महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
११६-
षोडशाधिकशततमोऽध्यायः
पिताकी आज्ञासे परशुरामजीका अपनी माताका मस्तक काटना और उन्हींके वरदानसे पुन: जिलाना, परशुरामजीद्वारा कार्तवीर्य-अर्जुनका वध और उसके पुत्रोंद्वारा जमदग्नि मुनिकी हत्या
अकृतव्रण उवाच
स वेदाध्ययने युक्तो जमदग्निर्महातपाः ।
तपस्तेपे ततो देवान् नियमाद् वशमानयत् ॥ १ ॥
**अकृतव्रण कहते हैं—**राजन्! महातपस्वी जमदग्निने वेदाध्ययनमें तत्पर होकर तपस्या आस्मभ की। तदनन्तर शौचसंतोषादि नियमोंका पालन करते हुए उन्होंने सम्पूर्ण देवताओंको अपने वशमें कर लिया* ॥ १ ॥
स प्रसेनजितं राजन्नधिगम्य नराधिपम् ।
रेणुकां वरयामास स च तस्मै ददौ नृपः ॥ २ ॥
युधिष्ठिर! फिर राजा प्रसेनजित्के पास जाकर जमदग्नि मुनिने उनकी पुत्री रेणुकाके लिये याचना की और राजाने मुनिको अपनी कन्या ब्याह दी ॥ २ ॥
रेणुकां त्वथ सम्प्राप्य भार्यां भार्गवनन्दनः ।
आश्रमस्थस्तया सार्धं तपस्तेपेऽनुकूलया ॥ ३ ॥
भृगुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले जमदग्नि राजकुमारी रेणुकाको पत्नीरूपमें पाकर आश्रमपर ही रहते हुए उसके साथ तपस्या करने लगे। रेणुका सदा सब प्रकारसे पतिके अनुकूल चलनेवाली स्त्री थी ॥ ३ ॥
तस्याः कुमाराश्चत्वारो जज्ञिरे रामपञ्चमाः ।
सर्वेषामजघन्यस्तु राम आसीज्जघन्यजः ॥ ४ ॥
उसके गर्भसे क्रमशः चार पुत्र हुए, फिर पाँचवें पुत्र परशुरामजीका जन्म हुआ। अवस्थाकी दृष्टिसे भाइयोंमें छोटे होनेपर भी वे गुणोंमें उन सबसे बढ़े-चढ़े थे ॥ ४ ॥
फलाहारेषु सर्वेषु गतेष्वथ सुतेषु वै ।
रेणुका स्नातुमगमत् कदाचिन्नियतव्रता ॥ ५ ॥
एक दिन जब सब पुत्र फल लानेके लिये वनमें चले गये तब नियमपूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाली रेणुका स्नान करनेके लिये नदी-तटपर गयी ॥ ५ ॥
सा तु चित्ररथं नाम मार्तिकावतकं नृपम् । ददर्श रेणुका राजन्नागच्छन्ती यदृच्छया ॥ ६ ॥ क्रीडन्तं सलिले दृष्ट्वा सभार्यं पद्ममालिनम् । ऋद्धिमन्तं ततस्तस्य स्पृहयामास रेणुका ॥ ७ ॥ राजन्! जब वह स्नान करके लौटने लगी उस समय अकस्मात् उसकी दृष्टि मार्तिकावत देशके राजा चित्ररथपर पड़ी, जो कमलोंकी माला धारण करके अपनी पत्नीके साथ जलमें क्रीड़ा कर रहा था। उस समृद्धिशाली नरेशको उस अवस्थामें देखकर रेणुकाने उसकी इच्छा की ॥ ६-७ ॥ व्यभिचाराच्च तस्मात् सा क्लिन्नाम्भसि विचेतना । प्रविवेशाश्रमं त्रस्ता तां वै भर्तान्र्वबुध्यत ॥ ८ ॥ उस समय इस मानसिक विकारसे द्रवित हुई रेणुका जलमें बेहोश-सी हो गयी। फिर त्रस्त होकर उसने आश्रमके भीतर प्रवेश किया। परंतु पतिदेव उसकी सब बातें जान गये ॥ ८ ॥ स तां दृष्ट्वा च्युतां धैर्याद् ब्राह्मया लक्ष्म्या विवर्जिताम् । धिक्शब्देन महातेजा गर्हयामास वीर्यवान् ॥ ९ ॥ उसे धैर्यसे च्युत और ब्रह्मतेजसे वंचित हुई देख उन महातेजस्वी शक्तिशाली महर्षिने धिक्कारपूर्ण वचनोंद्वारा उसकी निन्दा की ॥ ९ ॥ ततो ज्येष्ठो जामदग्न्यो रुमण्वान् नाम नामतः । आजगाम सुषेणश्च वसुर्विश्वावसुस्तथा ॥ १० ॥ इसी समय जमदग्निके ज्येष्ठ पुत्र रुमण्वान् वहाँ आ गये। फिर क्रमशः सुषेण, वसु और विश्वावसु भी आ पहुँचे ॥ १० ॥ तानानुपूर्व्याद् भगवान् वधे मातुरचोदयत् । न च ते जातसंस्नेहाः किंचिदूचुर्विचेतसः ॥ ११ ॥ भगवान् जमदग्निने बारी-बारीसे उन सभी पुत्रोंको यह आज्ञा दी कि तुम अपनी माताका वध कर डालो, परंतु मातृस्नेह उमड़ आनेसे वे कुछ भी बोल न सके—बेहोश-से खड़े रहे ॥ ११ ॥ ततः शशाप तान् क्रोधात् ते शप्ताश्चेतनां जहुः । मृगपक्षिसधर्माणः क्षिप्रामासञ्जडोपमाः ॥ १२ ॥ तब महर्षिने कुपित हो उन सब पुत्रोंको शाप दे दिया। शापग्रस्त होनेपर वे अपनी चेतना (विचार-शक्ति) खो बैठे और तुरंत मृग एवं पक्षियोंके समान जडबुद्धि हो गये ॥ १२ ॥ ततो रामोऽभ्ययात् पश्चादाश्रमं परवीरहा । तमुवाच महाबाहुर्जमदग्निर्महातपाः ॥ १३ ॥
