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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 298)

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एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

भगवान् शंकर और अर्जुनका युद्ध, अर्जुनपर उनका प्रसन्न होना एवं अर्जुनके द्वारा भगवान् शंकरकी स्तुति

वैशम्पायन उवाच

गतेषु तेषु सर्वेषु तपस्विषु महात्मसु ।
पिनाकपाणिर्भगवान् सर्वपापहरो हरः ॥ १ ॥
कैरातं वेषमास्थाय काञ्चनद्रुमसंनिभम् ।
विभ्राजमानो विपुलो गिरिर्मेरुरिवापरः ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उन सब तपस्वी महात्माओंके चले जानेपर सर्वपापहारी, पिनाक-पाणि, भगवान् शंकर किरातवेष धारण करके सुवर्णमय वृक्षके सदृश दिव्य कान्तिसे उद्भासित होने लगे। उनका शरीर दूसरे मेरुपर्वतके समान दीप्तिमान् और विशाल था ॥ १-२ ॥

श्रीमद् धनुरुपादाय शरांश्चाशीविषोपमान् ।
निष्पपात महावेगो दहनो देहवानिव ॥ ३ ॥

वे एक शोभायमान धनुष और सर्पोंके समान विषाक्त बाण लेकर बड़े वेगसे चले। मानो साक्षात् अग्निदेव ही देह धारण करके निकले हों ॥ ३ ॥

देव्या सहोमया श्रीमान् समानव्रतवेषया ।
नानावेषधरैर्हृष्टैर्भूतैरनुगतस्तदा ॥ ४ ॥
किरातवेषसंछन्नः स्त्रीभिश्चापि सहस्रशः ।
अशोभत तदा राजन् स देशोऽतीव भारत ॥ ५ ॥

उनके साथ भगवती उमा भी थीं, जिनका व्रत और वेष भी उन्हींके समान था। अनेक प्रकारके वेष धारण किये भूतगण भी प्रसन्नतापूर्वक उनके पीछे हो लिये थे। इस प्रकार किरातवेषमें छिपे हुए श्रीमान् शिव सहस्रों स्त्रियोंसे घिरकर बड़ी शोभा पा रहे थे। भरतवंशी राजन्! उस समय वह प्रदेश उन सबके चलने-फिरनेसे अत्यन्त सुशोभित हो रहा था ॥ ४-५ ॥

क्षणेन तद् वनं सर्वं निःशब्दमभवत् तदा ।
नादः प्रस्रवणानां च पक्षिणां चाप्युपारमत् ॥ ६ ॥

एक ही क्षणमें वह सारा वन शब्दरहित हो गया। झरनों और पक्षियोंतककी आवाज बंद हो गयी ॥ ६ ॥

स संनिकर्षमागम्य पार्थस्याक्लिष्टकर्मणः ।

मूकं नाम दनोः पुत्रं ददर्शाद्भुतदर्शनम् ॥ ७ ॥
वाराहं रूपमास्थाय तर्कयन्तमिवार्जुनम् ।
हन्तुं परं दीप्यमानं तमुवाचाथ फाल्गुनः ॥ ८ ॥
गाण्डीवं धनुरादाय शरांश्चाशीविषोपमान् ।
सज्यं धनुर्वरं कृत्वा ज्याघोषेण निनादयन् ॥ ९ ॥
अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले कुन्तीपुत्र अर्जुनके निकट आकर भगवान् शंकरने अद्भुत दीखनेवाले मूक नामक अद्भुत दानवको देखा, जो सूअरका रूप धारण करके अत्यन्त तेजस्वी अर्जुनको मार डालनेका उपाय सोच रहा था; उस समय अर्जुनने गाण्डीव धनुष और विषैले सर्पोंके समान भयंकर बाण हाथमें ले धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाकर उसकी टंकारसे दिशाओंको प्रतिध्वनित करके कहा— ॥ ७–९ ॥

यन्मां प्रार्थयसे हन्तुमनागसमिहागतम् ।
तस्मात् त्वां पूर्वमेवाहं नेताद्य यमसादनम् ॥ १० ॥
‘अरे! तू यहाँ आये हुए मुझ निरपराधको मारनेकी घातमें लगा है, इसीलिये मैं आज पहले ही तुझे यमलोक भेज दूँगा’ ॥ १० ॥

दृष्ट्वा तं प्रहरिष्यन्तं फाल्गुनं दृढधन्विनम् ।
कि

जैसे पर्वतपर बिजलीकी गड़गड़ाहट और वज्रपातका भयंकर शब्द होता है, उसी प्रकार उन दोनों बाणोंके आघातका शब्द हुआ ।। १५ ।। स विद्धो बहुभिर्बाणैर्दीप्तास्यैः पन्नगैरिव । ममार राक्षसं रूपं भूयः कृत्वा विभीषणम् ।। १६ ।। इस प्रकार प्रज्वलित मुखवाले सर्पोंके समान अनेक बाणोंसे घायल होकर वह दानव फिर अपने भयानक राक्षसरूपको प्रकट करते हुए मर गया ।। १६ ।। स ददर्श ततो जिष्णुः पुरुषं काञ्चनप्रभम् । किरातवेषसंच्छन्नं स्त्रीसहायममित्रहा ।। १७ ।। तमब्रवीत् प्रीतमनाः कौन्तेयः प्रहसन्निव । को भवानटते शून्ये वने स्त्रीगणसंवृतः ।। १८ ।। इसी समय शत्रुनाशक अर्जुनने सुवर्णके समान कान्तिमान् एक तेजस्वी पुरुषको देखा, जो स्त्रियोंके साथ आकर अपनेको किरातवेषमें छिपाये हुए थे। तब कुन्तीकुमारने प्रसन्नचित्त होकर हँसते हुए-से कहा—‘आप कौन हैं जो इस सूने वनमें स्त्रियोंसे घिरे हुए घूम रहे हैं? ।। १७-१८ ।। न त्वमस्मिन् वने घोरे बिभेषि कनकप्रभ । किमर्थं च त्वया विद्धो वराहो मत्परिग्रहः ।। १९ ।। ‘सुवर्णके समान दीप्तिमान् पुरुष! क्या आपको इस भयानक वनमें भय नहीं लगता? यह सूअर तो मेरा लक्ष्य था, आपने क्यों उसपर बाण मारा? ।। १९ ।। मयाभिपन्नः पूर्वं हि राक्षसोऽयमिहागतः । कामात् परिभवाद् वापि न मे जीवन् विमोक्ष्यसे ।। २० ।। ‘यह राक्षस पहले यहीं मेरे पास आया था और मैंने इसे काबूमें कर लिया था। आपने किसी कामनासे इस शूकरको मारा हो या मेरा तिरस्कार करनेके लिये। किसी दशामें भी मैं आपको जीवित नहीं छोड़ूँगा ।। २० ।। न ह्येष मृगयाधर्मो यस्त्वयाद्य कृतो मयि । तेन त्वां भ्रंशयिष्यामि जीवितात् पर्वताश्रयम् ।। २१ ।। ‘यह मृगयाका धर्म नहीं है, जो आज आपने मेरे साथ किया है। आप पर्वतके निवासी हैं तो भी उस अपराधके कारण मैं आपको जीवनसे वंचित कर दूँगा’ ।। २१ ।। इत्युक्तः पाण्डवेयेन किरातः प्रहसन्निव । उवाच श्लक्ष्णया वाचा पाण्डवं सव्यसाचिनम् ।। २२ ।। पाण्डुनन्दन अर्जुनके इस प्रकार कहनेपर किरात-वेषधारी भगवान् शंकर जोर-जोरसे हँस पड़े और सव्यसाची पाण्डवसे मधुर वाणीमें बोले— ।। २२ ।। न मत्कृते त्वया वीर भीः कार्या वनमन्तिकात् । इयं भूमिः सदास्माकमुचिता वसतां वने ।। २३ ।।

