महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1956, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर जितेन्द्रिय भगवान् श्रीरामने लंकापुरीकी सुरक्षाका प्रबन्ध करके लक्ष्मण, सुग्रीव आदि सभी श्रेष्ठ वानरों, विभीषण तथा प्रधान-प्रधान सचिवोंके साथ सीताको आगे करके इच्छानुसार चलनेवाले, आकाशचारी, शोभाशाली पुष्पकविमानपर आरूढ़ हो उसीके द्वारा पूर्वोक्त सेतुमार्गसे ऊपर-ही-ऊपर पुनः मकरालय समुद्रको पार किया ।। ५१—५३ १/२ ।।
ततस्तीरे समुद्रस्य यत्र शिष्ये स पार्थिवः ।। ५४ ।।
तत्रैवोवास धर्मात्मा सहितः सर्ववानरैः ।
समुद्रके इस पार आकर धर्मात्मा श्रीरामने पहले जहाँ शयन किया था, उसी स्थानपर सम्पूर्ण वानरोंके साथ विश्राम किया ।। ५४ १/२ ।।
अथैनान् राघवः काले समानीयाभिपूज्य च ।। ५५ ।।
विसर्जयामास तदा रत्नैः संतोष्य सर्वशः ।
फिर श्रीरघुनाथजीने यथासमय सबको अपने पास बुलाकर सबका यथायोग्य आदर-सत्कार किया तथा रत्नोंकी भेंटसे संतुष्ट करके सभी वानरों और रीछोंको बिदा किया ।। ५५ १/२ ।।
गतेषु वानरेन्द्रेषु गोपुच्छर्क्षेषु तेषु च ।। ५६ ।।
सुग्रीवसहितो रामः किष्किन्धां पुनरागमत् ।