भारतकोश
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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

अतीव चित्रमाश्चर्यं शक्रप्रह्लादयोरिव ॥ १८ ॥ वे दोनों ही एक-दूसरेको जीतनेके लिये उत्सुक थे। उस समय उनमें इन्द्र और प्रह्लादकी भाँति अत्यन्त अद्भुत तथा आश्चर्यजनक युद्ध होने लगा ॥ १८ ॥ अविध्यदिन्द्रजित् तीक्ष्णैः सौमित्रिं मर्मभेदिभिः । सौमित्रिश्चानलस्पर्शैर्विध्यद् रावणिं शरैः ॥ १९ ॥ इन्द्रजित्ने तीखे तथा मर्मभेदी बाणोंद्वारा सुमित्रा-कुमार लक्ष्मणको बींध डाला। इसी प्रकार लक्ष्मणने भी अग्निके समान दाहक स्पर्शवाले तीखे सायकोंद्वारा रावणकुमार इन्द्रजित्‌को घायल कर दिया ॥ १९ ॥ सौमित्रिशरसंस्पर्शाद् रावणिः क्रोधमूर्च्छितः । असृजल्लक्ष्मणायाष्टौ शरानाशीविषोपमान् ॥ २० ॥ लक्ष्मणके बाणोंकी चोट खाकर रावणकुमार क्रोधसे मूर्च्छित हो उठा। उसने उनके ऊपर विषधर साँपोंके समान विषैले आठ बाण छोड़े ॥ २० ॥ तस्यासून् पावकस्पर्शैः सौमित्रिः पत्रिभिस्त्रिभिः । यथा निरहरद् वीरस्तन्मे निगदतः शृणु ॥ २१ ॥ वीर सुमित्राकुमारने अग्निके समान दाहक तीन बाणोंद्वारा जिस प्रकार इन्द्रजित्‌के प्राण लिये, वह बताता हूँ; सुनो ॥ २१ ॥ एकेनास्य धनुष्मन्तं बाहुं देहादपातयत् । द्वितीयेन सनाराचं भुजं भूमौ न्यपातयत् ॥ २२ ॥ एक बाणद्वारा उन्होंने इन्द्रजित्‌की धनुष धारण करनेवाली भुजाको काटकर शरीरसे अलग कर दिया। दूसरे बाणद्वारा नाराच लिये हुए शत्रु की दूसरी भुजाको धराशायी कर दिया ॥ २२ ॥ तृतीयेन तु बाणेन पृथुधारेण भास्वता । जहार सुनसं चापि शिरो भ्राजिष्णुकुण्डलम् ॥ २३ ॥ तत्पश्चात् मोटी धारवाले और चमकीले तीसरे बाणसे उन्होंने सुन्दर नासिका और शोभाशाली कुण्डलोंसे विभूषित शत्रुके मस्तकको भी धड़से अलग कर दिया ॥ २३ ॥ विनिकृत्तभुजस्कन्धं कबन्धं भीमदर्शनम् । तं हत्वा सूतमप्यस्त्रैर्जघान बलिनां वरः ॥ २४ ॥ भुजाओं और कंधोंके कट जानेसे उसका धड़ बड़ा भयंकर दिखायी देता था। इन्द्रजित्‌को मारकर बलवानोंमें श्रेष्ठ लक्ष्मणने अपने अस्त्रोंद्वारा उसके सारथिको भी मार गिराया ॥ २४ ॥ लङ्कां प्रवेशयामासुस्तं रथं वाजिनस्तदा । ददर्श रावणस्तं च रथं पुत्रविनाकृतम् ॥ २५ ॥ स पुत्रं निहतं ज्ञात्वा त्रासात् सम्भ्रान्तमानसः ।

रावणः शोकमोहार्तो वैदेहीं हन्तुमुद्यतः ॥ २६ ॥
उस समय घोड़ोंने उस ही खाली रथको लंकापुरीमें पहुँचाया। रावणने देखा, मेरे पुत्रका रथ उसके बिना ही लौट आया है। तब पुत्रको मारा गया जान भयके मारे रावणका मन उद्भ्रान्त हो उठा। वह शोक और मोहसे आतुर होकर विदेहनन्दिनी सीताको मार डालनेके लिये उद्यत हो गया ॥ २५-२६ ॥

अशोकवनिकास्थां तां रामदर्शनलालसाम् ।
खड्गमादाय दुष्टात्मा जवेनाभिपपात ह ॥ २७ ॥
दुष्टात्मा दशानन हाथमें तलवार लेकर अशोक-वाटिकामें श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनकी लालसासे बैठी हुई सीताजीके पास बड़े वेगसे दौड़ा गया ॥ २७ ॥

तं दृष्ट्वा तस्य दुर्बुद्धेरविन्ध्यः पापनिश्चयम् ।
शमयामास संक्रुद्धं श्रूयतां येन हेतुना ॥ २८ ॥
दूषित बुद्धिवाले उस निशाचरके इस पापपूर्ण निश्चयको जानकर मन्त्री अविन्ध्यने समझा-बुझाकर उसका क्रोध शान्त किया। किस युक्तिसे उसने रावणको शान्त किया, यह बताता हूँ, सुनो— ॥ २८ ॥

महाराज्ये स्थितो दीप्ते न स्त्रियं हन्तुमर्हसि ।
हतैवैषा यदा स्त्री च बन्धनस्था च ते वशे ॥ २९ ॥
‘राक्षसराज! आप लंकाके समुज्ज्वल सम्राट्-पदपर विराजमान होकर एक अबलाको न मारें। यह स्त्री होकर आपके वशमें पड़ी है, आपके घरमें कैद है; ऐसी दशामें यह तो मरी हुई है ॥ २९ ॥

न चैषा देहभेदेन हता स्यादिति मे मतिः ।
जहि भर्तारमेवास्या हते तस्मिन् हता भवेत् ॥ ३० ॥
‘इसके शरीरके टुकड़े-टुकड़े कर देनेसे ही इसका वध नहीं होगा, ऐसा मेरा विचार है। इसके पतिको ही मार डालिये। उसके मारे जानेपर यह स्वतः मर जायगी ॥ ३० ॥

न हि ते विक्रमे तुल्यः साक्षादपि शतक्रतुः ।
असकृद्धि त्वया सेन्द्रास्त्रासितास्त्रिदशा युधि ॥ ३१ ॥
‘साक्षात् इन्द्र भी पराक्रममें आपकी समानता नहीं कर सकते। आपने अनेक बार युद्धमें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंको भयभीत (एवं पराजित) किया है’ ॥ ३१ ॥

