महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 306, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रगृह्याथ धनुष्कोट्या ज्यापाशेनावकृष्य च । मुष्टिभिश्चापि हतवान् वज्रकल्पैर्महाद्युतिः ॥ ४९ ॥ ऐसा विचारकर महातेजस्वी अर्जुनने किरातको अपने धनुषकी कोटिसे पकड़कर उसकी प्रत्यञ्चामें उसके शरीरको फँसाकर खींचा और वज्रके समान दुःसह मुष्टिप्रहारसे पीड़ित करना प्रारम्भ किया ॥ ४९ ॥
सम्प्रयुद्धो धनुष्कोट्या कौन्तेयः परवीरहा । तदप्यस्य धनुर्दिव्यं जग्राह गिरिगोचरः ॥ ५० ॥ शत्रु-वीरोंका संहार करनेवाले कुन्तीकुमार अर्जुनने जब धनुषकी कोटिसे प्रहार किया, तब उस पर्वतीय किरातने अर्जुनके उस दिव्य धनुषको भी अपनेमें लीन कर लिया ॥ ५० ॥
ततोऽर्जुनो ग्रस्तधनुः खड्गपाणिरतिष्ठत । युद्धस्यान्तमभीप्सन् वै वेगेनाभिजगाम तम् ॥ ५१ ॥ तदनन्तर धनुषके ग्रस्त हो जानेपर अर्जुन हाथमें तलवार लेकर खड़े हो गये और युद्धका अन्त कर देनेकी इच्छासे वेगपूर्वक उसपर आक्रमण किया ॥ ५१ ॥
तस्य मूर्ध्नि शितं खड्गमसक्तं पर्वतेष्वपि । मुमोच भुजवीर्येण विक्रम्य कुरुनन्दनः ॥ ५२ ॥ उनकी वह तलवार पर्वतोंपर भी कुण्ठित नहीं होती थी। कुरुनन्दन अर्जुनने अपने भुजाओंकी पूरी शक्ति लगाकर किरातके मस्तकपर उस तीक्ष्ण धारवाली तलवारसे वार किया ॥ ५२ ॥
तस्य मूर्धानमासाद्य पफालासिवरो हि सः । ततो वृक्षैः शिलाभिश्च योधयामास फाल्गुनः ॥ ५३ ॥ परंतु उसके मस्तकसे टकराते ही वह उत्तम तलवार टूक-टूक हो गयी। तब अर्जुनने वृक्षों और शिलाओंसे युद्ध करना आरम्भ किया ॥ ५३ ॥
तदा वृक्षान् महाकायः प्रत्यगृह्णादथो शिलाः । किरातरूपी भगवांस्ततः पार्थो महाबलः ॥ ५४ ॥ मुष्टिभिर्वज्रसंकाशैर्धूममुत्पादयन् मुखे । प्रजहार दुराधर्षे किरातसमरूपिणि ॥ ५५ ॥ तब विशालकाय किरातरूपी भगवान् शंकरने उन वृक्षों और शिलाओंको भी ग्रहण कर लिया। यह देखकर महाबली कुन्तीकुमार अपने वज्रतुल्य मुक्कोंसे दुर्धर्ष किरात-सदृश रूपवाले भगवान् शिवपर प्रहार करने लगे। उस समय क्रोधके आवेशसे अर्जुनके मुखसे धूम प्रकट हो रहा था ॥ ५४-५५ ॥
ततः शक्राशनिसमैर्मुष्टिभिर्भृशदारुणैः । किरातरूपी भगवानर्दयामास फाल्गुनम् ॥ ५६ ॥