महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 476)
षट्षष्टितमोऽध्यायः
राजा नलके द्वारा दावानलसे कर्कोटक नागकी रक्षा तथा नागद्वारा नलको आश्वासन
बृहदश्व उवाच
उत्सृज्य दमयन्तीं तु नलो राजा विशाम्पते ।
ददर्श दावं दह्यन्तं, महान्तं गहने वने ॥ १ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं—युधिष्ठिर! दमयन्तीको छोड़कर जब राजा नल आगे बढ़ गये, तब एक गहन वनमें उन्होंने महान् दावानल प्रज्वलित होते देखा ॥ १ ॥
तत्र शुश्राव शब्दं वै मध्ये भूतस्य कस्यचित् ।
अभिधाव नलेत्युच्चैः पुण्यश्लोकेति चासकृत् ॥ २ ॥
मा भैरिति नलश्चोक्त्वा मध्यमग्नेः प्रविश्य तम् ।
ददर्श नागराजानं शयानं कुण्डलीकृतम् ॥ ३ ॥
उसीके बीचमें उन्हें किसी प्राणीका यह शब्द सुनायी पड़ा—‘पुण्यश्लोक महाराज नल! दौड़िये, मुझे बचाइये।’ उच्च स्वरसे बार-बार दोहरायी गयी इस वाणीको सुनकर राजा नलने कहा—‘डरो मत’। इतना कहकर वे आगके भीतर घुस गये। वहाँ उन्होंने देखा, एक नागराज कुण्डलाकार पड़ा हुआ सो रहा है ॥ २-३ ॥
स नागः प्राञ्जलिर्भूत्वा वेपमानो नलं तदा ।
उवाच मां विद्धि राजन् नागं कर्कोटकं नृप ॥ ४ ॥
मया प्रलब्धो ब्रह्मर्षिर्नारदः सुमहातपाः ।
तेन मन्युपरीतेन शप्तोऽस्मि मनुजाधिप ॥ ५ ॥
तिष्ठ त्वं स्थावर इव यावदेव नलः क्वचित् ।
इतो नेता हि तत्र त्वं शापान्मोक्ष्यसि मत्कृतात् ॥ ६ ॥
उस नागने हाथ जोड़कर काँपते हुए नलसे उस समय इस प्रकार कहा—‘राजन्! मुझे कर्कोटक नाग समझिये। नरेश्वर! एक दिन मेरे द्वारा महातपस्वी ब्रह्मर्षि नारद ठगे गये, अतः मनुजेश्वर! उन्होंने क्रोधसे आविष्ट होकर मुझे शाप दे दिया—‘तुम स्थावर वृक्षकी भाँति एक जगह पड़े रहो, जब कभी राजा नल आकर तुम्हें यहाँसे अन्यत्र ले जायँगे, तभी तुम मेरे शापसे छुटकारा पा सकोगे’ ॥
तस्य शापान्न शक्तोऽस्मि पदाद् विचलितुं पदम् ।
उपदेक्ष्यामि ते श्रेयस्त्रातुमर्हति मां भवान् ॥ ७ ॥
'राजन्! नारदजीके उस शापसे मैं एक पग भी चल नहीं सकता; आप मुझे बचाइये, मैं आपको कल्याणकारी उपदेश दूँगा ॥ ७ ॥
सखा च ते भविष्यामि मत्समो नास्ति पन्नगः ।
लघुश्च ते भविष्यामि शीघ्रमादाय गच्छ माम् ॥ ८ ॥
'साथ ही मैं आपका मित्र हो जाऊँगा। सर्पोंमें मेरे-जैसा प्रभावशाली दूसरा कोई नहीं है। मैं आपके लिये हलका हो जाऊँगा। आप शीघ्र मुझे लेकर यहाँसे चल दीजिये' ॥ ८ ॥
एवमुक्त्वा स नागेन्द्रो बभूवाङ्गुष्ठमात्रकः ।
तं गृहीत्वा नलः प्रायाद् देशं दावविवर्जितम् ॥ ९ ॥
इतना कहकर नागराज कर्कोटक अँगूठेके बराबर हो गया। उसे लेकर राजा नल वनके उस प्रदेशकी ओर चले गये, जहाँ दावानल नहीं था ॥ ९ ॥
आकाशदेशमासाद्य विमुक्तं कृष्णवर्त्मना ।
उत्स्रष्टुकामं तं नागः पुनः कर्कोटकोऽब्रवीत् ॥ १० ॥
अग्निके प्रभावसे रहित आकाश-देशमें पहुँचनेपर जब नलने उस नागको छोड़नेका विचार किया, उस समय कर्कोटकने फिर कहा— ॥ १० ॥
पदानि गणयन् गच्छ स्वानि नैषध कानिचित् ।
तत्र तेऽहं महाबाहो श्रेयो धास्यामि यत् परम् ॥ ११ ॥
'नैषध! आप अपने कुछ पग गिनते हुए चलिये। महाबाहो! ऐसा करनेपर मैं आपके लिये परम कल्याणका साधन करूँगा' ॥ ११ ॥
ततः संख्यातुमारब्धमदशद् दशमे पदे ।
तस्य दष्टस्य तद् रूपं क्षिप्रमन्तरधीयत ॥ १२ ॥
तब राजा नलने अपने पग गिनने आरम्भ किये। पग गिनते-गिनते जब राजा नलने 'दश' कहा, तब नागने उन्हें डँस लिया। उसके डँसते ही उनका पहला रूप तत्काल अन्तर्हित (होकर श्यामवर्ण) हो गया ॥ १२ ॥
स दृष्ट्वा विस्मितस्तस्थावात्मानं विकृतं नलः ।
स्वरूपधारिणं नागं ददर्श स महीपतिः ॥ १३ ॥
अपने रूपको इस प्रकार विकृत (गौरवर्णसे श्यामवर्ण) हुआ देख राजा नलको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने अपने पूर्वस्वरूपको धारण करके खड़े हुए कर्कोटक नागको देखा ॥ १३ ॥
ततः कर्कोटको नागः सान्त्वयन् नलमब्रवीत् ।
मया तेऽन्तर्हितं रूपं न त्वां विद्युर्जना इति ॥ १४ ॥
तब कर्कोटक नागने राजा नलको सान्त्वना देते हुए कहा—'राजन्! मैंने आपके पहले रूपको इसलिये अदृश्य कर दिया है कि लोग आपको पहचान न सकें ॥ १४ ॥
