भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1934

प्रहर्तुमैच्छत् तं चास्य प्रासं चिच्छेद लक्ष्मणः ।
लक्ष्मणके तीखे बाणोंसे टूक-टूक होकर वे तोमर पृथ्वीपर बिखर गये। तब महावेगशाली वालिपुत्र श्रीमान् अंगदने एक वृक्ष उठा लिया और दौड़कर इन्द्रजित्‌के मस्तकपर उसे दे मारा; परंतु इन्द्रजित् इससे तनिक भी विचलित न हुआ। उस पराक्रमी वीरने प्रासद्वारा अंगदकी छातीमें प्रहार करनेका विचार किया, किंतु लक्ष्मणने उसे पहले ही काट गिराया ।। १४-१५ १/२ ।।
तमभ्याशगतं वीरमङ्गदं रावणात्मजः ।। १६ ।।
गदयाताडयत् सव्ये पार्श्वे वानरपुङ्गवम् ।
तब रावणकुमारने अपने निकट आये हुए उस वानरश्रेष्ठ वीर अंगदकी बायीं पसलीमें गदासे आघात किया ।। १६ १/२ ।।
तमचिन्त्य प्रहारं स बलवान् वालिनः सुतः ।। १७ ।।
ससर्जेन्द्रजितः क्रोधाच्छालस्कन्धं तथाङ्गदः ।
बलवान् वालिनन्दन अंगदने इन्द्रजित्‌के उस गदाप्रहारकी कोई परवा न करके ऊपर क्रोधपूर्वक साखूका तना उठाकर दे मारा ।। १७ १/२ ।।
सोऽङ्गदेन रुषोत्सृष्टो वधायेन्द्रजितस्तरुः ।। १८ ।।
जघानेन्द्रजितः पार्थ रथं साश्वं ससारथिम् ।
युधिष्ठिर! अंगदके द्वारा इन्द्रजित्‌के वधके लिये रोषपूर्वक चलाये हुए उस वृक्षने उसके सारथि और घोड़ोंसहित रथको नष्ट कर दिया ।। १८ १/२ ।।
ततो हताश्वात् प्रस्कन्द्य रथात् स हतसारथिः ।। १९ ।।
तत्रैवान्तर्दधे राजन् मायया रावणात्मजः ।
राजन्! सारथिके मारे जानेपर रावणकुमार इन्द्रजित् उस अश्वहीन रथसे कूद पड़ा और मायाका आश्रय ले वहीं अन्तर्धान हो गया ।। १९ १/२ ।।
अन्तर्हितं विदित्वा तं बहुमायं च राक्षसम् ।। २० ।।
रामस्तं देशमागम्य तत् सैन्यं पर्यरक्षत ।
अनेक प्रकारकी माया जाननेवाले उस राक्षसको अदृश्य हुआ जान भगवान् श्रीराम उस स्थानपर आकर सब ओरसे अपनी सेनाकी रक्षा करने लगे ।। २० १/२ ।।
स राममुद्दिश्य शरैस्ततो दत्तवरैस्तदा ।। २१ ।।
विव्याध सर्वगात्रेषु लक्ष्मणं च महाबलम् ।
तब इन्द्रजित्‌ने भगवान् श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मणके सम्पूर्ण अंगोंको देवताओंसे वरदानके रूपमें प्राप्त हुए बाणोंद्वारा क्षत-विक्षत कर दिया ।। २१ १/२ ।।
तमदृश्यं शरैः शूरौ माययान्तर्हितं तदा ।। २२ ।।
योधयामासतुरुभौ रावणिं रामलक्ष्मणौ ।