महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘राजन्! उक्त विधिसे इस जलको मैंने ऐसा शक्तिसम्पन्न कर दिया था कि इसको पीनेसे एक महाबली, महापराक्रमी और तपोबल सम्पन्न पुत्र उत्पन्न हो जो अपने बल-पराक्रमसे देवराज इन्द्रको भी यमलोक पहुँचा सके। उसी जलको तुमने आज पी लिया, यह अच्छा नहीं किया ।। २१-२२ ।।
न त्वद्य शक्यमस्माभिरेतत् कर्तुमतोऽन्यथा।
नूनं दैवकृतं ह्येतद् यदेवं कृतवानसि ।। २३ ।।
‘अब हमलोग इसके प्रभावको टालने या बदलनेमें असमर्थ हैं। तुमने जो ऐसा कार्य कर डाला है, इसमें निश्चय ही दैवकी प्रेरणा है ।। २३ ।।
पिपासितेन याः पीता विधिमन्त्रपुरस्कृताः।
आपस्त्वया महाराज मत्तपोवीर्यसम्भृताः ।। २४ ।।
ताभ्यस्त्वमात्मना पुत्रमीदृशं जनयिष्यसि ।
विधास्यामो वयं तत्र तवेष्टिं परमाद्भुताम् ।। २५ ।।
यथा शक्रसमं पुत्रं जनयिष्यसि वीर्यवान् ।
गर्भधारणजं वापि न खेदं समवाप्स्यसि ।। २६ ।।
‘महाराज! तुमने प्याससे व्याकुल होकर जो मेरे तपोबलसे संचित तथा विधिपूर्वक मन्त्रसे अभिमन्त्रित जलको पी लिया है, उसके कारण तुम अपने ही पेटसे तथाकथित इन्द्रविजयी पुत्रको जन्म दोगे। इस उद्देश्यकी सिद्धिके लिये हम तुम्हारी इच्छाके अनुरूप अत्यन्त अद्भुत यज्ञ करायेंगे जिससे तुम स्वयं भी शक्तिशाली रहकर इन्द्रके समान पराक्रमी पुत्र उत्पन्न कर सकोगे और गर्भधारणजनित कष्टका भी तुम्हें अनुभव न होगा’ ।। २४—२६ ।।
ततो वर्षशते पूर्णे तस्य राज्ञो महात्मनः ।
वामं पार्श्वं विनिर्भिद्य सुतः सूर्य इव स्थितः ।। २७ ।।
निष्चक्राम महातेजा न च तं मृत्युराविशत् ।
युवनाश्वं नरपतिं तदद्भुतमिवाभवत् ।। २८ ।।
तदनन्तर पूरे सौ वर्ष बीतनेपर उन महात्मा राजा युवनाश्वकी बायीं कोख फाड़कर एक सूर्यके समान महातेजस्वी बालक बाहर निकला तथा राजाकी मृत्यु भी नहीं हुई। यह एक अद्भुत-सी बात हुई ।। २७-२८ ।।
ततः शक्रो महातेजास्तं दिदृक्षुरुपागमत् ।
ततो देवा महेन्द्रं तमपृच्छन् धास्यतीति किम् ।। २९ ।।
तत्पश्चात् महातेजस्वी इन्द्र उस बालकको देखनेके लिये वहाँ आये। उस समय देवताओंने महेन्द्रसे पूछा—यह बालक क्या पीयेगा? ।। २९ ।।