यत्कृते चासि निकृतो दुःखेन महता नल ।
विषेण स मदीयेन त्वयि दुःखं निवत्स्यति ॥ १५ ॥ 'महाराज नल! जिस कलियुगके कपटसे आपको महान् दुःखका सामना करना पड़ा है, वह मेरे विषसे दग्ध होकर आपके भीतर बड़े कष्टसे निवास करेगा ॥ १५ ॥
विषेण संवृतैर्गात्रैर्यावत् त्वां न विमोक्ष्यति । तावत् त्वयि महाराज दुःखं वै स निवत्स्यति ॥ १६ ॥ 'कलियुगके सारे अंग मेरे विषसे व्याप्त हो जायँगे। महाराज! वह जबतक आपको छोड़ नहीं देगा, तबतक आपके भीतर बड़े दुःखसे निवास करेगा ॥ १६ ॥
अनागा येन निकृतस्त्वमनर्हो जनाधिप । क्रोधादसूययित्वा तं रक्षा मे भवतः कृता ॥ १७ ॥ 'नरेश्वर! आप छल-कपटद्वारा सताये जानेयोग्य नहीं थे, तो भी जिसने बिना किसी अपराधके आपके साथ कपटका व्यवहार किया है, उसीके प्रति क्रोधसे दोषदृष्टि रखकर मैंने आपकी रक्षा की है ॥ १७ ॥
न ते भयं नरव्याघ्र दंष्ट्रिभ्यः शत्रुतोऽपि वा । ब्रह्मविद्भ्यश्च भविता मत्प्रसादान्नराधिप ॥ १८ ॥ 'नरव्याघ्र महाराज! मेरे प्रसादसे आपको दाढ़ोंवाले जन्तुओं और शत्रुओंसे तथा वेदवेत्ताओंके शाप आदिसे भी कभी भय नहीं होगा ॥ १८ ॥
राजन् विषनिमित्ता च न ते पीडा भविष्यति । संग्रामेषु च राजेन्द्र शश्वज्जयमवाप्स्यसि ॥ १९ ॥ 'राजन्! आपको विषजनित पीड़ा कभी नहीं होगी। राजेन्द्र! आप युद्धमें भी सदा विजय प्राप्त करेंगे ॥ १९ ॥ गच्छ राजन्नितः सूतो बाहुकोऽहमिति ब्रुवन् । समीपमृतुपर्णस्य स हि चैवाक्षनैपुणः ॥ २० ॥ 'राजन्! अब आप यहाँसे अपनेको बाहुक नामक सूत बताते हुए राजा ऋतुपर्णके समीप जाइये। वे द्यूतविद्यामें बड़े निपुण हैं ॥ २० ॥ अयोध्यां नगरीं रम्यामद्य वै निषधेश्वर । स तेऽक्षहृदयं दाता राजाश्वहृदयेन वै ॥ २१ ॥ इक्ष्वाकुकुलजः श्रीमान् मित्रं चैव भविष्यति । भविष्यसि यदाक्षज्ञः श्रेयसा योक्ष्यसे तदा ॥ २२ ॥ 'निषधेश्वर! आप आज ही रमणीय अयोध्यापुरीको चले जाइये। इक्ष्वाकुकुलमें उत्पन्न श्रीमान् राजा ऋतुपर्ण आपसे अश्वविद्याका रहस्य सीखकर बदलेमें आपको द्यूतक्रीड़ाका रहस्य बतलायेंगे और आपके मित्र भी हो जायँगे। जब आप द्यूतविद्याके ज्ञाता होंगे, तब पुनः कल्याणभागी हो जायँगे ॥ २१-२२ ॥ सममेष्यसि दारैस्त्वं मा स्म शोके मनः कृथाः । राज्येन तनयाभ्यां च सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ २३ ॥ 'मैं सच कहता हूँ, आप एक ही साथ अपनी पत्नी, दोनों संतानों तथा राज्यको प्राप्त कर लेंगे; अतः अपने मनमें चिन्ता न कीजिये ॥ २३ ॥ स्वं रूपं च यदा द्रष्टुमिच्छेथास्त्वं नराधिप । संस्मर्त्तव्यस्तदा तेऽहं वासश्चेदं निवासयेः ॥ २४ ॥ 'नरेश्वर! जब आप अपने (पहलेवाले) रूपको देखना चाहें, उस समय मेरा स्मरण करें और इस कपड़ेको ओढ़ लें ॥ २४ ॥ अनेन वाससाच्छन्नः स्वं रूपं प्रतिपत्स्यसे । इत्युक्त्वा प्रददौ तस्मै दिव्यं वासोयुगं तदा ॥ २५ ॥ 'इस वस्त्रसे आच्छादित होते ही आप अपना पहला रूप प्राप्त कर लेंगे।' ऐसा कहकर नागने उन्हें दो दिव्य वस्त्र प्रदान किये ॥ २५ ॥ एवं नलं च संदिश्य वासो दत्त्वा च कौरव । नागराजस्ततो राजंस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ २६ ॥ कुरुनन्दन युधिष्ठिर! इस प्रकार राजा नलको संदेश और वस्त्र देकर नागराज कर्कोटक वहीं अन्तर्धान हो गया ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलकर्कोटकसंवादे षट्षष्टितमोऽध्यायः ।। ६६ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलकर्कोटकसंवादविषयक छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६६ ।।
अध्याय (पृष्ठ 481)
सप्तषष्टितमोऽध्यायः
राजा नलका ऋतुपर्णके यहाँ अश्वाध्यक्षके पदपर नियुक्त होना और वहाँ दमयन्तीके लिये निरन्तर चिन्तित रहना तथा उनकी जीवलसे बातचीत
बृहदश्व उवाच
तस्मिन्नन्तर्हिते नागे प्रययौ नैषधो नलः ।
ऋतुपर्णस्य नगरं प्राविशद् दशमेऽहनि ॥ १ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं—कर्कोटक नागके अन्तर्धान हो जानेपर निषधनरेश नलने दसवें दिन राजा ऋतुपर्णके नगरमें प्रवेश किया ॥ १ ॥