‘वीर! तुम हमारे लिये वनके निकट आनेके कारण भय न करो। हम तो वनवासी हैं, अतः हमारे लिये इस भूमिपर विचरना सदा उचित ही है ॥ २३ ॥ त्वया तु दुष्करः कस्मादिह वासः प्ररोचितः । वयं तु बहुसत्त्वेऽस्मिन् निवसामस्तपोधन ॥ २४ ॥ ‘किंतु तुमने यहाँका दुष्कर निवास कैसे पसंद किया? तपोधन! हम तो अनेक प्रकारके जीव-जन्तुओंसे भरे हुए इस वनमें सदा ही रहते हैं ॥ २४ ॥ भवांस्तु कृष्णवर्त्माभः सुकुमारः सुखोचितः । कथं शून्यमिमं देशमेकाकी विचरिष्यति ॥ २५ ॥ ‘तुम्हारे अंगोंकी प्रभा प्रज्वलित अग्निके समान जान पड़ती है। तुम सुकुमार हो और सुख भोगनेके योग्य प्रतीत होते हो। इस निर्जन प्रदेशमें किसलिये अकेले विचर रहे हो?’ ॥ २५ ॥

अर्जुन उवाच गाण्डीवमाश्रयं कृत्वा नाराचांश्चाग्निसंनिभान् । निवसामि महारण्ये द्वितीय इव पावकिः ॥ २६ ॥ **अर्जुनने कहा—**मैं गाण्डीव धनुष और अग्निके समान तेजस्वी बाणोंका आश्रय लेकर इस महान् वनमें द्वितीय कार्तिकेयकी भाँति (निर्भय) निवास करता हूँ ॥ २६ ॥ एष चापि मया जन्तुर्मृगरूपं समाश्रितः । राक्षसो निहतो घोरो हन्तुं मामिह चागतः ॥ २७ ॥ यह प्राणी हिंसक पशुका रूप धारण करके मुझे ही मारनेके लिये यहाँ आया था, अतः इस भयंकर राक्षसको मैंने मार गिराया है ॥ २७ ॥

किरात उवाच मयैष धन्वन्निर्मुक्तैस्ताडितः पूर्वमेव हि । बाणैरभिहतः शेते नीतश्च यमसादनम् ॥ २८ ॥ **किरातरूपधारी शिव बोले—**मैंने अपने धनुषद्वारा छोड़े हुए बाणोंसे पहले ही इसे घायल कर दिया था। मेरे ही बाणोंकी चोट खाकर यह सदाके लिये सो रहा है और यमलोकमें पहुँच गया ॥ २८ ॥ ममैष लक्ष्यभूतो हि मम पूर्वपरिग्रहः । ममैव च प्रहारेण जीविताद् व्यपरोपितः ॥ २९ ॥ मैंने ही पहले इसे अपने बाणोंका निशाना बनाया, अतः तुमसे पहले इसपर मेरा अधिकार स्थापित हो चुका था। मेरे ही तीव्र प्रहारसे इस दानवको अपने प्राणोंसे हाथ धोना पड़ा है ॥ २९ ॥ दोषान् स्वान् नार्हसेऽन्यस्मै वक्तुं स्वबलदर्पितः ।

अवलिप्तोऽसि मन्दात्मन् न मे जीवन् विमोक्ष्यसे ॥ ३० ॥
मन्दबुद्धे! तुम अपने बलके घमंडमें आकर अपने दोष दूसरेपर नहीं मढ़ सकते। तुम्हें अपनी शक्तिपर बड़ा गर्व है; अतः अब तुम मेरे हाथसे जीवित नहीं बच सकते ॥ ३० ॥
स्थिरो भवस्व मोक्ष्यामि सायकानशनीनिव ।
घटस्व परया शक्त्या मुञ्च त्वमपि सायकान् ॥ ३१ ॥
धैर्यपूर्वक सामने खड़े रहो, मैं वज्रके समान भयानक बाण छोड़ूँगा। तुम भी अपनी पूरी शक्ति लगाकर मुझे जीतनेका प्रयास करो। मेरे ऊपर अपने बाण छोड़ो ॥ ३१ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा किरातस्यार्जुनस्तदा ।
रोषमाहारयामास ताडयामास चेषुभिः ॥ ३२ ॥
किरातकी वह बात सुनकर उस समय अर्जुनको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने बाणोंसे उसपर प्रहार आरम्भ किया ॥ ३२ ॥
ततो हृष्टेन मनसा प्रतिजग्राह सायकान् ।
भूयो भूय इति प्राह मन्दमन्देत्युवाच ह ॥ ३३ ॥
प्रहरस्व शरानेतान् नाराचान् मर्मभेदिनः ।
तब किरातने प्रसन्नचित्तसे अर्जुनके छोड़े हुए सभी बाणोंको पकड़ लिया और कहा—‘ओ मूर्ख! और बाण मार और बाण मार, इन मर्मभेदी नाराचोंका प्रहार कर’ ॥ ३३ १/२ ॥
इत्युक्तो बाणवर्षं स मुमोच सहसार्जुनः ॥ ३४ ॥
उसके ऐसा कहनेपर अर्जुनने सहसा बाणोंकी झड़ी लगा दी ॥ ३४ ॥
ततस्तौ तत्र संरब्धौ राजमानौ मुहुर्मुहुः ।
शरैराशीविषाकारैस्ततक्षाते परस्परम् ॥ ३५ ॥
तदनन्तर वे दोनों क्रोधमें भरकर बारंबार सर्पाकार बाणोंद्वारा एक-दूसरेको घायल करने लगे। उस समय उन दोनोंकी बड़ी शोभा होने लगी ॥ ३५ ॥
ततोऽर्जुनः शरवर्षं किराते समवासृजत् ।
तत् प्रसन्नेन मनसा प्रतिजग्राह शङ्करः ॥ ३६ ॥
तत्पश्चात् अर्जुनने किरातपर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ की; परंतु भगवान् शंकरने प्रसन्नचित्तसे उन सब बाणोंको ग्रहण कर लिया ॥ ३६ ॥
मुहूर्तं शरवर्षं तत् प्रतिगृह्य पिनाकधृक् ।
अक्षतेन शरीरेण तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥ ३७ ॥
पिनाकधारी शिव दो ही घड़ीमें सारी बाण-वर्षाको अपनेमें लीन करके पर्वतकी भाँति अविचल भावसे खड़े रहे। उनके शरीरपर तनिक भी चोट या क्षति नहीं पहुँची थी ॥ ३७ ॥
स दृष्ट्वा बाणवर्षं तु मोघीभूतं धनंजयः ।
परमं विस्मयं चक्रे साधु साध्विति चाब्रवीत् ॥ ३८ ॥

