महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
२८७-
सप्ताशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
कुम्भकर्ण, वज्रवेग और प्रमाथीका वध
मार्कण्डेय उवाच
ततो निर्याय स्वपुरात् कुम्भकर्णः सहानुगः ।
अपश्यत् कपिसैन्यं तज्जितकाशयग्रतः स्थितम् ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! सेवकों-सहित अपने नगरसे निकलकर कुम्भकर्णने अपने सामने खड़ी हुई वानरसेनाको देखा, जो विजयके उल्लाससे सुशोभित हो रही थी ॥ १ ॥
स वीक्षमाणस्तत् सैन्यं रामदर्शनकाङ्क्षया ।
अपश्यच्चापि सौमित्रिं धनुष्पाणिं व्यवस्थितम् ॥ २ ॥
फिर जब उसने भगवान् श्रीरामके दर्शनकी इच्छासे उस सेनामें इधर-उधर दृष्टि डाली, तब उसे हाथमें धनुष लिये सुमित्रानन्दन लक्ष्मण खड़े दिखायी दिये ॥ २ ॥
तमभ्येत्याशु हरयः परिवव्रुः समन्ततः ।
अभ्यघ्नंश्च महाकायैर्बहुभिर्जगतीरुहैः ॥ ३ ॥
इतनेमें ही वानरोंने चारों ओरसे आकर कुम्भकर्णको शीघ्रतापूर्वक घेर लिया और बहुत-से बड़े-बड़े पेड़ उखाड़कर उन्हींके द्वारा उसपर प्रहार करने लगे ॥ ३ ॥
करजैरतुदंश्चान्ये विहाय भयमुत्तमम् । बहुधा युध्यमानास्ते युद्धमार्गैः प्लवङ्गमाः ॥ ४ ॥ नानाप्रहरणैर्भीमै राक्षसेन्द्रमताडयन् ।
कुछ वानरोंने कुम्भकर्णसे प्राप्त होनेवाले महान् भयकी परवा न करके उसको नखोंसे पीड़ा देनी प्रारम्भ की। युद्धकी विभिन्न प्रणालियोंद्वारा अनेक प्रकारसे युद्ध करते हुए वानरसैनिक भाँति-भाँतिके भयंकर आयुधोंद्वारा राक्षसराज कुम्भकर्णको चोट पहुँचाने लगे ।।
स ताड्यमानः प्रहसन् भक्षयामास वानरान् ॥ ५ ॥ बलं चण्डबलाख्यं च वज्रबाहुं च बानरम् ।
वानरोंके प्रहार करनेपर वह जोर-जोरसे हँसने और उन्हें पकड़-पकड़कर खाने लगा। देखते-देखते बल, चण्डबल और वज्रबाहु नामक वानर उसके मुखके ग्रास बन गये ।। ५ ½ ।।
तद् दृष्ट्वा व्यथनं कर्म कुम्भकर्णस्य रक्षसः ॥ ६ ॥ उदक्रोशन् परित्रस्तास्तारप्रभृतयस्तदा ।
राक्षस कुम्भकर्णका यह दुःखदायी कर्म देखकर तार आदि वानर भयभीत हो जोर-जोरसे चीत्कार करने लगे ।।
तानुच्चैः क्रोशतः सैन्याञ्छ्रुत्वा स हरियूथपान् ॥ ७ ॥
अभिदुद्राव सुग्रीवः कुम्भकर्णमपेतभीः ।
अपने सैनिकों तथा वानरयूथपतियोंका वह उच्च स्वरसे किया जाता हुआ चीत्कार सुनकर सुग्रीव निर्भय हो कुम्भकर्णकी ओर दौड़े ।। ७ १/२ ।।
ततो निपत्य वेगेन कुम्भकर्णं महामनाः ॥ ८ ॥
शालेन जघ्निवान् मूर्ध्नि बलेन कपिकुञ्जरः ।
महामना कपिश्रेष्ठ सुग्रीवने बड़े वेगसे उछलकर एक शालवृक्षके द्वारा कुम्भकर्णके मस्तकपर बलपूर्वक प्रहार किया ।। ८ १/२ ।।
स महात्मा महावेगः कुम्भकर्णस्य मूर्धनि ॥ ९ ॥
बिभेद शालं सुग्रीवो न चैवाव्यथयत् कपिः ।
कपिश्रेष्ठ सुग्रीवका हृदय महान् था। उनका वेग भी महान् था। उन्होंने कुम्भकर्णके मस्तकपर पटककर उस शालवृक्षको दो टूक कर डाला; तथापि वे उसे व्यथा न पहुँचा सके ।। ९ १/२ ।।
ततो विनद्य सहसा शालस्पर्शविबोधितः ॥ १० ॥
दोर्भ्यामादाय सुग्रीवं कुम्भकर्णोऽहरद् बलात् ।
शालके स्पर्शसे कुम्भकर्ण कुछ सावधान हो गया। उसने सहसा गर्जना करके सुग्रीवको दोनों हाथोंसे बलपूर्वक धर दबाया और अपने साथ ले लिया ।। १० १/२ ।।
ह्रियमाणं तु सुग्रीवं कुम्भकर्णेन रक्षसा ॥ ११ ॥
अवेक्ष्याभ्यद्रवद् वीरः सौमित्रिर्मित्रनन्दनः ।
राक्षस कुम्भकर्ण द्वारा सुग्रीवका अपहरण होता देख मित्रोंका आनन्द बढ़ानेवाले सुमित्राकुमार वीरवर लक्ष्मण उसकी ओर दौड़े ।। ११ १/२ ।।
सोऽभिपत्य महावेगं रुक्मपुङ्खं महाशरम् ॥ १२ ॥
प्राहिणोत् कुम्भकर्णाय लक्ष्मणः परवीरहा ।
शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मणने कुम्भकर्णके सामने जाकर उसको लक्ष्य करके सुवर्णमय पंखसे सुशोभित एक महावेगशाली महान् बाण चलाया ॥ १२ १/२ ॥
स तस्य देहावरणं भित्त्वा देहं च सायकः ॥ १३ ॥
जगाम दारयन् भूमिं रुधिरेण समुक्षितः ।
वह बाण उसके कवचको काटकर शरीरको छेदता हुआ रक्तरंजित हो धरतीको चीरकर उसमें समा गया' ॥ १३ १/२ ॥
