महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः
द्रौपदीका भीमसेनके प्रति अपने दुःखके उद्गार प्रकट करना
वैशम्पायन उवाच
(सा लज्जमाना भीता च अधोमुखमुखी ततः ।
नोवाच किंचिद् वचनं बाष्पदूषितलोचना ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! उस समय लज्जित और भयभीत हुई द्रौपदीके नेत्रोंमें आँसू भर आये थे। वह मुँह नीचा किये मौन बैठी रही; कुछ भी बोल न सकी।
अथाब्रवीद् भीमपराक्रमो बली
वृकोदरः पाण्डवमुख्यसम्मतः ।
प्रब्रूहि किं ते करवाणि सुन्दरि
प्रियं प्रिये वारणखेलगामिनि ॥)
तब पाण्डवप्रवर युधिष्ठिरके परम प्रिय भयंकर पराक्रमी महाबली भीम इस प्रकार बोले—‘सुन्दरि! गजराजकी भाँति लीला-विलासपूर्वक मन्द-गतिसे चलनेवाली प्रिये! बताओ; मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?’।
द्रौपद्युवाच
अशोच्यत्वं कुतस्तस्य यस्या भर्ता युधिष्ठिरः ।
जानन् सर्वाणि दुःखानि किं मां त्वं परिपृच्छसि ॥ १ ॥
**द्रौपदी बोली—**जिस स्त्रीके पति राजा युधिष्ठिर हों, वह बिना शोकके रहे, यह कैसे सम्भव हो सकता है? तुम मेरे सारे दुःखोंको जानते हुए भी मुझसे कैसे पूछते हो? ॥ १ ॥
यन्मां दासीप्रवादेन प्रातिकामी तदानयत् ।
सभापरिषदो मध्ये तन्मां दहति भारत ॥ २ ॥
दुर्योधनके सेवकके रूपमें दुःशासन मुझे दासी कहकर जो उस समय कौरवोंके सभाभवनमें जनसमाजके भीतर घसीट ले गया, वह अपमानकी आग मुझे आजतक जला रही है ॥ २ ॥
(क्षत्रियैस्तत्र कर्णाद्यैर्दृष्टा दुर्योधनेन च ।
श्वशुराभ्यां च भीष्मेण विदुरेण च धीमता ॥
द्रोणेन च महाबाहो कृपेण च परंतप ।
शत्रुओंको संताप देनेवाले महाबाहु भीम! उस समय वहाँ बैठे हुए कर्ण आदि क्षत्रियोंने, दुर्योधनने, मेरे दोनों ससुर भीष्म और बुद्धिमान् विदुरने तथा द्रोणाचार्य और कृपाचार्यने भी मुझे उस दुरवस्थामें देखा था।