एवं बहुविधैर्वाक्यैरविन्ध्यो रावणं तदा ।
क्रुद्धं संशमयामास जगृहे च स तद्वचः ॥ ३२ ॥
इस तरह अनेक प्रकारके वचनोंद्वारा अविन्ध्यने रावणका क्रोध शान्त किया और रावणने भी उसकी बात मान ली ॥ ३२ ॥

निर्याणे स मतिं कृत्वा निधायासिं क्षपाचरः ।
आज्ञापयामास तदा रथो मे कल्प्यतामिति ॥ ३३ ॥

फिर उस निशाचरने युद्धके लिये प्रस्थान करनेका निश्चय करके तलवार रख दी और आज्ञा दी—'मेरा रथ तैयार किया जाय' ॥ ३३ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि श्रीरामोपाख्यानपर्वणि इन्द्रजिद्वधे एकोननवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें इन्द्रजित्-वधविषयक दो सौ नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८९ ॥

२९०-

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नवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

राम और रावणका युद्ध तथा रावणका वध

मार्कण्डेय उवाच

ततः क्रुद्धो दशग्रीवः प्रिये पुत्रे निपातिते ।
निर्ययौ रथमास्थाय हेमरत्नविभूषितम् ॥ १ ॥
स वृतो राक्षसैर्घोरैर्विविधायुधपाणिभिः ।
अभिदुद्राव रामं स योधयन् हरियूथपान् ॥ २ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! अपने प्रिय पुत्र इन्द्रजित्‌के मारे जानेपर दशमुख रावणका क्रोध बहुत बढ़ गया। वह सुवर्ण तथा रत्नोंसे विभूषित रथपर बैठकर लंकापुरीसे बाहर निकला। हाथोंमें अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण करनेवाले भयंकर राक्षस उसे घेरकर चले। वह वानर-यूथपतियोंसे युद्ध करता हुआ श्रीरामचन्द्रजीकी ओर दौड़ा ॥ १-२ ॥

तमाद्रवन्तं संक्रुद्धं मैन्दनीलनलाङ्गदाः ।
हनूमाञ्जाम्बवांश्चैव ससैन्याः पर्यवारयन् ॥ ३ ॥
उसे क्रोधपूर्वक आक्रमण करते देख मैन्द, नील, नल, अंगद, हनुमान् और जाम्बवान्‌ने सेनासहित आगे बढ़कर उसे चारों ओरसे घेर लिया ॥ ३ ॥

ते दशग्रीवसैन्यं तदृक्षवानरपुङ्गवाः ।
द्रुमैर्विध्वंसयांचक्रुर्दशग्रीवस्य पश्यतः ॥ ४ ॥
उन रीछ और वानर-सेनापतियोंने दशाननके देखते-देखते वृक्षोंकी मारसे उसकी सेनाका संहार आरम्भ कर दिया ॥ ४ ॥

ततः स सैन्यमालोक्य वध्यमानमरातिभिः ।
मायावी चासृजन्मायां रावणो राक्षसाधिपः ॥ ५ ॥
अपनी सेनाको शत्रुओंद्धारा मारी जाती देख मायावी राक्षसराज रावणने माया प्रकट की ॥ ५ ॥

तस्य देहविनिष्क्रान्ताः शतशोऽथ सहस्रशः ।
राक्षसाः प्रत्यदृश्यन्त शरशक्त्यृष्टिपाणयः ॥ ६ ॥
उसके शरीरसे सैकड़ों और हजारों राक्षस प्रकट होकर हाथोंमें बाण, शक्ति तथा ऋष्टि आदि आयुध लिये दिखायी देने लगे ॥ ६ ॥

तान् रामो जघ्निवात् सर्वान् दिव्येनास्त्रेण राक्षसान् ।
अथ भूयोऽपि मायां स व्यदधाद् राक्षसाधिपः ॥ ७ ॥

श्रीरामचन्द्रजीने अपने दिव्य अस्त्रके द्वारा उन सब राक्षसोंको नष्ट कर दिया। तब राक्षसराजने पुनः मायाकी सृष्टि की ॥ ७ ॥

कृत्वा रामस्य रूपाणि लक्ष्मणस्य च भारत ।
अभिदुद्राव रामं च लक्ष्मणं च दशाननः ॥ ८ ॥
भारत! दशाननने श्रीराम और लक्ष्मणके ही बहुत-से रूप धारण करके श्रीराम और लक्ष्मणपर धावा किया ॥ ८ ॥
ततस्ते राममार्च्छन्तो लक्ष्मणं च क्षपाचराः ।
अभिपेतुस्तदा रामं प्रगृहीतशरासनाः ॥ ९ ॥
तदनन्तर वे राक्षस हाथोंमें धनुष-बाण लिये श्रीराम और लक्ष्मणको पीड़ा देते हुए उनपर टूट पड़े ॥ ९ ॥
तां दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रस्य मायामिक्ष्वाकुनन्दनः ।
उवाच रामं सौमित्रिरसम्भ्रान्तो बृहद् वचः ॥ १० ॥
राक्षसराज रावणकी उस मायाको देखकर इक्ष्वाकुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मणको तनिक भी घबराहट नहीं हुई। उन्होंने श्रीरामसे यह महत्त्वपूर्ण बात कही— ॥ १० ॥
जहीमान् राक्षसान् पापानात्मनः प्रतिरूपकान् ।

जघान रामस्तांश्चान्यानात्मनः प्रतिरूपकान् ॥ ११ ॥
‘भगवन्! अपने ही समान आकारवाले इन पापी राक्षसोंको मार डालिये।’ तब श्रीरामने रावणकी मायासे निर्मित अपने ही समान रूप धारण करनेवाले उन सबको तथा अन्य राक्षसोंको भी मार डाला ॥ ११ ॥
ततो हर्यश्वयुक्तेन रथेनादित्यवर्चसा ।
उपतस्थे रणे रामं मातलिः शक्रसारथिः ॥ १२ ॥
इसी समय इन्द्रका सारथि मातलि हरे रंगके घोड़ोंसे जुते हुए सूर्यके समान तेजस्वी रथके साथ उस रणभूमिमें श्रीरामचन्द्रजीके समीप आ पहुँचा ॥ १२ ॥