अपनी की हुई सारी बाण-वर्षा व्यर्थ हुई देख धनंजयको बड़ा आश्चर्य हुआ। वे किरातको साधुवाद देने लगे और बोले— ॥ ३८ ॥
अहोऽयं सुकुमाराङ्गो हिमवच्छिखराश्रयः ।
गाण्डीवमुक्तान् नाराचान् प्रतिगृह्णात्यविह्वलः ॥ ३९ ॥
‘अहो! हिमालयके शिखरपर निवास करनेवाले इस किरातके अंग तो बड़े सुकुमार हैं, तो भी यह गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाणोंको ग्रहण कर लेता है और तनिक भी व्याकुल नहीं होता ॥ ३९ ॥
कोऽयं देवो भवेत् साक्षाद् रुद्रो यक्षः सुरोऽसुरः ।
विद्यते हि गिरिश्रेष्ठे त्रिदशानां समागमः ॥ ४० ॥
‘यह कौन है? साक्षात् भगवान् रुद्रदेव, यक्ष, देवता अथवा असुर तो नहीं है। इस श्रेष्ठ पर्वतपर देवताओंका आना-जाना होता रहता है ॥ ४० ॥
न हि मद्बाणजालानामुत्सृष्टानां सहस्रशः ।
शक्तोऽन्यः सहितुं वेगमृते देवं पिनाकिनम् ॥ ४१ ॥
‘मैंने सहस्रों बार जिन बाण-समूहोंकी वृष्टि की है, उनका वेग पिनाकधारी भगवान् शंकरके सिवा दूसरा कोई नहीं सह सकता ॥ ४१ ॥
देवो वा यदि वा यक्षो रुद्रादन्यो व्यवस्थितः ।
अहमेनं शरैस्तीक्ष्णैर्नयामि यमसादनम् ॥ ४२ ॥
‘यदि यह रुद्रदेवसे भिन्न व्यक्ति है तो यह देवता हो या यक्ष—मैं इसे तीखे बाणोंसे मारकर अभी यमलोक भेजता हूँ’ ॥ ४२ ॥
ततो हृष्टमना जिष्णुर्नाराचान् मर्मभेदिनः ।
व्यसृजच्छतधा राजन् मयूखानिव भास्करः ॥ ४३ ॥
राजन्! यह सोचकर प्रसन्नचित्त अर्जुनने सहस्रों किरणोंको फैलानेवाले भगवान् भास्करकी भाँति सैकड़ों मर्मभेदी नाराचोंका प्रहार किया ॥ ४३ ॥
तान् प्रसन्नेन मनसा भगवाँल्लोकभावनः ।
शूलपाणिः प्रत्यगृह्णाच्छिलावर्षमिवाचलः ॥ ४४ ॥
परंतु त्रिशूलधारी भूतभावन भगवान् भवने हर्षभरे हृदयसे उन सब नाराचोंको उसी प्रकार आत्मसात् कर लिया, जैसे पर्वत पत्थरोंकी वर्षाको ॥ ४४ ॥

अध्याय (पृष्ठ 304)

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अर्जुनकी तपस्या

अर्जुनका किरातवेषधारी भगवान् शिवपर बाण चलाना

क्षणेन क्षीणबाणोऽथ संवृत्तः फाल्गुनस्तदा । भीश्चैनमाविशत् तीव्रा तं दृष्ट्वा शरसंक्षयम् ॥ ४५ ॥ उस समय एक ही क्षणमें अर्जुनके सारे बाण समाप्त हो चले। उन बाणोंका इस प्रकार विनाश देखकर उनके मनमें बड़ा भय समा गया ॥ ४५ ॥ चिन्तयामास जिष्णुस्तु भगवन्तं हुताशनम् । पुरस्तादक्षयौ दत्तौ तूणौ येनास्य खाण्डवे ॥ ४६ ॥ विजयी अर्जुनने उस समय भगवान् अग्निदेवका चिन्तन किया, जिन्होंने खाण्डववनमें प्रत्यक्ष दर्शन देकर उन्हें दो अक्षय तूणीर प्रदान किये थे ॥ ४६ ॥ किं नु मोक्ष्यामि धनुषा यन्मे बाणाः क्षयं गताः । अयं च पुरुषः कोऽपि बाणान् ग्रसति सर्वशः ॥ ४७ ॥ हत्वा चैनं धनुष्कोट्या शूलाग्रेणेव कुञ्जरम् । नयामि दण्डधारस्य यमस्य सदनं प्रति ॥ ४८ ॥ वे मन-ही-मन सोचने लगे, ‘मेरे सारे बाण नष्ट हो गये, अब मैं धनुषसे क्या चलाऊँगा। यह कोई अद्भुत पुरुष है, जो मेरे सारे बाणोंको खाये जा रहा है। अच्छा, अब मैं शूलके अग्रभागसे घायल किये जानेवाले हाथीकी भाँति इसे धनुषकी कोटि (नोक)-से मारकर दण्डधारी यमराजके लोकमें पहुँचा देता हूँ’ ॥ ४७-४८ ॥