तदनन्तर शत्रुपक्षके वीरोंका संहार करनेवाले परशुरामजी सबसे पीछे आश्रमपर आये। उस समय महातपस्वी महाबाहु जमदग्निने उनसे कहा — ॥ १३ ॥
जहीमां मातरं पापां मा च पुत्र व्यथां कृथाः ।
तत आदाय परशुं रामो मातुः शिरोऽहरत् ॥ १४ ॥
‘बेटा! अपनी इस पापिनी माताको अभी मार डालो और इसके लिये मनमें किसी प्रकारका खेद न करो।' तब परशुरामजीने फरसा लेकर उसी क्षण माताका मस्तक काट डाला ॥ १४ ॥
ततस्तस्य महाराज जमदग्नेर्महात्मनः ।
कोपोऽभ्यगच्छत् सहसा प्रसन्नश्चाब्रवीदिदम् ॥ १५ ॥
महाराज! इससे महात्मा जमदग्निका कोप सहसा शान्त हो गया और उन्होंने प्रसन्न होकर कहा— ॥ १५ ॥
ममेदं वचनात् तात कृतं ते कर्म दुष्करम् ।
वृणीष्व कामान् धर्मज्ञ यावतो वाञ्छसे हृदा ॥ १६ ॥
स वव्रे मातुरुत्थानमस्मृतिं च वधस्य वै ।
पापेन तेन चास्पर्शं भ्रातॄणां प्रकृतिं तथा ॥ १७ ॥
अप्रतिद्वन्द्वतां युद्धे दीर्घमायुश्च भारत ।
ददौ च सर्वान् कामांस्ताञ्जमदग्निर्महातपाः ॥ १८ ॥
'तात! तुमने मेरे कहनेसे यह कार्य किया है, जिसे करना दूसरोंके लिये बहुत कठिन है। तुम धर्मके ज्ञाता हो। तुम्हारे मनमें जो-जो कामनाएँ हों, उन सबको माँग लो।' तब परशुरामजीने कहा—'पिताजी! मेरी माता जीवित हो उठें, उन्हें मेरे द्वारा मारे जानेकी बात याद न रहे, वह मानस-पाप उनका स्पर्श न कर सके, मेरे चारों भाई स्वस्थ हो जायँ, युद्धमें मेरा सामना करनेवाला कोई न हो और मैं बड़ी आयु प्राप्त करूँ।' भारत! महातपस्वी जमदग्निने वरदान देकर उनकी वे सभी कामनाएँ पूर्ण कर दीं ॥ १६—१८ ॥
कदाचित् तु तथैवास्य विनिष्क्रान्ताः सुताः प्रभो ।
अथानूपपतिर्वीरः कार्तवीर्योऽभ्यवर्तत ॥ १९ ॥
युधिष्ठिर! एक दिन इसी तरह उनके सब पुत्र बाहर गये हुए थे। उसी समय अनूपदेशका वीर राजा कार्तवीर्य अर्जुन उधर आ निकला ॥ १९ ॥
तमाश्रमपदं प्राप्तमृषेर्भार्या समर्चयत् ।
स युद्धमदसम्मत्तो नाभ्यनन्दत् तथार्चनम् ॥ २० ॥
प्रमथ्य चाश्रमात् तस्माद्धोमधेनोस्तथा बलात् ।
जहार वत्सं क्रोशन्त्या बभञ्ज च महाद्रुमान् ॥ २१ ॥
आश्रममें आनेपर ऋषिपत्नी रेणुकाने उसका यथोचित आतिथ्य-सत्कार किया। कार्तवीर्य अर्जुन युद्धके मदसे उन्मत्त हो रहा था। उसने उस सत्कारको आदरपूर्वक ग्रहण नहीं किया। उलटे मुनिके आश्रमको तहस-नहस करके वहाँसे डकराती हुई होमधेनुके बछड़ेको बलपूर्वक हर लिया और आश्रमके बड़े-बड़े वृक्षोंको भी तोड़ डाला ॥ २०-२१ ॥
आगताय च रामाय तदाचष्ट पिता स्वयं ।
गां च रोरुदतीं दृष्ट्वा कोपो रामं समाविशत् ॥ २२ ॥
जब परशुरामजी आश्रममें आये तब स्वयं जमदग्निने उनसे सारी बातें कहीँ। बारंबार डकराती हुई होमकी धेनुपर भी उनकी दृष्टि पड़ी। इससे वे अत्यन्त कुपित हो उठे ॥ २२ ॥
स मृत्युवशमापन्नं कार्त्तवीर्यमुपाद्रवत् । तस्याथ युधि विक्रम्य भार्गवः परवीरहा ॥ २३ ॥ चिच्छेद निशितैर्भल्लैर्बाहून् परिघसंनिभान् । सहस्रसम्मितान् राजन् प्रगृह्य रुचिरं धनुः ॥ २४ ॥
