महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1939, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंअतीव चित्रमाश्चर्यं शक्रप्रह्लादयोरिव ॥ १८ ॥ वे दोनों ही एक-दूसरेको जीतनेके लिये उत्सुक थे। उस समय उनमें इन्द्र और प्रह्लादकी भाँति अत्यन्त अद्भुत तथा आश्चर्यजनक युद्ध होने लगा ॥ १८ ॥ अविध्यदिन्द्रजित् तीक्ष्णैः सौमित्रिं मर्मभेदिभिः । सौमित्रिश्चानलस्पर्शैर्विध्यद् रावणिं शरैः ॥ १९ ॥ इन्द्रजित्ने तीखे तथा मर्मभेदी बाणोंद्वारा सुमित्रा-कुमार लक्ष्मणको बींध डाला। इसी प्रकार लक्ष्मणने भी अग्निके समान दाहक स्पर्शवाले तीखे सायकोंद्वारा रावणकुमार इन्द्रजित्को घायल कर दिया ॥ १९ ॥ सौमित्रिशरसंस्पर्शाद् रावणिः क्रोधमूर्च्छितः । असृजल्लक्ष्मणायाष्टौ शरानाशीविषोपमान् ॥ २० ॥ लक्ष्मणके बाणोंकी चोट खाकर रावणकुमार क्रोधसे मूर्च्छित हो उठा। उसने उनके ऊपर विषधर साँपोंके समान विषैले आठ बाण छोड़े ॥ २० ॥ तस्यासून् पावकस्पर्शैः सौमित्रिः पत्रिभिस्त्रिभिः । यथा निरहरद् वीरस्तन्मे निगदतः शृणु ॥ २१ ॥ वीर सुमित्राकुमारने अग्निके समान दाहक तीन बाणोंद्वारा जिस प्रकार इन्द्रजित्के प्राण लिये, वह बताता हूँ; सुनो ॥ २१ ॥ एकेनास्य धनुष्मन्तं बाहुं देहादपातयत् । द्वितीयेन सनाराचं भुजं भूमौ न्यपातयत् ॥ २२ ॥ एक बाणद्वारा उन्होंने इन्द्रजित्की धनुष धारण करनेवाली भुजाको काटकर शरीरसे अलग कर दिया। दूसरे बाणद्वारा नाराच लिये हुए शत्रु की दूसरी भुजाको धराशायी कर दिया ॥ २२ ॥ तृतीयेन तु बाणेन पृथुधारेण भास्वता । जहार सुनसं चापि शिरो भ्राजिष्णुकुण्डलम् ॥ २३ ॥ तत्पश्चात् मोटी धारवाले और चमकीले तीसरे बाणसे उन्होंने सुन्दर नासिका और शोभाशाली कुण्डलोंसे विभूषित शत्रुके मस्तकको भी धड़से अलग कर दिया ॥ २३ ॥ विनिकृत्तभुजस्कन्धं कबन्धं भीमदर्शनम् । तं हत्वा सूतमप्यस्त्रैर्जघान बलिनां वरः ॥ २४ ॥ भुजाओं और कंधोंके कट जानेसे उसका धड़ बड़ा भयंकर दिखायी देता था। इन्द्रजित्को मारकर बलवानोंमें श्रेष्ठ लक्ष्मणने अपने अस्त्रोंद्वारा उसके सारथिको भी मार गिराया ॥ २४ ॥ लङ्कां प्रवेशयामासुस्तं रथं वाजिनस्तदा । ददर्श रावणस्तं च रथं पुत्रविनाकृतम् ॥ २५ ॥ स पुत्रं निहतं ज्ञात्वा त्रासात् सम्भ्रान्तमानसः ।