भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 491

ततः सुदेवमानाय्य राजमाता विशाम्पते । पप्रच्छ भार्या कस्येयं सुता वा कस्य भाविनी ॥ ३६ ॥ कथं च नष्टा ज्ञातिभ्यो भर्तुर्वा वामलोचना । त्वया च विदिता विप्र कथमेवंगता सती ॥ ३७ ॥ युधिष्ठिर! तब राजमाताने सुदेवको बुलाकर पूछा—‘विप्रवर! जान पड़ता है, तुम इसे जानते हो। बताओ, यह सुन्दरी युवती किसकी पत्नी अथवा किसकी पुत्री है? यह सुन्दर नेत्रोंवाली सुन्दरी अपने भाई-बन्धुओं अथवा पतिसे किस प्रकार विलग हुई है? यह सती-साध्वी नारी ऐसी दुरवस्थामें क्यों पड़ गयी? ॥ ३६-३७ ॥ एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं त्वत्तः सर्वमशेषतः । तत्त्वेन हि समाचक्ष्व पृच्छन्त्या देवरूपिणीम् ॥ ३८ ॥ ‘ब्रह्मन्! इस देवरूपिणी नारीके विषयमें यह सारा वृत्तान्त मैं पूर्णरूपसे सुनना चाहती हूँ। मैं जो कुछ पूछती हूँ, वह मुझे ठीक-ठीक बताओ’ ॥ ३८ ॥ एवमुक्तस्तया राजन् सुदेवो द्विजसत्तमः । सुखोपविष्ट आचष्ट दमयन्त्या यथातथम् ॥ ३९ ॥ राजन्! राजमाताके इस प्रकार पूछनेपर वे द्विजश्रेष्ठ सुदेव सुखपूर्वक बैठकर दमयन्तीका यथार्थ वृत्तान्त बताने लगे ॥ ३९ ॥