भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1938, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1938

'परंतप! महाराज कुबेर आपको यह जल इस उद्देश्यसे समर्पित कर रहे हैं कि आप इसे नेत्रोंमें लगाकर मायासे अदृश्य हुए प्राणियोंको देख सकें ।। १० ।। अनेन मृष्टनयनो भूतान्यन्तर्हितान्युत । भवान् द्रक्ष्यति यस्मै च प्रदास्यति नरः स तु ।। ११ ।। 'उन्होंने कहा है कि आप इस जलसे अपने दोनों नेत्र धोकर अदृश्य प्राणियोंको भी देख सकेंगे और आप जिसे यह जल अर्पित करेंगे, वह मनुष्य भी अदृश्य भूतोंको देखनेमें समर्थ होगा' ।। ११ ।। तथेति रामस्तद् वारि प्रतिगृह्याभिसंस्कृतम् । चकार नेत्रयोः शौचं लक्ष्मणश्च महामनाः ।। १२ ।। 'बहुत अच्छा' कहकर श्रीरामचन्द्रजीने वह अभिमन्त्रित जल ले लिया। फिर उन्होंने तथा महामना लक्ष्मणने भी उससे अपने दोनों नेत्र धोये ।। १२ ।। सुग्रीवजाम्बवन्तौ च हनुमानङ्गदस्तथा । मैन्दद्विविदनीलाश्च प्रायः प्लवगसत्तमाः ।। १३ ।। सुग्रीव, जाम्बवान्, हनुमान्, अंगद, मैन्द, द्विविद तथा नील आदि प्रायः सभी प्रमुख वानरोंने उस जलसे अपनी-अपनी आँखें धोयीं ।। १३ ।। तथा समभवच्चापि यदुवाच विभीषणः । क्षणेनातीन्द्रियाण्येषां चक्षूंष्यासन् युधिष्ठिर ।। १४ ।। युधिष्ठिर! जैसा विभीषणने बताया था, उसका वैसा ही प्रभाव देखनेमें आया। इन सबकी आँखें क्षणभरमें अतीन्द्रिय वस्तुओंका साक्षात्कार करनेवाली हो गयीं ।। १४ ।। इन्द्रजित् कृतकर्मा च पित्रे कर्म तदाऽऽत्मनः । निवेद्य पुनरागच्छत् त्वरयाऽऽजि शिरःप्रति ।। १५ ।। इन्द्रजित्ने उस दिन युद्धमें जो पराक्रम कर दिखाया था, अपने उस वीरोचित कर्मको पितासे बताकर वह पुनः युद्धके मुहानेकी ओर लौटने लगा ।। १५ ।। तमापतन्तं संक्रुद्धं पुनरेव युयुत्सया । अभिदुद्राव सौमित्रिर्विभीषणमते स्थितः ।। १६ ।। उसे क्रोधमें भरकर पुनः युद्धकी इच्छासे आते देख विभीषणकी सम्मतिसे लक्ष्मणने उसपर धावा किया ।। १६ ।। अकृताह्निकमेवैनं जिघांसुर्जितकाशिनम् । शरैर्जघान संक्रुद्धः कृतसंज्ञोऽथ लक्ष्मणः ।। १७ ।। इन्द्रजित् विजयके उल्लाससे सुशोभित हो रहा था। अभी उसने नित्यकर्म भी नहीं किया था, उसी अवस्थामें सचेत हुए लक्ष्मणने कुपित होकर उसे मार डालनेकी इच्छासे उसपर बाणोंद्वारा प्रहार करना आरम्भ किया ।। १७ ।। तयोः समभवद् युद्धं तदान्योन्यं जिगीषतोः ।