएँ दान की थीं तथा यज्ञों और तपस्याद्वारा परम सिद्धि प्राप्त कर ली थीं ।। २ ½ ।।
देशश्च नाहुषस्यायं यज्वनः पुण्यकर्मणः ।। ३ ।।
सार्वभौमस्य कौन्तेय ययातेरमितौजसः ।
स्पर्धमानस्य शक्रेण तस्येदं यज्ञवास्त्विह ।। ४ ।।
कुन्तीनन्दन! यह नहुषकुमार ययातिका देश है, जो पुण्यकर्मा, याज्ञिक, महातेजस्वी और सार्वभौम सम्राट् थे। वे सदा इन्द्रके साथ ईर्ष्या रखते थे। यहाँ यह उन्हींकी यज्ञभूमि है ।। ३-४ ।।
पश्य नानाविधाकारैरग्निभिर्निचितां महीम् ।
मज्जन्तीमिव चाक्रान्तां ययातेर्यज्ञकर्मभिः ।। ५ ।।
देखो, यहाँ अग्नियोंसे युक्त नाना प्रकारकी वेदियाँ हैं, जिनसे यह सारी भूमि व्याप्त हो रही है; मानो पृथ्वी ययातिके यज्ञकर्मोंसे आक्रान्त हो उनकी पुण्य-धारामें डूबी जा रही है ।। ५ ।।
एषा शम्येकपत्रा या सरकं चैतदुत्तमम् ।
पश्य रामह्रदानेतान् पश्य नारायणाश्रमम् ।। ६ ।।
यह एक पत्तेवाली शमीका अवशेष अंश है तथा यह उत्तम सरोवर है। देखो, ये परशुरामजीके कुण्ड हैं और यह नारायणाश्रम है ।। ६ ।।
एतच्चर्चीकपुत्रस्य योगैर्विचरतो महीम् ।
प्रसर्पणं महीपाल रौप्यायाममितौजसः ॥ ७ ॥ महाराज! योगशक्तिसे सारी पृथ्वीपर विचरनेवाले महातेजस्वी ऋचीकनन्दन जमदग्निका प्रसर्पण (घूमने-फिरनेका स्थान) तीर्थ है जो रौप्या नामक नदीके समीप सुशोभित है ॥ ७ ॥
अत्रानुवंशं पठतः शृणु मे कुरुनन्दन । उलूखलैराभरणैः पिशाची यदभाषत ॥ ८ ॥ कुरुनन्दन! इस तीर्थके विषयमें एक परम्परा-प्राप्त कथाको सूचित करनेवाले कुछ श्लोक हैं जिन्हें मैं पढ़ता हूँ, तुम मेरे मुखसे सुनो—(प्राचीनकालकी बात है, कोई स्त्री अपने पुत्रके साथ इस तीर्थमें निवास करनेके लिये आयी थी, उससे) एक भयंकर पिशाचीने, जिसने ओखली-जैसे आभूषण पहन रखे थे, उन श्लोकोंको कहा था— ॥ ८ ॥
युगन्धरे दधि प्राश्य उषित्वा चाच्युतस्थले । तद्वद् भूतलये स्नात्वा सपुत्रा वस्तुमर्हसि ॥ ९ ॥ श्लोक (का भाव) इस प्रकार है—'अरी! तू युगन्धरमें दही खाकर* अच्युतस्थलमें निवास करके२ और भूतलयमें नहाकर३ यहाँ पुत्रसहित निवास करनेकी अधिकारिणी कैसे हो सकती है? ॥ ९ ॥
एकरात्रमुषित्वेह द्वितीयं यदि वत्स्यसि । एतद् वै ते दिवावृत्तं रात्रौ वृत्तमतोऽन्यथा ॥ १० ॥ '(अच्छा, आयी है तो एक रात रह ले,) यदि एक रात यहाँ रह लेनेके पश्चात् दूसरी रातमें भी रहेगी तो दिनमें तो तेरा यह हाल है (आज दिनमें तो तुमको यह कष्ट दिया गया है) और रातमें तेरे साथ अन्यथा बर्ताव होगा (विशेष कष्ट दिया जायगा)' ॥ १० ॥