मातलिरुवाच

अयं हर्यश्वयुक् जैत्रो मघोनः स्यन्दनोत्तमः ।
अनेन शक्रः काकुत्स्थ समरे दैत्यदानवान् ॥ १३ ॥
शतशः पुरुषव्याघ्र रथोदारेण जघ्निवान् ।
तदनेन नरव्याघ्र मया यत्तेन संयुगे ॥ १४ ॥
स्यन्दनेन जहि क्षिप्रं रावणं मा चिरं कृथाः ।
मातलि बोला— पुरुषसिंह श्रीराम! यह हरे रंगके घोड़ोंसे जुता हुआ विजयशाली उत्तम रथ देवराज इन्द्रका है। इस विशाल रथके द्वारा इन्द्रने सैकड़ों दैत्यों और दानवोंका समरांगणमें संहार किया है। नरश्रेष्ठ! मेरे द्वारा संचालित इस रथपर बैठकर आप युद्धमें रावणको शीघ्र मार डालिये, विलम्ब न कीजिये ॥ १३-१४ १/२ ॥
इत्युक्तो राघवस्तथ्यं वचोऽशङ्कत मातलेः ॥ १५ ॥
मायैषा राक्षसस्येति तमुवाच विभीषणः ।
नेयं माया नरव्याघ्र रावणस्य दुरात्मनः ॥ १६ ॥
मातलिके ऐसा कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उसकी बातपर इसलिये संदेह किया कि कहीं यह भी राक्षसी माया ही न हो। तब विभीषणने उनसे कहा—‘पुरुषसिंह! यह दुरात्मा रावणकी माया नहीं है ॥ १५-१६ ॥
तदातिष्ठ रथं शीघ्रमिममैन्द्रं महाद्युते ।
ततः प्रहृष्टः काकुत्स्थस्तथेत्युक्त्वा विभीषणम् ॥ १७ ॥
रथेनाभिपपाताथ दशग्रीवं रुषान्वितः ।
‘महाद्युते! आप शीघ्र इन्द्रके इस रथपर आरूढ़ होइये।’ तब श्रीरामचन्द्रजीने प्रसन्नतापूर्वक विभीषणसे कहा—‘ठीक है।’ यों कहकर उन्होंने रथपर आरूढ़ हो बड़े रोषके साथ दशमुख रावणपर आक्रमण किया ॥
हाहाकृतानि भूतानि रावणे समभिद्रुते ॥ १८ ॥
सिंहनादाः सपठहा दिवि दिव्यास्तथानदन् ।

दशकन्धरराजसून्वोस्तथा युद्धमभून्महत् ॥ १९ ॥ रावणपर श्रीरामकी चढ़ाई होते ही समस्त प्राणी हाहाकार कर उठे, देवलोकमें नगारे बज उठे और जोर-जोरसे सिंहनाद होने लगा। दशकन्धर रावण तथा राजकुमार श्रीराममें उस समय महान् युद्ध छिड़ गया ॥ १८-१९ ॥ अलब्धोपममन्यत्र तयोरेव तथाभवत् । स रामाय महाघोरं विससर्ज निशाचरः ॥ २० ॥ शूलमिन्द्राशनिप्रख्यं ब्रह्मदण्डमिवोद्यतम् । तच्छूलं सत्वरं रामश्छिच्छेद निशितैः शरैः ॥ २१ ॥ उस युद्धकी संसारमें अन्यत्र कहीं उपमा नहीं थी। उनका वह संग्राम उन्हींके संग्रामके समान था। निशाचर रावणने श्रीरामपर एक त्रिशूल चलाया, जो उठे हुए इन्द्रके वज्र तथा ब्रह्मदण्डके समान अत्यन्त भयंकर था; परंतु श्रीरामने तत्काल अपने तीखे बाणोंद्वारा उस त्रिशूलके टुकड़े-टुकड़े कर दिये ॥ २०-२१ ॥ तद् दृष्ट्वा दुष्करं कर्म रावणं भयमाविशत् । ततः क्रुद्धः ससर्जाशु दशग्रीवः शिताञ्छरान् ॥ २२ ॥ उनका वह दुष्कर कर्म देखकर दशानन रावणके मनमें भय समा गया। फिर कुपित होकर उसने तुरंत ही तीखे सायकोंकी वर्षा आरम्भ की ॥ २२ ॥ सहस्रायुतशो रामे शस्त्राणि विविधानि च । ततो भुशुण्डीः शूलानि मुसलानि परश्वधान् ॥ २३ ॥ शक्तीश्च विविधाकाराः शतघ्नीश्च शितान् खुरान् । उस समय श्रीरामचन्द्रजीके ऊपर भाँति-भाँतिके हजारों शस्त्र गिरने लगे तथा भुशुण्डी, शूल, मुसल, फरसे, नाना प्रकारकी शक्तियाँ, शतघ्नी और तीखी धारवाले बाणोंकी वृष्टि होने लगी ॥ २३ १/२ ॥ तां मायां विकृतां दृष्ट्वा दशग्रीवस्य रक्षसः ॥ २४ ॥ भयात् प्रदुद्रुवुः सर्वे वानराः सर्वतोदिशम् । राक्षस दशाननकी उस विकराल मायाको देखकर सब वानर भयके मारे चारों दिशाओंमें भाग चले ॥ २४ १/२ ॥ ततः सुपत्रं सुमुखं हेमपुङ्खं शरोत्तमम् ॥ २५ ॥ तूणादादाय काकुत्स्थो ब्रह्मास्त्रेण युयोज ह । तं बाणवर्यं रामेण ब्रह्मास्त्रेणानुमन्त्रितम् ॥ २६ ॥ जहृषुर्देवगन्धर्वा दृष्ट्वा शक्रपुरोगमाः । अल्पावशेषमायुश्च ततोऽमन्यन्त रक्षसः ॥ २७ ॥ ब्रह्मास्त्रोदीरणाच्छत्रोर्देवदानवकिन्नराः ।

तब श्रीरामचन्द्रजीने सोनेके सुन्दर पंख तथा उत्तम अग्रभागवाले एक श्रेष्ठ बाणको तरकससे निकालकर उसे ब्रह्मास्त्रद्वारा अभिमन्त्रित किया। श्रीरामद्वारा ब्रह्मास्त्रसे अभिमन्त्रित किये हुए उस उत्तम बाणको देखकर इन्द्र आदि देवताओं तथा गन्धर्वोंके हर्षकी सीमा न रही। शत्रुके प्रति श्रीरामके मुखसे ब्रह्मास्त्रका प्रयोग होता देख देवता, दानव और किन्नर यह समझ गये कि अब इस राक्षसकी आयु बहुत थोड़ी रह गयी है ।। २५—२७ १/२ ।।

ततः ससर्ज तं रामः शरमप्रतिमौजसम् ।। २८ ।।
रावणान्तकरं घोरं ब्रह्मदण्डमिवोद्यतम् ।
तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने उठे हुए ब्रह्मदण्डके समान भयंकर तथा अप्रतिम तेजस्वी उस रावणविनाशक बाणको छोड़ दिया ।। २८ १/२ ।।