और कालके वशीभूत हुए कार्तवीर्य अर्जुनपर धावा बोल दिया। शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले भृगुनन्दन परशुरामजीने अपना सुन्दर धनुष ले युद्धमें महान् पराक्रम दिखाकर पैने बाणोंद्वारा उसकी परिघसदृश सहस्र भुजाओंको काट डाला ॥ २३-२४ ॥
अभिभूतः स रामेण संयुक्तः कालधर्मणा । अर्जुनस्याथ दायादा रामेण कृतमन्यवः ॥ २५ ॥
इस प्रकार परशुरामजीसे परास्त हो कार्तवीर्य अर्जुन कालके गालमें चला गया। पिताके मारे जानेसे अर्जुनके पुत्र परशुरामजीपर कुपित हो उठे ॥ २५ ॥
आश्रमस्थं विना रामं जमदग्निमुपाद्रवन् । ते तं जघ्नुर्महावीर्यमयुध्यन्तं तपस्विनम् ॥ २६ ॥
और एक दिन परशुरामजीकी अनुपस्थितिमें जब आश्रमपर केवल जमदग्निजी ही रह गये थे, वे उन्हींपर चढ़ आये। यद्यपि जमदग्निजी महान् शक्तिशाली थे तो भी तपस्वी ब्राह्मण होनेके कारण युद्धमें प्रवृत्त नहीं हुए। इस दशामें भी कार्तवीर्यके पुत्र उनपर प्रहार करने लगे ॥ २६ ॥
असकृद् रामरामेति विक्रोशन्तमनाथवत् । कार्तवीर्यस्य पुत्रास्तु जमदग्निं युधिष्ठिर ॥ २७ ॥ पीडयित्वा शरैर्जग्मुर्यथागतमरिंदमाः । अपक्रान्तेषु वै तेषु जमदग्नौ तथा गते ॥ २८ ॥ समित्पाणिरुपागच्छदाश्रमं भृगुनन्दनः । स दृष्ट्वा पितरं वीरस्तथा मृत्युवशं गतम् । अनर्हन्तं तथाभूतं विललाप सुदुःखितः ॥ २९ ॥ युधिष्ठिर! वे महर्षि अनाथकी भाँति 'राम! राम!!' की रट लगा रहे थे, उसी अवस्थामें कार्तवीर्य अर्जुनके पुत्रोंने उन्हें बाणोंसे घायल करके मार डाला। इस प्रकार मुनिकी हत्या करके वे शत्रुसंहारक क्षत्रिय जैसे आये थे, उसी प्रकार लौट गये। जमदग्निके इस तरह मारे जानेके बाद जब वे कार्तवीर्य-पुत्र भाग गये, तब भृगुनन्दन परशुरामजी हाथोंमें समिधा लिये आश्रममें आये। वहाँ अपने पिताको इस प्रकार दुर्दशापूर्वक मरा देख उन्हें बड़ा दुःख हुआ। उनके पिता इस प्रकार मारे जानेके योग्य कदापि नहीं थे, परशुरामजी उन्हें याद करके विलाप करने लगे ॥ २७—२९ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां कार्तवीर्योपाख्याने जमदग्निवधे षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें कार्तवीर्योपाख्यानमें जमदग्निवधविषयक एक सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११६ ॥
* यहाँ कुछ प्रतियोंमें 'देवान्' की जगह 'वेदान्' पाठ मिलता है। उस दशामें यह अर्थ होगा कि 'वेदोंको वशमें कर लिया।' परंतु वेदोंको वशमें करनेकी बात असंगत-सी लगती है। देवताओंको वशमें करना ही सुसंगत जान पड़ता है, इसलिये हमने 'देवान्' यही पाठ रखा है। काश्मीरकी देवनागरी लिपिवाली हस्तलिखित पुस्तकमें यहाँ तीन श्लोक अधिक मिलते हैं। उनसे भी 'देवान्' पाठका ही समर्थन होता है। वे श्लोक इस प्रकार हैं— तं तप्यमानं ब्रह्मर्षिमूचुर्देवाः सबान्धवाः । किमर्थं तप्यसे ब्रह्मन् कः कामः प्रार्थितस्तव ॥ एवमुक्तः प्रत्युवाच देवान् ब्रह्मर्षिसत्तमः । स्वर्गहेतोस्तपस्तप्ये लोकाश्च स्युर्ममाक्षयाः ॥ तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य तदा देवास्तमूचिरे । नासंततेर्भवेल्लोकः कृत्वा धर्मशतान्यपि ॥ स श्रुत्वा वचनं तेषां त्रिदशानां कुरूद्वह ॥ इन श्लोकोंद्वारा देवताओंके प्रकट होकर वरदान देनेका प्रसंग सूचित होता है, अतः '........ततो देवान् नियमाद् वशमानयत्' यही पाठ ठीक है।
११७-
सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः
परशुरामजीका पिताके लिये विलाप और पृथ्वीको इक्कीस बार निःक्षत्रिय करना एवं महाराज युधिष्ठिरके द्वारा परशुरामजीका पूजन
राम उवाच
ममापराधात् तैः क्षुद्रैर्हतस्त्वं तात बालिशैः ।
