महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1937, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंफिर सुग्रीवने दिव्य मन्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित विशल्या नामक महौषधिद्वारा उनके अंगोंसे बाण निकालकर उन्हें क्षणभरमें स्वस्थ कर दिया ।। ६ ।। तौ लब्धसंज्ञौ नृवरौ विशल्यावुदतिष्ठताम् । गततन्द्रीक्लमौ चापि क्षणेनैतौ महारथौ ।। ७ ।। होशमें आ जानेपर वे दोनों नरश्रेष्ठ महारथी वीर बाणोंसे रहित हो आलस्य और थकावट त्यागकर क्षणभरमें उठ खड़े हुए ।। ७ ।। ततो विभीषणः पार्थ राममिक्ष्वाकुनन्दनम् । उवाच विज्वरं दृष्ट्वा कृताञ्जलिरिदं वचः ।। ८ ।। युधिष्ठिर! तदनन्तर विभीषणने इक्ष्वाकुकुलनन्दन श्रीरामचन्द्रजीको नीरोग एवं स्वस्थ देख हाथ जोड़कर इस प्रकार कहा— ।। ८ ।। इदमम्भो गृहीत्वा तु राजराजस्य शासनात् । गुह्यकोऽभ्यागतः श्वेतात् त्वत्सकाशमरिन्दम ।। ९ ।। 'शत्रुदमन! राजाधिराज कुबेरकी आज्ञासे एक गुह्यक यह जल लिये हुए श्वेतपर्वतसे चलकर आपके समीप आया है ।। ९ ।। इदमम्भः कुबेरस्ते महाराजः प्रयच्छति । अन्तर्हितानां भूतानां दर्शनार्थं परंतप ।। १० ।।