महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 308, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंस मुहूर्तं तथा भूत्वा सचेताः पुनरुत्थितः ।
रुधिरेणाप्लुताङ्गस्तु पाण्डवो भृशदुःखितः ॥ ६४ ॥
दो घड़ीतक उसी अवस्थामें पड़े रहनेके पश्चात् जब अर्जुनको चेत हुआ, तब वे उठकर खड़े हो गये। उस समय उनका सारा शरीर खूनसे लथपथ हो रहा था और वे बहुत दुःखी हो गये थे ॥ ६४ ॥
शरण्यं शरणं गत्वा भगवन्तं पिनाकिनम् ।
मृण्मयं स्थण्डिलं कृत्वा माल्येनापूजयद् भवम् ॥ ६५ ॥
तब वे शरणागतवत्सल पिनाकधारी भगवान् शिवकी शरणमें गये और मिट्टीकी वेदी बनाकर उसीपर पार्थिव शिवकी स्थापना करके पुष्पमालाके द्वारा उनका पूजन किया ॥ ६५ ॥
तच्च माल्यं तदा पार्थः किरातशिरसि स्थितम् ।
अपश्यत् पाण्डवश्रेष्ठो हर्षेण प्रकृतिं गतः ॥ ६६ ॥
कुन्तीकुमारने जो माला पार्थिव शिवपर चढ़ायी थी, वह उन्हें किरातके मस्तकपर पड़ी दिखायी दी। यह देखकर पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुन हर्षसे उल्लसित हो अपने आपेमें आ गये ॥ ६६ ॥
पपात पादयोस्तस्य ततः प्रीतोऽभवद् भवः ।
उवाच चैनं वचसा मेघगम्भीरगीर्हरः ।
जातविस्मयमालोक्य तपःक्षीणाङ्गसंहतिम् ॥ ६७ ॥
और किरातरूपी भगवान् शंकरके चरणोंमें गिर पड़े। उस समय तपस्याके कारण उनके समस्त अवयव क्षीण हो रहे थे और वे महान् आश्चर्यमें पड़ गये थे, उन्हें इस अवस्थामें देखकर सर्वपापहारी भगवान् भव उनपर बहुत प्रसन्न हुए और मेघके समान गम्भीर वाणीमें बोले ॥ ६७ ॥
भव उवाच
भो भोः फाल्गुन तुष्टोऽस्मि कर्मणाप्रतिमेन ते ।
शौर्येणानेन धृत्या च क्षत्रियो नास्ति ते समः ॥ ६८ ॥
**भगवान् शिवने कहा—**फाल्गुन! मैं तुम्हारे इस अनुपम पराक्रम, शौर्य और धैर्यसे बहुत संतुष्ट हूँ। तुम्हारे समान दूसरा कोई क्षत्रिय नहीं है ॥ ६८ ॥
समं तेजश्च वीर्यं च ममाद्य तव चानघ ।
प्रीतस्तेऽहं महाबाहो पश्य मां भरतर्षभ ॥ ६९ ॥
अनघ! तुम्हारा तेज और पराक्रम आज मेरे समान सिद्ध हुआ है। महाबाहु भरतश्रेष्ठ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। मेरी ओर देखो ॥ ६९ ॥
ददामि ते विशालाक्ष चक्षुः पूर्वऋषिर्भवान् ।