महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 2247)
सप्तदशोऽध्यायः
द्रौपदीका भीमसेनके समीप जाना
वैशम्पायन उवाच
सा हता सूतपुत्रेण राजपत्नी यशस्विनी ।
वधं कृष्णा परीप्सन्ती सेनावाहस्य भामिनी ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! सूतपुत्र सेनापति कीचकने जबसे लात मारी थी, तभीसे यशस्विनी राजपत्नी भामिनी द्रौपदी उसके वधकी बात सोचने लगी ॥ १ ॥
जगामावासमेवाथ सा तदा द्रुपदात्मजा ।
कृत्वा शौचं यथान्यायं कृष्णा सा तनुमध्यमा ॥ २ ॥
गात्राणि वाससी चैव प्रक्षाल्य सलिलेन सा ।
चिन्तयामास रुदती तस्य दुःखस्य निर्णयम् ॥ ३ ॥
वह अपने निवासस्थानपर गयी। उस समय सूक्ष्म कटिभागवाली द्रुपदकुमारी कृष्णाने वहाँ यथायोग्य शौच-स्नान करके जलसे अपने शरीर और वस्त्र धोये तथा वह रोती हुई उस दुःखके निवारणका उपाय सोचने लगी— ॥ २-३ ॥
किं करोमि क्व गच्छामि कथं कार्यं भवेन्मम ।
इत्येवं चिन्तयित्वा सा भीमं वै मनसागमत् ॥ ४ ॥
‘क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? कैसे मेरा अभीष्ट कार्य होगा, इस प्रकार चिन्तन करके उसने मन-ही-मन भीमसेनका स्मरण किया ॥ ४ ॥
नान्यः कर्ता ऋते भीमान्ममाद्य मनसः प्रियम् ।
तत उत्थाय रात्रौ सा विहाय शयनं स्वकम् ॥ ५ ॥
प्राद्रवन्नाथमिच्छन्ती कृष्णा नाथवती सती ।
भवनं भीमसेनस्य क्षिप्रमायतलोचना ॥ ६ ॥
दुःखेन महता युक्ता मानसेन मनस्विनी ।
‘भीमसेनके सिवा दूसरा कोई आज मेरे मनको प्रिय लगनेवाला कार्य नहीं कर सकता’—ऐसा निश्चय करके वह विशाल नेत्रोंवाली सती-साध्वी सनाथा कृष्णा रातको अपनी शय्या छोड़कर उठी और अपने नाथ (रक्षक)-से मिलनेकी इच्छा रखकर शीघ्रतापूर्वक भीमसेनके भवनमें गयी। उस समय मनस्विनी द्रौपदी महान् मानसिक दुःखसे पीड़ित थी ॥ ५-६½ ॥
सैरन्ध्र्युवाच
तस्मिञ्जीवति पापिष्ठे सेनावाहे मम द्विषि ॥ ७ ॥
तत् कर्म कृतवानद्य कथं निद्रां निषेवसे । वहाँ पहुँचते ही सैरन्ध्री बोली—आर्यपुत्र! मुझसे द्वेष रखनेवाले उस महापापी सेनापतिके, जिसने मेरे साथ वैसा अपमानजनक बर्ताव किया था, जीते-जी तुम आज नींद कैसे ले रहे हो? ।। ७ १/२ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वाथ तां शालां प्रविवेश मनस्विनी ।। ८ ।। यस्यां भीमस्तथा शेते मृगराज इव श्वसन् । वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! ऐसा कहती हुई मनस्विनी द्रौपदीने उस भवनमें प्रवेश किया, जिसमें सिंहकी भाँति साँसें खींचते हुए भीमसेन सो रहे थे ।। तस्या रूपेण सा शाला भीमस्य च महात्मनः ।। ९ ।। सम्मूर्च्छितेव कौरव्य प्रजज्वाल च तेजसा । सा वै महानसं प्राप्य भीमसेनं शुचिस्मिता ।। १० ।। सर्वश्वेतेव माहेयी वने जाता त्रिहायणी । उपातिष्ठत पाञ्चाली वासितेव नरर्षभम् ।। ११ ।। कुरुनन्दन! द्रौपदीके दिव्य रूपसे महात्मा भीमकी वह पाकशाला शोभा-समृद्धिको प्राप्त होकर तेजसे प्रकाशित हो उठी। पवित्र मुसकानवाली द्रौपदी पाक-शालामें पहुँचकर क्रमशः [बक, साँड़ और गजराजके पास जानेवाली] जलमें उत्पन्न हुई बकी, तीन सालकी पार्थिव गौ तथा हथिनीके समान श्रेष्ठ पुरुष भीमसेनके समीप गयीं ।। ९—११ ।। सा लतेव महाशालं फुल्लं गोमतीतीरजम् । परिष्वजत पाञ्चाली मध्यमं पाण्डुनन्दनम् ।। १२ ।। जैसे लता गोमतीके तटपर उत्पन्न एवं खिले हुए ऊँचे शालवृक्षमें लिपट जाती है, उसी प्रकार सती-साध्वी पांचालीने मध्यम* पाण्डव भीमसेनका आलिंगन किया ।। १२ ।। बाहुभ्यां परिरभ्यैनं प्राबोधयदनिन्दिता । सिंहं सुप्तं वने दुर्गे मृगराजवधूरिव ।। १३ ।। उसने उन्हें दोनों भुजाओंसे कसकर जगाया; ठीक वैसे ही, जैसे दुर्गम वनमें सोये हुए सिंहको सिंहिनी जगाती है ।। १३ ।। भीमसेनमुपाश्लिष्यद्धस्तिनीव महागजम् । वीणेव मधुरालापा गान्धारं साधु मूर्छती । अभ्यभाषत पाञ्चाली भीमसेनमनिन्दिता ।। १४ ।। जैसे हथिनी महान् गजराजका आलिंगन करती है, उसी प्रकार निर्दोष पाञ्चालराजकुमारी भीमसेनसे सटकर गान्धार स्वरमें मधुर ध्वनि फैलाती हुई वीणाकी भाँति मीठे वचनोंमें बोली— ।। १४ ।।
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ किं शेषे भीमसेन यथा मृतः । नामृतस्य हि पापीयान् भार्यामालभ्य जीवति ॥ १५ ॥
‘भीमसेन! उठो, उठो, क्यों मुर्देकी तरह सो रहे हो?; क्योंकि (तुम्हारे-जैसे वीर) पुरुषके जीवित रहते हुए उसकी पत्नीका स्पर्श करके कोई महापापी मनुष्य जीवित नहीं रह सकता’ ॥ १५ ॥
स सम्प्रहाय शयनं राजपुत्र्या प्रबोधितः । उपातिष्ठत मेघाभः पर्यङ्के सोपसंग्रहे ॥ १६ ॥ अथाब्रवीद् राजपुत्रीं कौरव्यो महिषीं प्रियाम् । केनास्यर्थेन सम्प्राप्ता त्वरितेव ममान्तिकम् ॥ १७ ॥ न ते प्रकृतिमान् वर्णः कृशा पाण्डुश्च लक्ष्यसे । आचक्ष्व परिशेषेण सर्वं विद्यामहं यथा ॥ १८ ॥