तथा स भिन्नहृदयः समुत्सृज्य कपीश्वरम् ॥ १४ ॥
(वेगेन महताऽऽविष्टस्तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ।)
कुम्भकर्णो महेष्वासः प्रगृहीतशिलायुधः ।
अभिदुद्राव सौमित्रिमुद्यम्य महतीं शिलाम् ॥ १५ ॥
इस प्रकार छाती छिद जानेके कारण महाधनुर्धर कुम्भकर्णने वानरराज सुग्रीवको तो छोड़ दिया और बड़े वेगसे लक्ष्मणकी ओर घूमकर कहा—'अरे! खड़ा रह, खड़ा रह'। तत्पश्चात् एक बहुत बड़ी शिला हाथमें लेकर वह सुमित्रानन्दन लक्ष्मणकी ओर दौड़ा ॥ १४-१५ ॥
तस्याभिपततस्तूर्णं क्षुराभ्यामुच्छ्रितौ करौ ।
चिच्छेद निशिताग्राभ्यां स बभूव चतुर्भुजः ॥ १६ ॥
तब लक्ष्मणने भी बड़ी शीघ्रताके साथ तीखी धारवाले दो क्षुर नामक बाण मारकर अपनी ओर आते हुए कुम्भकर्णकी ऊपर उठी हुई दोनों भुजाओंको काट डाला। उनके कटते ही वह चार भुजाओंसे युक्त हो गया ॥ १६ ॥
तानप्यस्य भुजान् सर्वान् प्रगृहीतशिलायुधान् ।
क्षुरैश्चिच्छेद लघ्वस्त्रं सौमित्रिः प्रतिदर्शयन् ॥ १७ ॥
उन चारों भुजाओंमें भी उसने आयुधके रूपमें बड़ी-बड़ी चट्टानें उठा लीं। यह देख सुमित्राकुमारने अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए फिरसे पूर्वोक्त बाण मारकर उसकी उन चारों भुजाओंको भी काट दिया ॥ १७ ॥
स बभूवातिकायश्च बहुपादशिरोभुजः ।
तं ब्रह्मास्त्रेण सौमित्रिर्ददाराद्रिच्योपमम् ॥ १८ ॥
अब उसने अपना शरीर बहुत बड़ा बना लिया। उसके अनेक पैर, अनेक सिर और अनेक भुजाएँ हो गयीं। यह देख लक्ष्मणने ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करके पर्वत-समूहके समान विशाल शरीरवाले उस राक्षसको चीर डाला ॥ १८ ॥
स पपात महावीर्यो दिव्यास्त्राभिहतो रणे ।
महाशनिविनिर्दग्धः पादपोऽङ्कुरवानिव ॥ १९ ॥
जैसे महान् भयंकर बिजलीके आघातसे शाखाओं और पत्तोंसहित वृक्ष दग्ध हो जाता है, उसी प्रकार लक्ष्मणके दिव्यास्त्रसे आहत होकर महापराक्रमी कुम्भकर्ण रणभूमिमें गिर पड़ा ॥ १९ ॥
तं दृष्ट्वा वृत्रसंकाशं कुम्भकर्णं तरस्विनम् ।
गतासुं पतितं भूमौ राक्षसाः प्राद्रवन् भयात् ॥ २० ॥
वृत्रासुरके समान वेगशाली कुम्भकर्णको प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर पड़ा देख सब राक्षस भयके मारे भाग चले ॥ २० ॥
तथा तान् द्रवतो योधान् दृष्ट्वा तौ दूषणानुजौ ।
अवस्थाप्याथ सौमित्रिं संक्रुद्धावभ्यधावताम् ॥ २१ ॥
अपने उन सैनिकोंको इस प्रकार भागते देख दूषणके दोनों भाई—वज्रवेग और प्रमाथीने किसी प्रकार उन्हें रोककर खड़ा किया और अत्यन्त कुपित हो सुमित्राकुमार लक्ष्मणपर धावा बोल दिया ॥ २१ ॥
तावाद्रवन्तौ संक्रुद्धौ वज्रवेगप्रमाथिनौ ।
अभिजग्राह सौमित्रिर्निर्नद्योभौ पतत्त्रिभिः ॥ २२ ॥
क्रोधमें भरे हुए वज्रवेग और प्रमाथीको अपनी ओर आते देख लक्ष्मणने बड़े जोरसे सिंहनाद किया और उन दोनोंकी गतिको बाणोंद्वारा रोक दिया ॥ २२ ॥
ततः सुतुमुलं युद्धमभवल्लोमहर्षणम् ।
दूषणानुजयोः पार्थ लक्ष्मणस्य च धीमतः ॥ २३ ॥
युधिष्ठिर! फिर तो दूषणके भाइयों तथा बुद्धिमान् लक्ष्मणमें ऐसा भयंकर युद्ध हुआ, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ॥ २३ ॥
महता शरवर्षेण राक्षसौ सोऽभ्यवर्षत ।
तौ चापि वीरौ संक्रुद्धावुभौ तं समवर्षताम् ॥ २४ ॥
लक्ष्मण उन दोनों राक्षसोंपर बाणोंकी बड़ी भारी वर्षा कर रहे थे और वे दोनों वीर राक्षस भी अत्यन्त कुपित होकर लक्ष्मणपर बाणोंकी बौछार करते थे ॥ २४ ॥
मुहूर्तमेवमभवद् वज्रवेगप्रमाथिनोः ।
सौमित्रेश्च महाबाहोः सम्प्रहारः सुदारुणः ॥ २५ ॥
इस प्रकार वज्रवेग, प्रमाथी और महाबाहु लक्ष्मणका वह भयंकर संग्राम दो घड़ीतक अबाधगतिसे चलता रहा ॥ २५ ॥
अथाद्रिशृङ्गमादाय हनुमान् मारुतात्मजः ।
अभिद्रुत्याददे प्राणान् वज्रवेगस्य रक्षसः ॥ २६ ॥
इसी बीचमें वायुनन्दन हनुमान्जीने पर्वतका शिखर हाथमें लेकर वज्रवेग नामक राक्षसके ऊपर आक्रमण किया और उसके प्राण ले लिये ॥ २६ ॥
नीलश्च महता ग्राव्णा दूषणावरजं हरिः ।
प्रमाथिनमभिद्रुत्य प्रममाथ महाबलः ॥ २७ ॥