अद्य चात्र निवत्स्यामः क्षपां भरतसत्तम । द्वारमेतत् तु कौन्तेय कुरुक्षेत्रस्य भारत ॥ ११ ॥ भरतश्रेष्ठ! (इस किंवदन्तीके अनुसार किसीको भी यहाँ एक ही रात रहना चाहिये) अतः हमलोग केवल आजकी रातमें ही यहाँ निवास करेंगे। युधिष्ठिर! यह तीर्थ कुरुक्षेत्रका द्वार बताया गया है ॥ ११ ॥
अत्रैव नाहुषो राजा राजन् क्रतुभिरिष्टवान् । ययातिर्बहुरत्नौघैर्यैरिन्द्रो मुदमभ्यगात् ॥ १२ ॥ राजन! नहुषनन्दन राजा ययातिने यहीं प्रचुर रत्नराशिकी दक्षिणासे युक्त अनेक यज्ञोंद्वारा भगवान्का यजन किया था। उन यज्ञोंमें इन्द्रको बड़ी प्रसन्नता हुई थी ॥ १२ ॥
एतत् प्लक्षावतरणं यमुनातीर्थमुत्तमम् । एतद् वै नाकपृष्ठस्य द्वारमाहुर्मनीषिणः ॥ १३ ॥
यह यमुनाजीका प्लक्षावतरण नामक उत्तम तीर्थ है। मनीषी पुरुष इसे स्वर्गलोकका द्वार बताते हैं ।। १३ ।।
अत्र सारस्वतैर्यज्ञैरीजानाः परमर्षयः ।
यूपोलूखलिकास्तात गच्छन्त्यवभृथप्लवम् ।। १४ ।।
यहीं यूप और ओखली आदि यज्ञ-साधनोंका संग्रह करनेवाले महर्षियोंने सारस्वत यज्ञोंका अनुष्ठान करके अवभृथ स्नान किया था ।। १४ ।।
अत्र वै भरतो राजा राजन् क्रतुभिरिष्टवान् ।
हयमेधेन यज्ञेन मेध्यमश्वमवासृजत् ।। १५ ।।
असकृत् कृष्णसारङ्गं धर्मेणाप्य च मेदिनीम् ।
अत्रैव पुरुषव्याघ्र मरुत्तः सत्रमुत्तमम् ।। १६ ।।
प्राप चैवर्षिमुख्येन संवर्तेनाभिपालितः ।
अत्रोपस्पृश्य राजेन्द्र सर्वांल्लोकान् प्रपश्यति ।
पूयते दुष्कृताच्चैव अत्रापि समुपस्पृश ।। १७ ।।
राजन्! राजा भरतने धर्मपूर्वक वसुधाका राज्य पाकर यहीं बहुत-से यज्ञ किये थे और यहीं अश्वमेधयज्ञके उद्देश्यसे उन्होंने अनेक बार कृष्णमृगके समान रंगवाले यज्ञसम्बन्धी श्यामकर्ण अश्वको भूतलपर भ्रमणके लिये छोड़ा था। नरश्रेष्ठ! इसी तीर्थमें ऋषिप्रवर संवर्तसे सुरक्षित हो महाराज मरुत्तने उत्तम यज्ञका अनुष्ठान किया। राजेन्द्र! यहाँ स्नान करके शुद्ध हुआ मनुष्य सम्पूर्ण लोकोंको प्रत्यक्ष देखता है और पापसे मुक्त हो पवित्र हो जाता है; अतः तुम इसमें भी स्नान करो ।। १५—१७ ।।
वैशम्पायन उवाच
तत्र सभ्रातृकः स्नात्वा स्तूयमानो महर्षिभिः ।
लोमशं पाण्डवश्रेष्ठ इदं वचनमब्रवीत् ।। १८ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर भाइयोंसहित स्नान करके महर्षियोंद्वारा प्रशंसित हो पाण्डवश्रेष्ठ युधिष्ठिरने लोमशजीसे इस प्रकार कहा— ।। १८ ।।
सर्वांल्लोकान् प्रपश्यामि तपसा सत्यविक्रम ।
इहस्थः पाण्डवश्रेष्ठं पश्यामि श्वेतवाहनम् ।। १९ ।।
‘मुनीश्वर! तपोबलसे सम्पन्न होनेके कारण वस्तुतः आप ही यथार्थ पराक्रमी हैं। आपकी कृपासे आज मैं इस प्लक्षावतरणके जलमें स्थित होकर सब लोकोंको प्रत्यक्ष देख रहा हूँ। यहींसे मुझे पाण्डवश्रेष्ठ श्वेतवाहन अर्जुन भी दिखायी देते हैं ।। १९ ।।