स राजानमुपातिष्ठद् बाहुकोऽहमिति ब्रुवन् ।
अश्वानां वाहने युक्तः पृथिव्यां नास्ति मत्समः ॥ २ ॥
वे बाहुक नामसे अपना परिचय देते हुए राजा ऋतुपर्णके यहाँ उपस्थित हुए और बोले—‘घोड़ोंको हाँकनेकी कलामें इस पृथ्वीपर मेरे समान दूसरा कोई नहीं है ॥ २ ॥
अर्थकृच्छ्रेषु चैवाहं प्रष्टव्यो नैपुणेषु च ।
अन्नसंस्कारमपि च जानाम्यन्यैर्विशेषतः ॥ ३ ॥
‘मैं इन दिनों अर्थसंकटमें हूँ। आपको किसी भी कलाकी निपुणताके विषयमें सलाह लेनी हो तो मुझसे पूछ सकते हैं। अन्न-संस्कार (भाँति-भाँतिकी रसोई बनानेका कार्य) भी मैं दूसरोंकी अपेक्षा विशेष जानता हूँ ॥ ३ ॥
यानि शिल्पानि लोकेऽस्मिन् यच्चैवान्यत् सुदुष्करम् ।
सर्वं यतिष्ये तत् कर्तुमृतुपर्ण भरस्व माम् ॥ ४ ॥
‘इस जगत्में जितनी भी शिल्पकलाएँ हैं तथा दूसरे भी जो अत्यन्त कठिन कार्य हैं, मैं उन सबको अच्छी तरह करनेका प्रयत्न कर सकता हूँ। महाराज ऋतुपर्ण! आप मेरा भरण-पोषण कीजिये’ ।। ४ ।।
ऋतुपर्ण उवाच
वस बाहुक भद्रं ते सर्वमेतत् करिष्यसि । शीघ्रयाने सदा बुद्धिर्ध्रियते मे विशेषतः ।। ५ ।। **ऋतुपर्णने कहा—**बाहुक! तुम्हारा भला हो। तुम मेरे यहाँ निवास करो। ये सब कार्य तुम्हें करने होंगे। मेरे मनमें सदा यही विचार विशेषतः रहता है कि मैं शीघ्रतापूर्वक कहीं भी पहुँच सकूँ ।। ५ ।। स त्वमातिष्ठ योगं तं येन शीघ्रा हया मम । भवेयुरश्वाध्यक्षोऽसि वेतनं ते शतं शतम् ।। ६ ।। अतः तुम ऐसा उपाय करो, जिससे मेरे घोड़े शीघ्रगामी हो जायँ। आजसे तुम हमारे अश्वाध्यक्ष हो। दस हजार मुद्राएँ तुम्हारा वार्षिक वेतन है ।। ६ ।। त्वामुपस्थास्यतश्चैव नित्यं वार्ष्णेयजीवलौ । एताभ्यां रंस्यसे सार्धं वस वै मयि बाहुक ।। ७ ।।
वार्ष्णेय और जीवल—ये दोनों सारथि तुम्हारी सेवामें रहेंगे। बाहुक! इन दोनोंके साथ तुम बड़े सुखसे रहोगे। तुम मेरे यहाँ रहो ॥ ७॥
बृहदश्व उवाच
एवमुक्तो नलस्तेन न्यवसत् तत्र पूजितः ।
ऋतुपर्णस्य नगरे सहवार्ष्णेयजीवलः ॥ ८ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं— राजन्! राजाके ऐसा कहनेपर नल वार्ष्णेय और जीवलके साथ सम्मानपूर्वक ऋतुपर्णके नगरमें निवास करने लगे ॥ ८ ॥
स वै तत्रावसद् राजा वैदर्भीमनुचिन्तयन् ।
सायं सायं सदा चेमं श्लोकमेकं जगाद ह ॥ ९ ॥
वे दमयन्तीका निरन्तर चिन्तन करते हुए वहाँ रहने लगे। वे प्रतिदिन सायंकाल इस एक श्लोकको पढ़ा करते थे— ॥ ९ ॥
क्व नु सा क्षुत्पिपासार्ता श्रान्ता शेते तपस्विनी ।
स्मरन्ती तस्य मन्दस्य कं वा साद्योपतिष्ठति ॥ १० ॥
‘भूख-प्याससे पीड़ित और थकी-माँदी वह तपस्विनी उस मन्दबुद्धि पुरुषका स्मरण करती हुई कहाँ सोती होगी तथा अब वह किसके समीप रहती होगी?’ ॥ १० ॥
एवं ब्रुवन्तं राजानं निशायां जीवलोऽब्रवीत् ।
कामेनां शोचसे नित्यं श्रोतुमिच्छामि बाहुक ॥ ११ ॥
एक दिन रात्रिके समय जब राजा इस प्रकार बोल रहे थे ‘जीवलने पूछा—बाहुक! तुम प्रतिदिन किस स्त्रीके लिये शोक करते हो, मैं सुनना चाहता हूँ ॥ ११ ॥
आयुष्मन् कस्य वा नारी यामेवमनुशोचसि ।
तमुवाच नलो राजा मन्दप्रज्ञस्य कस्यचित् ॥ १२ ॥
आसीद् बहुमता नारी तस्यादृढ़तरं वचः ।
स वै केनचिदर्थेन तया मन्दो व्ययुज्यत ॥ १३ ॥
‘आयुष्मन्! वह किसकी पत्नी है, जिसके लिये तुम इस प्रकार निरन्तर शोकमग्न रहते हो।’ तब राजा नलने उससे कहा—‘किसी अल्पबुद्धि पुरुषके एक स्त्री थी, जो उसके अत्यन्त आदरकी पात्र थी। किंतु उस पुरुषकी बात अत्यन्त दृढ़ नहीं थी। वह अपनी प्रतिज्ञासे फिसल गया। किसी विशेष प्रयोजनसे विवश होकर वह भाग्यहीन पुरुष अपनी पत्नीसे बिछुड़ गया ॥ १२-१३ ॥
विप्रयुक्तः स मन्दात्मा भ्रमत्यसुखपीडितः ।
दह्यमानः स शोकेन दिवारात्रमतन्द्रितः ॥ १४ ॥
‘पत्नीसे विलग होकर वह मन्दबुद्धि मानव दिन-रात शोकाग्निसे दग्ध एवं दुःखसे पीड़ित होकर आलस्यसे रहित हो इधर-उधर भटकता रहता है ॥ १४ ॥