कार्तवीर्यस्य दायादैर्वने मृग इवेषुभिः ॥ १ ॥
**परशुरामजी बोले—**हा तात! मेरे अपराधका बदला लेनेके लिये कार्तवीर्यके उन नीच और पामर पुत्रोंने वनमें बाणोंद्वारा मारे जानेवाले मृगकी भाँति आपकी हत्या की है ॥ १ ॥
धर्मज्ञस्य कथं तात वर्तमानस्य सत्पथे ।
मृत्युरेवंविधो युक्तः सर्वभूतेष्वनागसः ॥ २ ॥
पिताजी! आप तो धर्मज्ञ होनेके साथ ही सन्मार्गपर चलनेवाले थे, कभी किसी भी प्राणीके प्रति कोई अपराध नहीं करते थे, फिर आपकी ऐसी मृत्यु कैसे उचित हो सकती है? ॥ २ ॥
किं नु तैर्न कृतं पापं यैर्भवांस्तपसि स्थितः ।
अयुध्यमानो वृद्धः सन् हतः शरशतैः शितैः ॥ ३ ॥
आप तपस्यामें संलग्न, युद्धसे विरत और वृद्ध थे तो भी जिन्होंने सैकड़ों तीखे बाणोंद्वारा आपकी हत्या की है, उन्होंने कौन-सा पाप नहीं किया? ॥ ३ ॥
किं नु ते तत्र वक्ष्यन्ति सचिवेषु सुहृत्सु च । अयुध्यमानं धर्मज्ञमेकं हत्वानपत्रपाः ॥ ४ ॥ वे निर्लज्ज राजकुमार युद्धसे दूर रहनेवाले आप-जैसे धर्मज्ञ एवं असहाय पुरुषको मारकर अपने सुहृदों और मन्त्रियोंके सामने क्या कहेंगे? ॥ ४ ॥ विलप्यैवं सकरुणं बहु नानाविधं नृप । प्रेतकार्याणि सर्वाणि पितुश्चक्रे महातपाः ॥ ५ ॥ ददाह पितरं चाग्नौ रामः परपुरंजयः । प्रतिजज्ञे वधं चापि सर्वक्षत्रस्य भारत ॥ ६ ॥ राजन्! इस प्रकार भाँति-भाँतिसे अत्यन्त करुणा-जनक विलाप करके शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले महातपस्वी परशुरामजीने अपने पिताके समस्त प्रेतकर्म किये। भारत! पहले तो उन्होंने विधिपूर्वक अग्निमें पिताका दाह-संस्कार किया, तत्पश्चात् सम्पूर्ण क्षत्रियोंके वधकी प्रतिज्ञा की ॥ ५-६ ॥ संक्रुद्धोऽतिबलः संख्ये शस्त्रमादाय वीर्यवान् । जघ्निवान् कार्तवीर्यस्य सुतानेकोऽन्तकोपमः ॥ ७ ॥
अत्यन्त बलवान् एवं पराक्रमी परशुरामजी क्रोधके आवेशमें साक्षात् यमराजके समान हो गये। उन्होंने युद्धमें शस्त्र लेकर अकेले ही कार्तवीर्यके सब पुत्रोंको मार डाला ।। ७ ।।
तेषां चानुगता ये च क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभ ।
तांश्च सर्वानवामृद्नाद् रामः प्रहरतां वरः ।। ८ ।।
क्षत्रियशिरोमणे! उस समय जिन-जिन क्षत्रियोंने उनका साथ दिया, उन सबको भी योद्धाओंमें श्रेष्ठ परशुरामजीने मिट्टीमें मिला दिया ।। ८ ।।
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां प्रभुः ।
समन्तपञ्चके पञ्च चकार रुधिरह्रदान् ।। ९ ।।
इस प्रकार भगवान् परशुरामने इस पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रियोंसे सूनी करके उनके रक्तसे समन्तपञ्चक क्षेत्रमें पाँच रुधिर-कुण्ड भर दिये ।। ९ ।।
स तेषु तर्पयामास भृगून् भृगुकुलोद्वहः ।
साक्षाद् ददर्श चर्चीकं स च रामं न्यवारयत् ।। १० ।।
भृगुकुलभूषण रामने उन कुण्डोंमें भृगुवंशी पितरोंका तर्पण किया और उस समय साक्षात् प्रकट हुए महर्षि ऋचीकको देखा। उन्होंने परशुरामको इस घोर कर्मसे रोका ।। १० ।।
ततो यज्ञेन महता जामदग्न्यः प्रतापवान् ।
तर्पयामास देवेन्द्रमृत्विग्भ्यः प्रददौ महीम् ।। ११ ।।
तदनन्तर प्रतापी जमदग्निकुमारने एक महान् यज्ञ करके देवराज इन्द्रको तृप्त किया तथा ऋत्विजोंको दक्षिणारूपमें भूमि दी ।। ११ ।।
वेदीं चाप्यददद्धैमीं कश्यपाय महात्मने ।
दशव्यामायतां कृत्वा नवोत्सेधां विशाम्पते ॥ १२ ॥
युधिष्ठिर! उन्होंने महात्मा कश्यपको एक सोनेकी वेदी प्रदान की, जिसकी लम्बाई-चौड़ाई दस-दस व्याम (चालीस-चालीस हाथ)-की थी। ऊँचाईमें भी वह वेदी नौ व्याम (छत्तीस हाथ)-की थी ॥ १२ ॥