मुक्तमात्रेण रामेण दूराकृष्टेन भारत ।। २९ ।।
स तेन राक्षसश्रेष्ठः सरथः साश्वसारथिः ।
प्रजज्वाल महाज्वालेनाग्निनाभिपरिप्लुतः ।। ३० ।।
युधिष्ठिर! श्रीरामद्वारा धनुषको दूरतक खींचकर छोड़े हुए उस बाणके लगते ही राक्षसराज रावण रथ, घोड़े और सारथिसहित इस प्रकार जलने लगा मानो भयंकर लपटोंवाली आगके लपेटमें आ गया हो ।। २९-३० ।।

ततः प्रहृष्टास्त्रिदशाः सहगन्धर्वचारणाः । निहतं रावणं दृष्ट्वा रामेणाक्लिष्टकर्मणा ॥ ३१ ॥ इस प्रकार अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीके हाथोंसे रावणको मारा गया देख देवता, गन्धर्व तथा चारण बहुत प्रसन्न हुए ॥ ३१ ॥ तत्यजुस्तं महाभागं पञ्च भूतानि रावणम् । भ्रंशितः सर्वलोकेभ्यः स हि ब्रह्मास्त्रतेजसा ॥ ३२ ॥ तदनन्तर पाँचों भूतोंने उस महान् भाग्यशाली रावणको त्याग दिया। ब्रह्मास्त्रके तेजसे दग्ध होकर वह सम्पूर्ण लोकोंसे भ्रष्ट हो गया ॥ ३२ ॥ शरीरधातवो ह्यस्य मांसं रुधिरमेव च । नेशुर्ब्रह्मास्त्रनिर्दग्धा न च भस्माप्यदृश्यत ॥ ३३ ॥ उसके शरीरके धातु, मांस तथा रक्त भी ब्रह्मास्त्रसे दग्ध होकर नष्ट हो गये। उसकी राखतक नहीं दिखायी दी ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि रावणवधे नवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २९० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें रावणवधविषयक दो सौ नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९० ॥

२९१-

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

श्रीरामका सीताके प्रति संदेह, देवताओंद्धारा सीताकी शुद्धिका समर्थन, श्रीरामका दल-बलसहित लंकासे प्रस्थान एवं किष्किन्धा होते हुए अयोध्यामें पहुँचकर भरतसे मिलना तथा राज्यपर अभिषिक्त होना

मार्कण्डेय उवाच

स हत्वा रावणं क्षुद्रं राक्षसेन्द्रं सुरद्विषम् ।
बभूव हृष्टः ससुहृद् रामः सौमित्रिणा सह ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! इस प्रकार नीच स्वभाववाले देवद्रोही राक्षसराज रावणका वध करके भगवान् श्रीराम अपने मित्रों तथा लक्ष्मणके साथ बड़े प्रसन्न हुए ॥ १ ॥

ततो हते दशग्रीवे देवाः सर्षिपुरोगमाः ।
आशीर्भिर्जययुक्ताभिरानर्चुस्तं महाभुजम् ॥ २ ॥
दशाननके मारे जानेपर देवता तथा महर्षिगण जययुक्त आशीर्वाद देते हुए उन महाबाहुकी पूजा एवं प्रशंसा करने लगे ॥ २ ॥

रामं कमलपत्राक्षं तुष्टुवुः सर्वदेवताः ।
गन्धर्वाः पुष्पवर्षैश्च वाग्भिश्च त्रिदशालयाः ॥ ३ ॥
स्वर्गवासी सम्पूर्ण देवताओं तथा गन्धर्वोंने फूलोंकी वर्षा करते हुए उत्तम वाणीद्वारा कमलनयन भगवान् श्रीरामका स्तवन किया ॥ ३ ॥

पूजयित्वा यथा रामं प्रतिजग्मुर्यथागतम् ।
तन्महोत्सवसंकाशमासीदाकाशमच्युत ॥ ४ ॥
श्रीरामकी भलीभाँति पूजा करके वे सब जैसे आये थे, उसी प्रकार लौट गये। युधिष्ठिर! उस समय आकाश महान् उत्सवसमारोहसे भरा-सा जान पड़ता था ॥ ४ ॥

ततो हत्वा दशग्रीवं लङ्कां रामो महायशाः ।
विभीषणाय प्रददौ प्रभुः परपुरञ्जयः ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले महायशस्वी भगवान् श्रीरामने दशानन रावणका वध करनेके अनन्तर लंकाका राज्य विभीषणको दे दिया ॥ ५ ॥

ततः सीतां पुरस्कृत्य विभीषणपुरस्कृताम् ।
अविन्ध्यो नाम सुप्रज्ञो वृद्धामात्यो विनिर्ययौ ॥ ६ ॥

इसके बाद उत्तम बुद्धिसे युक्त बूढ़े मन्त्री अविन्ध्य विभीषणसहित भगवती सीताको आगे करके लंकापुरीसे बाहर निकले ॥ ६ ॥ उवाच च महात्मानं काकुत्स्थं दैन्यमास्थितः । प्रतीच्छ देवीं सद्वृत्तां महात्मञ्जानकीमिति ॥ ७ ॥

वे ककुत्स्थकुलभूषण महात्मा श्रीरामचन्द्रजीसे दीनतापूर्वक बोले—'महात्मन्! सदाचारसे सुशोभित जनककिशोरी महारानी सीताको ग्रहण कीजिये' ॥ ७ ॥ एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्मादवतीर्य रथोत्तमात् । बाष्पेणापिहितां सीतां ददर्शेक्ष्वाकुनन्दनः ॥ ८ ॥ यह सुनकर इक्ष्वाकुनन्दन भगवान् श्रीरामने उस उत्तम रथसे उतरकर सीताको देखा। उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही थी ॥ ८ ॥ तां दृष्ट्वा चारुसर्वाङ्गीं यानस्थां शोककर्शिताम् । मलोपचितसर्वाङ्गीं जटिलां कृष्णवाससम् ॥ ९ ॥ शिबिकामें बैठी हुई सर्वांगसुन्दरी सीता शोकसे दुबली हो गयी थीं। उनके समस्त अंगोंमें मैल जम गयी थी, सिरके बाल आपसमें चिपककर जटाके रूपमें परिणत हो गये थे और उनका वस्त्र काला पड़ा गया था ॥ ९ ॥ उवाच रामो वैदेहीं परामर्शविशङ्कितः । गच्छ वैदेहि मुक्ता त्वं यत् कार्यं तन्मया कृतम् ॥ १० ॥