राजकुमारी द्रौपदीके जगानेपर मेघके समान श्याम वर्णवाले कुरुनन्दन भीमसेन तोशक बिछे हुए पलंगपर शयन छोड़कर उठ बैठे और अपनी प्यारी रानीसे बोले—‘देवि! किस कार्यसे तुम इतनी उतावली-सी होकर मेरे पास आयी हो? तुम्हारे शरीरकी कान्ति स्वाभाविक नहीं रह गयी है। तुमपर उदासी छायी है। तुम दुबली और पीली दिखायी देती हो। पूरी बात बताओ, जिससे मैं सब कुछ जान सकूँ’ ॥ १६—१८ ॥
सुखं वा यदि वा दुःखं द्वेष्यं वा यदि वा प्रियम् ।
यथावत् सर्वमाचक्ष्व श्रुत्वा ज्ञास्यामि यत् क्षमम् ॥ १९ ॥
‘तुम्हें सुख हो या दुःख, बुरा हुआ हो या भला, सब बातें ठीक-ठीक कह जाओ। वह सब सुनकर मैं उसके निवारणके लिये उचित उपाय सोचूँगा ।।
अहमेव हि ते कृष्णे विश्वास्यः सर्वकर्मसु ।
अहमापत्सु चापि त्वां मोक्ष्यामि पुनः पुनः ॥ २० ॥
‘कृष्णे! सब कार्योंके लिये मैं ही तुम्हारा विश्वासपात्र हूँ। मैं ही सब प्रकारकी विपत्तियोंमें बार-बार सहायता करके तुम्हें संकटसे मुक्त करता हूँ ॥ २० ॥
शीघ्रमुक्त्वा यथाकामं यत् ते कार्यं विवक्षितम् ।
गच्छ वै शयनायैव पुरा नान्येन बुध्यते ॥ २१ ॥
‘अतः जैसी तुम्हारी रुचि हो और जिस कार्यके लिये कुछ कहना चाहती हो, उसे शीघ्र कहकर पहले ही अपने शयनगृहमें चली जाओ, जिससे दूसरे किसीको इसका पता न चल सके’ ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि कीचकवधपर्वणि द्रौपदीभीमसंवादे सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें द्रौपदी-भीम-संवादविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥
* नकुल-सहदेव जुड़वें पैदा हुए थे; अतः वे दोनों कनिष्ठ (छोटे) भाई हैं। युधिष्ठिर बड़े हैं। भीमसेन और अर्जुन मध्यम हैं। विराटपर्वके प्रसंगमें अर्जुन पुरुष नहीं रह गये हैं। अतः भीमसेन ही यहाँ प्रधानरूपसे मध्यम पाण्डव कहे गये हैं।
अध्याय (पृष्ठ 2251)
अष्टादशोऽध्यायः
द्रौपदीका भीमसेनके प्रति अपने दुःखके उद्गार प्रकट करना
वैशम्पायन उवाच
(सा लज्जमाना भीता च अधोमुखमुखी ततः ।
नोवाच किंचिद् वचनं बाष्पदूषितलोचना ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! उस समय लज्जित और भयभीत हुई द्रौपदीके नेत्रोंमें आँसू भर आये थे। वह मुँह नीचा किये मौन बैठी रही; कुछ भी बोल न सकी।
अथाब्रवीद् भीमपराक्रमो बली
वृकोदरः पाण्डवमुख्यसम्मतः ।
प्रब्रूहि किं ते करवाणि सुन्दरि
प्रियं प्रिये वारणखेलगामिनि ॥)
तब पाण्डवप्रवर युधिष्ठिरके परम प्रिय भयंकर पराक्रमी महाबली भीम इस प्रकार बोले—‘सुन्दरि! गजराजकी भाँति लीला-विलासपूर्वक मन्द-गतिसे चलनेवाली प्रिये! बताओ; मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?’।
द्रौपद्युवाच
अशोच्यत्वं कुतस्तस्य यस्या भर्ता युधिष्ठिरः ।
जानन् सर्वाणि दुःखानि किं मां त्वं परिपृच्छसि ॥ १ ॥
**द्रौपदी बोली—**जिस स्त्रीके पति राजा युधिष्ठिर हों, वह बिना शोकके रहे, यह कैसे सम्भव हो सकता है? तुम मेरे सारे दुःखोंको जानते हुए भी मुझसे कैसे पूछते हो? ॥ १ ॥
यन्मां दासीप्रवादेन प्रातिकामी तदानयत् ।
सभापरिषदो मध्ये तन्मां दहति भारत ॥ २ ॥
दुर्योधनके सेवकके रूपमें दुःशासन मुझे दासी कहकर जो उस समय कौरवोंके सभाभवनमें जनसमाजके भीतर घसीट ले गया, वह अपमानकी आग मुझे आजतक जला रही है ॥ २ ॥
(क्षत्रियैस्तत्र कर्णाद्यैर्दृष्टा दुर्योधनेन च ।
श्वशुराभ्यां च भीष्मेण विदुरेण च धीमता ॥
द्रोणेन च महाबाहो कृपेण च परंतप ।
शत्रुओंको संताप देनेवाले महाबाहु भीम! उस समय वहाँ बैठे हुए कर्ण आदि क्षत्रियोंने, दुर्योधनने, मेरे दोनों ससुर भीष्म और बुद्धिमान् विदुरने तथा द्रोणाचार्य और कृपाचार्यने भी मुझे उस दुरवस्थामें देखा था।
साहं श्वशुरयोर्मध्ये भ्रातृमध्ये च पाण्डव ।।
केशे गृहीत्वैव सभां नीता जीवति वै त्वयि ।)
पाण्डुनन्दन! इस प्रकार तुम्हारे जीते-जी मेरे केश पकड़कर मुझे दोनों श्वशुरों तथा
दुर्योधन आदि भ्राताओंके बीच राजसभामें लाया गया।
पार्थिवस्य सुता नाम का नु जीवति मादृशी ।
अनुभूयेदृशं दुःखमन्यत्र द्रौपदीं प्रभो ।। ३ ।।
स्वामिन्! मुझ द्रुपदकन्याको छोड़कर दूसरी मेरी-जैसी कौन राजकुमारी होगी, जो
ऐसा दुःख भोगकर जी रही हो ।। ३ ।।
वनवासगतायाश्च सैन्धवेन दुरात्मना ।
परामर्शो द्वितीयो वै सोढुमुत्सहते तु का ।। ४ ।।
वनवासमें जानेपर दुरात्मा सिन्धुराज जयद्रथने जो मेरा स्पर्श कर लिया, यह दूसरा
अपमान था। उसे भी कौन सह सकती है? ।। ४ ।।
(पद्भ्यां पर्यचरं चाहं देशान् विषमसंस्थितान् ।
दुर्गाञ्छ्वापदसंकीर्णांस्त्वयि जीवति पाण्डव ।।
पाण्डुकुमार! तुम्हारे जीते-जी मुझे हिंसक जन्तुओंसे भरे हुए विषम एवं दुर्गम प्रदेशोंमें
पैदल विचरना पड़ा।