तां कश्यपस्यानुमते ब्राह्मणाः खण्डशस्तदा ।
व्यभजंस्ते तदा राजन् प्रख्याताः खाण्डवायनाः ॥ १३ ॥
राजन्! उस समय कश्यपजीकी आज्ञासे ब्राह्मणोंने उस स्वर्णवेदीको खण्ड-खण्ड करके बाँट लिया, अतः वे खाण्डवायन नामसे प्रसिद्ध हुए ॥ १३ ॥
स प्रदाय महीं तस्मै कश्यपाय महात्मने ।
अस्मिन् महेन्द्रे शैलेन्द्रे वसत्यमितविक्रमः ॥ १४ ॥
इस प्रकार सारी पृथ्वी महात्मा कश्यपको देकर अमित पराक्रमी परशुरामजी इस पर्वतराज महेन्द्रपर निवास करते हैं ॥ १४ ॥
एवं वैरमभूत् तस्य क्षत्रियैर्लोकवासिभिः ।
पृथिवी चापि विजिता रामेणामिततेजसा ॥ १५ ॥
इस तरह उनका सम्पूर्ण जगत्के क्षत्रियोंके साथ वैर हुआ था और उसी समय अमित तेजस्वी परशुरामजीने सारी पृथ्वी जीती थी ।। १५ ।।
वैशम्पायन उवाच
ततश्चतुर्दशीं रामः समयेन महामनाः ।
दर्शयामास तान् विप्रान् धर्मराजं च सानुजम् ।। १६ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर चतुर्दशी तिथिको निश्चित समयपर महामना परशुरामजीने उस पर्वतपर रहनेवाले उन ब्राह्मणों तथा भाइयोंसहित युधिष्ठिरको दर्शन दिया ।। १६ ।।
स तमानर्च राजेन्द्र भ्रातृभिः सहितः प्रभुः ।
द्विजानां च परां पूजां चक्रे नृपतिसत्तमः ।। १७ ।।
राजेन्द्र! उस समय प्रभावशाली नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिरने भाइयोंके साथ श्रद्धापूर्वक भगवान् परशुरामजीकी पूजा की तथा अन्य ब्राह्मणोंका भी बहुत आदर-सत्कार किया ।। १७ ।।
अर्चित्वा जामदग्न्यं स पूजितस्तेन चोदितः ।
महेन्द्र उष्य तां रात्रिं प्रययौ दक्षिणामुखः ।। १८ ।।
जमदग्निनन्दन परशुरामजीकी पूजा करके स्वयं भी उनके द्वारा सम्मानित हो वे उन्हींकी आज्ञासे उस रातको महेन्द्रपर्वतपर ही रहे, फिर सबेरे उठकर दक्षिण दिशाकी ओर चल दिये ।। १८ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां कार्तवीर्योपाख्याने सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें कार्तवीर्योपाख्यानविषयक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११७ ।।
११८-
अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः
युधिष्ठिरका विभिन्न तीर्थोंमें होते हुए प्रभासक्षेत्रमें पहुँचकर तपस्यामें प्रवृत्त होना और यादवोंका पाण्डवोंसे मिलना
वैशम्पायन उवाच
गच्छन् स तीर्थानि महानुभावः
पुण्यानि रम्याणि ददर्श राजा ।
सर्वाणि विप्रैरुपशोभितानि
क्वचित् क्वचिद् भारत सागरस्य ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! आगे जाते हुए महानुभाव राजा युधिष्ठिरने समुद्रतटके समस्त पुण्य तीर्थोंका दर्शन किया। वे सभी तीर्थ परम मनोहर थे। उनमें कहीं-कहीं ब्राह्मणलोग निवास करते थे, जिससे उन तीर्थोंकी बड़ी शोभा होती थी ॥ १ ॥
स वृत्तवांस्तेषु कृताभिषेकः
सहानुजः पार्थिवपुत्रपौत्रः ।
समुद्रगां पुण्यतमां प्रशस्तां
जगाम पारिक्षित पाण्डुपुत्रः ॥ २ ॥
परीक्षितनन्दन! सदाचारी पाण्डुकुमार युधिष्ठिर कश्यपपुत्र सूर्यदेवके पौत्र थे (क्योंकि उनकी उत्पत्ति सूर्यकुमार धर्मसे हुई थी)। वे भाइयोंसहित उन तीर्थोंमें स्नान करके समुद्रगामिनी पुण्यमयी प्रशस्ता नदीके तटपर गये ॥ २ ॥
तत्रापि चाप्लुत्य महानुभावः
संतर्पयामास पितॄन् सुरांश्च ।
द्विजातिमुख्येषु धनं विसृज्य
गोदावरीं सागरगामगच्छत् ॥ ३ ॥
महानुभाव युधिष्ठिरने वहाँ भी स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण किया तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको धन दान करके सागरगामिनी गोदावरी नदीकी ओर प्रस्थान किया ॥ ३ ॥