श्रीरामचन्द्रजीके मनमें यह संदेह हुआ कि सम्भव है, सीता पर पुरुषके स्पर्शसे अपवित्र हो गयी हों; अतः उन्होंने विदेहनन्दिनी सीतासे स्पष्ट वचनोंद्वारा कहा—‘विदेहकुमारी! मैंने तुम्हें रावणकी कैदसे छुड़ा दिया। अब तुम जाओ। मेरा जो कर्तव्य था, उसे मैंने पूरा कर दिया ।। १० ।।

मामासाद्य पतिं भद्रे न त्वं राक्षसवेश्मनि ।
जरां व्रजेथा इति मे निहतोऽसौ निशाचरः ।। ११ ।।
‘भद्रे! मुझ-जैसे पतिको पाकर तुम्हें वृद्धावस्थातक किसी राक्षसके घरमें न रहना पड़े, यही सोचकर मैंने उस निशाचरका वध किया है ।। ११ ।।

कथं ह्यस्मद्विधो जातु जानन् धर्मविनिश्चयम् ।
परहस्तगतां नारीं मुहूर्तमपि धारयेत् ।। १२ ।।
‘धर्मके सिद्धान्तको जाननेवाला मेरे-जैसा कोई भी पुरुष दूसरेके हाथमें पड़ी हुई नारीको मुहूर्तभरके लिये भी कैसे ग्रहण कर सकता है? ।। १२ ।।

सुवृत्तामसुवृत्तां वाप्यहं त्वामद्य मैथिलि ।
नोत्सहे परिभोगाय श्वावलीढं हविर्यथा ।। १३ ।।
‘मिथिलेशनन्दिनी! तुम्हारा आचार-विचार शुद्ध रह गया हो अथवा अशुद्ध, अब मैं तुम्हें अपने उपयोगमें नहीं ला सकता—ठीक उसी तरह, जैसे कुत्तेके चाटे हुए हविष्यको कोई भी ग्रहण नहीं करता’ ।। १३ ।।

ततः सा सहसा बाला तच्छ्रुत्वा दारुणं वचः ।
पपात देवी व्यथिता निकृत्ता कदली यथा ।। १४ ।।
सहसा यह कठोर वचन सुनकर देवी सीता व्यथित हो कटे हुए केलेके वृक्षकी भाँति सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ीं ।। १४ ।।

योऽप्यस्या हर्षसम्भूतौ मुखरागस्तदाभवत् ।
क्षणेन स पुनर्नष्टो निःश्वास इव दर्पणे ।। १५ ।।
जैसे श्वास लेनेसे दर्पणमें पड़ा हुआ मुखका प्रतिबिम्ब मलिन हो जाता है, उसी प्रकार सीताके मुखपर उस समय जो हर्षजनित कान्ति छा रही थी, वह एक ही क्षणमें फिर विलीन हो गयी ।। १५ ।।

ततस्ते हरयः सर्वे नच्छ्रुत्वा रामभाषितम् ।
गतासुकल्पा निश्चेष्टा बभूवुः सहलक्ष्मणाः ।। १६ ।।
श्रीरामचन्द्रजीका यह कथन सुनकर समस्त वानर तथा लक्ष्मण सबके सब मरे हुएके समान निश्चेष्ट हो गये ।। १६ ।।

ततो देवो विशुद्धात्मा विमानेन चतुर्मुखः ।
पद्मयोनिर्जगत्स्रष्टा दर्शयामास राघवम् ।। १७ ।।

इसी समय विशुद्ध अन्तःकरणवाले कमलयोनि जगत्स्रष्टा चतुर्मुख ब्रह्माजीने विमानद्वारा वहाँ आकर श्रीरामचन्द्रजीको दर्शन दिया ॥ १७ ॥ शक्रश्चाग्निश्च वायुश्च यमो वरुण एव च । यक्षाधिपश्च भगवांस्तथा सप्तर्षयोऽमलाः ॥ १८ ॥ साथ ही इन्द्र, अग्नि, वायु, यम, वरुण, यक्षराज भगवान् कुबेर तथा निर्मल चित्तवाले सप्तर्षिगण भी वहाँ आ गये ॥ १८ ॥ राजा दशरथश्चैव दिव्यभास्वरमूर्तिमान् । विमानेन महार्हेण हंसयुक्तेन भास्वता ॥ १९ ॥ इनके सिवा हंसोंसे युत एक बहुमूल्य तेजस्वी विमानद्वारा दिव्य प्रकाशमय स्वरूप धारण किये स्वयं राजा दशरथ भी वहाँ पधारे ॥ १९ ॥ ततोऽन्तरिक्षं तत् सर्वं देवगन्धर्वसंकुलम् । शुशुभे तारकाचित्रं शरदीव नभस्तलम् ॥ २० ॥ उस समय देवताओं और गन्धर्वोंसे भरा हुआ वह सम्पूर्ण अन्तरिक्ष इस प्रकार शोभा पाने लगा, मानो असंख्य तारागणोंसे चित्रित शरद्ऋतुका आकाश हो ॥ २० ॥ तत उत्थाय वैदेही तेषां मध्ये यशस्विनी । उवाच वाक्यं कल्याणी रामं पृथुलवक्षसम् ॥ २१ ॥ तब उन सबके बीचमें खड़ी होकर कल्याणमयी यशस्विनी सीताने चौड़ी छातीवाले भगवान् श्रीरामसे इस प्रकार कहा— ॥ २१ ॥ राजपुत्र न ते दोषं करोमि विदिता हि ते । गतिः स्त्रीणां नराणां च शृणु चेदं वचो मम ॥ २२ ॥ 'राजपुत्र! मैं आपको दोष नहीं देती, क्योंकि आप स्त्रियों और पुरुषोंकी कैसी गति है, यह अच्छी तरह जानते हैं। केवल मेरी यह बात सुन लीजिये ॥ २२ ॥ अन्तश्चरति भूतानां मातरिश्वा सदागतिः । स मे विमुञ्चतु प्राणान् यदि पापं चराम्यहम् ॥ २३ ॥ 'निरन्तर संचरण करनेवाले वायुदेव समस्त प्राणियोंके भीतर विचरते हैं। यदि मैंने कोई पापाचार किया हो तो वे वायुदेवता मेरे प्राणोंका परित्याग कर दें ॥ २३ ॥ अग्निरापस्तथाऽऽकाशं पृथिवी वायुरेव च । विमुञ्चन्तु मम प्राणान् यदि पापं चराम्यहम् ॥ २४ ॥ 'यदि मैं पापका आचरण करती होऊँ तो अग्नि, जल, आकाश, पृथ्वी और वायु—ये सब मिलकर मुझसे मेरे प्राणोंका वियोग करा दें ॥ २४ ॥ यथाहं त्वदृते वीर नान्यं स्वप्नेऽप्यचिन्तयम् । तथा मे देवनिर्दिष्टस्त्वमेव हि पतिर्भव ॥ २५ ॥