ततोऽहं द्वादशे वर्षे वन्यमूलफलाशना ।
इदं पुरमनुप्राप्ता सुदेष्णापरिचारिका ।।
परस्त्रियमुपतिष्ठे सत्यधर्मपथस्थिता ।
तदनन्तर बारहवें वर्षके अन्तमें मैं जंगली फल-मूलोंका आहार करती हुई इस
विराटनगरमें आयी और सुदेष्णाकी सेविका बन गयी। मैं सत्यधर्मके मार्गमें स्थित होकर
आज दूसरी स्त्रीकी सेवा करती हूँ।
गोशीर्षकं पद्मकं च हरिश्यामं च चन्दनम् ।।
नित्यं पिंषे विराटस्य त्वयि जीवति पाण्डव ।।
साहं बहूनि दुःखानि गणयामि न ते कृते ।
द्रुपदस्य सुता चाहं धृष्टद्युम्नस्य चानुजा ।
अग्निकुण्डात् समुद्भूता नोर्व्यां जातु चरामि भोः ।।)
'पाण्डुपुत्र! तुम्हारे जीते-जी मैं प्रतिदिन राजा विराटके लिये गोशीर्ष, पद्मकाष्ठ और
हरिश्याम आदि चन्दन पीसती हूँ। फिर भी तुम्हारे संतोषके लिये मैं ऐसे बहुत-से दुःखोंको
कुछ भी नहीं गिनती। मैं द्रुपदकी पुत्री और धृष्टद्युम्नकी बहिन हूँ। अग्निकुण्डसे मेरी उत्पत्ति
हुई है। मैं कभी धरतीपर पैदल नहीं चलती थी (परंतु अब यहाँ यह दुर्दशा भोग रही हूँ)।
मत्स्यराजसमक्षं तु तस्य धूर्तस्य पश्यतः ।
कीचकेन परामृष्टा का नु जीवति मादृशी ।। ५ ।।
मत्स्यदेशके राजा विराटके सामने उस जुआरीके देखते-देखते कीचकने जो लात मारकर मेरा अपमान किया है, उसको सहकर मेरी-जैसी कौन राजकुमारी जीवित रह सकती है? ।। ५ ।।
एवं बहुविधैः क्लेशैः क्लिश्यमानां च भारत ।
न मां जानासि कौन्तेय किं फलं जीवितेन मे ।। ६ ।।
भरतकुलभूषण कुन्तीनन्दन! ऐसे बहुत-से क्लेशोंद्वारा मैं निरन्तर पीड़ित रहती हूँ; क्या तुम यह नहीं जानते? फिर मेरे जीनेका ही क्या प्रयोजन है? ।। ६ ।।
योऽयं राज्ञो विराटस्य कीचको नाम भारत ।
सेनानीः पुरुषव्याघ्र श्यालः परमदुर्मतिः ।। ७ ।।
स मां सैरन्ध्रिवेषेण वसन्तीं राजवेश्मनि ।
नित्यमेवाह दुष्टात्मा भार्या मम भवेति वै ।। ८ ।।
भारत! पुरुषसिंह! राजा विराट्का जो यह कीचक नामक सेनापति है, वह उनका साला लगता है। उसकी बुद्धि बड़ी खोटी है। राजमहलमें सैरन्ध्रीके वेशमें निवास करती हुई मुझे देखकर वह दुष्टात्मा प्रतिदिन ही आकर मुझसे कहता है—‘मेरी ही पत्नी हो जाओ’ ।।
तेनोपमन्त्र्यमाणाया वधार्हेण सपत्नहन् ।
कालेनेव फलं पक्वं हृदयं मे विदीर्यते ।। ९ ।।
शत्रुदमन! उस मार डालने योग्य पापीके द्वारा रोज-रोज यह घृणित प्रस्ताव सुनते-सुनते समयसे पके हुए फलकी भाँति मेरा हृदय विदीर्ण हो रहा है ।। ९ ।।
(विजानामि तवामर्षं बलं वीर्यं च पाण्डव ।
ततोऽहं परिदेवामि चाग्रतस्ते महाबल ।।
महाबली पाण्डुनन्दन! मैं तुम्हारे अमर्ष, बल और पराक्रमको जानती हूँ; इसीलिये मैं तुम्हारे आगे रोती-बिलखती हूँ।
यथा यूथपतिर्मत्तः कुञ्जरः षष्टिहायनः ।
भूमौ निपतितं बिल्वं पद्ध्यामाक्रम्य पीडयेत् ।।
तथैव च शिरस्तस्य निपात्य धरणीतले ।
वामेन पुरुषव्याघ्र मर्द पादेन पाण्डव ।।
पुरुषसिंह पाण्डुपुत्र! जैसे साठ वर्षका मतवाला यूथपति गजराज धरतीपर गिरे हुए बेलके फलको पैरोंसे दबाकर कुचल डाले, उसी प्रकार कीचकके मस्तकको पृथ्वीपर गिराकर बाँयें पैरसे मसल डालो।
स चेदुद्यन्तमादित्यं प्रातरुत्थाय पश्यति ।
कीचकः शर्वरीं व्युष्टां नाहं जीवितुमुत्सहे ।।)
यदि कीचक इस रात्रिके बीतनेपर प्रातःकाल उठकर उगते हुए सूर्यका दर्शन कर लेगा, तो मैं जीवित नहीं रह सकूँगी।
भ्रातरं च विगर्हस्व ज्येष्ठं दुर्धूतदेविनम् । यस्यास्मि कर्मणा प्राप्ता दुःखमेतदनन्तकम् ॥ १० ॥ दूषित द्यूतक्रीड़ामें लगे रहनेवाले अपने उस बड़े भाईकी निन्दा करो, जिसकी करतूतसे मैं इस अनन्त दुःखमें पड़ गयी हूँ ॥ १० ॥
को हि राज्यं परित्यज्य सर्वस्वं चात्मना सह । प्रव्रज्यायैव दीव्येत विना दुर्धूतदेविनम् ॥ ११ ॥ निन्दनीय जूएमें आसक्त रहनेवाले उस जुआरीको छोड़कर दूसरा कौन ऐसा पुरुष होगा, जो अपने साथ ही राज्य तथा सर्वस्वका परित्याग करके वनवास लेनेकी शर्तपर जूआ खेल सकता हो? ॥ ११ ॥
यदि निष्कसहस्रेण यच्चान्यत् सारवद् धनम् । सायम्प्रातरदेविष्यदपि संवत्सरान् बहून् ॥ १२ ॥ रुक्मं हिरण्यं वासांसि यानं युग्ममजाविकम् । अश्वाश्वतरसङ्घांश्च न जातु क्षयमावहेत् ॥ १३ ॥ यदि वे प्रतिदिन शाम-सबेरे एक सहस्र स्वर्ण-मुद्राओंसे जूआ खेलते तथा जो दूसरे बहुमूल्य धन थे, उनको—सोने, चाँदी, वस्त्र, सवारी, रथ, बकरी, भेड़, घोड़े और खच्चरों आदिके समूहको बहुत वर्षोंतक भी दाँवपर लगाते रहते, तो भी हमारा राज्य-वैभव कभी क्षीण नहीं होता ॥ १२-१३ ॥
सोऽयं द्यूतप्रवादेन श्रियः प्रत्यवरोपितः । तूष्णीमास्ते यथा मूढः स्वानि कर्माणि चिन्तयन् ॥ १४ ॥ जूएकी आसक्तिने इन्हें राजलक्ष्मीके सिंहासनसे नीचे उतार दिया है और अब ये अपने उन कर्मोंका चिन्तन करते हुए अज्ञकी भाँति चुपचाप बैठे रहते हैं ॥