ततो विपाप्मा द्रविडेषु राजन्
समुद्रमासाद्य च लोकपुण्यम् ।
अगस्त्यतीर्थं च महापवित्रं
नारीतीर्थान्यथ वीरो ददर्श ॥ ४ ॥
जनमेजय! गोदावरीमें स्नान करके पवित्र हो वे वहाँसे द्रविड़देशमें घूमते हुए संसारके पुण्यमय तीर्थ समुद्रके तटपर गये। वहाँ स्नानादि करनेके पश्चात् वीर पाण्डुकुमारने आगे
बढ़कर परम पवित्र अगस्त्यतीर्थ तथा *नारीतीर्थोंका दर्शन किया ।। ४ ।। तत्रार्जुनस्याग्र्यधनुर्धरस्य निशम्य तत् कर्म नरैरशक्यम् । सम्पूज्यमानः परमर्षिसङ्घैः परां मुदं पाण्डुसुतः स लेभे ।। ५ ।। स तेषु तीर्थेष्वभिषिक्तगात्रः कृष्णासहायः सहितोऽनुजैश्च । सम्पूजयन् विक्रममर्जुनस्य रेमे महीपाल पतिः पृथिव्याः ।। ६ ।। वहाँ श्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुनके उस पराक्रमको, जो दूसरे मनुष्योंके लिये असम्भव था, सुनकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई। उन तीर्थोंमें बड़े-बड़े ऋषिगण भी उनका सत्कार करते थे। जनमेजय! द्रौपदी तथा भाइयोंके साथ राजा युधिष्ठिरने उन पाँचों तीर्थोंमें स्नान करके अर्जुनके पराक्रमकी प्रशंसा करते हुए बड़े हर्षका अनुभव किया ।। ५-६ ।। ततः सहस्राणि गवां प्रदाय तीर्थेषु तेष्वम्बुधरोत्तमस्य । हृष्टः सह भ्रातृभिरर्जुनस्य संकीर्तयामास गवां प्रदानम् ।। ७ ।। तदनन्तर समुद्रतटवर्ती उन सभी तीर्थोंमें सहस्रों गोदान करके भाइयोंसहित युधिष्ठिरने प्रसन्नतापूर्वक अर्जुनके द्वारा किये हुए गोदानका बारंबार वर्णन किया ।। ७ ।। स तानि तीर्थानि च सागरस्य पुण्यानि चान्यानि बहूनि राजन् । क्रमेण गच्छन् परिपूर्णकामः शूर्पारकं पुण्यतमं ददर्श ।। ८ ।। राजन्! समुद्रसम्बन्धी तथा अन्य बहुत-से पुण्य तीर्थोंमें क्रमशः भ्रमण करते हुए पूर्णकाम राजा युधिष्ठिरने अत्यन्त पुण्यमय शूर्पारकतीर्थका दर्शन किया ।। ८ ।। तत्रोदधेः कंचिदतीत्य देशं ख्यातं पृथिव्यां वनमाससाद । तप्तं सुरैस्तत्र तपः पुरस्ता- दिष्टं तथा पुण्यपरैर्नरेन्द्रैः ।। ९ ।। वहाँ समुद्रके कुछ भागको लाँघकर वे एक ऐसे वनमें आये जो भूमण्डलमें सर्वत्र विख्यात था। वहाँ पूर्वकालमें देवताओंने तपस्या की थी और पुण्यात्मा नरेशोंने यज्ञोंका अनुष्ठान किया था ।। ९ ।।
स तत्र तामग्र्यधनुर्धरस्य वेदीं ददर्शायतपीनबाहुः । ऋचीकपुत्रस्य तपस्विसङ्घैः समावृतां पुण्यकृदर्चनीयाम् ॥ १० ॥ लम्बी और मोटी भुजाओंवाले युधिष्ठिरने उस वनमें धनुर्धरशिरोमणि ऋचीकवंशी परशुरामजीकी वेदी देखी, जो पुण्यात्मा पुरुषोंके लिये पूजनीय थी तथा तपस्वियोंके समुदाय उसे सदा घेरे रहते थे ॥ १० ॥
ततो वसूनां वसुधाधिपः स मरुद्गणानां च तथाश्विनोश्च । वैवस्वतादित्यधनेश्वराणा- मिन्द्रस्य विष्णोः सवितुर्विभोश्च ॥ ११ ॥ भवस्य चन्द्रस्य दिवाकरस्य पतेरपां साध्यगणस्य चैव । धातुः पितॄणां च तथा महात्मा रुद्रस्य राजन् सगणस्य चैव ॥ १२ ॥ सरस्वत्याः सिद्धगणस्य चैव पुण्यांश्च ये चाप्यमरास्तथान्ये । पुण्यानि चाप्यायतनानि तेषां ददर्श राजा सुमनोहराणि ॥ १३ ॥ राजन्! तत्पश्चात् उन महात्मा नरेशने वसु, मरुद्गण, अश्विनीकुमार, यम, आदित्य, कुबेर, इन्द्र, विष्णु, भगवान् सविता, शिव, चन्द्रमा, सूर्य, वरुण, साध्यगण, धाता, पितृगण, अपने गणोंसहित रुद्र, सरस्वती, सिद्धसमुदाय तथा अन्य पुण्यमय देवताओंके परम पवित्र और मनोहर मन्दिरोंके दर्शन किये ॥ ११—१३ ॥
