महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 307, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर किरातरूपी भगवान् शिव भी अत्यन्त दारुण और इन्द्रके वज्रके समान दुःसह मुक्कोंसे मारकर अर्जुनको पीड़ा देने लगे ॥ ५६ ॥ ततश्चटचटाशब्दः सुघोरः समजायत । पाण्डवस्य च मुष्टीनां किरातस्य च युध्यतः ॥ ५७ ॥ फिर तो घमासान युद्धमें लगे हुए पाण्डुनन्दन अर्जुन तथा किरातरूपी शिवके मुक्कोंका एक-दूसरेके शरीरपर प्रहार होनेसे बड़ा भयंकर 'चट-चट' शब्द होने लगा ॥ ५७ ॥ सुमुहूर्तं तु तद् युद्धमभवल्लोमहर्षणम् । भुजप्रहारसंयुक्तं वृत्रवासवयोरिव ॥ ५८ ॥ वृत्रासुर और इन्द्रके समान उन दोनोंका वह रोमांचकारी बाहुयुद्ध दो घड़ीतक चलता रहा ॥ ५८ ॥ जघानाथ ततो जिष्णुः किरातमुरसा बली । पाण्डवं च विचेष्टं तं किरातोऽप्यहनद् बली ॥ ५९ ॥ तत्पश्चात् बलवान् वीर अर्जुनने अपनी छातीसे किरातको बड़े जोरसे मारा, तब महाबली किरातने भी विपरीत चेष्टा करनेवाले पाण्डुनन्दन अर्जुनपर आघात किया ॥ ५९ ॥ तयोर्भुजविनिष्पेषात् संघर्षेणोरसोस्तथा । समजायत गात्रेषु पावकोऽङ्गारधूमवान् ॥ ६० ॥ उन दोनोंकी भुजाओंके टकराने और वक्षःस्थलोंके संघर्षसे उनके अंगोंमें धूम और चिनगारियोंके साथ आग प्रकट हो जाती थी ॥ ६० ॥ तत एनं महादेवः पीड्य गात्रैः सुपीडितम् । तेजसा व्यक्रमद् रोषाच्चेतस्तस्य विमोहयन् ॥ ६१ ॥ तदनन्तर! महादेवजीने अपने अंगोंसे दबाकर अर्जुनको अच्छी तरह पीड़ा दी और उनके चित्तको मूर्च्छित-सा करते हुए उन्होंने तेज तथा रोषसे उनके ऊपर अपना पराक्रम प्रकट किया ॥ ६१ ॥ ततोऽभिपीडितैर्गात्रैः पिण्डीकृत इवाबभौ । फाल्गुनो गात्रसंरुद्धो देवदेवेन भारत ॥ ६२ ॥ भारत! तदनन्तर देवाधिदेव महादेवजीके अंगोंसे अवरुद्ध हो अर्जुन अपने पीड़ित अवयवोंके साथ मिट्टीके लोंदे-से दिखायी देने लगे ॥ ६२ ॥ निरुच्छ्वासोऽभवच्चैव संनिरुद्धो महात्मना । पपात भूम्यां निश्चेष्टो गतसत्त्व इवाभवत् ॥ ६३ ॥ महात्मा भगवान् शंकरके द्वारा भलीभाँति नियन्त्रित हो जानेके कारण अर्जुनकी श्वासक्रिया बंद हो गयी। वे निष्प्राणकी भाँति चेष्टाहीन होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ६३ ॥