महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजब वे रीछ, श्रेष्ठ वानर और लंगूर चले गये, तब सुग्रीवसहित श्रीरामने पुनः किष्किन्धापुरीको प्रस्थान किया ।। ५६ १/२ ।।
विभीषणेनानुगतः सुग्रीवसहितस्तदा ।। ५७ ।।
पुष्पकेण विमानेन वैदेह्या दर्शयन् वनम् ।
किष्किन्धां तु समासाद्य रामः प्रहरतां वरः ।। ५८ ।।
अङ्गदं कृतकर्माणं यौवराज्येऽभ्यषेचयत् ।
विभीषण और सुग्रीवके साथ पुष्पक-विमानद्वारा विदेहकुमारी सीताको वनकी शोभा दिखाते हुए योद्धाओंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने किष्किन्धामें पहुँचकर अंगदको, जिन्होंने लंकाके युद्धमें महान् पराक्रम दिखाया था, युवराजके पदपर अभिषिक्त किया ।। ५७-५८ १/२ ।।
ततस्तैरेव सहितो रामः सौमित्रिणा सह ।। ५९ ।।
यथागतेन मार्गेण प्रययौ स्वपुरं प्रति ।
इसके बाद लक्ष्मण तथा सुग्रीव आदिके साथ श्रीरामचन्द्रजी जिस मार्गसे आये थे, उसीके द्वारा अपनी राजधानी अयोध्याकी ओर प्रस्थित हुए ।। ५९ १/२ ।।
अयोध्यां स समासाद्य पुरीं राष्ट्रपतिस्ततः ।। ६० ।।
भरताय हनूमन्तं दूतं प्रास्थापयत् तदा ।
तत्पश्चात् अयोध्यापुरीके निकट पहुँचकर राष्ट्रपति श्रीरामने हनुमानजीको दूत बनाकर भरतके पास भेजा ।।
लक्षयित्वेङ्गितं सर्वं प्रियं तस्मै निवेद्य वै ।। ६१ ।।
वायुपुत्रे पुनः प्राप्ते नन्दिग्राममुपागमत् ।
जब वायुपुत्र हनुमान्जी भरतजीकी सारी चेष्टाओंको लक्ष्य करके उन्हें श्रीरामचन्द्रजीके पुनरागमनका प्रिय समाचार सुनाकर लौट आये, तब श्रीरामचन्द्रजी नन्दिग्राममें आये ।। ६१ १/२ ।।
स तत्र मलदिग्धाङ्गं भरतं चीरवाससम् ।। ६२ ।।
अग्रतः पादुके कृत्वा ददर्शासीनमासने ।
वहाँ आकर श्रीरामने देखा, भरत चीरवस्त्र पहने हुए हैं, उनका शरीर मैलसे भरा हुआ है और वे मेरी चरणपादुकाएँ आगे रखकर कुशासनपर बैठे हैं ।। ६२ १/२ ।।
संगतो भरतेनाथ शत्रुघ्नेन च वीर्यवान् ।। ६३ ।।
राघवः सहसौमित्रिर्मुमुदे भरतर्षभ ।
युधिष्ठिर! लक्ष्मणसहित पराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी भरत और शत्रुघ्नसे मिलकर बहुत प्रसन्न हुए ।। ६३ १/२ ।।
ततो भरतशत्रुघ्नौ समेतौ गुरुणा तदा ।। ६४ ।।