भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 814

स मृत्युवशमापन्नं कार्त्तवीर्यमुपाद्रवत् । तस्याथ युधि विक्रम्य भार्गवः परवीरहा ॥ २३ ॥ चिच्छेद निशितैर्भल्लैर्बाहून् परिघसंनिभान् । सहस्रसम्मितान् राजन् प्रगृह्य रुचिरं धनुः ॥ २४ ॥

और कालके वशीभूत हुए कार्तवीर्य अर्जुनपर धावा बोल दिया। शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले भृगुनन्दन परशुरामजीने अपना सुन्दर धनुष ले युद्धमें महान् पराक्रम दिखाकर पैने बाणोंद्वारा उसकी परिघसदृश सहस्र भुजाओंको काट डाला ॥ २३-२४ ॥

अभिभूतः स रामेण संयुक्तः कालधर्मणा । अर्जुनस्याथ दायादा रामेण कृतमन्यवः ॥ २५ ॥

इस प्रकार परशुरामजीसे परास्त हो कार्तवीर्य अर्जुन कालके गालमें चला गया। पिताके मारे जानेसे अर्जुनके पुत्र परशुरामजीपर कुपित हो उठे ॥ २५ ॥

आश्रमस्थं विना रामं जमदग्निमुपाद्रवन् । ते तं जघ्नुर्महावीर्यमयुध्यन्तं तपस्विनम् ॥ २६ ॥

और एक दिन परशुरामजीकी अनुपस्थितिमें जब आश्रमपर केवल जमदग्निजी ही रह गये थे, वे उन्हींपर चढ़ आये। यद्यपि जमदग्निजी महान् शक्तिशाली थे तो भी तपस्वी ब्राह्मण होनेके कारण युद्धमें प्रवृत्त नहीं हुए। इस दशामें भी कार्तवीर्यके पुत्र उनपर प्रहार करने लगे ॥ २६ ॥