भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1955

दिव्यास्त्वामुपभोगाश्च मत्प्रसादकृताः सदा ॥ ४५ ॥ उपस्थास्यन्ति हनुमन्निति स्म हरिलोचन । 'पिंगलनयन हनुमान्! मेरी कृपासे तुम्हें सदा ही दिव्य भोग प्राप्त होते रहेंगे' ॥ ४५ १/२ ॥

ततस्ते प्रेक्षमाणानां तेषामक्लिष्टकर्मणाम् ॥ ४६ ॥ अन्तर्धानं ययुर्देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः । तदनन्तर अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले वानरोंके देखते-देखते वहाँ इन्द्र आदि सब देवता अन्तर्धान हो गये ॥ ४६ १/२ ॥

दृष्ट्वा रामं तु जानक्या संगतं शक्रसारथिः ॥ ४७ ॥ उवाच परमप्रीतः सुहृन्मध्य इदं वचः । देवगन्धर्वयक्षाणां मानुषासुरभोगिनाम् ॥ ४८ ॥ अपनीतं त्वया दुःखमिदं सत्यपराक्रम । श्रीरामचन्द्रजीको जनकनन्दिनी सीताके साथ विराजमान देख इन्द्रसारथि मातलिको बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने सब सुहृदोंके बीचमें इस प्रकार कहा—'सत्यपराक्रमी श्रीराम! आपने देवता, गन्धर्व, यक्ष, मनुष्य, असुर और नाग—इन सबका दुःख दूर कर दिया है ॥ ४७-४८ १/२ ॥

सदेवासुरगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः ॥ ४९ ॥ कथयिष्यन्ति लोकास्त्वां यावद् भूमिर्धरिष्यति । 'जबतक यह पृथ्वी रहेगी, तबतक देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस तथा नागोंसहित सम्पूर्ण जगत्‌के लोग आपकी कीर्तिकथाका गान करेंगे' ॥ ४९ १/२ ॥

इत्येवमुक्त्वाऽनुज्ञाप्य रामं शस्त्रभृतां वरम् ॥ ५० ॥ सम्पूज्यापाक्रमत् तेन रथेनादित्यवर्चसा । ऐसा कहकर शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा ले उनकी पूजा करके सूर्यके समान तेजस्वी उसी रथके द्वारा मातलि स्वर्गलोकको चला गया ॥ ५० १/२ ॥

ततः सीतां पुरस्कृत्य रामः सौमित्रिणा सह ॥ ५१ ॥ सुग्रीवप्रमुखैश्चैव सहितः सर्ववानरैः । विधाय रक्षां लङ्कायां विभीषणपुरस्कृतः ॥ ५२ ॥ संततार पुनस्तेन सेतुना मकरालयम् । पुष्पकेण विमानेन खेचरेण विराजता ॥ ५३ ॥ कामगेन यथामुख्यैरमात्यैः संवृतो वशी ।