लोमश उवाच
एवमेतन्महाबाहो पश्यन्ति परमर्षयः ।
(इह स्नात्वा तपोयुक्तांस्त्रीँल्लोकान् सचराचरान्)
सरस्वतीमिमां पुण्यां पुण्यैकशरणावृताम् ॥ २० ॥ **लोमशजीने कहा—**महाबाहो! तुम ठीक कहते हो। यहाँ स्नान करके तपःशक्तिसम्पन्न श्रेष्ठ ऋषिगण इसी प्रकार चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंका दर्शन करते हैं। अब इस पुण्यसलिला सरस्वतीका दर्शन करो जो एकमात्र पुण्यका ही आश्रय लेनेवाले पुरुषोंसे घिरी हुई है ॥ २० ॥
यत्र स्नात्वा नरश्रेष्ठ धूतपाप्मा भविष्यसि । इह सारस्वतैर्यज्ञैरिष्टवन्तः सुरर्षयः । ऋषयश्चैव कौन्तेय तथा राजर्षयोऽपि च ॥ २१ ॥ नरश्रेष्ठ! इसमें स्नान करनेसे तुम्हारे सारे पाप धुल जायँगे। कुन्तीनन्दन! यहाँ अनेक देवर्षि, ब्रह्मर्षि तथा राजर्षियोंने सारस्वत यज्ञोंका अनुष्ठान किया है ॥ २१ ॥
वेदी प्रजापतेरेषा समन्तात् पञ्चयोजना । कुरोर्वै यज्ञशीलस्य क्षेत्रमेतन्महात्मनः ॥ २२ ॥ यह सब ओर पाँच योजन फैली हुई प्रजापतिकी यज्ञवेदी है। यही यज्ञपरायण महात्मा राजा कुरुका क्षेत्र है ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामेकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राविषयक एक सौ उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२९ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल २२ १/३ श्लोक हैं)
* युगन्धर एक पर्वत या प्रदेशका नाम है, जहाँके लोग ऊँटनी और गदहीतकके दूधका दही जमा लेते हैं। उस स्त्रीने कभी वहाँ जाकर दही खाया था। धर्मशास्त्रमें ऊँट और एक खुरवाले पशुओंके दूधको मदिराके तुल्य बताया गया है—‘औष्ट्रमेकशफं क्षीरं सुरातुल्यम्।’ इति।
१. प्राचीनकालमें अच्युतस्थल नामक गाँव वर्णसंकरजातीय अन्त्यजों एवं चाण्डालोंका निवासस्थान था। उस स्त्रीने उस गाँवमें किसी समय निवास किया था। धर्म-शास्त्रके अनुसार वर्णसंकरोंके संसर्गमें आनेपर प्रायश्चित्तरूपसे प्राजापत्य व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये—‘संसृज्य संकरैः सार्धं प्राजापत्यं व्रतं चरेत्।’ इति।
२. ‘भूतलय’ नामक गाँव चोरों और डाकुओंका अड्डा था। वहाँ एक नदी थी, जिसमें मुर्दे बहाये जाते थे। उस स्त्रीने उसी दूषित जलमें स्नान किया था। धर्मशास्त्रके अनुसार उस गाँवमें रहनेमात्रसे प्राजापत्य व्रत करनेकी आवश्यकता है—‘प्रोष्य भूतलये विप्रः प्राजापत्यं व्रतं चरेत्।’ इति।। इन तीनों दोषोंसे युक्त होनेके कारण वह स्त्री तीर्थवासकी अधिकारिणी नहीं रह गयी थी।