दश नागसहस्राणि हयानां हेममालिनाम् । यं यान्तमनुयान्तीह सोऽयं द्यूतेन जीवति ॥ १५ ॥ जिनके कहीं यात्रा करते समय दस हजार हाथी और सोनेकी मालाएँ पहने हुए सहस्रों घोड़े पीछे-पीछे चलते थे, वे ही महाराज यहाँ जूएसे जीविका चलाते हैं ॥
रथाः शतसहस्राणि नृपाणाममितौजसाम् । उपासन्त महाराजमिन्द्रप्रस्थे युधिष्ठिरम् ॥ १६ ॥ शतं दासीसहस्राणां यस्य नित्यं महानसे । पात्रीहस्तं दिवारात्रमतिथीन् भोजयन्त्युत ॥ १७ ॥ एष निष्कसहस्राणि प्रदाय ददतां वरः । द्यूतजेन ह्यनर्थेन महता समुपाश्रितः ॥ १८ ॥ इन्द्रप्रस्थमें जिनकी सवारीके लिये एक लाख रथ प्रस्तुत रहते थे और जिन महाराज युधिष्ठिरकी सेवामें सहस्रों महापराक्रमी राजा बैठा करते थे, जिनके भोजनालयमें नित्य एक
लाख दासियाँ सोनेके पात्र हाथमें लिये दिन-रात अतिथियोंको भोजन कराया करती थीं तथा जो दाताओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर रोज सहस्रों स्वर्णमुद्राएँ दानमें बाँटा करते थे, वे ही धर्मराज यहाँ जूएमं कमाये हुए महान् अनर्थकारी धनसे जीवन-निर्वाह कर रहे हैं ॥ १६—१८ ॥
एनं हि स्वरसम्पन्ना बहवः सूतमागधाः ।
सायम्प्रातरुपातिष्ठन् सुमृष्टमणिकुण्डलाः ॥ १९ ॥
इन्द्रप्रस्थमें विशुद्ध मणिमय कुण्डल धारण करनेवाले बहुत-से सूत और मागध मधुर स्वरसे संयुक्त वाणीद्वारा सायंकाल और प्रातःकाल इन महाराजकी स्तुति किया करते थे ॥ १९ ॥
सहस्रमृषयो यस्य नित्यमासन् सभासदः ।
तपःश्रुतोपसम्पन्नाः सर्वकामैरुपस्थिताः ॥ २० ॥
तपस्या और वेदज्ञानसे सम्पन्न सहस्रों पूर्णकाम ऋषि-महर्षि प्रतिदिन इनकी राजसभामें बैठा करते थे ॥
अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातका गृहमेधिनः ।
त्रिंशद्दासीक एकैको यान् बिभर्ति युधिष्ठिरः ॥ २१ ॥
अट्ठासी हजार स्नातक गृहस्थ ब्राह्मणोंका, जिनमेंसे एक-एककी सेवाके लिये तीस-तीस दासियाँ थीं, राजा युधिष्ठिर अपने यहाँ पालन करते थे ॥ २१ ॥
अप्रतिग्राहिणां चैव यतीनामूर्ध्वरेतसाम् ।
दश चापि सहस्राणि सोऽयमास्ते नरेश्वरः ॥ २२ ॥
साथ ही ये महाराज दान न लेनेवाले दस हजार ऊर्ध्वरेता संन्यासियोंका भी स्वयं ही भरण-पोषण करते थे। आज वे ही इस अवस्थामें रह रहे हैं ॥ २२ ॥
आनृशंस्यमनुक्रोशं संविभागस्तथैव च ।
यस्मिन्नेतानि सर्वाणि सोऽयमास्ते नरेश्वरः ॥ २३ ॥
जिनमें कोमलता, दया और सबको अन्न-वस्त्र देना आदि समस्त सद्गुण विद्यमान थे, वे ही ये महाराज आज इस दुरवस्थामें पड़े हैं ॥ २३ ॥
अन्धान् वृद्धांस्तथानाथान् बालान् राष्ट्रेषु दुर्गतान् ।
बिभर्ति विविधान् राजा धृतिमान् सत्यविक्रमः ।
संविभागमना नित्यमानृशंस्याद् युधिष्ठिरः ॥ २४ ॥
धैर्यवान् तथा सत्यपराक्रमी राजा युधिष्ठिर अपने कोमल स्वभावके कारण सदा सबको भोजन आदि देनेमें ही मन लगाते थे और अपने राज्यके अनेक अंधों, बूढ़ों, अनाथों, बालकों तथा दुर्गतिमें पड़े हुए लोगोंका भरण-पोषण करते रहते थे ॥ २४ ॥
स एष निरयं प्राप्तो मत्स्यस्य परिचारकः ।
सभायां देविता राज्ञः कङ्को ब्रूते युधिष्ठिरः ॥ २५ ॥
वे ही ये युधिष्ठिर आज मत्स्यराजके सेवक होकर परतन्त्रतारूपी नरकमें पड़े हुए हैं। ये सभामें राजाको जूआ खेलाते और कंक कहकर अपना परिचय देते हैं॥ २५॥
इन्द्रप्रस्थे निवसतः समये यस्य पार्थिवाः।
आसन् बलिभृतः सर्वे सोऽद्यान्यैर्भृतिमिच्छति॥ २६॥
इन्द्रप्रस्थमें रहते समय जिन्हें सब राजा भेंट देते थे, वे ही आज दूसरोंसे अपने भरण-पोषणके लिये धन पानेकी इच्छा रखते हैं॥ २६॥
पार्थिवाः पृथिवीपाला यस्यासन् वशवर्तिनः।
स वशे विवशो राजा परेषामद्य वर्तते॥ २७॥
इस पृथिवीका पालन करनेवाले बहुत-से भूपाल जिनकी आज्ञाके अधीन थे, वे ही महाराज आज विवश होकर दूसरोंके वशमें रहते हैं॥ २७॥
प्रताप्य पृथिवीं सर्वां रश्मिमानिव तेजसा।
सोऽयं राज्ञो विराटस्य सभास्तारो युधिष्ठिरः॥ २८॥
सूर्यकी भाँति अपने तेजसे सम्पूर्ण भूमण्डलको प्रकाशित कर अब ये धर्मराज युधिष्ठिर राजा विराटकी सभाके एक साधारण सदस्य बने हुए हैं॥ २८॥
यमुपासन्त राजानः सभायामृषिभिः सह।
तमुपासीनमद्यान्यं पश्य पाण्डव पाण्डवम्॥ २९॥
पाण्डुनन्दन! देखो, राजसभामें ऋषियोंके साथ अनेक राजा जिनकी उपासना करते थे, वे ही पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर आज दूसरेकी उपासना कर रहे हैं॥ २९॥
सदस्यं यमुपासीनं परस्य प्रियवादिनम्।
दृष्ट्वा युधिष्ठिरं कोपो वर्धते मामसंशयम्॥ ३०॥
एक सामान्य सदस्यकी हैसियतसे दूसरेकी सेवामें बैठे हुए वे विराटके मनको प्रिय लगनेवाली बातें करते हैं। महाराज युधिष्ठिरको इस दशामें देखकर निश्चय ही मेरा क्रोध बढ़ जाता है॥ ३०॥
अतदर्हं महाप्राज्ञं जीवितार्थेऽभिसंस्थितम्।
दृष्ट्वा कस्य न दुःखं स्याद् धर्मात्मानं युधिष्ठिरम्॥ ३१॥