प्रगृह्याथ धनुष्कोट्या ज्यापाशेनावकृष्य च । मुष्टिभिश्चापि हतवान् वज्रकल्पैर्महाद्युतिः ॥ ४९ ॥ ऐसा विचारकर महातेजस्वी अर्जुनने किरातको अपने धनुषकी कोटिसे पकड़कर उसकी प्रत्यञ्चामें उसके शरीरको फँसाकर खींचा और वज्रके समान दुःसह मुष्टिप्रहारसे पीड़ित करना प्रारम्भ किया ॥ ४९ ॥

सम्प्रयुद्धो धनुष्कोट्या कौन्तेयः परवीरहा । तदप्यस्य धनुर्दिव्यं जग्राह गिरिगोचरः ॥ ५० ॥ शत्रु-वीरोंका संहार करनेवाले कुन्तीकुमार अर्जुनने जब धनुषकी कोटिसे प्रहार किया, तब उस पर्वतीय किरातने अर्जुनके उस दिव्य धनुषको भी अपनेमें लीन कर लिया ॥ ५० ॥

ततोऽर्जुनो ग्रस्तधनुः खड्गपाणिरतिष्ठत । युद्धस्यान्तमभीप्सन् वै वेगेनाभिजगाम तम् ॥ ५१ ॥ तदनन्तर धनुषके ग्रस्त हो जानेपर अर्जुन हाथमें तलवार लेकर खड़े हो गये और युद्धका अन्त कर देनेकी इच्छासे वेगपूर्वक उसपर आक्रमण किया ॥ ५१ ॥

तस्य मूर्ध्नि शितं खड्गमसक्तं पर्वतेष्वपि । मुमोच भुजवीर्येण विक्रम्य कुरुनन्दनः ॥ ५२ ॥ उनकी वह तलवार पर्वतोंपर भी कुण्ठित नहीं होती थी। कुरुनन्दन अर्जुनने अपने भुजाओंकी पूरी शक्ति लगाकर किरातके मस्तकपर उस तीक्ष्ण धारवाली तलवारसे वार किया ॥ ५२ ॥

तस्य मूर्धानमासाद्य पफालासिवरो हि सः । ततो वृक्षैः शिलाभिश्च योधयामास फाल्गुनः ॥ ५३ ॥ परंतु उसके मस्तकसे टकराते ही वह उत्तम तलवार टूक-टूक हो गयी। तब अर्जुनने वृक्षों और शिलाओंसे युद्ध करना आरम्भ किया ॥ ५३ ॥

तदा वृक्षान् महाकायः प्रत्यगृह्णादथो शिलाः । किरातरूपी भगवांस्ततः पार्थो महाबलः ॥ ५४ ॥ मुष्टिभिर्वज्रसंकाशैर्धूममुत्पादयन् मुखे । प्रजहार दुराधर्षे किरातसमरूपिणि ॥ ५५ ॥ तब विशालकाय किरातरूपी भगवान् शंकरने उन वृक्षों और शिलाओंको भी ग्रहण कर लिया। यह देखकर महाबली कुन्तीकुमार अपने वज्रतुल्य मुक्कोंसे दुर्धर्ष किरात-सदृश रूपवाले भगवान् शिवपर प्रहार करने लगे। उस समय क्रोधके आवेशसे अर्जुनके मुखसे धूम प्रकट हो रहा था ॥ ५४-५५ ॥

ततः शक्राशनिसमैर्मुष्टिभिर्भृशदारुणैः । किरातरूपी भगवानर्दयामास फाल्गुनम् ॥ ५६ ॥

तदनन्तर किरातरूपी भगवान् शिव भी अत्यन्त दारुण और इन्द्रके वज्रके समान दुःसह मुक्कोंसे मारकर अर्जुनको पीड़ा देने लगे ॥ ५६ ॥ ततश्चटचटाशब्दः सुघोरः समजायत । पाण्डवस्य च मुष्टीनां किरातस्य च युध्यतः ॥ ५७ ॥ फिर तो घमासान युद्धमें लगे हुए पाण्डुनन्दन अर्जुन तथा किरातरूपी शिवके मुक्कोंका एक-दूसरेके शरीरपर प्रहार होनेसे बड़ा भयंकर 'चट-चट' शब्द होने लगा ॥ ५७ ॥ सुमुहूर्तं तु तद् युद्धमभवल्लोमहर्षणम् । भुजप्रहारसंयुक्तं वृत्रवासवयोरिव ॥ ५८ ॥ वृत्रासुर और इन्द्रके समान उन दोनोंका वह रोमांचकारी बाहुयुद्ध दो घड़ीतक चलता रहा ॥ ५८ ॥ जघानाथ ततो जिष्णुः किरातमुरसा बली । पाण्डवं च विचेष्टं तं किरातोऽप्यहनद् बली ॥ ५९ ॥ तत्पश्चात् बलवान् वीर अर्जुनने अपनी छातीसे किरातको बड़े जोरसे मारा, तब महाबली किरातने भी विपरीत चेष्टा करनेवाले पाण्डुनन्दन अर्जुनपर आघात किया ॥ ५९ ॥ तयोर्भुजविनिष्पेषात् संघर्षेणोरसोस्तथा । समजायत गात्रेषु पावकोऽङ्गारधूमवान् ॥ ६० ॥ उन दोनोंकी भुजाओंके टकराने और वक्षःस्थलोंके संघर्षसे उनके अंगोंमें धूम और चिनगारियोंके साथ आग प्रकट हो जाती थी ॥ ६० ॥ तत एनं महादेवः पीड्य गात्रैः सुपीडितम् । तेजसा व्यक्रमद् रोषाच्चेतस्तस्य विमोहयन् ॥ ६१ ॥ तदनन्तर! महादेवजीने अपने अंगोंसे दबाकर अर्जुनको अच्छी तरह पीड़ा दी और उनके चित्तको मूर्च्छित-सा करते हुए उन्होंने तेज तथा रोषसे उनके ऊपर अपना पराक्रम प्रकट किया ॥ ६१ ॥ ततोऽभिपीडितैर्गात्रैः पिण्डीकृत इवाबभौ । फाल्गुनो गात्रसंरुद्धो देवदेवेन भारत ॥ ६२ ॥ भारत! तदनन्तर देवाधिदेव महादेवजीके अंगोंसे अवरुद्ध हो अर्जुन अपने पीड़ित अवयवोंके साथ मिट्टीके लोंदे-से दिखायी देने लगे ॥ ६२ ॥ निरुच्छ्वासोऽभवच्चैव संनिरुद्धो महात्मना । पपात भूम्यां निश्चेष्टो गतसत्त्व इवाभवत् ॥ ६३ ॥ महात्मा भगवान् शंकरके द्वारा भलीभाँति नियन्त्रित हो जानेके कारण अर्जुनकी श्वासक्रिया बंद हो गयी। वे निष्प्राणकी भाँति चेष्टाहीन होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ६३ ॥

