भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2252

साहं श्वशुरयोर्मध्ये भ्रातृमध्ये च पाण्डव ।।

केशे गृहीत्वैव सभां नीता जीवति वै त्वयि ।)

पाण्डुनन्दन! इस प्रकार तुम्हारे जीते-जी मेरे केश पकड़कर मुझे दोनों श्वशुरों तथा

दुर्योधन आदि भ्राताओंके बीच राजसभामें लाया गया।

पार्थिवस्य सुता नाम का नु जीवति मादृशी ।

अनुभूयेदृशं दुःखमन्यत्र द्रौपदीं प्रभो ।। ३ ।।

स्वामिन्! मुझ द्रुपदकन्याको छोड़कर दूसरी मेरी-जैसी कौन राजकुमारी होगी, जो

ऐसा दुःख भोगकर जी रही हो ।। ३ ।।

वनवासगतायाश्च सैन्धवेन दुरात्मना ।

परामर्शो द्वितीयो वै सोढुमुत्सहते तु का ।। ४ ।।

वनवासमें जानेपर दुरात्मा सिन्धुराज जयद्रथने जो मेरा स्पर्श कर लिया, यह दूसरा

अपमान था। उसे भी कौन सह सकती है? ।। ४ ।।

(पद्भ्यां पर्यचरं चाहं देशान् विषमसंस्थितान् ।

दुर्गाञ्छ्वापदसंकीर्णांस्त्वयि जीवति पाण्डव ।।

पाण्डुकुमार! तुम्हारे जीते-जी मुझे हिंसक जन्तुओंसे भरे हुए विषम एवं दुर्गम प्रदेशोंमें

पैदल विचरना पड़ा।

ततोऽहं द्वादशे वर्षे वन्यमूलफलाशना ।

इदं पुरमनुप्राप्ता सुदेष्णापरिचारिका ।।

परस्त्रियमुपतिष्ठे सत्यधर्मपथस्थिता ।

तदनन्तर बारहवें वर्षके अन्तमें मैं जंगली फल-मूलोंका आहार करती हुई इस

विराटनगरमें आयी और सुदेष्णाकी सेविका बन गयी। मैं सत्यधर्मके मार्गमें स्थित होकर

आज दूसरी स्त्रीकी सेवा करती हूँ।

गोशीर्षकं पद्मकं च हरिश्यामं च चन्दनम् ।।

नित्यं पिंषे विराटस्य त्वयि जीवति पाण्डव ।।

साहं बहूनि दुःखानि गणयामि न ते कृते ।

द्रुपदस्य सुता चाहं धृष्टद्युम्नस्य चानुजा ।

अग्निकुण्डात् समुद्भूता नोर्व्यां जातु चरामि भोः ।।)

'पाण्डुपुत्र! तुम्हारे जीते-जी मैं प्रतिदिन राजा विराटके लिये गोशीर्ष, पद्मकाष्ठ और

हरिश्याम आदि चन्दन पीसती हूँ। फिर भी तुम्हारे संतोषके लिये मैं ऐसे बहुत-से दुःखोंको

कुछ भी नहीं गिनती। मैं द्रुपदकी पुत्री और धृष्टद्युम्नकी बहिन हूँ। अग्निकुण्डसे मेरी उत्पत्ति

हुई है। मैं कभी धरतीपर पैदल नहीं चलती थी (परंतु अब यहाँ यह दुर्दशा भोग रही हूँ)।

मत्स्यराजसमक्षं तु तस्य धूर्तस्य पश्यतः ।

कीचकेन परामृष्टा का नु जीवति मादृशी ।। ५ ।।