निशाकाले स्मरंस्तस्याः श्लोकमेकं स्म गायति । स विभ्रमन् महीं सर्वां क्वचिदासाद्य किंचन ।। १५ ।। वसन्यनर्हस्तद् दुःखं भूय एवानुसंस्मरन् । 'रातमें उसीका स्मरण करके वह एक श्लोकको गाया करता है। सारी पृथ्वीका चक्कर लगाकर वह कभी किसी स्थानमें पहुँचा और वहीं निरन्तर उस प्रियतमाका स्मरण करके दुःख भोगता रहता है। यद्यपि वह उस दुःखको भोगनेके योग्य है नहीं ।। १५ १/२ ।। सा तु तं पुरुषं नारी कृच्छ्रेऽप्यनुगता वने ।। १६ ।। त्यक्ता तेनाल्पपुण्येन दुष्करं यदि जीवति । एका बालानभिज्ञा च मार्गाणामतथोचिता ।। १७ ।। 'वह नारी इतनी पतिव्रता थी कि संकटकालमें भी उस पुरुषके पीछे-पीछे वनमें चली गयी; किंतु उस अल्प पुण्यवाले पुरुषने उसे वनमें ही त्याग दिया। अब तो यदि वह जीवित होगी तो बड़े कष्टसे उसके दिन बीतते होंगे। वह स्त्री अकेली थी। उसे मार्गका ज्ञान नहीं था। जिस संकटमें वह पड़ी थी, उसके योग्य वह कदापि नहीं थी ।। १६-१७ ।। क्षुत्पिपासापरीताङ्गी दुष्करं यदि जीवति । श्वापदाचरिते नित्यं वने महति दारुणे ।। १८ ।। त्यक्ता तेनाल्पभाग्येन मन्दप्रज्ञेन मारिष । इत्येवं नैषधो राजा दमयन्तीमनुस्मरन् ।। अज्ञातवासं न्यवसद् राज्ञस्तस्य निवेशने ।। १९ ।। 'भूख और प्याससे उसके अंग व्याप्त हो रहे थे। उस दशामें परित्यक्त होकर वह यदि जीवित भी हो तो भी उसका जीवित रहना बहुत कठिन है। आर्य जीवल! अत्यन्त भयंकर विशाल वनमें जहाँ नित्य-निरन्तर हिंसक जन्तु विचरते रहते हैं, उस मन्दबुद्धि एवं मन्दभाग्य पुरुषने उसका त्याग कर दिया था।' इस प्रकार निषधनरेश राजा नल दमयन्तीका निरन्तर स्मरण करते हुए राजा ऋतुपर्णके यहाँ अज्ञातवास कर रहे थे ।। १८-१९ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलविलापे सप्तषष्टितमोऽध्यायः ।। ६७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलविलापविषयक सड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६७ ।।
अध्याय (पृष्ठ 485)
अष्टषष्टितमोऽध्यायः
विदर्भराजका नल-दमयन्तीकी खोजके लिये ब्राह्मणोंको भेजना, सुदेव ब्राह्मणका चेदिराजके भवनमें जाकर मन-ही-मन दमयन्तीके गुणोंका चिन्तन और उससे भेंट करना
बृहदश्व उवाच
हृतराज्ये नले भीमः सभार्ये च वनं गते ।
द्विजान् प्रस्थापयामास नलदर्शनकाङ्क्षया ॥ १ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं—राजन्! राज्यका अपहरण हो जानेपर जब राजा नल पत्नीसहित वनमें चले गये, तब विदर्भनरेश भीमने नलका पता लगानेके लिये बहुत-से ब्राह्मणोंको इधर-उधर भेजा ॥ १ ॥
संदिदेश च तान् भीमो वसु दत्त्वा च पुष्कलम् ।
मृगयध्वं नलं चैव दमयन्तीं च मे सुताम् ॥ २ ॥
राजा भीमने प्रचुर धन देकर ब्राह्मणोंको यह संदेश दिया—'आपलोग राजा नल और मेरी पुत्री दमयन्तीकी खोज करें' ॥ २ ॥
अस्मिन् कर्मणि सम्पन्ने विज्ञाते निषधाधिपे ।
गवां सहस्रं दास्यामि यो वस्तावानयिष्यति ॥ ३ ॥
'निषधनरेश नलका पता लग जानेपर जब यह कार्य सम्पन्न हो जायगा, तब मैं आपलोगोंमेंसे जो भी नल-दमयन्तीको यहाँ ले आयेगा, उसे एक हजार गौएँ दूँगा ॥ ३ ॥
अग्रहारांश्च दास्यामि ग्रामं नगरसम्मितम् ।
न चेच्छक्याविहानेतुं दमयन्ती नलोऽपि वा ॥ ४ ॥
ज्ञातमात्रेऽपि दास्यामि गवां दशशतं धनम् ।
'साथ ही जीविकाके लिये अग्रहार (करमुक्त भूमि) दूँगा और ऐसा गाँव दे दूँगा, जो आयमें नगरके समान होगा। यदि नल-दमयन्तीमेंसे किसी एकको या दोनोंको ही यहाँ ले आना सम्भव न हो सके तो केवल उनका पता लग जानेपर भी मैं एक हजार गोधन दान करूँगा' ॥ ४ ½ ॥
इत्युक्तास्ते ययुर्हृष्टा ब्राह्मणाः सर्वतो दिशम् ॥ ५ ॥
पुरराष्ट्राणि चिन्वन्तो नैषधं सह भार्यया ।
नैव क्वापि प्रपश्यन्ति नलं वा भीमपुत्रिकाम् ॥ ६ ॥
ततश्चेदिपुरीं रम्यां सुदेवो नाम वै द्विजः ।
विचिन्वानोऽथ वैदर्भीमपश्यद् राजवेश्मनि ॥ ७ ॥