तेषूपवासान् विबुधानुपोष्य दत्त्वा च रत्नानि महान्ति राजा । तीर्थेषु सर्वेषु परिप्लुताङ्गः पुनः स शूर्पारकमाजगाम ॥ १४ ॥ उन तीर्थोंके निकट निवास करनेवाले विद्वान् ब्राह्मणोंको वस्त्राभूषणोंसे आच्छादित एवं विभूषित करके उन्हें बहुमूल्य रत्नोंकी भेंट दे वहाँके सभी तीर्थोंमें स्नान करके महाराज युधिष्ठिर पुनः शूर्पारक-क्षेत्रमें लौट आये ॥ १४ ॥
स तेन तीर्थेन तु सागरस्य पुनः प्रयाततः सह सोदरीयैः । द्विजैः पृथिव्यां प्रथितं महद्भि-
स्तीर्थं प्रभासं समुपाजगाम ॥ १५ ॥ वहाँसे प्रस्थित हो वे भाइयोंसहित सागरतटवर्ती तीर्थोंके मार्गसे होते हुए फिर प्रभासक्षेत्र आये जो श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके कारण भूमण्डलमें अधिक प्रसिद्ध है ॥ १५ ॥ तत्राभिषिक्तः पृथुलोहिताक्षः सहानुजैर्देवगणान् पितॄंश्च । संतर्पयामास तथैव कृष्णा ते चापि विप्राः सह लोमशेन ॥ १६ ॥ वहाँ भाइयोंसहित स्नान करके विशाल एवं लाल नेत्रोंवाले राजा युधिष्ठिरने देवताओं और पितरोंका तर्पण किया। इसी प्रकार द्रौपदीने, साथ आये हुए उन ब्राह्मणोंने तथा महर्षि लोमशने भी वहाँ स्नान एवं तर्पण किये ॥ १६ ॥ स द्वादशाहं जलवायुभक्षः कुर्वन् क्षपाहःसु तदाभिषेकम् । समन्ततोऽग्नीनुपदीपयित्वा तेपे तपो धर्मभृतां वरिष्ठः ॥ १७ ॥ धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर वहाँ बारह दिनोंतक केवल जल और वायु पीकर रहते हुए दिनमें और रातमें भी स्नान करते तथा अपने चारों ओर आग जलाकर तपस्यामें लगे रहते थे ॥ १७ ॥ तमुग्रमास्थाय तपश्चरन्तं शुश्राव रामश्च जनार्दनश्च । तौ सर्ववृष्णिप्रवरौ ससैन्यौ युधिष्ठिरं जग्मतुराजमीढम् ॥ १८ ॥ इसी समय वृष्णिवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामने सुना कि महाराज युधिष्ठिर प्रभासक्षेत्रमें उग्र तपस्या कर रहे हैं; तब वे अपने सैनिकोंसहित अजमीढकुलभूषण युधिष्ठिरसे मिलनेके लिये गये ॥ १८ ॥ ते वृष्णयः पाण्डुसुतान् समीक्ष्य भूमौ शयानान् मलदिग्धगात्रान् । अनर्हतीं द्रौपदीं चापि दृष्ट्वा सुदुःखिताश्चक्रुरार्तनादम् ॥ १९ ॥ वहाँ जाकर वृष्णिवंशियोंने देखा, पाण्डवलोग पृथ्वीपर सो रहे हैं, उनके सारे अंग धूलसे सने हुए हैं तथा कष्टसहनके अयोग्य द्रौपदी भी भारी दुर्दशा भोग रही है। यह सब देखकर वे बड़े दुःखी हुए और आर्त स्वरसे रोने लगे ॥ १९ ॥ ततः स रामं च जनार्दनं च कार्ष्णिं च साम्बं च शिनेश्च पौत्रम् ।
अन्यांश्च वृष्णीनुपगम्य पूजां
चक्रे यथाधर्ममहीनसत्त्वः ॥ २० ॥
(उस महान् संकटमें भी) महाराज युधिष्ठिरने अपना धैर्य नहीं छोड़ा था। उन्होंने बलराम, श्रीकृष्ण, प्रद्युम्न, साम्ब, सात्यकि तथा अन्यान्य वृष्णिवंशियोंके पास जा-जाकर धर्मानुसार उन सबका आदर-सत्कार किया ॥ २० ॥
ते चापि सर्वान् प्रतिपूज्य पार्थां-
स्तैः सत्कृताः पाण्डुसुतैस्तथैव ।
युधिष्ठिरं सम्परिवार्य राज-
न्नुपाविशन् देवगणा यथेन्द्रम् ॥ २१ ॥
राजन्! पाण्डुपुत्रोंद्वारा सत्कृत होकर यादवोंने भी उन सबका यथोचित सत्कार किया और फिर देवता जैसे इन्द्रके चारों ओर बैठ जाते हैं उसी प्रकार वे धर्मराज युधिष्ठिरको सब ओरसे घेरकर बैठ गये ॥ २१ ॥
तेषां स सर्वं चरितं परेषां
वने च वासं परमप्रतीतः ।
अस्त्रार्थमिन्द्रस्य गतं च पार्थं
निवेशनं हृष्टमनाः शशंस ॥ २२ ॥
तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिरने अत्यन्त विश्वस्त होकर यादवोंसे शत्रुओंकी सारी करतूतें कह सुनायीं और अपने वनवासका भी सब समाचार बताया। साथ ही बड़ी प्रसन्नताके साथ यह भी सूचित किया कि अर्जुन दिव्यास्त्रोंकी प्राप्तिके लिये इन्द्रलोकमें गये हैं ॥ २२ ॥
