महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयद्यपि रावणका पुत्र मायासे तिरोहित हो जानेके कारण दिखायी नहीं देता था, तो भी शूरवीर श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाई उसके साथ युद्ध करते ही रहे ।। २२ १/२ ।। स रुषा सर्वगात्रेषु तयोः पुरुषसिंहयोः ।। २३ ।। व्यसृजत् सायकान् भूयः शतशोऽथ सहस्रशः । इन्द्रजित्ने पुरुषोंमें सिंहके समान पराक्रमी उन दोनों भाइयोंके समस्त अंगोंमें रोषपूर्वक सैकड़ों और हजारों बाणोंकी बारंबार वृष्टि की ।। २३ १/२ ।। तमदृश्यं विचिन्वन्तः सृजन्तमनिशं शरान् ।। २४ ।। हरयो विविशुर्व्योम प्रगृह्य महतीः शिलाः । वानरोंने देखा कि वह राक्षस छिपकर निरन्तर बाणोंकी झड़ी लगा रहा है, तब वे हाथोंमें बड़ी-बड़ी शिलाएँ लिये आकाशमें उड़ गये और उसकी खोज करने लगे ।। २४ १/२ ।। तांश्च तौ चाप्यदृश्यः स शरैर्विव्याध राक्षसः ।। २५ ।। स भृशं ताडयामास रावणिर्माययाऽऽवृतः । रावणकुमार अपनी मायासे आवृत होनेके कारण स्वयं किसीकी दृष्टिमें नहीं आता था; परंतु वह उन दोनों भाइयोंको तथा सम्पूर्ण वानरोंको भी निरन्तर अपने बाणोंद्वारा घायल कर रहा था ।। २५ १/२ ।। तौ शरैराचितौ वीरौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ । पेततुर्गगनाद् भूमिं सूर्याचन्द्रमसाविव ।। २६ ।। वे दोनों बन्धु श्रीराम और लक्ष्मण ऊपरसे नीचेतक बाणोंसे व्याप्त हो गये थे; अतः आकाशसे गिरे हुए सूर्य और चन्द्रमाकी भाँति इस पृथ्वीपर गिर पड़े ।। २६ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि इन्द्रजिद्युद्धे अष्टाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २८८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें इन्द्रजित्-युद्धविषयक दो सौ अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २८८ ।।