स मुहूर्तं तथा भूत्वा सचेताः पुनरुत्थितः ।
रुधिरेणाप्लुताङ्गस्तु पाण्डवो भृशदुःखितः ॥ ६४ ॥
दो घड़ीतक उसी अवस्थामें पड़े रहनेके पश्चात् जब अर्जुनको चेत हुआ, तब वे उठकर खड़े हो गये। उस समय उनका सारा शरीर खूनसे लथपथ हो रहा था और वे बहुत दुःखी हो गये थे ॥ ६४ ॥
शरण्यं शरणं गत्वा भगवन्तं पिनाकिनम् ।
मृण्मयं स्थण्डिलं कृत्वा माल्येनापूजयद् भवम् ॥ ६५ ॥
तब वे शरणागतवत्सल पिनाकधारी भगवान् शिवकी शरणमें गये और मिट्टीकी वेदी बनाकर उसीपर पार्थिव शिवकी स्थापना करके पुष्पमालाके द्वारा उनका पूजन किया ॥ ६५ ॥
तच्च माल्यं तदा पार्थः किरातशिरसि स्थितम् ।
अपश्यत् पाण्डवश्रेष्ठो हर्षेण प्रकृतिं गतः ॥ ६६ ॥
कुन्तीकुमारने जो माला पार्थिव शिवपर चढ़ायी थी, वह उन्हें किरातके मस्तकपर पड़ी दिखायी दी। यह देखकर पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुन हर्षसे उल्लसित हो अपने आपेमें आ गये ॥ ६६ ॥
पपात पादयोस्तस्य ततः प्रीतोऽभवद् भवः ।
उवाच चैनं वचसा मेघगम्भीरगीर्हरः ।
जातविस्मयमालोक्य तपःक्षीणाङ्गसंहतिम् ॥ ६७ ॥
और किरातरूपी भगवान् शंकरके चरणोंमें गिर पड़े। उस समय तपस्याके कारण उनके समस्त अवयव क्षीण हो रहे थे और वे महान् आश्चर्यमें पड़ गये थे, उन्हें इस अवस्थामें देखकर सर्वपापहारी भगवान् भव उनपर बहुत प्रसन्न हुए और मेघके समान गम्भीर वाणीमें बोले ॥ ६७ ॥

भव उवाच
भो भोः फाल्गुन तुष्टोऽस्मि कर्मणाप्रतिमेन ते ।
शौर्येणानेन धृत्या च क्षत्रियो नास्ति ते समः ॥ ६८ ॥
**भगवान् शिवने कहा—**फाल्गुन! मैं तुम्हारे इस अनुपम पराक्रम, शौर्य और धैर्यसे बहुत संतुष्ट हूँ। तुम्हारे समान दूसरा कोई क्षत्रिय नहीं है ॥ ६८ ॥
समं तेजश्च वीर्यं च ममाद्य तव चानघ ।
प्रीतस्तेऽहं महाबाहो पश्य मां भरतर्षभ ॥ ६९ ॥
अनघ! तुम्हारा तेज और पराक्रम आज मेरे समान सिद्ध हुआ है। महाबाहु भरतश्रेष्ठ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। मेरी ओर देखो ॥ ६९ ॥
ददामि ते विशालाक्ष चक्षुः पूर्वऋषिर्भवान् ।

विजेष्यसि रणे शत्रूनपि सर्वान् दिवौकसः ॥ ७० ॥
विशाललोचन! मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि देता हूँ। तुम पहलेके ‘नर’ नामक ऋषि हो। तुम युद्धमें अपने शत्रुओंपर, वे चाहे सम्पूर्ण देवता ही क्यों न हों, विजय पाओगे ॥ ७० ॥
प्रीत्या च तेऽहं दास्यामि यदस्त्रमनिवारितम् ।
त्वं हि शक्तो मदीयं तदस्त्रं धारयितुं क्षणात् ॥ ७१ ॥
मैं तुम्हारे प्रेमवश तुम्हें अपना पाशुपतास्त्र दूँगा, जिसकी गतिको कोई रोक नहीं सकता। तुम क्षणभरमें मेरे उस अस्त्रको धारण करनेमें समर्थ हो जाओगे ॥ ७१ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततो देवं महादेवं गिरिशं शूलपाणिनम् ।
ददर्श फाल्गुनस्तत्र सह देव्या महाद्युतिम् ॥ ७२ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर अर्जुनने शूलपाणि महातेजस्वी महादेवजीका देवी पार्वती-सहित दर्शन किया ॥ ७२ ॥
स जानुभ्यां महीं गत्वा शिरसा प्रणिपत्य च ।
प्रसादयामास हरं पार्थः परपुरंजयः ॥ ७३ ॥
शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले कुन्तीकुमारने उनके आगे पृथ्वीपर घुटने टेक दिये और सिरसे प्रणाम करके शिवजीको प्रसन्न किया ॥ ७३ ॥