राजाके ऐसा कहनेपर वे सब ब्राह्मण बड़े प्रसन्न होकर सब दिशाओंमें चले गये और नगर तथा राष्ट्रोंमें पत्नीसहित निषधनरेश नलका अनुसंधान करने लगे; परंतु कहीं भी वे नल अथवा भीमकुमारी दमयन्तीको नहीं देख पाते थे। तदनन्तर सुदेव नामक ब्राह्मणने पता लगाते हुए रमणीय चेदिनगरीमें जाकर वहाँ राजमहलमें विदर्भकुमारी दमयन्तीको देखा ।। ५–७ ।। पुण्याहवाचने राज्ञः सुनन्दासहितां स्थिताम् । मन्दं प्रख्यायमानेन रूपेणाप्रतिमेन ताम् ॥ ८ ॥ निबद्धां धूमजालेन प्रभामिव विभावसोः । तां समीक्ष्य विशालाक्षीमधिकं मलिनां कृशाम् । तर्कयामास भैमीति कारणैरुपपादयन् ॥ ९ ॥ वह राजाके पुण्याहवाचनके समय सुनन्दाके साथ खड़ी थी। उसका अनुपम रूप (मैलसे आवृत होनेके कारण) मन्द-मन्द प्रकाशित हो रहा था, मानो अग्निकी प्रभा धूमसमूहसे आवृत हो रही हो। विशाल नेत्रोंवाली उस राजकुमारीको अधिक मलिन और दुर्बल देख उपर्युक्त कारणोंसे उसकी पहचान करते हुए सुदेवने निश्चय किया कि यह भीमकुमारी दमयन्ती ही है ।। ८-९ ।।
सुदेव उवाच
यथेयं मे पुरा दृष्टा तथारूपेयमङ्गना । कृतार्थोऽस्म्यद्य दृष्ट्वेमां लोककान्तामिव श्रियम् ॥ १० ॥ सुदेव मन-ही-मन बोले—मैंने पहले जिस रूपमें इस कल्याणमयी राजकन्याको देखा है, वैसी ही यह आज भी है। लोककमनीय लक्ष्मीकी भाँति इस भीमकुमारीको देखकर आज मैं कृतार्थ हो गया हूँ ।। १० ।। पूर्णचन्द्रनिभां श्यामां चारुवृत्तपयोधराम् । कुर्वन्तीं प्रभया देवीं सर्वा वितिमिरा दिशः ॥ ११ ॥ यह श्यामा युवती पूर्ण चन्द्रमाके समान कान्तिमती है। इसके स्तन बड़े मनोहर हैं। यह देवी अपनी प्रभासे सम्पूर्ण दिशाओंको आलोकित कर रही है ।। ११ ।। चारुपद्मविशालाक्षीं मन्मथस्य रतीमिव । इष्टां समस्तलोकस्य पूर्णचन्द्रप्रभामिव ॥ १२ ॥ उसके बड़े-बड़े नेत्र मनोहर कमलोंकी शोभाको लज्जित कर रहे हैं। यह कामदेवकी रति-सी जान पड़ती है। पूर्णिमाके चन्द्रमाकी चाँदनीके समान यह सब लोगोंके लिये प्रिय है ।। १२ ।। विदर्भसरसस्तस्माद् दैवदोषादिवोद्धृताम् । मलपङ्कानुलिप्ताङ्गीं मृणालीमिव चोद्धृताम् ॥ १३ ॥
पौर्णमासीमिव निशां राहुग्रस्तनिशाकराम् । पतिशोकाकुलां दीनां शुष्कस्रोतां नदीमिव ॥ १४ ॥ विदर्भरूपी सरोवरसे यह कमलिनी मानो प्रारब्धके दोषसे निकाल ली गयी है। इसके मलिन अंग कीचड़ लिपटी हुई नलिनीके समान प्रतीत होते हैं। यह उस पूर्णिमाकी रजनीके समान जान पड़ती है, जिसके चन्द्रमापर मानो राहुने ग्रहण लगा रखा हो। पति-शोकसे व्याकुल और दीन होनेके कारण यह सूखे जल-प्रवाहवाली सरिताके समान प्रतीत होती है ॥ १३-१४ ॥
विध्वस्तपर्णकमलां वित्रासितविहंगमाम् । हस्तिहस्तपरामृष्टां व्याकुलामिव पद्मिनीम् ॥ १५ ॥ इसकी दशा उस पुष्करिणीके समान दिखायी देती है, जिसे हाथियोंने अपने शुण्डदण्डसे मथ डाला हो तथा जो नष्ट हुए पत्तोंवाले कमलसे युक्त हो एवं जिसके भीतर निवास करनेवाले पक्षी अत्यन्त भयभीत हो रहे हों। यह दुःखसे अत्यन्त व्याकुल-सी प्रतीत हो रही है ॥ १५ ॥
सुकुमारीं सुजाताङ्गीं रत्नगर्भगृहोचिताम् । दह्यमानामिवार्केण मृणालीमिव चोद्धृताम् ॥ १६ ॥ मनोहर अंगोंवाली यह सुकुमारी राजकन्या उन महलोंमें रहनेयोग्य है, जिनका भीतरी भाग रत्नोंका बना हुआ है। (इस समय दुःखने इसे ऐसा दुर्बल कर दिया है कि) यह सरोवरसे निकाली और सूर्यकी किरणोंसे जलायी हुई कमलिनीके समान प्रतीत हो रही है ॥ १६ ॥
रूपौदार्यगुणोपेतां मण्डनार्हाममण्डिताम् । चन्द्रलेखामिव नवां व्योम्नि नीलाभ्रसंवृताम् ॥ १७ ॥ यह रूप और उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न है। शृंगार धारण करनेके योग्य होनेपर भी यह शृंगारशून्य है, मानो आकाशमें मेघोंकी काली घटासे आवृत नूतन चन्द्रकला हो ॥ १७ ॥
कामभोगैः प्रियैर्हीनां हीनां बन्धुजनेन च । देहं संधारयन्तीं हि भर्तृदर्शनकाङ्क्षया ॥ १८ ॥ यह राजकन्या प्रिय कामभोगोंसे वंचित है। अपने बन्धुजनोंसे बिछुड़ी हुई है और पतिके दर्शनकी इच्छासे अपने (दीन-दुर्बल) शरीरको धारण कर रही है ॥ १८ ॥
भर्ता नाम परं नार्या भूषणं भूषणैर्विना । एषा हि रहिता तेन शोभमाना न शोभते ॥ १९ ॥ वास्तवमें पति ही नारीका सबसे श्रेष्ठ आभूषण है। उसके होनेसे वह बिना आभूषणोंके सुशोभित होती है; परंतु यह पतिरूप आभूषणसे रहित होनेके कारण शोभामयी होकर भी सुशोभित नहीं हो रही है ॥ १९ ॥