महाबली नील नामक वानरने एक विशाल चट्टान लेकर दूषणके छोटे भाई प्रमाथीपर हमला किया और उसका कचूमर निकाल दिया ॥ २७ ॥
ततः प्रावर्तत पुनः संग्रामः कटुकोदयः ।
रामरावणसैन्यानामन्योन्यमभिधावताम् ॥ २८ ॥
तदनन्तर श्रीराम और रावणकी सेनाओंमें परस्पर आक्रमणपूर्वक भीषण संग्राम आरम्भ हो गया जो कटु परिणामका जनक था ॥ २८ ॥
शतशो नैर्ऋतान् वन्या जघ्नुर्वन्यांश्च नैर्ऋताः ।
नैर्ऋतास्तत्र वध्यन्ते प्रायेण न तु वानराः ॥ २९ ॥
वनवासी वानरोंने सैकड़ों राक्षसोंको तथा राक्षसोंने वानरोंको घायल किया। उस युद्धमें अधिकांश राक्षस ही मारे जा रहे थे, वानर नहीं ॥ २९ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि कुम्भकर्णादिवधे
सप्ताशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें कुम्भकर्ण आदिका
वधविषयक दो सौ सत्तासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८७ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल २९ १/२ श्लोक हैं)
२८८-
अष्टाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
इन्द्रजित्का मायामय युद्ध तथा श्रीराम और लक्ष्मणकी मूर्च्छा
मार्कण्डेय उवाच
ततः श्रुत्वा हतं संख्ये कुम्भकर्णं सहानुगम् ।
प्रहस्तं च महेष्वासं धूम्राक्षं चातितेजसम् ॥ १ ॥
पुत्रमिन्द्रजितं वीरं रावणः प्रत्यभाषत ।
जहि रामममित्रघ्न सुग्रीवं च सलक्ष्मणम् ॥ २ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! तदनन्तर सेवकोंसहित कुम्भकर्ण, महाधनुर्धर प्रहस्त तथा अत्यन्त तेजस्वी धूम्राक्षको संग्राममें मारा गया सुनकर रावणने अपने वीर पुत्र इन्द्रजित्से कहा—'शत्रुसूदन! तुम राम, लक्ष्मण तथा सुग्रीवका वध करो ॥ १-२ ॥
त्वया हि मम सत्पुत्र यशो दीप्तमुपार्जितम् ।
जित्वा वज्रधरं संख्ये सहस्राक्षं शचीपतिम् ॥ ३ ॥
'सुपुत्र! तुमने युद्धमें सहस्र नेत्रोंवाले वज्रधारी शचीपति इन्द्रको जीतकर उज्ज्वल यशका उपार्जन किया है ॥ ३ ॥
अन्तर्हितः प्रकाशो वा दिव्यैर्दत्तवरैः शरैः ।
जहि शत्रूनमित्रघ्न मम शस्त्रभृतां वर ॥ ४ ॥
'शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ शत्रुनाशन वीर! जिनके लिये देवताओंने तुम्हें वरदान दिया है, ऐसे दिव्यास्त्रों-द्वारा प्रकटरूपमें या अदृश्य होकर मेरे शत्रुओंका नाश करो ॥ ४ ॥
रामलक्ष्मणसुग्रीवाः शरस्पर्शं न तेऽनघ ।
समर्थाः प्रतिसोढुं च कुतस्तदनुयायिनः ॥ ५ ॥
'अनघ! स्वयं राम, लक्ष्मण और सुग्रीव भी तुम्हारे बाणोंका आघात सहन करनेमें समर्थ नहीं हैं, फिर उनके अनुयायी तो हो ही कैसे सकते हैं? ॥ ५ ॥
अकृता या प्रहस्तेन कुम्भकर्णेन चानघ ।
खरस्यापचितिः संख्ये तां गच्छ त्वं महाभुज ॥ ६ ॥
'निष्पाप महाबाहो! प्रहस्त और कुम्भकर्णने भी खरके वधका जो बदला नहीं चुकाया, उसे युद्धमें तुम चुकाओ ॥ ६ ॥
त्वमद्य निशितैर्बाणैर्हत्वा शत्रून् ससैनिकान् ।
प्रतिनन्दय मां पुत्र पुरा जित्वेव वासवम् ॥ ७ ॥
‘बेटा! तुमने पूर्वकालमें इन्द्रको जीतकर जिस प्रकार मुझे आनन्दित किया था, उसी प्रकार आज तुम तीखे बाणोंसे सैनिकोंसहित शत्रुओंका संहार करके मेरा आनन्द बढ़ाओ’॥ ७॥
इत्युक्तः स तथेत्युक्त्वा रथमास्थाय दंशितः।
प्रययाविन्द्रजिद् राजंस्तूर्णमायोधनं प्रति॥ ८॥
राजन्! रावणके द्वारा ऐसी आज्ञा देनेपर इन्द्रजित्ने ‘बहुत अच्छा’ कहकर पिताकी आज्ञा स्वीकार की और वह कवच बाँध रथपर बैठकर तुरंत ही संग्रामभूमिकी ओर चल दिया॥ ८॥
ततो विश्राव्य विस्पष्टं नाम राक्षसपुङ्गवः।
आह्वयामास समरे लक्ष्मणं शुभलक्षणम्॥ ९॥
तत्पश्चात् उस राक्षसराजने स्पष्टरूपसे अपने नामकी घोषणा करके शुभलक्षण लक्ष्मणको युद्धके लिये ललकारा॥ ९॥
तं लक्ष्मणोऽभ्यधावच्च प्रगृह्य सशरं धनुः।
त्रासयंस्तलघोषेण सिंहः क्षुद्रमृगान् यथा॥ १०॥
तब लक्ष्मण भी धनुषपर बाण चढ़ाये हुए उसकी ओर बड़े वेगसे दौड़े और सिंह जैसे छोटे मृगोंको डरा देता है, उसी प्रकार वे अपने धनुषकी टंकारसे सब राक्षसोंको त्रास देने लगे॥ १०॥
तयोः समभवद् युद्धं सुमहज्जयगृद्धिनोः।
दिव्यास्त्रविदुषोस्तीव्रमन्योन्यस्पर्धिनोस्तदा॥ ११॥