अर्जुन उवाच

कपर्दिन् सर्वदेवेश भगनेत्रनिपातन ।
देवदेव महादेव नीलग्रीव जटाधर ॥ ७४ ॥
**अर्जुन बोले—**जटाजूटधारी सर्वदेवेश्वर देवदेव महादेव! आप भगदेवताके नेत्रोंका विनाश करनेवाले हैं। आपकी ग्रीवामें नील चिह्न शोभा पा रहा है। आप अपने मस्तकपर सुन्दर जटा धारण करते हैं ॥ ७४ ॥
कारणानां च परमं जाने त्वां त्र्यम्बकं विभुम् ।
देवानां च गतिं देव त्वत्प्रसूतमिदं जगत् ॥ ७५ ॥
प्रभो! मैं आपको समस्त कारणोंमें सर्वश्रेष्ठ कारण मानता हूँ। आप त्रिनेत्रधारी तथा सर्वव्यापी हैं। सम्पूर्ण देवताओंके आश्रय हैं। देव! यह सम्पूर्ण जगत् आपसे ही उत्पन्न हुआ है ॥ ७५ ॥
अजेयस्त्वं त्रिभिर्लोकैः सदेवासुरमानुषैः ।
शिवाय विष्णुरूपाय विष्णवे शिवरूपिणे ॥ ७६ ॥
देवता, असुर और मनुष्योंसहित तीनों लोक भी आपको पराजित नहीं कर सकते। आप ही विष्णुरूप शिव तथा शिवस्वरूप विष्णु हैं, आपको नमस्कार है ॥ ७६ ॥
दक्षयज्ञविनाशाय हरिरुद्राय वै नमः ।

ललाटाक्षाय शर्वाय मीढुषे शूलपाणये ॥ ७७ ॥
दक्षयज्ञका विनाश करनेवाले हरिहररूप आप भगवान्‌को नमस्कार है। आपके ललाटमें तृतीय नेत्र शोभा पाता है। आप जगत्‌का संहारक होनेके कारण शर्व कहलाते हैं। भक्तोंकी अभीष्ट कामनाओंकी वर्षा करनेके कारण आपका नाम मीढ्वान् (वर्षणशील) है। अपने हाथमें त्रिशूल धारण करनेवाले आपको नमस्कार है ।। ७७ ।।

पिनाकगोप्त्रे सूर्याय मंगल्याय च वेधसे ।
प्रसादये त्वां भगवन् सर्वभूतमहेश्वर ॥ ७८ ॥
पिनाकरक्षक, सूर्यस्वरूप, मंगलकारक और सृष्टिकर्ता आप परमेश्वरको नमस्कार है। भगवन्! सर्वभूत-महेश्वर! मैं आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ ।। ७८ ।।

गणेशं जगतः शम्भुं लोककारणकारणम् ।
प्रधानपुरुषातीतं परं सूक्ष्मतरं हरम् ॥ ७९ ॥
आप भूतगणोंके स्वामी, सम्पूर्ण जगत्‌का कल्याण करनेवाले तथा जगत्‌के कारणके भी कारण हैं। प्रकृति और पुरुष दोनोंसे परे अत्यन्त सूक्ष्मस्वरूप तथा भक्तोंके पापोंको हरनेवाले हैं ।। ७९ ।।

व्यतिक्रमं मे भगवन् क्षन्तुमर्हसि शंकर ।
भगवन् दर्शनाकाङ्क्षी प्राप्तोऽस्मीमं महागिरिम् ॥ ८० ॥
कल्याणकारी भगवन्! मेरा अपराध क्षमा कीजिये। भगवन्! मैं आपहीके दर्शनकी इच्छा लेकर इस महान् पर्वतपर आया हूँ ।। ८० ।।

दयितं तव देवेश तापसालयमुत्तमम् ।
प्रसादये त्वां भगवन् सर्वलोकनमस्कृतम् ॥ ८१ ॥
देवेश्वर! यह शैल-शिखर तपस्वियोंका उत्तम आश्रय तथा आपका प्रिय निवासस्थान है। प्रभो! सम्पूर्ण जगत् आपके चरणोंमें वन्दना करता है। मैं आपसे यह प्रार्थना करता हूँ कि आप मुझपर प्रसन्न हों ।। ८१ ।।

न मे स्यादपराधोऽयं महादेवातिसाहसात् । कृतो मयायमज्ञानाद् विमर्दो यस्त्वया सह । शरणं प्रतिपन्नाय तत् क्षमस्वाद्य शंकर ॥ ८२ ॥ महादेव! अत्यन्त साहसवश मैंने जो आपके साथ यह युद्ध किया है, इसमें मेरा अपराध नहीं है। यह अनजानमें मुझसे बन गया है। शंकर! मैं अब आपकी शरणमें आया हूँ। आप मेरी उस धृष्टताको क्षमा करें ।।

वैशम्पायन उवाच

तमुवाच महातेजाः प्रहस्य वृषभध्वजः । प्रगृह्य रुचिरं बाहुं क्षान्तमित्येव फाल्गुनम् ॥ ८३ ॥ **वैशम्पायनजीने कहा—**जनमेजय! तब महातेजस्वी भगवान् वृषभध्वजने अर्जुनका सुन्दर हाथ पकड़कर उनसे हँसते हुए कहा—'मैंने तुम्हारा अपराध पहलेसे ही क्षमा कर दिया' ।। ८३ ।।

परिष्वज्य च बाहुभ्यां प्रीतात्मा भगवान् हरः । पुनः पार्थं सान्त्वपूर्वमुवाच वृषभध्वजः ॥ ८४ ॥

फिर उन्हें दोनों भुजाओंसे खींचकर हृदयसे लगाया और प्रसन्नचित्त हो वृषके चिह्नसे अंकितध्वजा धारण करनेवाले भगवान् रुद्रने पुनः कुन्तीकुमारको सान्त्वना देते हुए कहा॥ ८४॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कैरातपर्वणि महादेवस्तवे एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कैरातपर्वमें महादेवजीकी स्तुतिसे सम्बन्ध रखनेवाला उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३९॥

अध्याय (पृष्ठ 313)

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चत्वारिंशोऽध्यायः

भगवान् शंकरका अर्जुनको वरदान देकर अपने धामको प्रस्थान

देवदेव उवाच

नरस्त्वं पूर्वदेहे वै नारायणसहायवान् ।
बदर्यां तप्तवानुग्रं तपो वर्षायुतान् बहून् ॥ १ ॥
देवदेव महादेवजी बोले— अर्जुन! तुम पूर्व-शरीरमें 'नर' नामक सुप्रसिद्ध ऋषि थे। नारायण तुम्हारे सखा हैं। तुमने बदरिकाश्रममें अनेक सहस्र वर्षोंतक उग्र तपस्या की है ॥ १ ॥

त्वयि वा परमं तेजो विष्णौ वा पुरुषोत्तमे ।
युवाभ्यां पुरुषाग्र्याभ्यां तेजसा धार्यते जगत् ॥ २ ॥
तुममें अथवा पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुमें उत्कृष्ट तेज है। तुम दोनों पुरुषरत्नोंने अपने तेजसे इस सम्पूर्ण जगत्‌को धारण कर रखा है ॥ २ ॥