दुष्करं कुरुतेऽत्यन्तं हीनो यदनया नलः ।
धारयत्यात्मनो देहं न शोकेनापि सीदति ॥ २० ॥
इससे विलग होकर राजा नल यदि अपने शरीरको धारण करते हैं और शोकसे शिथिल नहीं हो रहे हैं तो यह समझना चाहिये कि वे अत्यन्त दुष्कर कर्म कर रहे हैं ॥ २० ॥
इमामसितकेशान्तां शतपत्रायतेक्षणाम् ।
सुखार्हां दुःखितां दृष्ट्वा ममापि व्यथते मनः ॥ २१ ॥
काले-काले केशों और कमलके समान विशाल नेत्रोंसे सुशोभित इस राजकन्याको, जो सदा सुख भोगनेके ही योग्य है, दुःखित देखकर मेरे मनमें भी बड़ी व्यथा हो रही है ॥ २१ ॥
कदा नु खलु दुःखस्य पारं यास्यति वै शुभा ।
भर्तुः समागमात् साध्वी रोहिणी शशिनो यथा ॥ २२ ॥
जैसे रोहिणी चन्द्रमाके संयोगसे सुखी होती है, उसी प्रकार यह शुभलक्षणा साध्वी राजकुमारी अपने पतिके समागमसे (संतुष्ट हो) कब इस दुःखके समुद्रसे पार हो सकेगी ॥ २२ ॥
अस्या नूनं पुनर्लाभान्नैषधः प्रीतिमेष्यति ।
राजा राज्यपरिभ्रष्टः पुनर्लब्ध्वा च मेदिनीम् ॥ २३ ॥
जैसे कोई राजा एक बार अपने राज्यसे च्युत होकर फिर उसी राज्यभूमिको प्राप्त कर लेनेपर अत्यन्त आनन्दका अनुभव करता है, उसी प्रकार पुनः इसके मिल जानेपर निषधनरेश नलको निश्चय ही बड़ी प्रसन्नता होगी ॥ २३ ॥
तुल्यशीलवयोयुक्तां तुल्याभिजनसंवृताम् ।
नैषधोऽर्हति वैदर्भीं तं चेयमसितेक्षणा ॥ २४ ॥
विदर्भकुमारी दमयन्ती राजा नलके समान शील और अवस्थासे युक्त है, उन्हींके तुल्य उत्तम कुलसे सुशोभित है। निषधनरेश नल विदर्भकुमारीके योग्य हैं और यह कजरारे नेत्रोंवाली वैदर्भी नलके योग्य है ॥ २४ ॥
युक्तं तस्याप्रमेयस्य वीर्यसत्त्ववतो मया ।
समाश्वासयितुं भार्यां पतिदर्शनलालसाम् ॥ २५ ॥
राजा नलका पराक्रम और धैर्य असीम है। उनकी यह पत्नी पतिदर्शनके लिये लालायित और उत्कण्ठित है, अतः मुझे इससे मिलकर इसे आश्वासन देना चाहिये ॥ २५ ॥
अहमाश्वासयाम्येनां पूर्णचन्द्रनिभाननाम् ।
अदृष्टपूर्वां दुःखस्य दुःखार्तां ध्यानतत्पराम् ॥ २६ ॥
इस पूर्णचन्द्रमुखी राजकुमारीने पहले कभी दुःखको नहीं देखा था। इस समय दुःखसे आतुर हो पतिके ध्यानमें परायण है, अतः मैं इसे आश्वासन देनेका विचार कर रहा
हूँ॥ २६ ॥
बृहदश्व उवाच
एवं विमृश्य विविधैः कारणैर्लक्षणैश्च ताम्।
उपागम्य ततो भैमीं सुदेवो ब्राह्मणोऽब्रवीत् ॥ २७ ॥
अहं सुदेवो वैदर्भि भ्रातुस्ते दयितः सखा।
भीमस्य वचनाद् राजंस्त्वामन्वेष्टुमिहागतः ॥ २८ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं— युधिष्ठिर! इस प्रकार भाँति-भाँतिके कारणों और लक्षणोंसे दमयन्तीको पहचानकर और अपने कर्तव्यके विषयमें विचार करके सुदेव ब्राह्मण उसके समीप गये और इस प्रकार बोले—'विदर्भराजकुमारी! मैं तुम्हारे भाईका प्रिय सखा सुदेव हूँ। महाराज भीमकी आज्ञासे तुम्हारी खोज करनेके लिये यहाँ आया हूँ॥ २७-२८॥
कुशली ते पिता राज्ञि जननी भ्रातरश्च ते।
आयुष्मन्तौ कुशलिनौ तत्रस्थौ दारकौ च तौ ॥ २९ ॥
'निषधदेशकी महारानी! तुम्हारे पिता, माता और भाई सब सकुशल हैं और कुण्डिनपुरमें जो तुम्हारे बालक हैं, वे भी कुशलसे हैं॥ २९॥
त्वत्कृते बन्धुवर्गाश्च गतसत्त्वा इवासते।
अन्वेष्टारो ब्राह्मणाश्च भ्रमन्ति शतशो महीम् ॥ ३० ॥
'तुम्हारे बन्धु-बान्धव तुम्हारी ही चिन्तासे मृतक-तुल्य हो रहे हैं। (तुम्हारी खोज करनेके लिये) सैकड़ों ब्राह्मण इस पृथ्वीपर घूम रहे हैं' ॥ ३० ॥
बृहदश्व उवाच अभिज्ञाय सुदेवं तं दमयन्ती युधिष्ठिर । पर्यपृच्छत तान् सर्वान् क्रमेण सुहृदः स्वकान् ॥ ३१ ॥ बृहदश्व मुनि कहते हैं—युधिष्ठिर! सुदेवको पहचानकर दमयन्तीने क्रमशः अपने सभी सगे-सम्बन्धियोंका कुशल समाचार पूछा ॥ ३१ ॥ रुरोद च भृशं राजन् वैदर्भी शोककर्शिता । दृष्ट्वा सुदेवं सहसा भ्रातुरिष्टं द्विजोत्तमम् ॥ ३२ ॥ रुदतीं तामथो दृष्ट्वा सुनन्दा शोककर्शिता । सुदेवेन सहैकान्ते कथयन्तीं च भारत ॥ ३३ ॥ राजन्! अपने भाईके प्रिय मित्र द्विजश्रेष्ठ सुदेवको सहसा आया देख दमयन्ती शोकसे व्याकुल हो फूट-फूटकर रोने लगी। भारत! तदनन्तर उसे सुदेवके साथ एकान्तमें बात करती तथा रोती देख सुनन्दा शोकसे व्याकुल हो उठी ॥ ३२-३३ ॥ जनित्र्यै कथयामास सैरन्ध्री रोदितीति च । ब्राह्मणेन सहागम्य तां वेद यदि मन्यसे ॥ ३४ ॥ उसने अपनी मातासे जाकर कहा—'माँ! सैरन्ध्री एक ब्राह्मणसे मिलकर बहुत रो रही है। यदि तुम ठीक समझो तो इसका कारण जाननेकी चेष्टा करो' ॥ ३४ ॥ अथ चेदिपतेर्माता राज्ञश्चान्तःपुरात् तदा । जगाम यत्र सा बाला ब्राह्मणेन सहाभवत् ॥ ३५ ॥ तदनन्तर चेदिराजकी माता उस समय अन्तःपुरसे निकलकर उसी स्थानपर गयीं, जहाँ राजकन्या दमयन्ती ब्राह्मणके साथ खड़ी थी ॥ ३५ ॥
ततः सुदेवमानाय्य राजमाता विशाम्पते । पप्रच्छ भार्या कस्येयं सुता वा कस्य भाविनी ॥ ३६ ॥ कथं च नष्टा ज्ञातिभ्यो भर्तुर्वा वामलोचना । त्वया च विदिता विप्र कथमेवंगता सती ॥ ३७ ॥ युधिष्ठिर! तब राजमाताने सुदेवको बुलाकर पूछा—‘विप्रवर! जान पड़ता है, तुम इसे जानते हो। बताओ, यह सुन्दरी युवती किसकी पत्नी अथवा किसकी पुत्री है? यह सुन्दर नेत्रोंवाली सुन्दरी अपने भाई-बन्धुओं अथवा पतिसे किस प्रकार विलग हुई है? यह सती-साध्वी नारी ऐसी दुरवस्थामें क्यों पड़ गयी? ॥ ३६-३७ ॥ एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं त्वत्तः सर्वमशेषतः । तत्त्वेन हि समाचक्ष्व पृच्छन्त्या देवरूपिणीम् ॥ ३८ ॥ ‘ब्रह्मन्! इस देवरूपिणी नारीके विषयमें यह सारा वृत्तान्त मैं पूर्णरूपसे सुनना चाहती हूँ। मैं जो कुछ पूछती हूँ, वह मुझे ठीक-ठीक बताओ’ ॥ ३८ ॥ एवमुक्तस्तया राजन् सुदेवो द्विजसत्तमः । सुखोपविष्ट आचष्ट दमयन्त्या यथातथम् ॥ ३९ ॥ राजन्! राजमाताके इस प्रकार पूछनेपर वे द्विजश्रेष्ठ सुदेव सुखपूर्वक बैठकर दमयन्तीका यथार्थ वृत्तान्त बताने लगे ॥ ३९ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि दमयन्तीसुदेवसंवादे अष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें दमयन्ती-सुदेव- संवादविषयक अरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६८ ॥
अध्याय (पृष्ठ 493)
एकोनसप्ततितमोऽध्यायः
दमयन्तीका अपने पिताके यहाँ जाना और वहाँसे नलको ढूँढ़नेके लिये अपना संदेश देकर ब्राह्मणोंको भेजना
सुदेव उवाच
विदर्भराजो धर्मात्मा भीमो नाम महाद्युतिः ।
सुतेयं तस्य कल्याणी दमयन्तीति विश्रुता ॥ १ ॥
सुदेवने कहा—देवि! विदर्भदेशके राजा महा-तेजस्वी भीम बड़े धर्मात्मा हैं। यह उन्हींकी पुत्री है। इस कल्याणस्वरूपा राजकन्याका नाम दमयन्ती है ॥ १ ॥
राजा तु नैषधो नाम वीरसेनसुतो नलः ।
भार्येयं तस्य कल्याणी पुण्यश्लोकस्य धीमतः ॥ २ ॥
वीरसेनपुत्र नल निषधदेशके सुप्रसिद्ध राजा हैं। उन्हीं (परम) बुद्धिमान् पुण्यश्लोक नलकी यह कल्याणमयी पत्नी है ॥ २ ॥
स द्यूतेन जितो भ्रात्रा हृतराज्यो महीपतिः ।
दमयन्त्या गतः सार्धं न प्राज्ञायत कस्यचित् ॥ ३ ॥
एक दिन राजा नल अपने भाईके द्वारा जूएमं हार गये। उसीमें उनका सारा राज्य चला गया। वे दमयन्तीके साथ वनमें चले गये। तबसे अबतक किसीको उनका पता नहीं लगा ॥ ३ ॥
ते वयं दमयन्त्यर्थे चरामः पृथिवीमिमाम् ।
सेयमासादिता बाला तव पुत्रनिवेशने ॥ ४ ॥
हम अनेक ब्राह्मण दमयन्तीको ढूँढ़नेके लिये इस पृथ्वीपर विचर रहे हैं। आज आपके पुत्रके महलमें मुझे यह राजकुमारी मिली है ॥ ४ ॥
अस्या रूपेण सदृशी मानुषी न हि विद्यते ।
अस्या ह्येष भ्रुवोर्मध्ये सहजः पिप्लुरुत्तमः ॥ ५ ॥
रूपमें इसकी समानता करनेवाली कोई भी मानवकन्या नहीं है। इसके दोनों भौंहोंके बीच एक जन्मजात उत्तम तिलका चिह्न है ॥ ५ ॥
श्यामायाः पद्मसंकाशो लक्षितोऽन्तर्हितो मया ।
मलेन संवृतो ह्यस्याश्छन्नोऽभ्रेणेव चन्द्रमाः ॥ ६ ॥
मैंने देखा है, इस श्यामा राजकुमारीके ललाटमें वह कमलके समान चिह्न छिपा हुआ है। मेघमालासे ढँके हुए चन्द्रमाकी भाँति उसका वह चिह्न मैलसे ढक गया है ॥ ६ ॥
चिह्नभूतो विभूत्यर्थमयं धात्रा विनिर्मितः ।
प्रतिपत्कलुष्यस्येन्दोर्लेखा नातिविराजते ॥ ७ ॥
न चास्या नश्यते रूपं वपुर्मलसमाचितम् ।
असंस्कृतमभिव्यक्तं भाति काञ्चनसंनिभम् ॥ ८ ॥