वे दोनों ही विजयकी अभिलाषा रखनेवाले, दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता तथा परस्पर बड़ी स्पर्धा रखनेवाले थे। उन दोनोंमें उस समय बड़ा भारी युद्ध हुआ॥ ११॥
रावणिस्तु यदा नैनं विशेषयति सायकैः।
ततो गुरुतरं यत्नमतिष्ठद् बलिनां वरः॥ १२॥
बलवानोंमें श्रेष्ठ रावणकुमार इन्द्रजित् जब बाण-वर्षा करनेमें लक्ष्मणसे आगे न बढ़ सका, तब उसने गुरुतर प्रयत्न आरम्भ किया॥ १२॥
तत एनं महावेगैदर्दयामास तोमरैः।
तानागतान् स चिच्छेद सौमित्रिर्निशितैः शरैः॥ १३॥
उसने अत्यन्त वेगशाली तोमरोंकी वर्षा करके लक्ष्मणको पीड़ा पहुँचानेकी चेष्टा की, परंतु लक्ष्मणने तीखे बाणोंसे उन सब तोमरोंको पास आते ही काट गिराया॥ १३॥
ते निकृत्ताः शरैस्तीक्ष्णैर्न्यपतन् धरणीतले।
तमङ्गदो वालिसुतः श्रीमानुद्यम्य पादपम्॥ १४॥
अभिद्रुत्य महावेगस्ताडयामास मूर्धनि।
तस्येन्द्रजिदसम्भ्रान्तः प्रासेनोरसि वीर्यवान्॥ १५॥
प्रहर्तुमैच्छत् तं चास्य प्रासं चिच्छेद लक्ष्मणः ।
लक्ष्मणके तीखे बाणोंसे टूक-टूक होकर वे तोमर पृथ्वीपर बिखर गये। तब महावेगशाली वालिपुत्र श्रीमान् अंगदने एक वृक्ष उठा लिया और दौड़कर इन्द्रजित्के मस्तकपर उसे दे मारा; परंतु इन्द्रजित् इससे तनिक भी विचलित न हुआ। उस पराक्रमी वीरने प्रासद्वारा अंगदकी छातीमें प्रहार करनेका विचार किया, किंतु लक्ष्मणने उसे पहले ही काट गिराया ।। १४-१५ १/२ ।।
तमभ्याशगतं वीरमङ्गदं रावणात्मजः ।। १६ ।।
गदयाताडयत् सव्ये पार्श्वे वानरपुङ्गवम् ।
तब रावणकुमारने अपने निकट आये हुए उस वानरश्रेष्ठ वीर अंगदकी बायीं पसलीमें गदासे आघात किया ।। १६ १/२ ।।
तमचिन्त्य प्रहारं स बलवान् वालिनः सुतः ।। १७ ।।
ससर्जेन्द्रजितः क्रोधाच्छालस्कन्धं तथाङ्गदः ।
बलवान् वालिनन्दन अंगदने इन्द्रजित्के उस गदाप्रहारकी कोई परवा न करके ऊपर क्रोधपूर्वक साखूका तना उठाकर दे मारा ।। १७ १/२ ।।
सोऽङ्गदेन रुषोत्सृष्टो वधायेन्द्रजितस्तरुः ।। १८ ।।
जघानेन्द्रजितः पार्थ रथं साश्वं ससारथिम् ।
युधिष्ठिर! अंगदके द्वारा इन्द्रजित्के वधके लिये रोषपूर्वक चलाये हुए उस वृक्षने उसके सारथि और घोड़ोंसहित रथको नष्ट कर दिया ।। १८ १/२ ।।
ततो हताश्वात् प्रस्कन्द्य रथात् स हतसारथिः ।। १९ ।।
तत्रैवान्तर्दधे राजन् मायया रावणात्मजः ।
राजन्! सारथिके मारे जानेपर रावणकुमार इन्द्रजित् उस अश्वहीन रथसे कूद पड़ा और मायाका आश्रय ले वहीं अन्तर्धान हो गया ।। १९ १/२ ।।
अन्तर्हितं विदित्वा तं बहुमायं च राक्षसम् ।। २० ।।
रामस्तं देशमागम्य तत् सैन्यं पर्यरक्षत ।
अनेक प्रकारकी माया जाननेवाले उस राक्षसको अदृश्य हुआ जान भगवान् श्रीराम उस स्थानपर आकर सब ओरसे अपनी सेनाकी रक्षा करने लगे ।। २० १/२ ।।
स राममुद्दिश्य शरैस्ततो दत्तवरैस्तदा ।। २१ ।।
विव्याध सर्वगात्रेषु लक्ष्मणं च महाबलम् ।
तब इन्द्रजित्ने भगवान् श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मणके सम्पूर्ण अंगोंको देवताओंसे वरदानके रूपमें प्राप्त हुए बाणोंद्वारा क्षत-विक्षत कर दिया ।। २१ १/२ ।।
तमदृश्यं शरैः शूरौ माययान्तर्हितं तदा ।। २२ ।।
योधयामासतुरुभौ रावणिं रामलक्ष्मणौ ।
यद्यपि रावणका पुत्र मायासे तिरोहित हो जानेके कारण दिखायी नहीं देता था, तो भी शूरवीर श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाई उसके साथ युद्ध करते ही रहे ।। २२ १/२ ।। स रुषा सर्वगात्रेषु तयोः पुरुषसिंहयोः ।। २३ ।। व्यसृजत् सायकान् भूयः शतशोऽथ सहस्रशः । इन्द्रजित्ने पुरुषोंमें सिंहके समान पराक्रमी उन दोनों भाइयोंके समस्त अंगोंमें रोषपूर्वक सैकड़ों और हजारों बाणोंकी बारंबार वृष्टि की ।। २३ १/२ ।। तमदृश्यं विचिन्वन्तः सृजन्तमनिशं शरान् ।। २४ ।। हरयो विविशुर्व्योम प्रगृह्य महतीः शिलाः । वानरोंने देखा कि वह राक्षस छिपकर निरन्तर बाणोंकी झड़ी लगा रहा है, तब वे हाथोंमें बड़ी-बड़ी शिलाएँ लिये आकाशमें उड़ गये और उसकी खोज करने लगे ।। २४ १/२ ।। तांश्च तौ चाप्यदृश्यः स शरैर्विव्याध राक्षसः ।। २५ ।। स भृशं ताडयामास रावणिर्माययाऽऽवृतः । रावणकुमार अपनी मायासे आवृत होनेके कारण स्वयं किसीकी दृष्टिमें नहीं आता था; परंतु वह उन दोनों भाइयोंको तथा सम्पूर्ण वानरोंको भी निरन्तर अपने बाणोंद्वारा घायल कर रहा था ।। २५ १/२ ।। तौ शरैराचितौ वीरौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ । पेततुर्गगनाद् भूमिं सूर्याचन्द्रमसाविव ।। २६ ।। वे दोनों बन्धु श्रीराम और लक्ष्मण ऊपरसे नीचेतक बाणोंसे व्याप्त हो गये थे; अतः आकाशसे गिरे हुए सूर्य और चन्द्रमाकी भाँति इस पृथ्वीपर गिर पड़े ।। २६ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि इन्द्रजिद्युद्धे अष्टाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २८८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें इन्द्रजित्-युद्धविषयक दो सौ अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २८८ ।।
२८९-
एकोननवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
श्रीराम-लक्ष्मणका सचेत होकर कुबेरके भेजे हुए अभिमन्त्रित जलसे प्रमुख वानरोंसहित अपने नेत्र धोना, लक्ष्मणद्वारा इन्द्रजित्का वध एवं सीताको मारनेके लिये उद्यत हुए रावणका अविन्ध्यके द्वारा निवारण करना
मार्कण्डेय उवाच
तावुभौ पतितौ दृष्ट्वा भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ।
बबन्ध रावणिर्भूयः शरैर्दत्तवरैस्तदा ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणको पृथ्वीपर पड़े देख रावणकुमार इन्द्रजित्ने जिनके लिये देवताओंका वर प्राप्त था, उन बाणोंद्वारा उन्हें सब ओरसे बाँध लिया ॥ १ ॥
तौ वीरौ शरबन्धेन बद्धाविन्द्रजिता रणे ।
रेजतुः पुरुषव्याघ्रौ शकुन्ताविव पञ्जरे ॥ २ ॥
इन्द्रजित्द्वारा बाणोंके बन्धनसे बँधे हुए वे दोनों वीर पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण पिंजड़ेमें बंद हुए दो पक्षियोंकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ २ ॥
तौ दृष्ट्वा पतितौ भूमौ शतशः सायकैश्चितौ ।
सुग्रीवः कपिभिः सार्धं परिवार्य ततः स्थितः ॥ ३ ॥
उन दोनोंको सैकड़ों बाणोंसे व्याप्त एवं पृथ्वीपर पड़े देख वानरोंसहित सुग्रीव उन्हें सब ओरसे घेरकर खड़े हो गये ॥ ३ ॥
सुषेणमैन्दद्विविदैः कुमुदेनाङ्गदेन च ।
हनुमन्नीलतारैश्च नलेन च कपीश्वरः ॥ ४ ॥
सुषेण, मैन्द, द्विविद, कुमुद, अंगद, हनुमान्, नील, तार तथा नलके साथ कपिराज सुग्रीव उन दोनों बन्धुओंकी रक्षा करने लगे ॥ ४ ॥
ततस्तं देशमागम्य कृतकर्मा विभीषणः ।
बोधयामास तौ वीरौ प्रज्ञास्त्रेण प्रबोधितौ ॥ ५ ॥
तदनन्तर अपने कर्तव्य कर्मको पूरा करके विभीषण उस स्थानपर आये। उन्होंने प्रज्ञास्त्रद्वारा उन दोनों वीरोंको होशमें लाकर जगाया ॥ ५ ॥
विशल्यौ चापि सुग्रीवः क्षणेनैतौ चकार ह ।
विशल्यया महौषध्या दिव्यमन्त्रप्रयुक्तया ॥ ६ ॥
फिर सुग्रीवने दिव्य मन्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित विशल्या नामक महौषधिद्वारा उनके अंगोंसे बाण निकालकर उन्हें क्षणभरमें स्वस्थ कर दिया ।। ६ ।। तौ लब्धसंज्ञौ नृवरौ विशल्यावुदतिष्ठताम् । गततन्द्रीक्लमौ चापि क्षणेनैतौ महारथौ ।। ७ ।। होशमें आ जानेपर वे दोनों नरश्रेष्ठ महारथी वीर बाणोंसे रहित हो आलस्य और थकावट त्यागकर क्षणभरमें उठ खड़े हुए ।। ७ ।। ततो विभीषणः पार्थ राममिक्ष्वाकुनन्दनम् । उवाच विज्वरं दृष्ट्वा कृताञ्जलिरिदं वचः ।। ८ ।। युधिष्ठिर! तदनन्तर विभीषणने इक्ष्वाकुकुलनन्दन श्रीरामचन्द्रजीको नीरोग एवं स्वस्थ देख हाथ जोड़कर इस प्रकार कहा— ।। ८ ।। इदमम्भो गृहीत्वा तु राजराजस्य शासनात् । गुह्यकोऽभ्यागतः श्वेतात् त्वत्सकाशमरिन्दम ।। ९ ।। 'शत्रुदमन! राजाधिराज कुबेरकी आज्ञासे एक गुह्यक यह जल लिये हुए श्वेतपर्वतसे चलकर आपके समीप आया है ।। ९ ।। इदमम्भः कुबेरस्ते महाराजः प्रयच्छति । अन्तर्हितानां भूतानां दर्शनार्थं परंतप ।। १० ।।