शक्राभिषेके सुमहद्धनुर्जलदनिःस्वनम् ।
प्रगृह्य दानवाः शस्तास्त्वया कृष्णेन च प्रभो ॥ ३ ॥
प्रभो! तुमने और श्रीकृष्णने इन्द्रके अभिषेकके समय मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाले महान् धनुषको हाथमें लेकर बहुत-से दानवोंका वध किया था ॥ ३ ॥

तदेतदेव गाण्डीवं तव पार्थ करोचितम् ।
मायामास्थाय यद् ग्रस्तं मया पुरुषसत्तम ॥ ४ ॥
पुरुषप्रवर पार्थ! तुम्हारे हाथमें रहनेयोग्य यही वह गाण्डीव धनुष है, जिसे मैंने मायाका आश्रय लेकर अपनेमें विलीन कर लिया था ॥ ४ ॥

तूणौ चाप्यक्षयौ भूयस्तव पार्थ यथोचितौ ।
भविष्यति शरीरं च नीरुजं कुरुनन्दन ॥ ५ ॥
कुरुनन्दन! और ये रहे तुम्हारे दोनों अक्षय तूणीर, जो सर्वथा तुम्हारे ही योग्य हैं। कुन्तीकुमार! तुम्हारे शरीरमें जो चोट पहुँची है, वह सब दूर होकर तुम नीरोग हो जाओगे ॥ ५ ॥

प्रीतिमानस्मि ते पार्थ भवान् सत्यपराक्रमः ।
गृहाण वरमस्मतः काङ्क्षितं पुरुषोत्तम ॥ ६ ॥
पार्थ! तुम्हारा पराक्रम यथार्थ है, इसलिये मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। पुरुषोत्तम! तुम मुझसे मनोवांछित वर ग्रहण करो ॥ ६ ॥

न त्वया पुरुषः कश्चित् पुमान् मर्त्येषु मानद ।
दिवि वा वर्तते क्षत्रं त्वत्प्रधानमरिंदम ॥ ७ ॥
मानद! मर्त्यलोक अथवा स्वर्गलोकमें भी कोई पुरुष तुम्हारे समान नहीं है। शत्रुदमन! क्षत्रिय-जातिमें तुम्हीं सबसे श्रेष्ठ हो ॥ ७ ॥

अर्जुन उवाच

भगवन् ददासि चेन्मह्यं कामं प्रीत्या वृषध्वज ।
कामये दिव्यमस्त्रं तद् घोरं पाशुपतं प्रभो ॥ ८ ॥
अर्जुन बोले— भगवन्! वृषध्वज! यदि आप प्रसन्नतापूर्वक मुझे इच्छानुसार वर देते हैं तो प्रभो! मैं उस भयंकर दिव्यास्त्र पाशुपतको प्राप्त करना चाहता हूँ ॥ ८ ॥
यत् तद् ब्रह्मशिरो नाम रौद्रं भीमपराक्रमम् ।
युगान्ते दारुणे प्राप्ते कृत्स्नं संहरते जगत् ॥ ९ ॥
जिसका नाम ब्रह्मशिर है, आप भगवान् रुद्र ही जिसके देवता हैं, जो भयानक पराक्रम प्रकट करनेवाला तथा दारुण प्रलयकालमें सम्पूर्ण जगत्‌का संहारक है ॥ ९ ॥
कर्णभीष्मकृपद्रोणैर्भविता तु महाहवः ।
त्वत्प्रसादान्महादेव जयेयं तान् यथा युधि ॥ १० ॥
महादेव! कर्ण, भीष्म, कृप, द्रोणाचार्य आदिके साथ मेरा महान् युद्ध होनेवाला है, उस युद्धमें मैं आपकी कृपासे उन सबपर विजय पा सकूँ, इसीके लिये दिव्यास्त्र चाहता हूँ ॥ १० ॥
दहेयं येन संग्रामे दानवान् राक्षसांस्तथा ।
भूतानि च पिशाचांश्च गन्धर्वानथ पन्नगान् ॥ ११ ॥
यस्मिञ्छूलसहस्राणि गदाश्चोग्रप्रदर्शनाः ।
शराश्चाशीविषाकाराः सम्भवन्त्यनुमन्त्रिते ॥ १२ ॥
मुझे वह अस्त्र प्रदान कीजिये, जिससे संग्राममें दानवों, राक्षसों, भूतों, पिशाचों, गन्धर्वों तथा नागोंको भस्म कर सकूँ। जिस अस्त्रके अभिमन्त्रित करते ही सहस्रों शूल, देखनेमें भयंकर गदाएँ और विषैले सर्पोंके समान बाण प्रकट हों ॥ ११-१२ ॥
युध्येयं येन भीष्मेण द्रोणेन च कृपेण च ।
सूतपुत्रेण च रणे नित्यं कटुकभाषिणा ॥ १३ ॥
उस अस्त्रको पाकर मैं भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य तथा सदा कटु भाषण करनेवाले सूतपुत्र कर्णके साथ भी युद्धमें लड़ सकूँ ॥ १३ ॥
एष मे प्रथमः कामो भगवन् भगनेत्रहन् ।
त्वत्प्रसादाद् विनिर्वृत्तः समर्थः स्यामहं यथा ॥ १४ ॥

भगदेवताकी आँखें नष्ट करनेवाले भगवन्! आपके समक्ष यह मेरा सबसे पहला मनोरथ है, जो आपहीके कृपाप्रसादसे पूर्ण हो सकता है। आप ऐसा करें, जिससे मैं सर्वथा शत्रुओंको परास्त करनेमें समर्थ हो सकूँ॥ १४॥