अनेन वपुषा बाला पिप्लुनानेन सूचिता ।
लक्षितेयं मया देवी निभृतोऽग्निरिवोष्मणा ॥ ९ ॥
विधाताके द्वारा निर्मित यह चिह्न इसके भावी ऐश्वर्यका सूचक है। इस समय यह प्रतिपदाकी मलिन चन्द्रकलाके समान अधिक शोभा नहीं पा रही है। इसका सुवर्ण-जैसा सुन्दर शरीर मैलसे व्याप्त और संस्कारशून्य (मार्जन आदिसे रहित) होनेपर भी स्पष्ट रूपसे उद्भासित हो रहा है। इसका रूप-सौन्दर्य नष्ट नहीं हुआ है। जैसे छिपी हुई आग अपनी गरमीसे पहचान ली जाती है, उसी प्रकार यद्यपि देवी दमयन्ती मलिन शरीरसे युक्त है तो भी इस ललाटवर्ती तिलके चिह्नसे ही मैंने इसे पहचान लिया है ॥ ७—९ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य सुदेवस्य विशाम्पते ।
सुनन्दा शोधयामास पिप्लुप्रच्छादनं मलम् ॥ १० ॥
युधिष्ठिर! सुदेवका यह वचन सुनकर सुनन्दाने दमयन्तीके ललाटवर्ती चिह्नको ढँकनेवाली मैल धो दी ॥ १० ॥
स मलेनापकृष्टेन पिप्लुस्तस्या व्यरोचत ।
दमयन्त्या यथा व्यभ्रे नभसीव निशाकरः ॥ ११ ॥
मैल धुल जानेपर उसके ललाटका वह चिह्न उसी प्रकार चमक उठा, जैसे बादलरहित आकाशमें चन्द्रमा प्रकाशित होता है ॥ ११ ॥
पिप्लुं दृष्ट्वा सुनन्दा च राजमाता च भारत ।
रुदत्यौ तां परिष्वज्य मुहूर्तंमिव तस्थतुः ॥ १२ ॥
भारत! उस चिह्नको देखकर सुनन्दा और राजमाता दोनों रोने लगीं और दमयन्तीको हृदयसे लगाये दो घड़ीतक स्तब्ध खड़ी रहीं ॥ १२ ॥
उत्सृज्य बाष्पं शनकै राजमातेदमब्रवीत् ।
भगिन्या दुहिता मेऽसि पिप्लुनानेन सूचिता ॥ १३ ॥
तत्पश्चात् राजमाताने आँसू बहाते हुए धीरेसे कहा—‘बेटी! तुम मेरी बहिनकी पुत्री हो। इस चिह्नके कारण मैंने भी तुम्हें पहचान लिया ॥ १३ ॥
अहं च तव माता च राजंस्तस्य महात्मनः ।
सुते दशार्णाधिपतेः सुदाम्नश्चारुदर्शने ॥ १४ ॥
‘सुन्दरी! मैं और तुम्हारी माता दोनों दशार्णदेशके स्वामी महामना राजा सुदामाकी पुत्रियाँ हैं ॥ १४ ॥
भीमस्य राज्ञः सा दत्ता वीरबाहोरहं पुनः ।
त्वं तु जाता मया दृष्टा दशार्णेषु पितुर्गृहे ॥ १५ ॥
‘तुम्हारी माँका ब्याह राजा भीमके साथ हुआ और मेरा चेदिराज वीरबाहुके साथ। तुम्हारा जन्म दशार्णदिशमें मेरे पिताके ही घरपर हुआ और मैंने अपनी आँखों देखा ।। १५ ।। यथैव ते पितुर्गेहं तथैव मम भामिनि । यथैव च ममैश्वर्यं दमयन्ति तथा तव ।। १६ ।। ‘भामिनि! तुम्हारे लिये जैसा पिताका घर है, वैसा ही मेरा घर है। दमयन्ती! यह सारा ऐश्वर्य जैसे मेरा है, उसी प्रकार तुम्हारा भी है’ ।। १६ ।। तां प्रहृष्टेन मनसा दमयन्ती विशाम्पते । प्रणम्य मातृभगिनीमिदं वचनमब्रवीत् ।। १७ ।। युधिष्ठिर! तब दमयन्तीने प्रसन्न हृदयसे अपनी मौसीको प्रणाम करके कहा — ।। १७ ।। अज्ञायमानापि सती सुखमस्म्युषिता त्वयि । सर्वकामैः सुविहिता रक्ष्यमाणा सदा त्वया ।। १८ ।। ‘माँ! यद्यपि तुम मुझे पहचानती नहीं थी, तब भी मैं तुम्हारे यहाँ बड़े सुखसे रही हूँ। तुमने मेरी इच्छानुसार सारी सुविधाएँ कर दीं और सदा तुम्हारे द्वारा मेरी रक्षा होती रही ।। १८ ।। सुखात् सुखतरो वासो भविष्यति न संशयः । चिरविप्रोषितां मातर्मामनुज्ञातुमर्हसि ।। १९ ।। ‘अब यदि मैं यहाँ रहूँ तो यह मेरे लिये अधिक-से-अधिक सुखदायक होगा, इसमें संशय नहीं है, किंतु मैं बहुत दिनोंसे प्रवासमें भटक रही हूँ, अतः माताजी! मुझे विदर्भ जानेकी आज्ञा दीजिये ।। १९ ।। दारकौ च हि मे नीतौ वसतस्तत्र बालकौ । पित्रा विहीनौ शोकार्तौ मया चैव कथं नु तौ ।। २० ।। ‘मैंने अपने बच्चोंको पहले ही कुण्डिनपुर भेज दिया था। वे वहीं रहते हैं। पितासे तो उनका वियोग हो ही गया है; मुझसे भी वे बिछुड़ गये हैं, ऐसी दशामें वे शोकार्त बालक कैसे रहते होंगे? ।। २० ।। यदि चापि प्रियं किंचिन्मयि कर्तुमिहेच्छसि । विदर्भान् यातुमिच्छामि शीघ्रं मे यानमादिश ।। २१ ।। बाढमित्येव तामुक्त्वा हृष्टा मातृष्वसा नृप । गुप्तां बलेन महता पुत्रस्यानुमते ततः ।। २२ ।। प्रास्थापयद् राजमाता श्रीमतीं नरवाहिना । यानेन भरतश्रेष्ठ स्वन्नपानपरिच्छदाम् ।। २३ ।।