'परंतप! महाराज कुबेर आपको यह जल इस उद्देश्यसे समर्पित कर रहे हैं कि आप इसे नेत्रोंमें लगाकर मायासे अदृश्य हुए प्राणियोंको देख सकें ।। १० ।। अनेन मृष्टनयनो भूतान्यन्तर्हितान्युत । भवान् द्रक्ष्यति यस्मै च प्रदास्यति नरः स तु ।। ११ ।। 'उन्होंने कहा है कि आप इस जलसे अपने दोनों नेत्र धोकर अदृश्य प्राणियोंको भी देख सकेंगे और आप जिसे यह जल अर्पित करेंगे, वह मनुष्य भी अदृश्य भूतोंको देखनेमें समर्थ होगा' ।। ११ ।। तथेति रामस्तद् वारि प्रतिगृह्याभिसंस्कृतम् । चकार नेत्रयोः शौचं लक्ष्मणश्च महामनाः ।। १२ ।। 'बहुत अच्छा' कहकर श्रीरामचन्द्रजीने वह अभिमन्त्रित जल ले लिया। फिर उन्होंने तथा महामना लक्ष्मणने भी उससे अपने दोनों नेत्र धोये ।। १२ ।। सुग्रीवजाम्बवन्तौ च हनुमानङ्गदस्तथा । मैन्दद्विविदनीलाश्च प्रायः प्लवगसत्तमाः ।। १३ ।। सुग्रीव, जाम्बवान्, हनुमान्, अंगद, मैन्द, द्विविद तथा नील आदि प्रायः सभी प्रमुख वानरोंने उस जलसे अपनी-अपनी आँखें धोयीं ।। १३ ।। तथा समभवच्चापि यदुवाच विभीषणः । क्षणेनातीन्द्रियाण्येषां चक्षूंष्यासन् युधिष्ठिर ।। १४ ।। युधिष्ठिर! जैसा विभीषणने बताया था, उसका वैसा ही प्रभाव देखनेमें आया। इन सबकी आँखें क्षणभरमें अतीन्द्रिय वस्तुओंका साक्षात्कार करनेवाली हो गयीं ।। १४ ।। इन्द्रजित् कृतकर्मा च पित्रे कर्म तदाऽऽत्मनः । निवेद्य पुनरागच्छत् त्वरयाऽऽजि शिरःप्रति ।। १५ ।। इन्द्रजित्ने उस दिन युद्धमें जो पराक्रम कर दिखाया था, अपने उस वीरोचित कर्मको पितासे बताकर वह पुनः युद्धके मुहानेकी ओर लौटने लगा ।। १५ ।। तमापतन्तं संक्रुद्धं पुनरेव युयुत्सया । अभिदुद्राव सौमित्रिर्विभीषणमते स्थितः ।। १६ ।। उसे क्रोधमें भरकर पुनः युद्धकी इच्छासे आते देख विभीषणकी सम्मतिसे लक्ष्मणने उसपर धावा किया ।। १६ ।। अकृताह्निकमेवैनं जिघांसुर्जितकाशिनम् । शरैर्जघान संक्रुद्धः कृतसंज्ञोऽथ लक्ष्मणः ।। १७ ।। इन्द्रजित् विजयके उल्लाससे सुशोभित हो रहा था। अभी उसने नित्यकर्म भी नहीं किया था, उसी अवस्थामें सचेत हुए लक्ष्मणने कुपित होकर उसे मार डालनेकी इच्छासे उसपर बाणोंद्वारा प्रहार करना आरम्भ किया ।। १७ ।। तयोः समभवद् युद्धं तदान्योन्यं जिगीषतोः ।
अतीव चित्रमाश्चर्यं शक्रप्रह्लादयोरिव ॥ १८ ॥ वे दोनों ही एक-दूसरेको जीतनेके लिये उत्सुक थे। उस समय उनमें इन्द्र और प्रह्लादकी भाँति अत्यन्त अद्भुत तथा आश्चर्यजनक युद्ध होने लगा ॥ १८ ॥ अविध्यदिन्द्रजित् तीक्ष्णैः सौमित्रिं मर्मभेदिभिः । सौमित्रिश्चानलस्पर्शैर्विध्यद् रावणिं शरैः ॥ १९ ॥ इन्द्रजित्ने तीखे तथा मर्मभेदी बाणोंद्वारा सुमित्रा-कुमार लक्ष्मणको बींध डाला। इसी प्रकार लक्ष्मणने भी अग्निके समान दाहक स्पर्शवाले तीखे सायकोंद्वारा रावणकुमार इन्द्रजित्को घायल कर दिया ॥ १९ ॥ सौमित्रिशरसंस्पर्शाद् रावणिः क्रोधमूर्च्छितः । असृजल्लक्ष्मणायाष्टौ शरानाशीविषोपमान् ॥ २० ॥ लक्ष्मणके बाणोंकी चोट खाकर रावणकुमार क्रोधसे मूर्च्छित हो उठा। उसने उनके ऊपर विषधर साँपोंके समान विषैले आठ बाण छोड़े ॥ २० ॥ तस्यासून् पावकस्पर्शैः सौमित्रिः पत्रिभिस्त्रिभिः । यथा निरहरद् वीरस्तन्मे निगदतः शृणु ॥ २१ ॥ वीर सुमित्राकुमारने अग्निके समान दाहक तीन बाणोंद्वारा जिस प्रकार इन्द्रजित्के प्राण लिये, वह बताता हूँ; सुनो ॥ २१ ॥ एकेनास्य धनुष्मन्तं बाहुं देहादपातयत् । द्वितीयेन सनाराचं भुजं भूमौ न्यपातयत् ॥ २२ ॥ एक बाणद्वारा उन्होंने इन्द्रजित्की धनुष धारण करनेवाली भुजाको काटकर शरीरसे अलग कर दिया। दूसरे बाणद्वारा नाराच लिये हुए शत्रु की दूसरी भुजाको धराशायी कर दिया ॥ २२ ॥ तृतीयेन तु बाणेन पृथुधारेण भास्वता । जहार सुनसं चापि शिरो भ्राजिष्णुकुण्डलम् ॥ २३ ॥ तत्पश्चात् मोटी धारवाले और चमकीले तीसरे बाणसे उन्होंने सुन्दर नासिका और शोभाशाली कुण्डलोंसे विभूषित शत्रुके मस्तकको भी धड़से अलग कर दिया ॥ २३ ॥ विनिकृत्तभुजस्कन्धं कबन्धं भीमदर्शनम् । तं हत्वा सूतमप्यस्त्रैर्जघान बलिनां वरः ॥ २४ ॥ भुजाओं और कंधोंके कट जानेसे उसका धड़ बड़ा भयंकर दिखायी देता था। इन्द्रजित्को मारकर बलवानोंमें श्रेष्ठ लक्ष्मणने अपने अस्त्रोंद्वारा उसके सारथिको भी मार गिराया ॥ २४ ॥ लङ्कां प्रवेशयामासुस्तं रथं वाजिनस्तदा । ददर्श रावणस्तं च रथं पुत्रविनाकृतम् ॥ २५ ॥ स पुत्रं निहतं ज्ञात्वा त्रासात् सम्भ्रान्तमानसः ।