भव उवाच

ददामि तेऽस्त्रं दयितमहं पाशुपतं विभो ।
समर्थो धारणे मोक्षे संहारे चासि पाण्डव ॥ १५ ॥
**महादेवजीने कहा—**पराक्रमशाली पाण्डुकुमार! मैं अपना परम प्रिय पाशुपतास्त्र तुम्हें प्रदान करता हूँ। तुम इसके धारण, प्रयोग और उपसंहारमें समर्थ हो॥ १५॥
नैतद् वेद महेन्द्रोऽपि न यमो न च यक्षराट् ।
वरुणोऽप्यथवा वायुः कुतो वेत्स्यन्ति मानवाः ॥ १६ ॥
इसे देवराज इन्द्र, यम, यक्षराज कुबेर, वरुण अथवा वायुदेवता भी नहीं जानते। फिर साधारण मानव तो जान ही कैसे सकेंगे?॥ १६॥
न त्वेतत् सहसा पार्थ मोक्तव्यं पुरुषे क्वचित् ।
जगद् विनाशयेत् सर्वमल्पतेजसि पातितम् ॥ १७ ॥
परंतु कुन्तीकुमार! तुम सहसा किसी पुरुषपर इसका प्रयोग न करना। यदि किसी अल्पशक्ति योद्धापर इसका प्रयोग किया गया तो यह सम्पूर्ण जगत्‌का नाश कर डालेगा॥ १७॥
अवध्यो नाम नास्त्यत्र त्रैलोक्ये सचराचरे ।
मनसा चक्षुषा वाचा धनुषा च निपातयेत् ॥ १८ ॥
चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकीमें कोई ऐसा पुरुष नहीं है जो इस अस्त्रद्वारा मारा न जा सके। इसका प्रयोग करनेवाला पुरुष अपने मानसिक संकल्पसे, दृष्टिसे, वाणीसे तथा धनुष-बाणद्वारा भी शत्रुओंको नष्ट कर सकता है॥ १८॥

वैशम्पायन उवाच

तच्छ्रुत्वा त्वरितः पार्थः शुचिर्भूत्वा समाहितः ।
उपसंगम्य विश्वेशमधीष्वेत्यथ सोऽब्रवीत् ॥ १९ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यह सुनकर कुन्तीपुत्र अर्जुन तुरंत ही पवित्र एवं एकाग्रचित्त हो शिष्यभावसे भगवान् विश्वेश्वरकी शरण गये और बोले—'भगवन्! मुझे इस पाशुपतास्त्रका उपदेश कीजिये'॥ १९॥
ततस्त्वध्यापयामास सरहस्यनिवर्तनम् ।
तदस्त्रं पाण्डवश्रेष्ठं मूर्तिमन्तमिवान्तकम् ॥ २० ॥
उपतस्थे च तत् पार्थं यथा त्र्यक्षमुमापतिम् ।
प्रतिजग्राह तच्चापि प्रीतिमानर्जुनस्तदा ॥ २१ ॥

तब भगवान् शिवने रहस्य और उपसंहारसहित पाशुपतास्त्रका उन्हें उपदेश दिया। उस समय वह अस्त्र जैसे पहले त्रिनेत्रधारी उमापति शिवकी सेवामें उपस्थित हुआ था, उसी प्रकार मूर्तिमान् यमराजतुल्य पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुनके पास आ गया। तब अर्जुनने बहुत प्रसन्न होकर उसे ग्रहण किया ॥ २०-२१ ॥

ततश्चचाल पृथिवी सपर्वतवनद्रुमा ।
ससागरवनोद्देशा सग्रामनगराकरा ॥ २२ ॥
अर्जुनके पाशुपतास्त्र ग्रहण करते ही पर्वत, वन, वृक्ष, समुद्र, वनस्थली, ग्राम, नगर तथा आकरों (खानों) सहित सारी पृथ्वी काँप उठी ॥ २२ ॥

शङ्खदुन्दुभिघोषाश्च भेरीणां च सहस्रशः ।
तस्मिन् मुहूर्ते सम्प्राप्ते निर्घातश्च महानभूत् ॥ २३ ॥
उस शुभ मुहूर्त्तके आते ही शंख और दुन्दुभियोंके शब्द होने लगे। सहस्रों भेरियाँ बज उठीं। आकाशमें वायुके टकरानेका महान् शब्द होने लगा ॥ २३ ॥

अथास्त्रं जाज्वलद् घोरं पाण्डवस्यामितौजसः ।
मूर्तिमद् वै स्थितं पार्श्वे ददृशुर्देवदानवाः ॥ २४ ॥
तदनन्तर वह भयंकर अस्त्र मूर्तिमान् हो अग्निके समान प्रज्वलित तेजस्वीरूपसे अमित पराक्रमी पाण्डुनन्दन अर्जुनके पार्श्वभागमें खड़ा हो गया। यह बात देवताओं और दानवोंने प्रत्यक्ष देखी ॥ २४ ॥

स्पृष्टस्य त्र्यम्बकेनाथ फाल्गुनस्यामितौजसः ।
यत् किंचिदशुभं देहे तत् सर्वं नाशमीयिवत् ॥ २५ ॥
भगवान् शंकरके स्पर्श करनेसे अमित तेजस्वी अर्जुनके शरीरमें जो कुछ भी अशुभ था, वह नष्ट हो गया ॥ २५ ॥

स्वर्गं गच्छेत्यनुज्ञातस्त्र्यम्बकेण तदार्जुनः ।
प्रणम्य शिरसा राजन् प्राञ्जलिर्देवमैक्षत ॥ २६ ॥
उस समय भगवान् त्रिलोचनने अर्जुनको यह आज्ञा दी कि 'तुम स्वर्गलोकको जाओ।' राजन्! तब अर्जुनने भगवान्‌के चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनकी ओर देखने लगे ॥ २६ ॥

ततः प्रभुस्त्रिदिवनिवासिनां वशी
महामतिर्गिरिश उमापतिः शिवः ।
धनुर्महद् दितिजपिशाचसूदनं
ददौ भवः पुरुषवराय गाण्डिवम् ॥ २७ ॥
तत्पश्चात् देवताओंके स्वामी, जितेन्द्रिय एवं परम बुद्धिमान् कैलासवासी उमावल्लभ भगवान् शिवने पुरुषप्रवर अर्जुनको वह महान् गाण्डीवधनुष दे दिया, जो दैत्यों और पिशाचोंका संहार करनेवाला था ॥ २७ ॥

ततः शुभं गिरिवरमीश्वरस्तदा सहोमया सिततटसानुकन्दरम् । विहाय तं पतगमहर्षिसेवितं जगाम खं पुरुषवरस्य पश्यतः ॥ २८ ॥

जिसके तट, शिखर और कन्दराएँ हिमाच्छादित होनेके कारण श्वेत दिखायी देती हैं, पक्षी और महर्षिगण सदा जिसका सेवन करते हैं, उस मंगलमय गिरिश्रेष्ठ इन्द्रकीलको छोड़कर भगवान् शंकर भगवती उमादेवीके साथ अर्जुनके देखते-देखते आकाशमार्गसे चले गये ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कैरातपर्वणि शिवप्रस्थाने चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कैरातपर्वमें शिवप्रस्थानविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४० ॥