महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 815, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंअसकृद् रामरामेति विक्रोशन्तमनाथवत् । कार्तवीर्यस्य पुत्रास्तु जमदग्निं युधिष्ठिर ॥ २७ ॥ पीडयित्वा शरैर्जग्मुर्यथागतमरिंदमाः । अपक्रान्तेषु वै तेषु जमदग्नौ तथा गते ॥ २८ ॥ समित्पाणिरुपागच्छदाश्रमं भृगुनन्दनः । स दृष्ट्वा पितरं वीरस्तथा मृत्युवशं गतम् । अनर्हन्तं तथाभूतं विललाप सुदुःखितः ॥ २९ ॥ युधिष्ठिर! वे महर्षि अनाथकी भाँति 'राम! राम!!' की रट लगा रहे थे, उसी अवस्थामें कार्तवीर्य अर्जुनके पुत्रोंने उन्हें बाणोंसे घायल करके मार डाला। इस प्रकार मुनिकी हत्या करके वे शत्रुसंहारक क्षत्रिय जैसे आये थे, उसी प्रकार लौट गये। जमदग्निके इस तरह मारे जानेके बाद जब वे कार्तवीर्य-पुत्र भाग गये, तब भृगुनन्दन परशुरामजी हाथोंमें समिधा लिये आश्रममें आये। वहाँ अपने पिताको इस प्रकार दुर्दशापूर्वक मरा देख उन्हें बड़ा दुःख हुआ। उनके पिता इस प्रकार मारे जानेके योग्य कदापि नहीं थे, परशुरामजी उन्हें याद करके विलाप करने लगे ॥ २७—२९ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां कार्तवीर्योपाख्याने जमदग्निवधे षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें कार्तवीर्योपाख्यानमें जमदग्निवधविषयक एक सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११६ ॥
* यहाँ कुछ प्रतियोंमें 'देवान्' की जगह 'वेदान्' पाठ मिलता है। उस दशामें यह अर्थ होगा कि 'वेदोंको वशमें कर लिया।' परंतु वेदोंको वशमें करनेकी बात असंगत-सी लगती है। देवताओंको वशमें करना ही सुसंगत जान पड़ता है, इसलिये हमने 'देवान्' यही पाठ रखा है। काश्मीरकी देवनागरी लिपिवाली हस्तलिखित पुस्तकमें यहाँ तीन श्लोक अधिक मिलते हैं। उनसे भी 'देवान्' पाठका ही समर्थन होता है। वे श्लोक इस प्रकार हैं— तं तप्यमानं ब्रह्मर्षिमूचुर्देवाः सबान्धवाः । किमर्थं तप्यसे ब्रह्मन् कः कामः प्रार्थितस्तव ॥ एवमुक्तः प्रत्युवाच देवान् ब्रह्मर्षिसत्तमः । स्वर्गहेतोस्तपस्तप्ये लोकाश्च स्युर्ममाक्षयाः ॥ तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य तदा देवास्तमूचिरे । नासंततेर्भवेल्लोकः कृत्वा धर्मशतान्यपि ॥ स श्रुत्वा वचनं तेषां त्रिदशानां कुरूद्वह ॥ इन श्लोकोंद्वारा देवताओंके प्रकट होकर वरदान देनेका प्रसंग सूचित होता है, अतः '........ततो देवान् नियमाद् वशमानयत्' यही पाठ ठीक है।