जो धर्मात्मा और परम बुद्धिमान् हैं, जिनका कभी इस दुरवस्थामें पड़ना उचित नहीं है, वे ही जीविकाके लिये आज दूसरेके घरमें पड़े हैं। महाराज युधिष्ठिरको इस दशामें देखकर किसे दुःख न होगा?॥ ३१॥
उपास्ते स्म सभायां यं कृत्स्ना वीर वसुन्धरा।
तमुपासीनमप्यन्यं पश्य भारत भारतम्॥ ३२॥
वीर! पहले राजसभामें समस्त भूमण्डलके लोग जिनकी सब ओरसे उपासना करते थे, भारत! अब उन्हीं भरतवंशशिरोमणिको आज दूसरे राजाकी सभामें बैठे देख लो॥ ३२॥
एवं बहुविधैर्दुःखैः पीड्यमानामनाथवत्।
शोकसागरमध्यस्थां किं मां भीम न पश्यसि ॥ ३३ ॥ भीमसेन! इस प्रकार अनेक दुःखोंसे अनाथकी भाँति पीड़ित होती हुई मैं शोकके महासागरमें डूब रही हूँ, क्या तुम मेरी यह दुर्दशा नहीं देखते? ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि कीचकवधपर्वणि द्रौपदीभीमसंवादे अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें द्रौपदीभीमसंवादविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४६ १/३ श्लोक हैं।)
अध्याय (पृष्ठ 2258)
एकोनविंशोऽध्यायः
पाण्डवोंके दुःखसे दुःखित द्रौपदीका भीमसेनके सम्मुख विलाप
द्रौपद्युवाच
इदं तु ते महद् दुःखं यत् प्रवक्ष्यामि भारत ।
न मेऽभ्यसूया कर्तव्या दुःखादेतद् ब्रवीम्यहम् ॥ १ ॥
द्रौपदी बोली— भारत! अब जो दुःख मैं तुमसे निवेदन करनेवाली हूँ, वह तो मेरे लिये और भी महान् है। तुम इसके लिये मुझे दोष न देना। मैं दुःखसे व्यथित होनेके कारण ही यह सब कह रही हूँ ॥ १ ॥
सूदकर्मणि हीने त्वमसमे भरतर्षभ ।
ब्रुवन् बल्लवजातीयः कस्य शोकं न वर्धयेः ॥ २ ॥
भरतर्षभ! जो तुम्हारे लिये सर्वथा अयोग्य है, ऐसे रसोइयेके नीच काममें लगे हो और अपनेको ‘बल्लव’ जातिका मनुष्य बताते हो। इस अवस्थामें तुम्हें देखकर किसका शोक न बढ़ेगा? ॥ २ ॥
सूपकारं विराटस्य बल्लवं त्वां विदुर्जनाः ।
प्रेष्यत्वं समनुप्राप्तं ततो दुःखतरं नु किम् ॥ ३ ॥
लोग तुम्हें राजा विराटके रसोइये बल्लवके नामसे जानते हैं। तुम स्वामी होकर भी आज सेवककी दशामें पड़े हो। इससे बढ़कर महान् कष्ट मेरे लिये और क्या हो सकता है? ॥ ३ ॥
यदा महानसे सिद्धे विराटमुपतिष्ठसि ।
ब्रुवाणो बल्लवः सूदस्तदा सीदति मे मनः ॥ ४ ॥
जब पाकशालामें भोजन बना लेनेपर तुम विराटकी सेवामें उपस्थित होते हो और कहते हो—‘महाराज! बल्लव रसोइया आपको भोजनके लिये बुलाने आया है’, तब यह सब सुनकर मेरा मन दुःखित हो जाता है ॥ ४ ॥
यदा प्रहृष्टः सम्राट् त्वां संयोधयति कुञ्जरैः ।
हसन्त्यन्तःपुरे नार्यो मम तूद्विजते मनः ॥ ५ ॥
जब विराटनरेश प्रसन्न होकर तुम्हें हाथियोंसे लड़ाते हैं, उस समय रनिवासकी दूसरी स्त्रियाँ तो हँसती हैं और मेरा हृदय शोकसे व्याकुल हो उठता है ॥
शार्दूलैर्महिषैः सिंहैरागारे योध्यसे यदा ।
कैकेय्याः प्रेक्षमाणायास्तदा मे कश्मलं भवेत् ॥ ६ ॥
जब रानी सुदेष्णा दर्शक बनकर बैठती हैं और तुम महलके आँगनमें व्याघ्रों, सिंहों तथा भैंसोंसे लड़ते हो, उस समय मुझे बड़ी व्यथा होती है ॥ ६ ॥ तत उत्थाय कैकेयी सर्वास्ताः प्रत्यभाषत । प्रेष्याः समुत्थिताश्चापि कैकेयीं ताः स्त्रियोऽब्रुवन् ॥ ७ ॥ प्रेक्ष्य मामनवद्याङ्गीं कश्मलोपहतामिव । एक दिन उक्त पशुओंसे तुम्हारा युद्ध देखकर उठनेके बाद मुझ निर्दोष अंगोंवाली अबलाको इसी कारण शोकपीड़ित-सी देख केकयराजकुमारी सुदेष्णा अपने साथ आयी हुई सम्पूर्ण दासियोंसे और वे खड़ी हुई दासियाँ रानी कैकेयीसे इस प्रकार कहने लगीं— ॥ स्नेहात् संवासजाद् धर्मात् सूदमेषा शुचिस्मिता ॥ ८ ॥ योद्धयमानं महावीर्यमियं समनुशोचति । कल्याणरूपा सैरन्ध्री बल्लवश्चापि सुन्दरः ॥ ९ ॥ ‘यह पवित्र मुसकानवाली सैरन्ध्री पहले (युधिष्ठिरके यहाँ) एक स्थानमें साथ-साथ रहनेके कारण पैदा होनेवाले स्नेहसे अथवा धर्मसे प्रेरित होकर उस महापराक्रमी रसोइयेको पशुओंसे लड़ते देख उसके लिये बार-बार शोक करने लगती है। सैरन्ध्रीका रूप तो मंगलमय है ही, बल्लव भी बड़ा सुन्दर है ॥ ८-९ ॥ स्त्रीणां चित्तं च दुर्ज्ञेयं युक्तरूपौ च मे मतौ । सैरन्ध्री प्रियसंवासान्नित्यं करुणवादिनी ॥ १० ॥ ‘स्त्रियोंके हृदयको समझ लेना बहुत कठिन है, हमें तो यह जोड़ी अच्छी जान पड़ती है। सैरन्ध्री अपने प्रिय सम्बन्धके कारण जब रसोइयेको हाथी आदिसे लड़ानेकी बात की जाती है, तब (अत्यन्त दीन-सी होकर) सदा करुणायुक्त वचन बोलने लगती है ॥ १० ॥ अस्मिन् राजकुले चेमौ तुल्यकालनिवासिनौ । इति ब्रुवाणा वाक्यानि सा मां नित्यमतर्जयत् ॥ ११ ॥ ‘क्यों न हो, इस राजपरिवारमें भी तो ये दोनों एक ही समयसे निवास करते हैं?’ इस तरहकी बातें कहकर रानी सुदेष्णा प्रायः नित्य मुझे झिड़का करती हैं ॥ क्रुध्यन्तीं मां च सम्प्रेक्ष्य समशङ्कत मां त्वयि । तस्यां तथा ब्रुवत्यां तु दुःखं मां महदाविशत् ॥ १२ ॥ और मुझे क्रोध करती देख तुम्हारे प्रति मेरे गुप्त प्रेमकी आशंका कर बैठती हैं। जब-जब वे वैसी बातें कहती हैं, उस समय मुझे बहुत दुःख होता है ॥ १२ ॥ त्वय्येवं निरयं प्राप्ते भीमे भीमपराक्रमे । शोके यौधिष्ठिरे मग्ना नाहं जीवितुमुत्सहे ॥ १३ ॥ भीम! भयंकर पराक्रम दिखानेवाले होकर भी तुम ऐसे नरकतुल्य कष्ट भोग रहे हो और उधर महाराज युधिष्ठिरको भी भारी शोक सहन करना पड़ता है। इस प्रकार मैं दुःखके समुद्रमें डूबी हुई हूँ। अब मुझे जीवित रहनेका तनिक भी उत्साह नहीं है ॥ १३ ॥