रावणः शोकमोहार्तो वैदेहीं हन्तुमुद्यतः ॥ २६ ॥
उस समय घोड़ोंने उस ही खाली रथको लंकापुरीमें पहुँचाया। रावणने देखा, मेरे पुत्रका रथ उसके बिना ही लौट आया है। तब पुत्रको मारा गया जान भयके मारे रावणका मन उद्भ्रान्त हो उठा। वह शोक और मोहसे आतुर होकर विदेहनन्दिनी सीताको मार डालनेके लिये उद्यत हो गया ॥ २५-२६ ॥
अशोकवनिकास्थां तां रामदर्शनलालसाम् ।
खड्गमादाय दुष्टात्मा जवेनाभिपपात ह ॥ २७ ॥
दुष्टात्मा दशानन हाथमें तलवार लेकर अशोक-वाटिकामें श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनकी लालसासे बैठी हुई सीताजीके पास बड़े वेगसे दौड़ा गया ॥ २७ ॥
तं दृष्ट्वा तस्य दुर्बुद्धेरविन्ध्यः पापनिश्चयम् ।
शमयामास संक्रुद्धं श्रूयतां येन हेतुना ॥ २८ ॥
दूषित बुद्धिवाले उस निशाचरके इस पापपूर्ण निश्चयको जानकर मन्त्री अविन्ध्यने समझा-बुझाकर उसका क्रोध शान्त किया। किस युक्तिसे उसने रावणको शान्त किया, यह बताता हूँ, सुनो— ॥ २८ ॥
महाराज्ये स्थितो दीप्ते न स्त्रियं हन्तुमर्हसि ।
हतैवैषा यदा स्त्री च बन्धनस्था च ते वशे ॥ २९ ॥
‘राक्षसराज! आप लंकाके समुज्ज्वल सम्राट्-पदपर विराजमान होकर एक अबलाको न मारें। यह स्त्री होकर आपके वशमें पड़ी है, आपके घरमें कैद है; ऐसी दशामें यह तो मरी हुई है ॥ २९ ॥
न चैषा देहभेदेन हता स्यादिति मे मतिः ।
जहि भर्तारमेवास्या हते तस्मिन् हता भवेत् ॥ ३० ॥
‘इसके शरीरके टुकड़े-टुकड़े कर देनेसे ही इसका वध नहीं होगा, ऐसा मेरा विचार है। इसके पतिको ही मार डालिये। उसके मारे जानेपर यह स्वतः मर जायगी ॥ ३० ॥
न हि ते विक्रमे तुल्यः साक्षादपि शतक्रतुः ।
असकृद्धि त्वया सेन्द्रास्त्रासितास्त्रिदशा युधि ॥ ३१ ॥
‘साक्षात् इन्द्र भी पराक्रममें आपकी समानता नहीं कर सकते। आपने अनेक बार युद्धमें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंको भयभीत (एवं पराजित) किया है’ ॥ ३१ ॥
एवं बहुविधैर्वाक्यैरविन्ध्यो रावणं तदा ।
क्रुद्धं संशमयामास जगृहे च स तद्वचः ॥ ३२ ॥
इस तरह अनेक प्रकारके वचनोंद्वारा अविन्ध्यने रावणका क्रोध शान्त किया और रावणने भी उसकी बात मान ली ॥ ३२ ॥
निर्याणे स मतिं कृत्वा निधायासिं क्षपाचरः ।
आज्ञापयामास तदा रथो मे कल्प्यतामिति ॥ ३३ ॥
फिर उस निशाचरने युद्धके लिये प्रस्थान करनेका निश्चय करके तलवार रख दी और आज्ञा दी—'मेरा रथ तैयार किया जाय' ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि श्रीरामोपाख्यानपर्वणि इन्द्रजिद्वधे एकोननवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें इन्द्रजित्-वधविषयक दो सौ नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८९ ॥
२९०-
नवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
राम और रावणका युद्ध तथा रावणका वध
मार्कण्डेय उवाच
ततः क्रुद्धो दशग्रीवः प्रिये पुत्रे निपातिते ।
निर्ययौ रथमास्थाय हेमरत्नविभूषितम् ॥ १ ॥
स वृतो राक्षसैर्घोरैर्विविधायुधपाणिभिः ।
अभिदुद्राव रामं स योधयन् हरियूथपान् ॥ २ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! अपने प्रिय पुत्र इन्द्रजित्के मारे जानेपर दशमुख रावणका क्रोध बहुत बढ़ गया। वह सुवर्ण तथा रत्नोंसे विभूषित रथपर बैठकर लंकापुरीसे बाहर निकला। हाथोंमें अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण करनेवाले भयंकर राक्षस उसे घेरकर चले। वह वानर-यूथपतियोंसे युद्ध करता हुआ श्रीरामचन्द्रजीकी ओर दौड़ा ॥ १-२ ॥
तमाद्रवन्तं संक्रुद्धं मैन्दनीलनलाङ्गदाः ।
हनूमाञ्जाम्बवांश्चैव ससैन्याः पर्यवारयन् ॥ ३ ॥