'वीर! यदि मैंने आपके सिवा दूसरे किसी पुरुषका स्वप्नमें भी चिन्तन न किया हो तो देवताओंके दिये हुए एकमात्र आप ही मेरे पति हों' ॥ २५ ॥ ततोऽन्तरिक्षे वागासीत् सुभगा लोकसाक्षिणी । पुण्या संहर्षणी तेषां वानराणां महात्मनाम् ॥ २६ ॥ तदनन्तर आकाशमें सब लोगोंको साक्षी देती हुई एक सुन्दर वाणी उच्चरित हुई, जो परम पवित्र होनेके साथ ही उन महामना वानरोंको भी हर्ष प्रदान करनेवाली थी ॥ २६ ॥

वायुरुवाच

भो भो राघव सत्यं वै वायुरस्मि सदागतिः । अपापा मैथिली राजन् संगच्छ सह भार्यया ॥ २७ ॥ (उस आकाशवाणीके रूपमें) **वायुदेवता बोले—**रघुनन्दन! मैं सदा विचरण करनेवाला वायुदेवता हूँ। सीताने जो कुछ कहा है, वह सत्य है। राजन्! मिथिलेशकुमारी सर्वथा पापशून्य हैं। आप अपनी इस पत्नीसे निःसंकोच होकर मिलिये ॥ २७ ॥

अग्निरुवाच

अहमन्तःशरीरस्थो भूतानां रघुनन्दन । सुसूक्ष्ममपि काकुत्स्थ मैथिली नापराध्यति ॥ २८ ॥ **अग्निदेवने कहा—**रघुनन्दन! मैं समस्त प्राणियोंके शरीरमें रहनेवाला अग्नि हूँ। मुझे मालूम है कि मिथिलेशकुमारीके द्वारा कभी सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म अपराध नहीं हुआ है ॥ २८ ॥

वरुण उवाच

रसा वै मत्प्रसूता हि भूतदेहेषु राघव । अहं वै त्वां प्रब्रवीमि मैथिली प्रतिगृह्यताम् ॥ २९ ॥ **वरुणदेवने कहा—**श्रीराम! समस्त प्राणियोंके शरीरमें जो जलतत्त्व है, वह मुझसे ही उत्पन्न हुआ है। अतः मैं तुमसे कहता हूँ, मिथिलेशकुमारी निष्पाप है, इसे ग्रहण करो ॥ २९ ॥

ब्रह्मोवाच

पुत्र नैतदिहाश्चर्यं त्वयि राजर्षिधर्मणि । साधो सद्वृत्त काकुत्स्थ शृणु चेदं वचो मम ॥ ३० ॥ **तत्पश्चात् ब्रह्माजी बोले—**वत्स! तुम राजर्षियोंके धर्मपर चलनेवाले हो; अतः तुममें ऐसा सद्विचार होना आश्चर्यकी बात नहीं है। साधु सदाचारी श्रीराम! तुम मेरी यह बात सुनो ॥ ३० ॥ शत्रुरेष त्वया वीर देवगन्धर्वभोगिनाम् ।

यक्षाणां दानवानां च महर्षीणां च पातितः ॥ ३१ ॥
वीरवर! यह रावण देवता, गन्धर्व, नाग, यक्ष, दानव तथा महर्षियोंका भी शत्रु था। इसे तुमने मार गिराया है ॥ ३१ ॥
अवध्यः सर्वभूतानां मत्प्रसादात् पुराभवत् ।
कस्माच्चित् कारणात् पापः कञ्चित् कालमुपेक्षितः ॥ ३२ ॥
पूर्वकालमें मेरे ही प्रसादसे यह समस्त प्राणियोंके लिये अवध्य हो गया था। किसी कारणवश ही कुछ कालतक इस पापीकी उपेक्षा की गयी थी ॥ ३२ ॥
वधार्थमात्मनस्तेन हृता सीता दुरात्मना ।
नलकूबरशापेन रक्षा चास्याः कृता मया ॥ ३३ ॥
दुरात्मा रावणने अपने वधके लिये ही सीताका अपहरण किया था। नलकूबरके शापद्वारा मैंने सीताकी रक्षाका प्रबन्ध कर दिया था ॥ ३३ ॥
यदि ह्यकामां सेवेत स्त्रियमन्यामपि ध्रुवम् ।
शतधास्य फलेन्मूर्धा इत्युक्तः सोऽभवत् पुरा ॥ ३४ ॥
पूर्वकालमें रावणको यह शाप दिया गया था कि यदि यह उसे न चाहनेवाली किसी परायी स्त्रीका बलपूर्वक सेवन करेगा तो इसके मस्तकके सैकड़ों टुकड़े हो जायँगे ॥ ३४ ॥
नात्र शङ्का त्वया कार्या प्रतीच्छेमां महाद्युते ।
कृतं त्वया महत् कार्यं देवानाममरप्रभ ॥ ३५ ॥
अतः महातेजस्वी श्रीराम! तुम्हें सीताके विषयमें कोई शंका नहीं करनी चाहिये। इसे ग्रहण करो। देवताओंके समान तेजस्वी वीर! तुमने रावणको मारकर देवताओंका महान् कार्य सिद्ध किया है ॥ ३५ ॥

दशरथ उवाच

प्रीतोऽस्मि वत्स भद्रं ते पिता दशरथोऽस्मि ते ।
अनुजानामि राज्यं च प्रशाधि पुरुषोत्तम ॥ ३६ ॥
**दशरथजी बोले—**वत्स! मैं तुम्हारा पिता दशरथ हूँ, तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण हो। पुरुषोत्तम! मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ कि अब तुम अयोध्याका राज्य करो ॥ ३६ ॥

राम उवाच

अभिवादये त्वां राजेन्द्र यदि त्वं जनको मम ।
गमिष्यामि पुरीं रम्यामयोध्यां शासनात् तव ॥ ३७ ॥
**श्रीरामचन्द्रजीने कहा—**राजेन्द्र! यदि आप मेरे पिता हैं तो मैं आपको प्रणाम करता हूँ। आपकी आज्ञासे अब मैं रमणीय अयोध्यापुरीको लौट जाऊँगा ॥ ३७ ॥