यः सदेवान् मनुष्यांश्च सर्वांश्चैकरथोऽजयत् । सोऽयं राज्ञो विराटस्य कन्यानां नर्तको युवा ॥ १४ ॥ वह तरुण वीर अर्जुन, जो अकेले ही रथमें बैठकर सम्पूर्ण मनुष्यों तथा देवताओंपर भी विजय पा चुका है, आज राजा विराटकी कन्याओंको नाचना सिखाता है ॥ १४ ॥
योऽतर्पयदमेयात्मा खाण्डवे जातवेदसम् । सोऽन्तःपुरगतः पार्थ कूपेऽग्निरिव संवृतः ॥ १५ ॥ कुन्तीनन्दन! जो असीम आत्मबलसे सम्पन्न है, जिसने खाण्डववनमें साक्षात् अग्निदेवको तृप्त किया था, वही वीर अर्जुन आज कुएँमें पड़ी हुई अग्निकी तरह अन्तःपुरमें छिपा हुआ है ॥ १५ ॥
यस्माद् भयममित्राणां सदैव पुरुषर्षभात् । स लोकपरिभूतेन वेषेणास्ते धनंजयः ॥ १६ ॥ जो पुरुषोंमें श्रेष्ठ है, जिससे शत्रुओंको सदा ही भय प्राप्त होता आया है, वही धनंजय आज लोकनिन्दित नपुंसकवेषमें रह रहा है ॥ १६ ॥
यस्य ज्याक्षेपकठिनौ बाहू परिघसंनिभौ । स शङ्खपरिपूर्णाभ्यां शोचन्नास्ते धनंजयः ॥ १७ ॥ जिसकी परिघ (लोहदण्ड)-के समान मोटी भुजाएँ प्रत्यञ्चा खींचते-खींचते कठोर हो गयी थीं, वही धनंजय आज हाथोंमें शंखकी चूड़ियाँ पहनकर दुःख भोग रहा है ॥ १७ ॥
यस्य ज्यातलनिर्घोषात् समकम्पन्त शत्रवः । स्त्रियो गीतस्वनं तस्य मुदिताः पर्युपासते ॥ १८ ॥ जिसके धनुषकी टंकारसे समस्त शत्रु थर्रा उठते थे, आज अन्तःपुरकी स्त्रियाँ उसीके गीतोंकी ध्वनि सुनती और प्रसन्न होती हैं ॥ १८ ॥
किरीटं सूर्यसंकाशं यस्य मूर्द्धन्यशोभत । वेणीविकृतकेशान्तः सोऽयमद्य धनंजयः ॥ १९ ॥ जिसके मस्तकपर सूर्यके समान तेजस्वी किरीट शोभा पाता था, सिरपर चोटी धारण करनेके कारण उसी अर्जुनके केशोंकी शोभा बिगड़ गयी है ॥ १९ ॥
तं वेणीकृतकेशान्तं भीमधन्वानमर्जुनम् । कन्यापरिवृतं दृष्ट्वा भीम सीदति मे मनः ॥ २० ॥ भीम! भयंकर गाण्डीव धनुष धारण करनेवाले वीर अर्जुनको अपने सिरपर केशोंकी चोटी धारण किये कन्याओंसे घिरा देख मेरा हृदय विषादसे भर जाता है ॥ २० ॥
यस्मिन्नस्त्राणि दिव्यानि समस्तानि महात्मनि । आधारः सर्वविद्यानां स धारयति कुण्डले ॥ २१ ॥ जिस महात्मामें सम्पूर्ण दिव्यास्त्र प्रतिष्ठित हैं तथा जो समस्त विद्याओंका आधार है, वह आज कानोंमें (स्त्रियोंकी भाँति) कुण्डल धारण करता है ॥ २१ ॥
स्प्रष्टुं राजसहस्राणि तेजसाप्रतिमानि वै ।
समरे नाभ्यवर्तन्त वेलामिव महार्णवः ॥ २२ ॥
सोऽयं राज्ञो विराटस्य कन्यानां नर्तको युवा ।
आस्ते वेषप्रतिच्छन्नः कन्यानां परिचारकः ॥ २३ ॥
जैसे महासागर तट सीमाको नहीं लाँघ पाता, उसी प्रकार सहस्रों अप्रतिम तेजवाले
राजा जिस वीरको वशीभूत करनेके लिये आगे न बढ़ सके, वही तरुण अर्जुन इस समय
राजा विराटकी कन्याओंको नाचना सिखा रहा है और हीजड़ेके वेषमें छिपकर उन
कन्याओंकी सेवा करता है ॥ २२-२३ ॥
यस्य स्म रथघोषेण समकम्पत मेदिनी ।
सपर्वतवना भीम सहस्थावरजङ्गमा ॥ २४ ॥
यस्मिन् जाते महाभागे कुन्त्याः शोको व्यनश्यत ।
स शोचयति मामद्य भीमसेन तवानुजः ॥ २५ ॥
भीमसेन! जिसके रथकी घर्घरहाटसे पर्वत, वन और चराचर प्राणियोंसहित सम्पूर्ण
पृथ्वी काँप उठती थी, जिस महान् भाग्यशाली पुत्रके उत्पन्न होनेपर माता कुन्तीका सारा
शोक नष्ट हो गया था, वही तुम्हारा छोटा भाई अर्जुन आज अपनी दुरवस्थाके कारण मुझे
शोकमग्न किये देता है ॥ २४-२५ ॥
भूषितं तमलंकारैः कुण्डलैः परिहाटकैः ।
कम्बुपाणिनमायान्तं दृष्ट्वा सीदति मे मनः ॥ २६ ॥
अर्जुनको स्त्रीजनोचित आभूषणों तथा सुवर्णमय कुण्डलोंसे विभूषित हो हाथोंमें
शंखकी चूड़ियाँ धारण किये आते देख मेरा हृदय दुःखित हो जाता है ॥ २६ ॥
यस्य नास्ति समो वीर्ये कश्चिदुर्व्यां धनुर्धरः ।
सोऽद्य कन्यापरिवृतो गायन्नास्ते धनंजयः ॥ २७ ॥
इस भूतलपर जिसके बल-पराक्रमकी समानता करनेवाला कोई धनुर्धर वीर नहीं है,
वही धनंजय आज राजकन्याओंके बीचमें बैठकर गीत गाया करता है ॥ २७ ॥
धर्मे शौर्ये च सत्ये च जीवलोकस्य सम्मतम् ।
स्त्रीवेषविकृतं पार्थं दृष्ट्वा सीदति मे मनः ॥ २८ ॥
धर्म, शूरवीरता और सत्यभाषणमें जो सम्पूर्ण जीव-जगत्के लिये एक आदर्श था, उसी