श्रुत्वा तु ते तस्य वचः प्रतीता-
स्तांश्चापि दृष्ट्वा सुकृशानतीव ।
नेत्रोद्भवं सम्मुमुचुर्महार्हा
दुःखार्तिजं वारि महानुभावाः ॥ २३ ॥
युधिष्ठिरका यह वचन सुनकर उन्हें कुछ सान्त्वना मिली। परंतु पाण्डवोंको अत्यन्त दुर्बल देखकर वे परम पूजनीय महानुभाव यादव वीर दुःख और वेदनासे पीड़ित हो आँसू बहाने लगे ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां प्रभासे
यादवपाण्डवसमागमे अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें प्रभासक्षेत्रके भीतर यादव-पाण्डव-समागमविषयक एक सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११८ ॥
* पाँच अप्सराओंके तीर्थ।
अध्याय (पृष्ठ 827)
किमकुर्वन् कथाश्चैषां कास्तत्रासंस्तपोधन ॥ १ ॥
एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
प्रभासतीर्थमें बलरामजीके पाण्डवोंके प्रति सहानुभूतिसूचक दुःखपूर्ण उद्गार
जनमेजय उवाच
प्रभासतीर्थमासाद्य पाण्डवा वृष्णयस्तथा ।
किमकुर्वन् कथाश्चैषां कास्तत्रासंस्तपोधन ॥ १ ॥
ते हि सर्वे महात्मानः सर्वशास्त्रविशारदाः ।
वृष्णयः पाण्डवाश्चैव सुहृदश्च परस्परम् ॥ २ ॥
जनमेजयने पूछा— तपोधन! प्रभासतीर्थमें पहुँचकर पाण्डवों तथा वृष्णिवंशियोंने क्या किया? वहाँ उनमें कैसी बातचीत हुई? वे सब महात्मा यादव और पाण्डव सम्पूर्ण शास्त्रोंके विद्वान् और एक-दूसरेका हित चाहनेवाले थे, (अतः उनमें क्या बात हुई? यह मैं जानना चाहता हूँ) ॥ १-२ ॥
वैशम्पायन उवाच
प्रभासतीर्थं सम्प्राप्य पुण्यं तीर्थं महोदधेः ।
वृष्णयः पाण्डवान् वीराः परिवार्योपतस्थिरे ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! प्रभासक्षेत्र समुद्र-तटवर्ती एक पुण्यमय तीर्थ है। वहाँ जाकर वृष्णिवंशी वीर पाण्डवोंको चारों ओरसे घेरकर बैठ गये ॥ ३ ॥
ततो गोक्षीरकुन्देन्दुमृणालरजतप्रभः ।
वनमाली हली रामो बभाषे पुष्करेक्षणम् ॥ ४ ॥
तदनन्तर गोदुग्ध, कुन्दकुसुम, चन्द्रमा, मृणाल (कमलनाल) तथा चाँदीकी-सी कान्तिवाले वनमाला-विभूषित हलधर बलरामने कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णसे कहा ॥ ४ ॥
बलदेव उवाच
न कृष्ण धर्मश्चरितो भवाय
जन्तोर्धर्मश्च पराभवाय ।
युधिष्ठिरो यत्र जटी महात्मा
वनाश्रयः क्लिश्यति चीरवासाः ॥ ५ ॥
बलदेवजी बोले— श्रीकृष्ण! जान पड़ता है आचरणमें लाया हुआ धर्म भी प्राणियोंके अभ्युदयका कारण नहीं होता; और उनका किया हुआ अधर्म भी पराजयकी प्राप्ति
करानेवाला नहीं होता, क्योंकि महात्मा युधिष्ठिरको (जो सदा धर्मका ही पालन करते हैं) जटाधारी होकर वल्कल वस्त्र पहने वनमें रहते हुए महान् क्लेश भोगना पड़ रहा है ।। ५ ।। दुर्योधनश्चापि महीं प्रशास्ति ** न चास्य भूमिविवरं ददाति ।** धर्मादधर्मश्चरितो वरीया- ** नितीव मन्येत नरोऽल्पबुद्धिः ।। ६ ।।** दुर्योधने चापि विवर्धमाने ** युधिष्ठिरे चासुखमात्तराज्ये ।** किं त्वत्र कर्तव्यमिति प्रजाभिः ** शङ्का मिथः संजनिता नराणाम् ।। ७ ।।**
उधर, दुर्योधन (अधर्मपरायण होनेपर भी) पृथ्वीका शासन कर रहा है। उसके लिये यह पृथ्वी भी नहीं फटती है। इससे तो मन्द बुद्धिवाले मनुष्य यही समझेंगे कि धर्माचरणकी अपेक्षा अधर्मका आचरण ही श्रेष्ठ है। दुर्योधन निरन्तर उन्नति कर रहा है और युधिष्ठिर छलसे राज्य छिन जानेके कारण दुःख उठा रहे हैं। (युधिष्ठिर और दुर्योधनके दृष्टान्तको