उसे क्रोधपूर्वक आक्रमण करते देख मैन्द, नील, नल, अंगद, हनुमान् और जाम्बवान्ने सेनासहित आगे बढ़कर उसे चारों ओरसे घेर लिया ॥ ३ ॥
ते दशग्रीवसैन्यं तदृक्षवानरपुङ्गवाः ।
द्रुमैर्विध्वंसयांचक्रुर्दशग्रीवस्य पश्यतः ॥ ४ ॥
उन रीछ और वानर-सेनापतियोंने दशाननके देखते-देखते वृक्षोंकी मारसे उसकी सेनाका संहार आरम्भ कर दिया ॥ ४ ॥
ततः स सैन्यमालोक्य वध्यमानमरातिभिः ।
मायावी चासृजन्मायां रावणो राक्षसाधिपः ॥ ५ ॥
अपनी सेनाको शत्रुओंद्धारा मारी जाती देख मायावी राक्षसराज रावणने माया प्रकट की ॥ ५ ॥
तस्य देहविनिष्क्रान्ताः शतशोऽथ सहस्रशः ।
राक्षसाः प्रत्यदृश्यन्त शरशक्त्यृष्टिपाणयः ॥ ६ ॥
उसके शरीरसे सैकड़ों और हजारों राक्षस प्रकट होकर हाथोंमें बाण, शक्ति तथा ऋष्टि आदि आयुध लिये दिखायी देने लगे ॥ ६ ॥
तान् रामो जघ्निवात् सर्वान् दिव्येनास्त्रेण राक्षसान् ।
अथ भूयोऽपि मायां स व्यदधाद् राक्षसाधिपः ॥ ७ ॥
श्रीरामचन्द्रजीने अपने दिव्य अस्त्रके द्वारा उन सब राक्षसोंको नष्ट कर दिया। तब राक्षसराजने पुनः मायाकी सृष्टि की ॥ ७ ॥
कृत्वा रामस्य रूपाणि लक्ष्मणस्य च भारत ।
अभिदुद्राव रामं च लक्ष्मणं च दशाननः ॥ ८ ॥
भारत! दशाननने श्रीराम और लक्ष्मणके ही बहुत-से रूप धारण करके श्रीराम और लक्ष्मणपर धावा किया ॥ ८ ॥
ततस्ते राममार्च्छन्तो लक्ष्मणं च क्षपाचराः ।
अभिपेतुस्तदा रामं प्रगृहीतशरासनाः ॥ ९ ॥
तदनन्तर वे राक्षस हाथोंमें धनुष-बाण लिये श्रीराम और लक्ष्मणको पीड़ा देते हुए उनपर टूट पड़े ॥ ९ ॥
तां दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रस्य मायामिक्ष्वाकुनन्दनः ।
उवाच रामं सौमित्रिरसम्भ्रान्तो बृहद् वचः ॥ १० ॥
राक्षसराज रावणकी उस मायाको देखकर इक्ष्वाकुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मणको तनिक भी घबराहट नहीं हुई। उन्होंने श्रीरामसे यह महत्त्वपूर्ण बात कही— ॥ १० ॥
जहीमान् राक्षसान् पापानात्मनः प्रतिरूपकान् ।
जघान रामस्तांश्चान्यानात्मनः प्रतिरूपकान् ॥ ११ ॥
‘भगवन्! अपने ही समान आकारवाले इन पापी राक्षसोंको मार डालिये।’ तब श्रीरामने रावणकी मायासे निर्मित अपने ही समान रूप धारण करनेवाले उन सबको तथा अन्य राक्षसोंको भी मार डाला ॥ ११ ॥
ततो हर्यश्वयुक्तेन रथेनादित्यवर्चसा ।
उपतस्थे रणे रामं मातलिः शक्रसारथिः ॥ १२ ॥
इसी समय इन्द्रका सारथि मातलि हरे रंगके घोड़ोंसे जुते हुए सूर्यके समान तेजस्वी रथके साथ उस रणभूमिमें श्रीरामचन्द्रजीके समीप आ पहुँचा ॥ १२ ॥
मातलिरुवाच
अयं हर्यश्वयुक् जैत्रो मघोनः स्यन्दनोत्तमः ।
अनेन शक्रः काकुत्स्थ समरे दैत्यदानवान् ॥ १३ ॥
शतशः पुरुषव्याघ्र रथोदारेण जघ्निवान् ।
तदनेन नरव्याघ्र मया यत्तेन संयुगे ॥ १४ ॥
स्यन्दनेन जहि क्षिप्रं रावणं मा चिरं कृथाः ।
मातलि बोला— पुरुषसिंह श्रीराम! यह हरे रंगके घोड़ोंसे जुता हुआ विजयशाली उत्तम रथ देवराज इन्द्रका है। इस विशाल रथके द्वारा इन्द्रने सैकड़ों दैत्यों और दानवोंका समरांगणमें संहार किया है। नरश्रेष्ठ! मेरे द्वारा संचालित इस रथपर बैठकर आप युद्धमें रावणको शीघ्र मार डालिये, विलम्ब न कीजिये ॥ १३-१४ १/२ ॥
इत्युक्तो राघवस्तथ्यं वचोऽशङ्कत मातलेः ॥ १५ ॥
मायैषा राक्षसस्येति तमुवाच विभीषणः ।
नेयं माया नरव्याघ्र रावणस्य दुरात्मनः ॥ १६ ॥
मातलिके ऐसा कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उसकी बातपर इसलिये संदेह किया कि कहीं यह भी राक्षसी माया ही न हो। तब विभीषणने उनसे कहा—‘पुरुषसिंह! यह दुरात्मा रावणकी माया नहीं है ॥ १५-१६ ॥
तदातिष्ठ रथं शीघ्रमिममैन्द्रं महाद्युते ।
ततः प्रहृष्टः काकुत्स्थस्तथेत्युक्त्वा विभीषणम् ॥ १७ ॥
रथेनाभिपपाताथ दशग्रीवं रुषान्वितः ।
‘महाद्युते! आप शीघ्र इन्द्रके इस रथपर आरूढ़ होइये।’ तब श्रीरामचन्द्रजीने प्रसन्नतापूर्वक विभीषणसे कहा—‘ठीक है।’ यों कहकर उन्होंने रथपर आरूढ़ हो बड़े रोषके साथ दशमुख रावणपर आक्रमण किया ॥
हाहाकृतानि भूतानि रावणे समभिद्रुते ॥ १८ ॥
सिंहनादाः सपठहा दिवि दिव्यास्तथानदन् ।