अर्जुनको अब स्त्रीवेषमें विकृत हुआ देखकर मेरा हृदय शोकमें डूब जाता है ॥ २८ ॥
यदा ह्येनं परिवृतं कन्याभिर्देवरूपिणम् ।
प्रभिन्नमिव मातङ्गं परिकीर्णं करेणुभिः ॥ २९ ॥
मत्स्यमर्थपतिं पार्थं विराटं समुपस्थितम् ।
पश्यामि तूर्यमध्यस्थं दिशो नश्यन्ति मे तदा ॥ ३० ॥
हथिनियोंसे घिरे हुए गण्डस्थलसे मधुकी धारा बहानेवाले गजराजकी भाँति जब
वाद्ययन्त्रोंके बीचमें बैठे हुए देवरूपधारी कुन्तीनन्दन अर्जुनको (नृत्यशालामें) कन्याओंसे
घिरकर धनपति मत्स्यराज विराटकी सेवामें उपस्थित देखती हूँ, उस समय मेरी आँखोंमें
अँधेरा छा जाता है; मुझे दिशाएँ नहीं सूझती हैं ॥ २९-३० ॥
नूनमार्या न जानाति कृच्छ्रं प्राप्तं धनंजयम् ।
अजातशत्रुं कौरव्यं मग्नं दुर्ध्यूतदेविनम् ॥ ३१ ॥
निश्चय ही मेरी सास कुन्ती नहीं जानती होंगी कि मेरा पुत्र धनंजय ऐसे संकटमें पड़ा है
और खोटे जूएके खेलमें आसक्त कुरुवंशशिरोमणि अजातशत्रु युधिष्ठिर भी शोकमें डूबे हुए
हैं ॥ ३१ ॥
(ऐन्द्रवारुणवायव्यब्राह्माग्नेयैश्च वैष्णवैः ।
अग्नीन् संतर्पयन् पार्थः सर्वांश्चैकरथोऽजयत् ॥
दिव्यैरस्त्रैरचिन्त्यात्मा सर्वशत्रुनिबर्हणः ॥
दिव्यं गान्धर्वमस्त्रं च वायव्यमथ वैष्णवम् ।
ब्राह्मं पाशुपतं चैव स्थूणाकर्णं च दर्शयन् ॥
पौलोमान् कालकेयांश्च इन्द्रशत्रून् महासुरान् ।
निवातकवचैः सार्धं घोरानेकरथोऽजयत् ।
सोऽन्तःपुरगतः पार्थः कूपेऽग्निरिव संवृतः ॥
जिन कुन्तीकुमार अर्जुनने ऐन्द्र, वारुण, वायव्य, ब्राह्म, आग्नेय और वैष्णव अस्त्रोंद्वारा
अग्निदेवको तृप्त करते हुए एकमात्र रथकी सहायतासे सब देवताओंको जीत लिया,
जिनका आत्मबल अचिन्त्य है, जो अपने दिव्यास्त्रोंद्वारा समस्त शत्रुओंका नाश करनेमें
समर्थ हैं, जिन्होंने एकमात्र रथपर आरूढ़ हो दिव्य गान्धर्व, वायव्य, वैष्णव, ब्राह्म, पाशुपत
तथा स्थूणाकर्ण नामक अस्त्रोंका प्रदर्शन करते हुए युद्धमें निवातकवचोंसहित भयंकर
पौलोम और कालकेय आदि महान् असुरोंको, जो इन्द्रसे शत्रुता रखनेवाले थे, परास्त कर
दिया था, वे ही अर्जुन आज अन्तःपुरमें उसी प्रकार छिपे बैठे हैं, जैसे प्रज्वलित अग्नि
कुएँमें ढक दी गयी हो।
कन्यापुरगतं दृष्ट्वा गोष्ठेष्विव महर्षभम् ।
स्त्रीवेषविकृतं पार्थं कुन्तीं गच्छति मे मनः ॥)
जैसे बड़ा भारी साँड़ गोशालाओंमें आबद्ध हो, उसी प्रकार स्त्रियोंके वेषसे विकृत
अर्जुनको कन्याओंके अन्तःपुरमें देखकर मेरा मन बार-बार कुन्तीदेवीकी याद करता है।
तथा दृष्ट्वा यवीयांसं सहदेवं गवां पतिम् ।
गोषु गोवेषमायान्तं पाण्डुभूतास्मि भारत ॥ ३२ ॥
भारत! इसी प्रकार तुम्हारे छोटे भाई सहदेवको, जो गौओंका पालक बनाया गया है,
जब मैं गौओंके बीच ग्वालेके वेशमें आते देखती हूँ, तो मेरा रक्त सूख जाता है और सारा
शरीर पीला पड़ जाता है ।। ३२ ।। सहदेवस्य वृत्तानि चिन्तयन्ती पुनः पुनः । न निद्रामभिगच्छामि भीमसेन कुतो रतिम् ।। ३३ ।। भीमसेन! सहदेवकी दुर्दशाका बार-बार चिन्तन करनेके कारण मुझे कभी नींदतक नहीं आती; फिर सुख कहाँसे मिल सकता है? ।। ३३ ।। न विन्दामि महाबाहो सहदेवस्य दुष्कृतम् । यस्मिन्नेवंविधं दुःखं प्राप्नुयात् सत्यविक्रमः ।। ३४ ।। महाबाहो! जहाँतक मैं जानती हूँ, सहदेवने कभी कोई पाप नहीं किया है, जिससे इस सत्यपराक्रमी वीरको ऐसा दुःख उठाना पड़े ।। ३४ ।। दूयामि भरतश्रेष्ठ दृष्ट्वा ते भ्रातरं प्रियम् । गोषु गोवृषसंकाशं मत्स्येनाभिनिवेशितम् ।। ३५ ।। भरतश्रेष्ठ! साँड़के समान हृष्ट-पुष्ट तुम्हारे प्रिय भ्राता सहदेवको राजा विराटके द्वारा गौओंकी सेवामें लगाया गया देख मुझे बड़ा दुःख होता है ।। ३५ ।। संरब्धं रक्तनेपथ्यं गोपालानां पुरोगमम् । विराटमभिनन्दन्तमथ मे भवति ज्वरः ।। ३६ ।। गेरू आदिसे लाल रंगका शृंगार धारण किये ग्वालोंके अगुआ बने हुए सहदेवको उद्विग्न होनेपर भी जब मैं राजा विराटका अभिनन्दन करते देखती हूँ, तब मुझे बुखार चढ़ आता है ।। ३६ ।। सहदेवं हि मे वीर नित्यमार्या प्रशंसति । महाभिजनसम्पन्नः शीलवान् वृत्तवानिति ।। ३७ ।। वीर! आर्या कुन्ती मुझसे सहदेवकी सदा प्रशंसा किया करती थीं कि यह महान् कुलमें उत्पन्न, शीलवान् और सदाचारी है ।। ३७ ।। ह्रीनिषेवो मधुरवाग्धार्मिकश्च प्रियश्च मे । स तेऽरण्येषु वोढव्यो याज्ञसेनि क्षपास्वपि ।। ३८ ।। सुकुमारश्च शूरश्च राजानं चाप्यनुव्रतः । ज्येष्ठापचायिनं वीरं स्वयं पाञ्चालि भोजयेः ।। ३९ ।। इत्युवाच हि मां कुन्ती रुदती पुत्रगृद्धिनी । प्रव्रजन्तं महारण्यं तं परिष्वज्य तिष्ठती ।। ४० ।। मुझे स्मरण है, जब सहदेव महान् वनमें आने लगे, उस समय पुत्रवत्सला माता कुन्ती उन्हें हृदयसे लगाकर खड़ी हो गयीं और रोती हुई मुझसे यों कहने लगीं—'याज्ञसेनी! सहदेव बड़ा लज्जाशील, मधुरभाषी और धार्मिक है। यह मुझे अत्यन्त प्रिय है। इसे वनमें रात्रिके समय तुम स्वयं सँभालकर (हाथ पकड़कर) ले जाना, क्योंकि यह सुकुमार है (सम्भव है, थकावटके कारण चल न सके)। मेरा सहदेव शूरवीर, राजा युधिष्ठिरका भक्त,