मार्कण्डेय उवाच

तमुवाच पिता भूयः प्रहृष्टो भरतर्षभ ।
गच्छायोध्यां प्रशाधीति रामं रक्तान्तलोचनम् ॥ ३८ ॥
सम्पूर्णानीह वर्षाणि चतुर्दश महाद्युते ।
मार्कण्डेयजी कहते हैं— भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर! तदनन्तर पिता दशरथने अत्यन्त प्रसन्न होकर कुछ-कुछ लाल नेत्रोंवाले श्रीरामचन्द्रजीसे पुनः कहा—'महाद्युते! तुम्हारे वनवासके चौदह वर्ष पूरे हो गये हैं। अब तुम अयोध्या जाओ और वहाँका शासन अपने हाथमें लो' ॥ ३८ १/२ ॥
ततो देवान् नमस्कृत्य सुहृद्भिरभिनन्दितः ॥ ३९ ॥
महेन्द्र इव पौलोम्या भार्यया स समेयिवान् ।
तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजीने देवताओंको नमस्कार किया और सुहृदोंसे अभिनन्दित हो अपनी पत्नी सीतासे मिले, मानो इन्द्रका शचीसे मिलन हुआ हो ॥ ३९ १/२ ॥
ततो वरं ददौ तस्मै ह्यविन्ध्याय परंतपः ॥ ४० ॥
त्रिजटां चार्थमानाभ्यां योजयामास राक्षसीम् ।
इसके बाद परंतप श्रीरामने अविन्ध्यको अभीष्ट वरदान दिया तथा त्रिजटा राक्षसीको धन और सम्मानसे संतुष्ट किया ॥ ४० १/२ ॥
तमुवाच ततो ब्रह्मा देवैः शक्रपुरोगमैः ॥ ४१ ॥
कौसल्यामातरिष्टांस्ते वरानद्य ददानि कान् ।
यह सब हो जानेपर इन्द्र आदि देवताओंसहित ब्रह्माने भगवान् रामसे कहा—'कौसल्यानन्दन! कहो, आज मैं तुम्हें कौन-कौनसे अभीष्ट वर प्रदान करूँ'? ॥
वव्रे रामः स्थितिं धर्मे शत्रुभिश्चापराजयम् ॥ ४२ ॥
राक्षसैर्निहतानां च वानराणां समुद्भवम् ।
तब श्रीरामचन्द्रजीने उनसे ये वर माँगे—'मेरी धर्ममें सदा स्थिति रहे, शत्रुओंसे कभी पराजय न हो तथा राक्षसोंके द्वारा मारे गये वानर पुनः जीवित हो जायँ' ॥ ४२ १/२ ॥
ततस्ते ब्रह्मणा प्रोक्ते तथेति वचने तदा ॥ ४३ ॥
समुत्तस्थुर्महाराज वानरा लब्धचेतसः ।
यह सुनकर ब्रह्माजीने कहा—'ऐसा ही हो।' महाराज! उनके इतना कहते ही सभी वानर चेतना प्राप्त करके जी उठे ॥ ४३ १/२ ॥
सीता चापि महाभागा वरं हनुमते ददौ ॥ ४४ ॥
रामकीर्त्या समं पुत्र जीवितं ते भविष्यति ।
महासौभाग्यवती सीताने भी हनुमान्‌जीको यह वर दिया—'पुत्र! जबतक इस धरातलपर भगवान् श्रीरामकी कीर्ति बनी रहेगी, तबतक तुम्हारा जीवन स्थिर रहेगा ॥ ४४ १/२ ॥

दिव्यास्त्वामुपभोगाश्च मत्प्रसादकृताः सदा ॥ ४५ ॥ उपस्थास्यन्ति हनुमन्निति स्म हरिलोचन । 'पिंगलनयन हनुमान्! मेरी कृपासे तुम्हें सदा ही दिव्य भोग प्राप्त होते रहेंगे' ॥ ४५ १/२ ॥

ततस्ते प्रेक्षमाणानां तेषामक्लिष्टकर्मणाम् ॥ ४६ ॥ अन्तर्धानं ययुर्देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः । तदनन्तर अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले वानरोंके देखते-देखते वहाँ इन्द्र आदि सब देवता अन्तर्धान हो गये ॥ ४६ १/२ ॥

दृष्ट्वा रामं तु जानक्या संगतं शक्रसारथिः ॥ ४७ ॥ उवाच परमप्रीतः सुहृन्मध्य इदं वचः । देवगन्धर्वयक्षाणां मानुषासुरभोगिनाम् ॥ ४८ ॥ अपनीतं त्वया दुःखमिदं सत्यपराक्रम । श्रीरामचन्द्रजीको जनकनन्दिनी सीताके साथ विराजमान देख इन्द्रसारथि मातलिको बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने सब सुहृदोंके बीचमें इस प्रकार कहा—'सत्यपराक्रमी श्रीराम! आपने देवता, गन्धर्व, यक्ष, मनुष्य, असुर और नाग—इन सबका दुःख दूर कर दिया है ॥ ४७-४८ १/२ ॥

सदेवासुरगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः ॥ ४९ ॥ कथयिष्यन्ति लोकास्त्वां यावद् भूमिर्धरिष्यति । 'जबतक यह पृथ्वी रहेगी, तबतक देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस तथा नागोंसहित सम्पूर्ण जगत्‌के लोग आपकी कीर्तिकथाका गान करेंगे' ॥ ४९ १/२ ॥

इत्येवमुक्त्वाऽनुज्ञाप्य रामं शस्त्रभृतां वरम् ॥ ५० ॥ सम्पूज्यापाक्रमत् तेन रथेनादित्यवर्चसा । ऐसा कहकर शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा ले उनकी पूजा करके सूर्यके समान तेजस्वी उसी रथके द्वारा मातलि स्वर्गलोकको चला गया ॥ ५० १/२ ॥

ततः सीतां पुरस्कृत्य रामः सौमित्रिणा सह ॥ ५१ ॥ सुग्रीवप्रमुखैश्चैव सहितः सर्ववानरैः । विधाय रक्षां लङ्कायां विभीषणपुरस्कृतः ॥ ५२ ॥ संततार पुनस्तेन सेतुना मकरालयम् । पुष्पकेण विमानेन खेचरेण विराजता ॥ ५३ ॥ कामगेन यथामुख्यैरमात्यैः संवृतो वशी ।

तदनन्तर जितेन्द्रिय भगवान् श्रीरामने लंकापुरीकी सुरक्षाका प्रबन्ध करके लक्ष्मण, सुग्रीव आदि सभी श्रेष्ठ वानरों, विभीषण तथा प्रधान-प्रधान सचिवोंके साथ सीताको आगे करके इच्छानुसार चलनेवाले, आकाशचारी, शोभाशाली पुष्पकविमानपर आरूढ़ हो उसीके द्वारा पूर्वोक्त सेतुमार्गसे ऊपर-ही-ऊपर पुनः मकरालय समुद्रको पार किया ।। ५१—५३ १/२ ।।

