भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 490

'तुम्हारे बन्धु-बान्धव तुम्हारी ही चिन्तासे मृतक-तुल्य हो रहे हैं। (तुम्हारी खोज करनेके लिये) सैकड़ों ब्राह्मण इस पृथ्वीपर घूम रहे हैं' ॥ ३० ॥

बृहदश्व उवाच अभिज्ञाय सुदेवं तं दमयन्ती युधिष्ठिर । पर्यपृच्छत तान् सर्वान् क्रमेण सुहृदः स्वकान् ॥ ३१ ॥ बृहदश्व मुनि कहते हैं—युधिष्ठिर! सुदेवको पहचानकर दमयन्तीने क्रमशः अपने सभी सगे-सम्बन्धियोंका कुशल समाचार पूछा ॥ ३१ ॥ रुरोद च भृशं राजन् वैदर्भी शोककर्शिता । दृष्ट्वा सुदेवं सहसा भ्रातुरिष्टं द्विजोत्तमम् ॥ ३२ ॥ रुदतीं तामथो दृष्ट्वा सुनन्दा शोककर्शिता । सुदेवेन सहैकान्ते कथयन्तीं च भारत ॥ ३३ ॥ राजन्! अपने भाईके प्रिय मित्र द्विजश्रेष्ठ सुदेवको सहसा आया देख दमयन्ती शोकसे व्याकुल हो फूट-फूटकर रोने लगी। भारत! तदनन्तर उसे सुदेवके साथ एकान्तमें बात करती तथा रोती देख सुनन्दा शोकसे व्याकुल हो उठी ॥ ३२-३३ ॥ जनित्र्यै कथयामास सैरन्ध्री रोदितीति च । ब्राह्मणेन सहागम्य तां वेद यदि मन्यसे ॥ ३४ ॥ उसने अपनी मातासे जाकर कहा—'माँ! सैरन्ध्री एक ब्राह्मणसे मिलकर बहुत रो रही है। यदि तुम ठीक समझो तो इसका कारण जाननेकी चेष्टा करो' ॥ ३४ ॥ अथ चेदिपतेर्माता राज्ञश्चान्तःपुरात् तदा । जगाम यत्र सा बाला ब्राह्मणेन सहाभवत् ॥ ३५ ॥ तदनन्तर चेदिराजकी माता उस समय अन्तःपुरसे निकलकर उसी स्थानपर गयीं, जहाँ राजकन्या दमयन्ती ब्राह्मणके साथ खड़ी थी ॥ ३५ ॥