अपने बड़े भाईका पुजारी और वीर है। पाञ्चालराजकुमारी! तुम इसे अपने हाथों भोजन कराना॥ ३८—४०॥ तं दृष्ट्वा व्यापृतं गोषु वत्सचर्मक्षपाशयम्। सहदेवं युधां श्रेष्ठं किं नु जीवामि पाण्डव ॥ ४१ ॥ पाण्डुनन्दन! योद्धाओंमें श्रेष्ठ उसी सहदेवको जब मैं गौओंकी सेवामें तत्पर और बछड़ोंके चमड़ेपर रातमें सोते देखती हूँ, तब किसलिये जीवन धारण करूँ?॥ ४१॥ यस्त्रिभिर्नित्यसम्पन्नो रूपेणास्त्रेण मेधया। सोऽश्वबन्धो विराटस्य पश्य कालस्य पर्ययम् ॥ ४२ ॥ इसी प्रकार जो सुन्दर रूप, अस्त्रबल और मेधाशक्ति—इन तीनोंसे सदा सम्पन्न रहता है, वह वीरवर नकुल आज विराटके यहाँ घोड़े बाँधता है। देखो, कालकी कैसी विपरीत गति है?॥ ४२॥ अभ्यकीर्यन्त वृन्दानि दामग्रन्थिमुदीक्ष्य तम्। विनयन्तं जवेनाश्वान् महाराजस्य पश्यतः ॥ ४३ ॥ जिसे देखकर शत्रुओंके समुदाय बिखर जाते—भाग खड़े होते हैं, वही अब ग्रन्थिक बनकर घोड़ोंकी रास खोलता और बाँधता है तथा महाराजके सामने अश्वोंको वेगसे चलनेकी शिक्षा देता है॥ ४३॥ अपश्यमेनं श्रीमन्तं मत्स्यं भ्राजिष्णुमुत्तमम्। विराटमुपतिष्ठन्तं दर्शयन्तं च वाजिनः ॥ ४४ ॥ मैंने शोभासम्पन्न, तेजस्वी तथा उत्तम रूपवाले नकुलको अपनी आँखों देखा है। वह मत्स्यनरेश विराटको भाँति-भाँतिके घोड़े दिखाता और उनकी सेवामें खड़ा रहता है॥ ४४॥ किं नु मां मन्यसे पार्थ सुखिनीति परंतप। एवं दुःखशताविष्टा युधिष्ठिरनिमित्ततः ॥ ४५ ॥ कुन्तीनन्दन! शत्रुदमन! क्या तुम समझते हो, यह सब देखकर मैं सुखी हूँ। राजा युधिष्ठिरके कारण ऐसे सैकड़ों दुःख मुझे सदा घेरे रहते हैं॥ ४५॥ अतः प्रतिविशिष्टानि दुःखान्यन्यानि भारत। वर्तन्ते मयि कौन्तेय वक्ष्यामि शृणु तान्यपि ॥ ४६ ॥ भारत! कुन्तीकुमार! इनसे भी भारी दूसरे दुःख मुझपर आ पड़े हैं, उनका भी वर्णन करती हूँ, सुनो॥ युष्मासु ध्रियमाणेषु दुःखानि विविधान्युत। शोषयन्ति शरीरं मे किं नु दुःखमतः परम् ॥ ४७ ॥ तुम सबके जीते-जी नाना प्रकारके कष्ट मेरे शरीरको सुखा रहे हैं, इससे बढ़कर दुःख और क्या हो सकता है?॥ ४७॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि कीचकवधपर्वणि द्रौपदीभीमसंवादे एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें द्रौपदीभीमसेनसंवादविषयक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ श्लोक मिलाकर कुल ५२ श्लोक हैं।)
अध्याय (पृष्ठ 2266)
विंशोऽध्यायः
द्रौपदीद्वारा भीमसेनसे अपना दुःख निवेदन करना
द्रौपद्युवाच
अहं सैरन्ध्रिवेषेण चरन्ती राजवेश्मनि ।
शौचदास्मि सुदेष्णाया अक्षधूर्तस्य कारणात् ॥ १ ॥
द्रौपदी कहती है—परंतप! तुम्हारे जूएमें चतुर चालाक भाईके कारण आज मैं राजमहलमें सैरन्ध्रीका वेश धारण करके टहल बजाती और रानी सुदेष्णाको स्नानकी वस्तुएँ जुटाकर देती हूँ ॥ १ ॥
विक्रियां पश्य मे तीव्रां राजपुत्र्याः परंतप ।
आत्मकालमुदीक्षन्ती सर्वं दुःखं क्लान्तवत् ॥ २ ॥
राजपुत्री होकर भी मुझे कैसा भारी हीन कार्य करना पड़ता है, यह अपनी आँखों देख लो; परंतु सब लोग अपने अभ्युदयका अवसर देखते रहते हैं; क्योंकि यदि दुःख आता है तो उसका अन्त भी होता ही है ॥ २ ॥
अनित्या किल मर्त्यानामर्थसिद्धिर्जयाजयौ ।
इति कृत्वा प्रतीक्षामि भर्तृणामुदयं पुनः ॥ ३ ॥
मनुष्योंकी अर्थ-सिद्धि या जय-पराजय अनित्य हैं। वे सदा स्थिर नहीं रहते। यही सोचकर मैं अपने पतियोंके पुनः अभ्युदयकी प्रतीक्षा करती हूँ ॥ ३ ॥
चक्रवत्परिवर्तन्ते ह्यर्थाश्च व्यसनानि च ।
इति कृत्वा प्रतीक्षामि भर्तृणामुदयं पुनः ॥ ४ ॥
धन और व्यसन (सम्पत्ति और विपत्ति) सदा गाड़ीके पहियेकी तरह घूमा करते हैं; ऐसा विचारकर मैं पतियोंके पुनः अभ्युदयकालकी प्रतीक्षा करती हूँ ॥ ४ ॥
य एव हेतुर्भवति पुरुषस्य जयावहः ।
पराजये च हेतुश्च स इति प्रतिपालये ।
किं मां न प्रतिजानीषे भीमसेन मृतामिव ॥ ५ ॥
जो काल मनुष्यके लिये विजयदायक होता है, वही उसकी पराजयका भी कारण बन जाता है। ऐसा विचारकर मैं अपने पक्षकी विजयके अवसरकी राह देखती हूँ। भीमसेन! क्या तुम नहीं जानते कि इन दुःखोंके आघातसे मैं मरी हुई-सी हो गयी हूँ ॥ ५ ॥
दत्त्वा याचन्ति पुरुषा हत्वा वध्यन्ति चापरे ।
पातयित्वा च पात्यन्ते परैरिति च मे श्रुतम् ॥ ६ ॥
मैंने सुना है, जो मनुष्य दान करते हैं, वे ही कभी याचनाके लिये विवश हो जाते हैं। दूसरे बहुत-से मनुष्य ऐसे हैं, जो दूसरोंको मारकर स्वयं भी दूसरोंके द्वारा मारे जाते हैं तथा