ततस्तीरे समुद्रस्य यत्र शिष्ये स पार्थिवः ।। ५४ ।।
तत्रैवोवास धर्मात्मा सहितः सर्ववानरैः ।
समुद्रके इस पार आकर धर्मात्मा श्रीरामने पहले जहाँ शयन किया था, उसी स्थानपर सम्पूर्ण वानरोंके साथ विश्राम किया ।। ५४ १/२ ।।
अथैनान् राघवः काले समानीयाभिपूज्य च ।। ५५ ।।
विसर्जयामास तदा रत्नैः संतोष्य सर्वशः ।
फिर श्रीरघुनाथजीने यथासमय सबको अपने पास बुलाकर सबका यथायोग्य आदर-सत्कार किया तथा रत्नोंकी भेंटसे संतुष्ट करके सभी वानरों और रीछोंको बिदा किया ।। ५५ १/२ ।।
गतेषु वानरेन्द्रेषु गोपुच्छर्क्षेषु तेषु च ।। ५६ ।।
सुग्रीवसहितो रामः किष्किन्धां पुनरागमत् ।

जब वे रीछ, श्रेष्ठ वानर और लंगूर चले गये, तब सुग्रीवसहित श्रीरामने पुनः किष्किन्धापुरीको प्रस्थान किया ।। ५६ १/२ ।।
विभीषणेनानुगतः सुग्रीवसहितस्तदा ।। ५७ ।।
पुष्पकेण विमानेन वैदेह्या दर्शयन् वनम् ।
किष्किन्धां तु समासाद्य रामः प्रहरतां वरः ।। ५८ ।।
अङ्गदं कृतकर्माणं यौवराज्येऽभ्यषेचयत् ।
विभीषण और सुग्रीवके साथ पुष्पक-विमानद्वारा विदेहकुमारी सीताको वनकी शोभा दिखाते हुए योद्धाओंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने किष्किन्धामें पहुँचकर अंगदको, जिन्होंने लंकाके युद्धमें महान् पराक्रम दिखाया था, युवराजके पदपर अभिषिक्त किया ।। ५७-५८ १/२ ।।

ततस्तैरेव सहितो रामः सौमित्रिणा सह ।। ५९ ।।
यथागतेन मार्गेण प्रययौ स्वपुरं प्रति ।
इसके बाद लक्ष्मण तथा सुग्रीव आदिके साथ श्रीरामचन्द्रजी जिस मार्गसे आये थे, उसीके द्वारा अपनी राजधानी अयोध्याकी ओर प्रस्थित हुए ।। ५९ १/२ ।।
अयोध्यां स समासाद्य पुरीं राष्ट्रपतिस्ततः ।। ६० ।।
भरताय हनूमन्तं दूतं प्रास्थापयत् तदा ।
तत्पश्चात् अयोध्यापुरीके निकट पहुँचकर राष्ट्रपति श्रीरामने हनुमानजीको दूत बनाकर भरतके पास भेजा ।।

लक्षयित्वेङ्गितं सर्वं प्रियं तस्मै निवेद्य वै ।। ६१ ।।
वायुपुत्रे पुनः प्राप्ते नन्दिग्राममुपागमत् ।
जब वायुपुत्र हनुमान्‌जी भरतजीकी सारी चेष्टाओंको लक्ष्य करके उन्हें श्रीरामचन्द्रजीके पुनरागमनका प्रिय समाचार सुनाकर लौट आये, तब श्रीरामचन्द्रजी नन्दिग्राममें आये ।। ६१ १/२ ।।

स तत्र मलदिग्धाङ्गं भरतं चीरवाससम् ।। ६२ ।।
अग्रतः पादुके कृत्वा ददर्शासीनमासने ।
वहाँ आकर श्रीरामने देखा, भरत चीरवस्त्र पहने हुए हैं, उनका शरीर मैलसे भरा हुआ है और वे मेरी चरणपादुकाएँ आगे रखकर कुशासनपर बैठे हैं ।। ६२ १/२ ।।

संगतो भरतेनाथ शत्रुघ्नेन च वीर्यवान् ।। ६३ ।।
राघवः सहसौमित्रिर्मुमुदे भरतर्षभ ।
युधिष्ठिर! लक्ष्मणसहित पराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी भरत और शत्रुघ्नसे मिलकर बहुत प्रसन्न हुए ।। ६३ १/२ ।।

ततो भरतशत्रुघ्नौ समेतौ गुरुणा तदा ।। ६४ ।।

वैदेह्या दर्शनेनोभौ प्रहर्षं समवापतुः ।
भरत और शत्रुघ्नको भी उस समय बड़े भाईसे मिलकर तथा विदेहकुमारी सीताका दर्शन करके महान् हर्ष प्राप्त हुआ ॥ ६४ १/२ ॥
तस्मै तद् भरतो राज्यमागतायातिसत्कृतम् ।
न्यासं निर्यातयामास युक्तः परमया मुदा ॥ ६५ ॥
फिर भरतजीने बड़ी प्रसन्नताके साथ अयोध्या पधारे हुए भगवान् श्रीरामको अपने पास धरोहरके रूपमें रखा हुआ (अयोध्याका) राज्य अत्यन्त सत्कारपूर्वक लौटा दिया ॥ ६५ ॥

ततस्तं वैष्णवे शूरं नक्षत्रेऽभिमतेऽहनि ।
वसिष्ठो वामदेवश्च सहितावभ्यषिञ्चताम् ॥ ६६ ॥
तत्पश्चात् विष्णुदेवतासम्बन्धी श्रवण नक्षत्रका पुण्य दिवस आनेपर वसिष्ठ और वामदेव दोनों ऋषियोंने मिलकर शूरशिरोमणि भगवान् रामका राज्याभिषेक किया ॥ ६६ ॥
सोऽभिषिक्तः कपिश्रेष्ठं सुग्रीवं ससुहृज्जनम् ।
विभीषणं च पौलस्त्यमन्वजानाद् गृहान् प्रति ॥ ६७ ॥
राज्याभिषेकका कार्य सम्पन्न हो जानेपर श्रीरामचन्द्रजीने सुहृदोंसहित सुग्रीवको तथा पुलस्त्यकुलनन्दन विभीषणको अपने-अपने घर लौटनेकी आज्ञा दी ॥ ६७ ॥