भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 869

प्रदेशिनीं ततोऽस्यास्ये शक्रः समभिसंदधे । मामयं धास्यतीत्येवं भाषिते चैव वज्रिणा ।। ३० ।। मान्धातेति च नामास्य चक्रुः सेन्द्रा दिवौकसः ।। ३१ ।। प्रदेशिनीं शक्रदत्तामास्वाद्य स शिशुस्तदा । अवर्धत महातेजाः किष्कून् राजंस्त्रयोदश ।। ३२ ।। तब इन्द्रने अपनी तर्जनी अंगुली बालकके मुँहमें डाल दी और कहा—'माम् अयं धाता।' 'अर्थात् यह मुझे ही पीयेगा' वज्रधारी इन्द्रके ऐसा कहनेपर इन्द्र आदि सब देवताओंने मिलकर उस बालकका नाम 'मान्धाता' रख दिया। राजन्! इन्द्रकी दी हुई प्रदेशिनी (तर्जनी) अंगुलिका रसास्वादन करके वह महातेजस्वी शिशु तेरह बित्ता बढ़ गया ।। ३०—३२ ।।

वेदास्तं सधनुर्वेदा दिव्यान्यस्त्राणि चेश्वरम् । उपतस्थुर्महाराज ध्यातमात्रस्य सर्वशः ।। ३३ ।। महाराज! उस समय शक्तिशाली मान्धाताके चिन्तन करनेमात्रसे ही धनुर्वेदसहित सम्पूर्ण वेद और दिव्य अस्त्र (ईश्वरकी कृपासे) उपस्थित हो गये ।। ३३ ।।

आजगवं नाम धनुः शतः शृङ्गोद्भवाश्च ये । अभैद्यं कवचं चैव सद्यस्तमुपशिश्रियुः ।। ३४ ।।