भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1933, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1933

‘बेटा! तुमने पूर्वकालमें इन्द्रको जीतकर जिस प्रकार मुझे आनन्दित किया था, उसी प्रकार आज तुम तीखे बाणोंसे सैनिकोंसहित शत्रुओंका संहार करके मेरा आनन्द बढ़ाओ’॥ ७॥

इत्युक्तः स तथेत्युक्त्वा रथमास्थाय दंशितः।
प्रययाविन्द्रजिद् राजंस्तूर्णमायोधनं प्रति॥ ८॥
राजन्! रावणके द्वारा ऐसी आज्ञा देनेपर इन्द्रजित्ने ‘बहुत अच्छा’ कहकर पिताकी आज्ञा स्वीकार की और वह कवच बाँध रथपर बैठकर तुरंत ही संग्रामभूमिकी ओर चल दिया॥ ८॥

ततो विश्राव्य विस्पष्टं नाम राक्षसपुङ्गवः।
आह्वयामास समरे लक्ष्मणं शुभलक्षणम्॥ ९॥
तत्पश्चात् उस राक्षसराजने स्पष्टरूपसे अपने नामकी घोषणा करके शुभलक्षण लक्ष्मणको युद्धके लिये ललकारा॥ ९॥

तं लक्ष्मणोऽभ्यधावच्च प्रगृह्य सशरं धनुः।
त्रासयंस्तलघोषेण सिंहः क्षुद्रमृगान् यथा॥ १०॥
तब लक्ष्मण भी धनुषपर बाण चढ़ाये हुए उसकी ओर बड़े वेगसे दौड़े और सिंह जैसे छोटे मृगोंको डरा देता है, उसी प्रकार वे अपने धनुषकी टंकारसे सब राक्षसोंको त्रास देने लगे॥ १०॥

तयोः समभवद् युद्धं सुमहज्जयगृद्धिनोः।
दिव्यास्त्रविदुषोस्तीव्रमन्योन्यस्पर्धिनोस्तदा॥ ११॥
वे दोनों ही विजयकी अभिलाषा रखनेवाले, दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता तथा परस्पर बड़ी स्पर्धा रखनेवाले थे। उन दोनोंमें उस समय बड़ा भारी युद्ध हुआ॥ ११॥

रावणिस्तु यदा नैनं विशेषयति सायकैः।
ततो गुरुतरं यत्नमतिष्ठद् बलिनां वरः॥ १२॥
बलवानोंमें श्रेष्ठ रावणकुमार इन्द्रजित् जब बाण-वर्षा करनेमें लक्ष्मणसे आगे न बढ़ सका, तब उसने गुरुतर प्रयत्न आरम्भ किया॥ १२॥

तत एनं महावेगैदर्दयामास तोमरैः।
तानागतान् स चिच्छेद सौमित्रिर्निशितैः शरैः॥ १३॥
उसने अत्यन्त वेगशाली तोमरोंकी वर्षा करके लक्ष्मणको पीड़ा पहुँचानेकी चेष्टा की, परंतु लक्ष्मणने तीखे बाणोंसे उन सब तोमरोंको पास आते ही काट गिराया॥ १३॥

ते निकृत्ताः शरैस्तीक्ष्णैर्न्यपतन् धरणीतले।
तमङ्गदो वालिसुतः श्रीमानुद्यम्य पादपम्॥ १४॥
अभिद्रुत्य महावेगस्ताडयामास मूर्धनि।
तस्येन्द्रजिदसम्भ्रान्तः प्रासेनोरसि वीर्यवान्॥ १५॥